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सहजन फसल की वैज्ञानिक खेती कर कमाएं लाखों, पढ़ें सम्पूर्ण जानकारी

हेमन्त वर्मा
हेमन्त वर्मा

सहजन या मोरिंगा एक औषधीय पौधा है. इसके सभी भागों का उपयोग किया जा सकता है. जिससे इसका महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है. सहजन का उपयोग आज के समय में भोजन, दवा, पशुचारा आदि कार्यों में किया जाता है. सहजन का फुल, फल और पत्तियों का भोजन के रूप उपयोग किया जाता है और सहजन में प्रचुर मात्रा में विटामिन एवं पोषक तत्व पाये जाते हैं. इसकी छाल, पत्ती, बीज, गोंद, जड़ आदि से औषधीय दवाएँ तैयार की जाती है इसकी पत्तियाँ मवेशियों के चारा के रूप में भी इस्तेमाल की जाती है.  

सहजन या मोरिंगा की खेती के लिए जलवायु (Climate for Drumstick Farming):

सहजन की खेती देश के ज़्यादातर हिस्सो में की जा सकती है किन्तु इसके लिए गर्म और नमीयुक्त जलवायु और फूल खिलने के लिए सूखा मौसम अच्छा माना जाता है. इसका पौधा सूखे की स्थिति में भी जिंदा रह सकता है. सहजन के फूलों के लिए 25 से 30 डिग्री से अनुकूल होता है.   

सहजन खेती के लिए भूमि चुनाव (Land selection for drumstick farming)

सहजन की खेती बलुई से लगाकर चिकनी मिट्टी में की जा सकती है मगर इसके लिए सर्वोत्तम मिट्टी बलुई दोमट है जिसमें जल निकास प्रबन्धन ठीक से हो. समुद्र तटीय इलाके की मिट्टी और कमजोर गुणवत्ता वाली मिट्टी को भी यह पौधा सहन कर लेता है. कम या अधिक pH मान की मिट्टी इसके विकास को कम कर देती है.

सहजन की उन्नत किस्में (Advanced varieties of drumstick)

रोहित-1: पौधारोपन के 4 से 6 महीने के बाद ये उत्पादन शुरू कर देता है और 10 साल तक उत्पादन देता रहता है. इस किस्म से एक साल में दो बार उत्पादन लिया जा सकता है. इसमें फली गहरे हरे रंग की 45 से 60 इंच की होती है और इसका गुदा मुलायम होता है तथा इसकी गुणवत्ता भी बहुत अच्छी होती है.

कोयम्बटूर-1: यह किस्म करीब 250 से 350 फलियाँ देता है. इसकी फली के लम्बाई 25 से 40 सेमी तक है.

कोयम्बटूर-2: इसकी फली की लंबाई 25 से 35 सेमी होती है. फली का रंग गहरा हरा और स्वादिस्ट होता है. प्रत्येक पौधा करीब 250 से 375 फली पैदा करता है.

पी.के.एम-2: इसके प्रत्येक फली लंबाई 45 से 75 सेमी होती है. प्रत्येक पौधा लगभग 300 से 400 फली उत्पादित करता है . इस किस्म को अधिक पानी की आवश्यकता होती है.

बुवाई/रोपण का तरीका (Method of sowing/ planting)

पौधे को लगाने से पहले जमीन की पहले अच्छे से जुताई कर लें. बीजारोपन से पहले 50 सेमी गहरा और चौड़ा गड्ढा खोद लें. जिससे पौधे की जड़ तेजी से फैल सके. पांच किलो गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट को प्रति गड्ढा मिट्टी के साथ मिला दें. उस मिट्टी को गड्ढे में ना मिलाये जो खुदाई के दौरान निकाली गई है. नर्सरी से पौधे को निकालने से पहले अच्छा पानी दे ताकि पौधा निकालते समय पौधे की जड़ें न टूटे. अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में पौधे को मिट्टी को ढेर की शक्ल में खड़ा कर सकते हैं ताकि पानी वहां से निकल जाए. शुरुआत के कुछ दिनों तक ज्यादा पानी नहीं दें. अगर पौधा गिरता है तो उसे एक लकड़ी की सहायता से सहारा देकर बांध दें.

ज्यादा बारिश का और ज्यादा ठंड का मौसम छोड़ कर सहजन को सालभर में कभी भी लगा सकते हैं. सहजन का पौधारोपण सामान्यतया जून में पहली बारिश के बाद किया जाता है . अंकुरण के 50 से 60 दिनों बाद या सीधे बीजों से उगाये जाते है. प्रत्येक गड्ढे में 2 बीज डाले जाते है. दो पौधों में 3 x 3 मी की दूरी रखनी चाहिए. 

पौध संरक्षण (Plant Protection / Crop Management)

वैसे तो सहजन की फसल में कोई कीट या रोग सामान्य रूप से नहीं लगता किन्तु कुछ कीट या रोग फसल की उपज को नुकसान जरूर पहुंचा सकते हैं.

भूमिगत कीट या दीमक: जिस क्षेत्र में कीट की समस्या हो वहाँ इमिडाक्लोप्रिड 600 FS की 1.5 मिलीलीटर मात्रा को अवश्यकतानुसार पानी में मिलाकर उसका घोल बीजों पर समान रूप से छिड़काव कर उपचारित करें या फिपरोनिल 5 SC 10 मिलीलीटर प्रति किलो बीज उपचारित करें.

अंतिम जुताई के समय क्यूनोलफॉस 1.5% चूर्ण 10 किलो प्रति एकड़ की दर से मिट्टी में मिला दें. या जैविक फफूंदनाशी बुवेरिया बेसियाना एक किलो या मेटारिजियम एनिसोपली एक किलो मात्रा को एक एकड़ खेत में 100 किलो गोबर की खाद में मिलाकर खेत में बीखेर दें.

रसचूसक कीट: इस प्रकार के कीटों से बचाव हेतु एसिटामिप्रीड 20% SP की 80 ग्राम मात्रा या थियामेंथोक्साम 25% WG की 100 ग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर दें. यह मात्रा एक एकड़ क्षेत्र के लिए प्रायप्त है. जैविक उपचार के रूप में बवेरिया बेसियाना पाउडर की 250 ग्राम मात्रा भी एकड़ की दर से छिड़काव किया जा सकता है.

फल मक्खी: सहजन फल पर फल मक्खी का आक्रमण हो सकता है. इस कीट के नियंत्रण हेतु भी डाइक्लोरोवास 0.5 मिली. दवा एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने पर कीट का नियंत्रण किया जा सकता है.

जड़ सड़न रोग: रोग नियंत्रण के लिए 5-10 ग्राम ट्राइकोडर्मा एक प्रति किलो दर से बीज उपचार किया जा सकता है. रासायनिक कार्बेण्डजिम 50% WP की 2 ग्राम मात्रा को एक लीटर पानी में मिलाकर जमीन में तने के पास डालें.   

खाद एवं उर्वरक (Manure and fertilizer)

300 ग्राम अच्छे सड़ी गोबर की खाद सितम्बर और दिसम्बर में तथा 250 ग्राम गोबर की खाद अप्रेल में दें. उर्वरक में प्रति वर्ष 500 ग्राम की या आवश्यकता अनुसार वृद्धि करें.

सिंचाई व्यवस्था (Irrigation system)

अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई लाभदायक सिद्ध होती है. गड्ढों में बीज से बुवाई की गई है तो बीज के अंकुरण और अच्छी तरह से लगने तक नमी का बना रहना आवश्यक है. फूल लगने के समय खेत ज्यादा सूखा या ज्यादा गीला रहने पर दोनों ही अवस्था में फूल के झड़ने की समस्या होती है. गर्मी की मौसम में आवश्यकतानुसार 10 दिन के अन्तराल में सिंचाई करें. 

हल्की मिट्टी में 10 से 12 दिनों के भीतर तथा काली भरी मिट्टी में 15 से 20 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई आवश्यक है. फरवरी के बाद सिंचाई बंद कर देनी चाहिए क्योकि पत्तिया गिरने लगती है तथा पेड़ सुसुप्ता अवस्था में चला जाता है. अक्टूम्बर माह में सिंचाई रोक देनी चाहिए ताकि नवम्बर-दिसम्बर में फूल लग सके. फूल लगने के बाद फलिया आने तक 10 से 20 दिनों के नियमित अन्तराल पर सिंचाई जरुरी है.

खरपतवार प्रबंधन (Weed management)

जुताई के समय सभी खरपतवार को साफ कर दे तथा बीजाई के बाद और अंकुरण से पहले खरपतवार नियंत्रण के लिए पेंडिमेथालीन 38.7% CS @ 700 मिली/एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर देना चाहिए. ताकि फसल में दोनों प्रकार के संकरी और चौड़ी पत्ती के खरपतवार को उगने से पहले ही नष्ट किया जा सके. पौधों के विकास के शुरुआती चरणों के दौरान रिक्त स्थान को लगातार निराई करके खरपतवार रहित रखना चाहिए.

तुड़ाई या छंटाई और उपज (Picking or Sorting and Yield)

जब पौधे 1 मीटर के हो जाए तो पौधे की उपरी डालियाँ काट देनी चाहिए जिससे अधिक और अच्छी किस्म का उत्पादन हो सके . पहली छंटाई रोपण के दो महीने बाद या पौधे के 1 मीटर की ऊंचाई तक हो जाने के बाद की जानी चाहिए. 

साल में दो बार फल देने वाले सहजन की किस्मों की तुड़ाई सामान्यतया फरवरी-मार्च और सितम्बर-अक्टूबर में होती है. प्रत्येक पौधे से लगभग 200-400 फली (40-50 किलो) सहजन सालभर में प्राप्त हो जाता है. सहजन के फल में रेशा आने से पहले ही तुड़ाई करना चाहिए  इससे लाभ भी ज्यादा मिलता है.  

भंडारण (Storage)

सहजन की पत्तों की खेती में तीन 3 महीने के अंतराल से कटाई छटाई होती है. इस प्रकार से सहजन की 1 साल में चार बार कटाई होती है. लेकिन पहली कटाई चार या पांच वे माह में आ सकती है. सहजन की डालियों को काटने के बाद उसमें से छोटी डालिया अलग करनी है और उन छोटी डालियों को पानी से धोना चाहिए. पानी से धोने के बाद इन पत्तियों को छांव में सुखाने के लिए रख दे. आमतौर पर सहजन की पत्तियां 3 से 4 दिन में सूख जाती है. पत्तों को सुखाने के बाद इनको बोरियों में भरा जाता है और बाद मे इन्हें स्टोर किया या बेचा जा सकता है.

लागत और शुद्ध लाभ (Cost and net profit)

वैज्ञानिक विधि से पांच साल तक खेती करने पर लगभग 1,78,000 रूपये का खर्च आता है. वहीं पांच वर्ष में शुद्ध लाभ 6,16,000 रुपये है. अधिक जानकारी के लिए https://www.hcms.org.in/ वेबसाइट या 97850-15005, 98875-55005, 81073-79410, 83291-99541, 96100-02243, 78919-55005 नम्बर पर सम्पर्क किया जा सकता है.

बीज या पौधे प्राप्ति का स्थान (Seed or Plant location)

बीज या पौध की प्राप्ति के लिए जिले के कृषि विज्ञान केन्द्र में या नजदीकी कृषि विश्वविद्यालय से प्राप्त किया जा सकता है.

निजी क्षेत्र में बीज प्राप्त करने के लिए 08048758982 या 08048006776 पर भी सम्पर्क किया जा सकता है.

English Summary: Earn millions by doing scientific farming of drunken crops, read all information

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