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खेती से 100 करोड़ का टर्नओवर: हेलीकॉप्टर के बाद अब हवाई जहाज से कृषि क्रांति लाएंगे डॉ. राजाराम त्रिपाठी

Success Story of Successful Farmer Dr. Rajaram Tripathi: डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने सुरक्षित बैंक नौकरी छोड़कर खेती को अपना मिशन बनाया और बस्तर में औषधीय व बहुस्तरीय खेती से कृषि क्रांति खड़ी की। 100 करोड़ से अधिक टर्नओवर वाले उनके कृषि मॉडल से लाखों किसान प्रेरित हो रहे हैं। हेलीकॉप्टर के बाद अब वे खेती के लिए हवाई जहाज अपनाने जा रहे हैं, जिससे वे देश के पहले “हवाई जहाज वाले किसान” बनेंगे।

विवेक कुमार राय
success story of Bastars herbal king Dr Rajaram Tripathi
बस्तर के 'हर्बल किंग' डॉ. राजाराम त्रिपाठी की सफलता की कहानी

Success Story of Successful Farmer Dr. Rajaram Tripathi: छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे चुनौतीपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र से निकलकर अपनी मेहनत, जिद और नवाचार के दम पर कृषि जगत में वैश्विक पहचान बनाने वाले डॉ. राजाराम त्रिपाठी आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनकी कहानी एक प्रेरणादायक यात्रा है, जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एक प्रोबेशनर ऑफिसर की सुरक्षित नौकरी से शुरू होकर मिट्टी के प्रति उनके अगाध प्रेम तक पहुंचती है। डॉ. त्रिपाठी ने न केवल अपनी जिंदगी बदली, बल्कि 1200 एकड़ से अधिक जमीन पर औषधीय पौधों, मसालों और हर्बल खेती के माध्यम से सैकड़ों आदिवासी किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है।

आठवीं की बोर्ड परीक्षा में मेरिट में स्थान पाने वाले डॉ. त्रिपाठी ने शिक्षा के क्षेत्र में भी असाधारण उपलब्धियां हासिल कीं। उन्होंने छह विषयों में एमए किया, एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और बिलासपुर हाईकोर्ट में पंजीकृत अधिवक्ता भी रहे। जनजातीय सहित कई विषयों पर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की, प्रोफेसर रहे और बाद में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में उच्च अधिकारी के पद तक पहुंचे। लेकिन एक झटके में उन्होंने नौकरी, पद और सुरक्षित भविष्य छोड़कर खेती को अपना जीवन बना लिया। पिछले 30 वर्षों से वे खेती में ऐसे रम गए हैं जैसे कोई साधक अपनी तपस्या में लीन हो जाता है।

डॉ. त्रिपाठी का फार्म किसी सामान्य फार्म हाउस जैसा नहीं लगता, बल्कि किसी तपस्वी के आश्रम की अनुभूति कराता है। यहां देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी किसान सीखने और समझने के लिए पहुंचते हैं। खास बात यह है कि उन्होंने आज तक किसी भी किसान को निराश नहीं किया। अब तक 25 लाख से अधिक किसान किसी न किसी रूप में उनके साथ जुड़ चुके हैं और उनके अनुभवों से लाभान्वित हुए हैं।

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MFOI Awards 2023 में रिचेस्ट फार्मर ऑफ इंडिया अवार्ड प्राप्त करते हुए सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी

उन्हें उनकी अभूतपूर्व उपलब्धियों के लिए ‘हरित-योद्धा’, ‘कृषि-ऋषि’, ‘हर्बल किंग’ और ‘रिचेस्ट फार्मर ऑफ इंडिया’ जैसी उपाधियों से सम्मानित किया गया है। पहले खेती के लिए हेलीकॉप्टर खरीदकर सुर्खियां बटोरने वाले डॉ. त्रिपाठी अब कृषि कार्यों के लिए हवाई जहाज लेने का निर्णय ले चुके हैं, जिससे वे भारत के पहले ‘हवाई जहाज वाले किसान’ बन जाएंगे। 100 करोड़ रुपये से ज्यादा के सालाना टर्नओवर वाले समूह का नेतृत्व करने के बावजूद उनकी सादगी, आध्यात्मिक सोच और मिट्टी से जुड़ाव उन्हें एक वास्तविक ‘कृषि-ऋषि’ बनाता है। प्रस्तुत है कृषि जागरण के साथ डॉ. त्रिपाठी की विस्तृत बातचीत के संपादित अंश-

सवाल: वर्तमान में आप किन मुख्य फसलों की खेती कर रहे हैं?
जवाब: हम मुख्य रूप से बहुस्तरीय खेती करते हैं। हम ऊंचे पेड़ लगाते हैं और उन पर काली मिर्च जैसी लताएं चढ़ाते हैं। पेड़ों के नीचे हम हल्दी, अदरक, सफेद मूसली, स्टीविया, अश्वगंधा, कालमेघ, ब्राह्मी और इंसुलिन प्लांट जैसी औषधीय फसलों और मसालों की खेती करते हैं। हम एक ही जमीन पर एक साथ चार-पांच फसलें लेते हैं। प्राचीन ग्रंथों, जैसे 'कृषि पराशर' में भी लिखा है कि धरती को आराम की जरूरत होती है। इसलिए साल में तीन अलग-अलग फसलें लेने के बजाय, एक ही समय में बड़े पेड़, झाड़ियां और छाया में उगने वाले पौधों का संयोजन (Combination) सबसे अधिक लाभदायक होता है।

सवाल: आपने एक सुरक्षित बैंक की नौकरी छोड़ी। आज के युवाओं के लिए 'खेती या नौकरी' के द्वंद्व पर आपकी क्या राय है?

जवाब:  यह सच है कि हर शिक्षित युवा आईएएस या कलेक्टर बनने का सपना देखता है। लेकिन मेरा मानना है कि चाहे आप कलेक्टर हों या चपरासी, बिना भोजन के चैन नहीं मिल सकता। भोजन खेत से आता है, इसलिए नौकरी से ज्यादा जरूरी खेती है। नौकरी व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक हो सकती है, लेकिन मानवता के अस्तित्व के लिए अनाज और उसे उगाने वाला किसान ही सबसे महत्वपूर्ण है। मैंने खुद बैंक की नौकरी छोड़कर खेती को इसलिए चुना क्योंकि मैं व्यवस्था का हिस्सा बनने के बजाय व्यवस्था का पोषण करना चाहता था।

सवाल: डॉ. त्रिपाठी, आपने काली मिर्च की एक क्रांतिकारी किस्म MDBP-16 विकसित की है। इस सफर और इसके पीछे के 30 वर्षों के संघर्ष के बारे में विस्तार से बताएं।

जवाब: MDBP-16 का विकास केवल एक कृषि उपलब्धि नहीं, बल्कि तीन दशकों की तपस्या का परिणाम है। ऐतिहासिक रूप से काली मिर्च की खेती केवल दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों तक सीमित मानी जाती थी। जब मैंने मध्य भारत के बस्तर में इसकी खेती की बात की, तो विशेषज्ञों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यहां केवल वानस्पतिक विकास होगा, फल नहीं आएंगे; और यदि फल आए भी, तो उनकी गुणवत्ता खराब होगी।

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काली मिर्च के बाग में सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी, फोटो साभार: कृषि जागरण

लेकिन जब मैंने गुणवत्ता की जांच कराई, तो हमारी काली मिर्च में पाइपरिन (Piperine) का प्रतिशत 16% पाया गया, जो देश में सबसे अधिक है। इसी शोध और सफलता के आधार पर हमने 2016 में इसे पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किया, इसलिए इसका नाम MDBP-16 रखा गया। आज यह किस्म 16 राज्यों में सफलतापूर्वक उगाई जा रही है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी उत्पादकता है। जहां सामान्य पेड़ 1.5 से 2.5 किलो उपज देते हैं, वहीं MDBP-16 प्रति पेड़ 8 से 10 किलो तक काली मिर्च प्रदान करती है। वैज्ञानिकों ने इसे "बस्तर का काला सोना" (Black Gold of Bastar) कहा है।

सवाल: परंपरागत कृषि में पॉली हाउस का क्या विकल्प उपलब्ध है?
जवाब: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण बढ़ती गर्मी एक बड़ी समस्या है। अत्यधिक तेज रोशनी के कारण 10:30 से 3:30 बजे के बीच पौधे प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) नहीं कर पाते, जिससे उत्पादन घट जाता है। पॉली हाउस इस रोशनी को कम करने के लिए प्लास्टिक का उपयोग करते हैं, जो प्रतिबंधित और पर्यावरण के लिए हानिकारक है।

इसका श्रेष्ठ विकल्प प्रकृति ने स्वयं दिया है- पेड़ों के माध्यम से 'नेचुरल शेड' तैयार करना। हमने पेड़ लगाकर ऐसा मॉडल बनाया है जो न केवल छाया देता है, बल्कि उसकी पत्तियां बेहतरीन खाद भी बनाती हैं। ये पेड़ (जैसे ऑस्ट्रेलियन टीक) नाइट्रोजन फिक्सेशन करके मिट्टी को प्राकृतिक यूरिया प्रदान करते हैं। इस मॉडल में 90% जगह खाली रहती है जहां आप अन्य फसलें उगा सकते हैं। साथ ही, इन पेड़ों पर काली मिर्च या गिलोय जैसी लताएं चढ़ाकर 30-40 फीट की ऊंचाई तक उत्पादन लिया जा सकता है। जहां अनाज की बालियां केवल 6-8 इंच तक सीमित रहती हैं और बाकी हिस्सा पराली (वेस्टेज) बन जाता है, वहीं यह प्राकृतिक विकल्प एक एकड़ को 50-60 एकड़ की उत्पादकता में बदल सकता है। भारत के लिए यह प्राकृतिक विकल्प किसी वरदान से कम नहीं है।

सवाल: छोटे किसानों के लिए पॉली हाउस (Poly House) में खेती करना कितना व्यावहारिक है?
जवाब: पॉली हाउस उन पूंजीपतियों के लिए तो अच्छा है जिनके पास निवेश के लिए भरपूर पैसा है, लेकिन आम किसान के लिए यह घाटे का सौदा साबित हो सकता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एक एकड़ में पॉली हाउस लगाने की लागत लगभग ₹40 लाख है। 50% सब्सिडी के बाद भी किसान को भारी कर्ज चुकाना पड़ता है और उसे हर साल ₹6-7 लाख केवल ब्याज और किश्त के लिए कमाने होंगे, जो बहुत कठिन है। यह केवल तभी लाभदायक है जब आपके पास नर्सरी या विदेशी सब्जियों (Exotic Vegetables) और फूलों का निर्यात आर्डर हो। सामान्य सब्जियां उगाने के चक्कर में ₹40 लाख का 'सफेद हाथी' पालने से किसान की जमीन भी नीलाम हो सकती है।

सवाल: खेती से करोड़ों की कमाई कितनी सच है?
जवाब: खेती से करोड़ों की कमाई उतनी ही सच है जितनी किसी उद्योग या खेल (जैसे क्रिकेट) में सफलता। सही रणनीति और सही तरीके से काम करने वाले कई लोगों ने खेती से करोड़ों कमाए हैं। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि हर खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर या विराट कोहली नहीं हो सकता, पर इसका मतलब यह नहीं कि हम खेलना छोड़ दें। आज जो करोड़ों कमा रहे हैं, 25 साल पहले उनका इतिहास भी आम किसानों जैसा ही था। उन्होंने संघर्ष, सही समय पर सही निर्णय और मेहनत के ज़रिए सफलता हासिल की है। भारत की खेती में समस्याएं भी हैं और कीर्तिमान भी।

Dr Rajaram Tripathi
काली मिर्च के बाग में सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी, फोटो साभार: कृषि जागरण

सवाल: क्या कोई ऐसी एक फसल है जो सभी किसानों को उगानी चाहिए?
जवाब: मेरा मानना है कि कोई भी एक ऐसी फसल नहीं है जिसे सभी किसानों को उगाना चाहिए। खेती में विविधता (Diversity) का होना बहुत आवश्यक है। हर किसान को फसल का चुनाव करते समय अपने खेत की मिट्टी, उपलब्ध सिंचाई की सुविधा और अपनी निवेश क्षमता को ध्यान में रखना चाहिए।

इसके अलावा, यह भी महत्वपूर्ण है कि किसान को पैसे की वापसी कब चाहिए। उदाहरण के लिए, एक बड़ा किसान 2 साल तक इंतज़ार कर सकता है, लेकिन एक छोटे किसान को अपनी आजीविका के लिए नियमित आय की आवश्यकता होती है। अतः अपनी आवश्यकता, पूंजी और जलवायु (Climate) जैसे महत्वपूर्ण कारकों को देख कर ही फसल का चयन करना चाहिए, क्योंकि हर जलवायु में हर फसल नहीं उग सकती।

सवाल: आपके अनुसार खेती में सबसे बड़ी गलती क्या है?
जवाब: सबसे बड़ी गलती है दूसरों की देखा-देखी खेती करना। अक्सर किसान दूसरों की कमाई की बातें सुनकर बिना सोचे-समझे वही फसल उगाने लगते हैं। जब हम इस तरह की 'भेड़ चाल' में चलते हैं, तो अक्सर हमें भारी नुकसान उठाना पड़ता है।

सवाल: खेती में धैर्य कितना जरूरी है?
जवाब: मेरा मानना है कि खेती की शुरुआत ही धैर्य से होती है। जब आप बीज बोते हैं, तो उसके अंकुरित होने और बढ़ने का आपको इंतजार करना पड़ता है। जैसा कि कबीरदास जी ने भी कहा है-"माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय"। इसका अर्थ है कि फसल में फल तभी आएगा जब उसका सही समय होगा। किसान से ज्यादा धैर्यवान कोई नहीं होता। सूखा पड़े या बाढ़ आए, किसान इन चुनौतियों के बावजूद अगले साल फिर पूरे धीरज के साथ बीज बोता है। इसलिए मेरा मानना है कि खेती और धीरज एक-दूसरे के पूरक हैं; खेती धीरज का ही दूसरा नाम है।

सवाल: एक किसान को पहले क्या सीखना चाहिए- उत्पादन या मार्केटिंग?
जवाब: मेरा मानना है कि किसान को सबसे पहले मार्केटिंग पर अपना 'होमवर्क' करना चाहिए। उसे बाजार में डिमांड और सप्लाई (मांग और आपूर्ति) की स्थिति का गहन अध्ययन करना चाहिए। यदि आप ऐसी कोई फसल उगा लेते हैं जिसकी बाजार में मांग ही नहीं है या बहुत कम है, तो आपको उसे बेचने के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा। इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि मांग और आपूर्ति के बीच कितना अंतर है और बाजार वास्तव में क्या चाहता है, क्योंकि बाजार ही 'राजा' है। हमें बाजार की आवश्यकता को उत्पादन की मात्रा और उसकी गुणवत्ता (Quality), दोनों ही स्तरों पर पूरा करना होगा। बाजार जिस मानक की गुणवत्ता चाहता है, हमें वही गुणवत्ता प्रदान करनी होगी।

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सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी, फोटो साभार: कृषि जागरण

सवाल: खेती के लिए सबसे मुनाफे वाली फसल कौन-सी है?
जवाब: देखिए, इसके लिए किसी एक फसल का नाम लेना संभव नहीं है। कुछ फसलें दूरगामी फायदा देती हैं, जिनमें दो-चार साल का इंतजार करना पड़ता है, जबकि कुछ फसलें मात्र तीन महीने में तैयार हो जाती हैं। मेरा मानना है कि किसान को 'अपने सारे अंडे एक ही टोकरी में' नहीं रखने चाहिए। मुनाफे के लिए दीर्घकालिक फसलों के साथ-साथ अन्य विकल्प भी रखने चाहिए।

'हाई वैल्यू' फसलें तीन तरह की होती हैं:

  • नियमित आय देने वाली फसलें: जो आपको लगातार इनकम देती रहें।

  • अल्पकालिक फसलें: जो बहुत कम समय में तैयार हो जाएं।

  • दीर्घकालिक (Long-term) फसलें: जो लंबे समय के बाद बड़ा लाभ दें।

इसे हम बैंक खातों के उदाहरण से समझ सकते हैं- जैसे हम करंट अकाउंट, फिक्स्ड डिपॉजिट (TDR) और आवर्ती जमा (RD) रखते हैं, वैसे ही हमें तीनों तरह की खेती करनी चाहिए ताकि हम आर्थिक रूप से मजबूत रहें। उदाहरण के लिए, हमने ऐसे पेड़ लगाए हैं जो 10-12 साल में लकड़ी देते हैं; साथ ही काली मिर्च लगाई है जो 2-3 साल में उपज देती है। इन पेड़ों के बीच हम हर साल सफेद मूसली, स्टीविया और हल्दी जैसी फसलें उगाते हैं जो हर 3-4 महीने में आय देती हैं। इस तरह से तीनों तरह की आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं। भविष्य में बड़े खर्चों के लिए लकड़ी एक 'डिपॉजिट' की तरह काम करती है जो खराब नहीं होती। अतः सबसे लाभकारी वही है, जहां 'बहुस्तरीय खेती' (Multi-layer farming) अपनाई जाए।

सवाल: एग्रीकल्चर पॉलिसी (कृषि नीति) में ऐसी कौन सी बातें हैं जिन्हें तुरंत बदलना चाहिए?
जवाब: सबसे पहली बात यह है कि जब भी कृषि नीतियां बनें, उनमें 'वास्तविक किसानों' की भागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए। मैं उन लोगों की बात नहीं कर रहा जो सिर्फ पगड़ी बांधकर नेतागिरी करते हैं, बल्कि उन किसानों की बात कर रहा हूं जो जमीन पर उतरकर सच में खेती करते हैं और जमीनी स्तर की समस्याओं को भलीभांति समझते हैं। अक्सर सरकार की नीयत तो ठीक होती है, लेकिन योजनाएं बनाने वाले लोगों को खेती के जमीनी धरातल का ज्ञान नहीं होता, जिस कारण अधिकांश योजनाएं असफल हो जाती हैं।

सवाल: कृषि में महिलाओं की सहभागिता कितनी जरूरी है?
जवाब: भारत के अधिकांश प्रदेशों, विशेषकर आदिवासी और जनजातीय क्षेत्रों में खेती पूरी तरह से महिलाओं के कंधों पर टिकी है। उदाहरण के लिए, हमारे बस्तर में खेती के कार्यों में महिलाओं की भूमिका 70% तक है। खेती में नारी शक्ति की यह भूमिका बहुत महत्वपूर्ण और एक शुभ लक्षण है। अन्य राज्यों में भी महिलाएं खेतों में कठोर परिश्रम करती हैं, लेकिन उन्हें वह श्रेय नहीं मिलता जिसकी वे हकदार हैं। संबोधन भी अक्सर 'भाइयों और बहनों' से शुरू होता है, जबकि इसे 'बहनों और भाइयों' से शुरू होना चाहिए।

Dr Rajaram Tripathi
जिन्होंने अपने बच्चे की तरह सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी का ध्यान रखा

सवाल: भविष्य की फसलों और बाजार की मांग को आप कैसे देखते हैं?
जवाब: भविष्य 'श्रीअन्न' (मिलेट्स), जैविक पद्धति से उगाए गए अनाज और सुपरफूड्स का है। स्टीविया, किनोवा और चिया सीड्स जैसी फसलों की मांग स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण बहुत बढ़ेगी। स्टीविया चीनी से 25 गुना अधिक मीठा है और जीरो कैलोरी है, इसमें भविष्य की अपार संभावनाएं हैं।

सवाल: ड्रोन से खेती करना कितना क्रांतिकारी साबित हो सकता है?
जवाब: देखिए, ड्रोन का उपयोग अभी शुरुआती स्तर पर है, लेकिन निश्चित रूप से यह भविष्य की खेती में बहुत उपयोगी सिद्ध होगा। दवाइयों के छिड़काव से लेकर बीज बोने और बीमारियों का पता लगाने तक, यह तकनीक बहुत प्रभावी है। हालांकि, यह अभी भी एक महंगी तकनीक है। सरकार ने इसके लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन यह अभी पूरी तरह गाँवों तक नहीं पहुंच पाई है। जैसे-जैसे ग्रामीण लोग मोबाइल के बाद अब ड्रोन चलाना सीख जाएंगे, वे इसका लाभ उठा सकेंगे। वर्तमान में यह आम किसान की पहुंच से बाहर है। इसे सस्ता बनाना अनिवार्य है, क्योंकि जिस किसान को अपनी मोटरसाइकिल में 200 रुपये का पेट्रोल डलाने में कठिनाई होती है, उसके लिए लाखों का उपकरण खरीदना एक बहुत कठिन सौदा है।

अपने काली मिर्च के बाग में बस्तर की आदिवासी महिला किसानों के साथ सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी, फोटो साभार: कृषि जागरण
अपने काली मिर्च के बाग में बस्तर की आदिवासी महिला किसानों के साथ सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी, फोटो साभार: कृषि जागरण

सवाल: आदिवासी क्षेत्रों में कृषि कार्य करना कितना चुनौतीपूर्ण है?
जवाब: आदिवासी क्षेत्रों में खेती को कठिन बनाने में शासन की कुछ नीतियां और नियम बड़ी बाधा हैं। कई ऐसी धाराएं और कानून बनाए गए हैं कि यदि कोई आदिवासी किसानों के साथ मिलकर साझा खेती करने का प्रयास करता है, तो उसे गलत तरीके से प्रचारित किया जाता है। राजनीति के कारण आदिवासी भाइयों को, जो स्वभाव से सरल होते हैं, उनके स्वार्थ के लिए भड़काया जाता है। जब भी कोई किसान बड़े पैमाने पर काम करने या किसानों को एकजुट करने की कोशिश करता है, तो वहां के नेताओं को अपना वोट बैंक खिसकने का डर सताने लगता है और उस व्यक्ति को टारगेट किया जाता है। हालांकि, मुझे विश्वास है कि जैसे-जैसे आदिवासी समाज शिक्षित होगा और अपने लाभ-हानि को समझने लगेगा, यह स्थिति धीरे-धीरे सुधरेगी।

सवाल: हाइड्रोपोनिक्स (Hydroponics) भविष्य की तकनीक है या सिर्फ एक हाइप है?
जवाब: हाइड्रोपोनिक्स निश्चित रूप से भविष्य है और इस पर शोध होना चाहिए, विशेषकर अंतरिक्ष अनुसंधान के दृष्टिकोण से। लेकिन वर्तमान में भारत जैसे देश में इसका कोई व्यावहारिक भविष्य नहीं है। यहाँ एक एकड़ की लागत करोड़ों में आती है, जबकि हमारे 84% किसानों के पास 4 एकड़ से कम जमीन है और उनकी वार्षिक आय भी बहुत कम है। हाइड्रोपोनिक्स से उगाई गई सब्जियों (जैसे पालक या टमाटर) की लागत खुले खेत की तुलना में कई गुना अधिक होती है। यह तकनीक केवल एलिट क्लास को 'सुपर फूड' या 'माइक्रो ग्रीन' के नाम पर ऊंचे दामों में बेचने तक सीमित है। भारत की डेढ़ अरब की जनसंख्या का पेट भरने के लिए हमें प्रकृति के साथ ही चलना होगा। हमें ऐसी किस्मों पर शोध करना चाहिए जो कम पानी, अधिक गर्मी और विपरीत परिस्थितियों को सह सकें।

बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज़, लैंड रोवर, फॉर्च्यूनर और पजेरो जैसी दर्जनों गाड़ियां होने के बावजूद, पिछले 21 वर्षों से डॉ. त्रिपाठी ज़्यादातर खुद अपनी 21 साल पुरानी स्कॉर्पियो चलाना ही पसंद करते हैं।
बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज़, लैंड रोवर, फॉर्च्यूनर और पजेरो जैसी दर्जनों गाड़ियां होने के बावजूद, पिछले 21 वर्षों से डॉ. त्रिपाठी ज़्यादातर खुद अपनी 21 साल पुरानी स्कॉर्पियो चलाना ही पसंद करते हैं।

सवाल: आप स्वयं को एक सफल किसान कहलाना पसंद करते हैं या एक कृषि वैज्ञानिक?
जवाब: मेरी मूल पहचान एक किसान की ही है। मेरे जीवन में स्कूल जाने से पहले खेत जाना शुरू हो गया था; हम सुबह खेत जाते थे और फिर 10 बजे स्कूल। इसलिए मेरे लिए खेती पहले है और पढ़ाई बाद में। हालांकि पढ़ाई भी बहुत जरूरी है, लेकिन मुझे 'किसान' कहलाने में गर्व महसूस होता है।

सवाल: आपको देशभर में 'हेलीकॉप्टर वाले किसान' के रूप में जाना जाता है। क्या आप भविष्य में भी इसी तरह की आधुनिक मशीनरी और नई तकनीक को अपनाना जारी रखेंगे?
जवाब: देखिए, हेलीकॉप्टर मेरे लिए कोई विलासिता नहीं बल्कि खेती की एक अनिवार्य आवश्यकता है। आज के दौर में जहां ड्रोन की सीमाएं समाप्त होती हैं, वहां से हेलीकॉप्टर की वास्तविक उपयोगिता शुरू होती है। फसलों में रोगों के नियंत्रण के लिए जब हम दवाइयों का छिड़काव करते हैं, तो सटीकता (Precision) बहुत मायने रखती है। यदि खेत का एक छोटा सा कोना भी छिड़काव से छूट जाए, तो बैक्टीरिया या कीट वहां से पुनः पूरे खेत में फैल सकते हैं।

डॉ. त्रिपाठी के फार्म पर प्रतिदिन अलग-अलग क्षेत्रों से किसानों के दल बहु स्तरीय उच्च लाभदायक खेती को सीखने समझने आते हैं
डॉ. त्रिपाठी के फार्म पर प्रतिदिन अलग-अलग क्षेत्रों से किसानों के दल बहु स्तरीय उच्च लाभदायक खेती को सीखने समझने आते हैं

यही कारण है कि पश्चिमी देशों में हवाई जहाज या हेलीकॉप्टर के माध्यम से छिड़काव करना एक सामान्य कृषि प्रक्रिया है। हमने इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर हेलीकॉप्टर लिया था। हालांकि, भारत में कृषि क्षेत्र में इनके व्यावसायिक उपयोग के लिए आवश्यक लाइसेंस और अनुमतियों से संबंधित नीतियां अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। मैंने इस विषय में सरकार तक अपनी बात पहुंचाई है और मुझे पूरी उम्मीद है कि जल्द ही एक स्पष्ट नीति सामने आएगी, जिसका सीधा लाभ हमारे छोटे किसानों को मिलेगा। इसके साथ ही, हमने अब अपनी कृषि तकनीकी क्षमताओं को और विस्तार देने के लिए विशेष रूप से खेती के कार्यों हेतु हवाई जहाज खरीदने का भी निर्णय लिया है।

सवाल: हाल ही में भारत धान उत्पादन में अव्वल बना है। क्या आपके अनुसार किसानों को इतने बड़े स्तर पर धान की खेती जारी रखनी चाहिए?
जवाब: भारत के कई क्षेत्रों में चावल मुख्य भोजन है, इसलिए धान की खेती तो करनी ही होगी। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहा जाता है- "धान की खेती और गरीबी का चोली-दामन का साथ है।" छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है, लेकिन यहां के छोटे किसानों को जीवन-यापन में आज भी कठिनाई आती है । मेरा मानना है कि धान की खेती में बहुत ज्यादा लाभ संभव नहीं है ।

टिकाऊ, प्राकृतिक ग्रीन हाउस
टिकाऊ, प्राकृतिक ग्रीन हाउस

सबसे बड़ी समस्या पानी की है; एक किलो धान उगाने में लगभग 1200 लीटर पानी लगता है। यदि हम 20 रुपये प्रति लीटर की दर से पानी का मूल्य जोड़ें, तो एक किलो धान की कीमत 24,000 रुपये बैठेगी। पानी पूरी मानवता की साझी विरासत है, किसी एक देश या व्यक्ति की नहीं। इसलिए हमें बारिश के पानी का संचयन (Water Harvesting) करना चाहिए और धान की ऐसी किस्में विकसित करनी चाहिए जो कम समय और कम पानी में तैयार हो सकें।

सवाल: क्या आधुनिक खेती (Modern Farming) गरीब किसानों की पहुंच से बाहर होती जा रही है?
जवाब: हां, यह एक कड़वी सच्चाई है। खेती में जिस तरह से लागत बढ़ रही है, वह चिंताजनक है। उदाहरण के लिए, टमाटर का बीज ₹70,000 प्रति किलो तक मिलता है और मक्के का बीज ₹60-70 प्रति किलो है, जबकि उपज मात्र ₹20 किलो बिकती है। सरकार द्वारा भारी अनुदान के बावजूद खाद और बीज महंगे होते जा रहे हैं, जिससे खेती आम किसानों के लिए घाटे का सौदा बनती जा रही है।

अपने काली मिर्च के बाग में सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी, फोटो साभार: कृषि जागरण
अपने काली मिर्च के बाग में सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी, फोटो साभार: कृषि जागरण

यदि कोई नया युवा 5 एकड़ में आधुनिक खेती शुरू करना चाहे और उसके पास पैतृक जमीन नहीं है, तो उसे कम से कम ₹60 लाख के निवेश की आवश्यकता होगी। इसमें ₹50 लाख जमीन की खरीद और लगभग ₹10 लाख बाउंड्री, बोरवेल, बिजली कनेक्शन और अन्य आवश्यक खर्चों के लिए चाहिए। वास्तव में, खेती बहुत खर्चीली और कठिन होती जा रही है। ऐसी स्थिति में हमें उन नवाचारी मॉडलों और वैज्ञानिकों की जरूरत है जो खेती की लागत कम करने के तरीके खोजें। उदाहरण के लिए, ड्रोन बहुत उपयोगी है, लेकिन ₹10-12 लाख का ड्रोन एक अकेला गरीब किसान नहीं खरीद सकता; इसे केवल समूह (4-5 किसान मिलकर) में ही अपनाया जा सकता है।

सवाल: क्या टेक्नोलॉजी फार्मिंग को और अधिक महंगा बना रही है?
जवाब: नई तकनीक के शोध और विकास में भारी खर्च होता है, जिसे कंपनियां वसूलना चाहती हैं, इसलिए शुरुआत में तकनीक हमेशा महंगी होती है। लेकिन जब इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है और उपयोग बढ़ता है, तो कीमतें कम हो जाती हैं- जैसे मोबाइल और टेलीविजन के साथ हुआ।

खेती से संबंधित तकनीक को सस्ता बनाने के लिए सरकार को कंपनियों के शोध और नवाचारों पर अनुदान देना चाहिए। सरकार को हर स्तर पर सहायता प्रदान करनी चाहिए क्योंकि तकनीक के विकास का लाभ अंततः पूरी कम्युनिटी और समाज को मिलता है।

सवाल: हाइड्रोपोनिक्स (Hydroponics) भविष्य की तकनीक है या सिर्फ एक हाइप है?
जवाब: हाइड्रोपोनिक्स निश्चित रूप से भविष्य है और इस पर शोध होना चाहिए, विशेषकर अंतरिक्ष अनुसंधान के दृष्टिकोण से। लेकिन वर्तमान में भारत जैसे देश में इसका कोई व्यावहारिक भविष्य नहीं है। यहां एक एकड़ की लागत करोड़ों में आती है, जबकि हमारे 84% किसानों के पास 4 एकड़ से कम जमीन है और उनकी वार्षिक आय भी बहुत कम है। हाइड्रोपोनिक्स से उगाई गई सब्जियों (जैसे पालक या टमाटर) की लागत खुले खेत की तुलना में कई गुना अधिक होती है। यह तकनीक केवल एलिट क्लास को 'सुपर फूड' या 'माइक्रो ग्रीन' के नाम पर ऊंचे दामों में बेचने तक सीमित है। भारत की डेढ़ अरब की जनसंख्या का पेट भरने के लिए हमें प्रकृति के साथ ही चलना होगा। हमें ऐसी किस्मों पर शोध करना चाहिए जो कम पानी, अधिक गर्मी और विपरीत परिस्थितियों को सह सकें।

सवाल: क्या केमिकल फार्मिंग पूरी तरह से खत्म हो सकती है?
जवाब: संतुलित रासायनिक खेती तो फिलहाल बनी रहेगी, लेकिन अंततः हमें यह समझना होगा कि रसायनों की जरूरत धरती को नहीं है। इसे एक उदाहरण से समझें-मनुष्य का पेट प्रकृति की ऐसी रचना है जो फल, जड़ें, दूध और दही सब पचा सकता है, लेकिन रसायनों के लिए इसमें कोई स्थान नहीं है। जिस तरह मनुष्य रसायनों को पचाकर लंबे समय तक स्वस्थ नहीं रह सकता, वैसे ही धरती के मित्र बैक्टीरिया और कीट रसायनों से नष्ट हो जाते हैं।

धरती केमिकल के लिए नहीं बनी है, इसलिए भविष्य में हमें पूरी तरह से रासायनिक खेती से हटना ही होगा। हालांकि, यह बदलाव रातों-रात संभव नहीं है; इसमें पर्याप्त समय और सुनियोजित योजना की आवश्यकता होगी।

सवाल: क्या किसान एक ब्रांड बन सकता है
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जवाब: किसान वास्तव में पहले से ही एक ब्रांड बन चुका है, लेकिन उसे केवल विपणन (Marketing) के लिए उपयोग किया जाता है। चुनाव हो या मल्टीनेशनल कंपनियों के विज्ञापन, आपको हर जगह किसान की छवि (पगड़ी और लट्ठ के साथ) नजर आएगी। विडंबना यह है कि जिन कंपनियों ने खेती का 'क' भी नहीं सीखा, वे भी किसान के नाम का उपयोग करती हैं। वास्तव में किसान को जो 'ब्रांड वैल्यू', रॉयल्टी और सम्मान मिलना चाहिए, वह उसे नहीं मिल पाता है।

डॉक्टर त्रिपाठी की पाठशाला जो खेतों में लगती है... इसमें डॉक्टर इंजीनियर वकील प्रोफेसर भी होते हैं छात्र
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सवाल: भविष्य में कौन-सा राज्य एक 'एग्रीकल्चर मॉडल' बन सकता है?
जवाब: सभी राज्य अपने स्तर पर अच्छा प्रयास कर रहे हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में बहुत अच्छी संभावनाएं हैं क्योंकि यह भारत के मध्य में स्थित है और यहां की जलवायु लगभग 90% फसलों के लिए अनुकूल है। इसके अलावा मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में भी काफी संभावनाएं हैं। विशेष रूप से वे राज्य जो 'बाय डिफॉल्ट' ऑर्गेनिक रह गए हैं (जहां आर्थिक तंगी के कारण रासायनिक खाद का अधिक उपयोग नहीं हो पाया), उनके पास खेती में अगुआ बनने का सबसे बड़ा अवसर है। भविष्य में उन राज्यों की चमक बढ़ेगी जिन्हें अब तक पिछड़ा माना जाता रहा है।

सवाल: भारत की एग्रीकल्चर (कृषि) सबसे पीछे किस चीज में है?
जवाब: भारत की खेती में तो मैं नहीं मानूंगा कि हम पीछे हैं। भारत के किसानों ने फल, सब्जी और अनाज के उत्पादन में अपने खून-पसीने से देश के गोदाम भरे हैं। लेकिन हम वास्तव में एग्रो प्रोसेसिंग (Agro-processing) में बहुत पिछड़े हैं। हमारे पास पर्याप्त एग्रो वेयरहाउस और आधुनिक गोदाम नहीं हैं, जिसके कारण उपज खराब हो जाती है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, उचित भंडारण के अभाव में लगभग 2 लाख करोड़ की सब्जियां और फल हर साल खराब हो रहे हैं।

हमें तहसील स्तर पर छोटी-छोटी इकाइयां, कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण केंद्र चाहिए ताकि किसान अपनी उपज का मूल्यवर्धन कर सकें। मेरा मानना है कि बुनियादी ढांचे के इस अभाव में भारत काफी पीछे है।

सवाल: किसानों के लिए क्या जरूरी है- एमएसपी (MSP) या एक्सपोर्ट फ्रीडम?
जवाब: दोनों चाहिए। यह वैसा ही है जैसे आप पूछें कि खाना खाएंगे या पानी पिएंगे, तो जवाब होगा कि दोनों ही जीवन के लिए जरूरी हैं। इसके अलावा, मेरा किसानों को यह सुझाव है कि वे खेती में किसी की 'भेड़चाल' या देखा-देखी न करें। किसानों को नवीन तकनीकों को अपनाना चाहिए और अपने साथी सफल किसानों के नवाचारों से सीखना चाहिए।

सवाल: सबसे बड़ा इन्वेस्टमेंट (निवेश) क्या है- ज़मीन, नॉलेज या नेटवर्क?
जवाब: देखिए, ज़मीन पहली आवश्यकता है, क्योंकि ज़मीन ही नहीं होगी तो खेती कहां करेंगे? लेकिन मेरा मानना है कि नॉलेज (ज्ञान) भी उतना ही जरूरी है। हम इसे प्राथमिकता के आधार पर क्रमबद्ध कर सकते हैं: जमीन, ज्ञान, फिर पूंजी, मेहनत, साहस और अंत में सरकार का थोड़ा प्रोत्साहन।

सवाल: खेती से जुड़ा सबसे बड़ा मिथक क्या है?
जवाब: खेती वास्तव में मिथकों से परे एक यथार्थ है। यह जमीन के धरातल से जुड़ी हुई है, जहां  केवल कल्पनाएं काम नहीं करतीं। यहां 'मान लेने' से काम नहीं चलता। यह सच है कि एक दाना डालने से 50 दाने मिलते हैं, लेकिन यह भी उतना ही कड़वा सच है कि जरूरी नहीं कि मिट्टी में डाला गया हर दाना उगे ही। भारत के दृष्टिकोण से यदि कोई कहता है कि खेती बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है या किसानों की आय में बहुत वृद्धि हो रही है, तो वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए मैं इसे एक 'मिथक' या 'मिथ्या' ही मानता हूं।

MFOI Awards 2023 में रिचेस्ट फार्मर ऑफ इंडिया अवार्ड  प्राप्त करते हुए सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी
MFOI Awards 2023 में रिचेस्ट फार्मर ऑफ इंडिया अवार्ड प्राप्त करते हुए सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी

सवाल: खेती में सफलता के लिए मार्केटिंग का कितना महत्व है?
जवाब: मेरा मानना है कि किसान को उत्पादन से पहले मार्केटिंग पर होमवर्क करना चाहिए। बाजार 'राजा' है। हमें यह समझना होगा कि बाजार क्या चाहता है और उसी के अनुसार गुणवत्ता और उत्पादन तय करना होगा। डिमांड और सप्लाई के गणित को समझे बिना खेती करना जोखिम भरा है। भारत का किसान अक्सर खेत में नहीं, बल्कि बाजार में हार जाता है।

सवाल: आदिवासी क्षेत्रों में कृषि कार्य करना कितना चुनौतीपूर्ण है?
जवाब: आदिवासी क्षेत्रों में खेती को कठिन बनाने में शासन की कुछ नीतियां और नियम बड़ी बाधा हैं। कई ऐसी धाराएं और कानून बनाए गए हैं कि यदि कोई आदिवासी किसानों के साथ मिलकर साझा खेती करने का प्रयास करता है, तो उसे गलत तरीके से प्रचारित किया जाता है। राजनीति के कारण आदिवासी भाइयों को, जो स्वभाव से सरल होते हैं, उनके स्वार्थ के लिए भड़काया जाता है। जब भी कोई किसान बड़े पैमाने पर काम करने या किसानों को एकजुट करने की कोशिश करता है, तो वहां के नेताओं को अपना वोट बैंक खिसकने का डर सताने लगता है और उस व्यक्ति को टारगेट किया जाता है। हालांकि, मुझे विश्वास है कि जैसे-जैसे आदिवासी समाज शिक्षित होगा और अपने लाभ-हानि को समझने लगेगा, यह स्थिति धीरे-धीरे सुधरेगी।

सवाल: आप स्वयं को एक सफल किसान कहलाना पसंद करते हैं या एक कृषि वैज्ञानिक?
जवाब: मेरी मूल पहचान एक किसान की ही है। मेरे जीवन में स्कूल जाने से पहले खेत जाना शुरू हो गया था; हम सुबह खेत जाते थे और फिर 10 बजे स्कूल। इसलिए मेरे लिए खेती पहले है और पढ़ाई बाद में। हालांकि पढ़ाई भी बहुत जरूरी है, लेकिन मुझे 'किसान' कहलाने में गर्व महसूस होता है।

अपने काली मिर्च के बाग में सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी, फोटो साभार: कृषि जागरण
अपने काली मिर्च के बाग में सफल किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी, फोटो साभार: कृषि जागरण

सवाल: क्या किसानों को राजनीति में आना चाहिए?
जवाब: आज की राजनीति का काफी अधोपतन हुआ है और वह एक व्यापार बन गई है। भ्रष्टाचार इसकी जननी बन गया है। लेकिन मेरा मानना है कि जहां समस्या है, वहां समाधान भी है। किसानों को राजनीति में व्याप्त 'कचरे' और भ्रष्टाचार की सफाई के लिए आगे आना चाहिए, क्योंकि किसान ही इस देश की राजनीति को ठीक कर सकते हैं।

देश की लगभग 65% से 70% जनसंख्या कृषि से जुड़ी है, फिर भी सरकार केवल 38-40% वोट से बन जाती है। यदि यह 70% किसान एकजुट हो जाएं, तो राजनीति की सारी खामियां दूर हो जाएंगी। दुर्भाग्य से, किसान अभी राजनीति को नहीं समझा है; वह वोट देते समय जाति और भाषा में बँट जाता है, जबकि सूखा या बीमारी किसी की जाति देखकर नहीं आती। जब तक किसान एकजुट होकर अपनी भागीदारी सुनिश्चित नहीं करेंगे, उनके हित में योजनाएं नहीं बनेंगी।

सवाल: क्या डॉ. राजाराम त्रिपाठी भविष्य में सक्रिय राजनीति में शामिल हो सकते हैं?
जवाब: देखिए, भविष्य के बारे में कोई भी भविष्यवाणी करना कठिन है। लेकिन यदि मैं वर्तमान के दृष्टिकोण से कहूं, तो राजनीति वह अंतिम स्थान है जहां मैं कभी नहीं जाना चाहूंगा। राजनीति को मैंने जितना करीब से और दूर से देखा है, मुझे लगता है कि हमारे जैसे लोगों के लिए वहां कोई जगह नहीं है। आज की राजनीति में सफल होने के लिए अक्सर चाटुकारिता और दलाली जैसे दुर्गुणों का सहारा लिया जाता है। ऐसा नहीं है कि राजनीति में अच्छे लोग नहीं हैं, लेकिन वे अक्सर हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं।

राजनीति वह आखिरी विकल्प होगा जिसे मैं चुनना चाहूंगा। हालांकि, जीवन में मैंने जो सोचा, अक्सर उसके विपरीत हुआ है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं बैंक में नौकरी करूंगा; मुझे लगता था कि बैंकर्स दुनिया के सबसे दयनीय प्राणी हैं जो नोटों के अंबार के बीच रहकर भी एक नोट खर्च नहीं कर सकते - जैसे समुद्र के बीच रहकर भी प्यासा रहना। लेकिन मुझे वह नौकरी करनी पड़ी। इसी तरह, मैंने सोचा था कि खेती वह अंतिम पेशा है जिसमें किसी को जाना चाहिए क्योंकि यहां किसान आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन मैं खेती में ही आया।

प्रकृति अक्सर मुझे वहीं ले जाती है जहां वह चाहती है। फिर भी, यदि आप मेरी निजी राय पूछें, तो मैं राजनीति से कोसों दूर खड़ा होना चाहूंगा। मैं न तो उधर देखना चाहता हूं और न ही राजनीति के बारे में कुछ सुनना चाहता हूं।

सवाल: ऐसी कौन सी एक आदत है जिसने आपको सफलता दिलाई?
जवाब: हार न मानने का संकल्प (जीत की ज़िद)। मेरा मानना है कि आप कोई भी काम शुरू करें, उसमें चुनौतियां और असफलताएं आएंगी ही, लेकिन आपको अडिग रहना होगा। मेरे जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब मेरी जमीनें नीलामी की कगार पर थीं और मुझे 'डिफाल्टर किसान' कहा जाने लगा था। लेकिन मैंने खेती नहीं छोड़ी और निरंतर लगा रहा। परिणाम स्वरूप, जिस बैंक ने मुझे डिफ़ॉल्टर कहा था, उसी बैंक ने बाद में मुझे प्रशंसा पत्र दिया और उनकी नई शाखा का उद्घाटन भी मेरे हाथों हुआ। जीवन में उतार-चढ़ाव के बावजूद जीत के प्रति दृढ़ रहना बेहद ज़रूरी है।

सवाल: आपके लिए सफलता का वास्तविक अर्थ क्या है?
जवाब: सफलता का अर्थ है समाज, परिवेश और पर्यावरण को साथ लेकर उन्नति करना। आप जो काम कर रहे हैं, वह 'बहुजन हिताय' (सबके हित के लिए) होना चाहिए। यदि आप अकेले सफल होते हैं, लेकिन आपके समाज या पर्यावरण को उससे कोई लाभ नहीं पहुंचाता, तो मैं उसे वास्तविक सफलता नहीं मानता।

English Summary: success story of Bastars herbal king Dr Rajaram Tripathi black pepper farming innovation Published on: 12 May 2026, 04:15 PM IST

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