सुबह के चार बजे हैं, हिमाचल के पहाड़ों का दुर्गम गाँव हो या राजस्थान के मरुस्थल में, या मध्यप्रदेश की किसी बस्ती में, यूँ कहा जाए कि देश के हर प्रदेश के हरेक कोने में, एक महिला अपनी अधूरी नींद से उठ चुकी है जबकि घर के बाकी सदस्य अभी सो रहे हैं. वह चुपचाप बाहर गाय या भैंस के पास जाती है, हाथ फेरती है, बात करती है — जैसे किसी पुरानी सखी से. बर्तन धोती है, दूध निकालती है, फिर उसे सहकारी समिति या किसी अन्य संग्रह केंद्र तक पहुँचाने की जुगत बिठाती है. यह उसकी दिनचर्या है — रोज़, बिना नागा; न कोई छुट्टी, न कोई तारीफ, न कोई बोनस. बस एक अटूट ज़िम्मेदारी, जो उसने कभी किसी से माँगी नहीं पर उसकी ही हो गई है क्योंकि उसने इसे स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया.
यही वह हाथ हैं जो इस देश को दूध पिलाते हैं.
विश्व दुग्ध दिवस हर वर्ष पहली जून को मनाया जाता है. इस वर्ष, 2026 में, इसकी थीम है — "महिला किसानों का उत्सव." यह थीम महज एक नारा नहीं है; यह उस सच्चाई की स्वीकृति है जिसे हम दशकों से नज़रअंदाज़ करते आए हैं.
भारत का दुग्ध गौरव: एक असाधारण यात्रा
आज भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है. वर्ष 2024-25 में हमने 247.87 मिलियन टन दूध का उत्पादन किया. यह वैश्विक उत्पादन का लगभग 24 प्रतिशत है. जब वर्ष 2014-15 में हम 146.30 मिलियन टन दूध का उत्पादन कर रहे थे, तब किसने सोचा था कि एक दशक में यह आंकड़ा 63.56 प्रतिशत बढ़ जाएगा? जबकि दुनिया भर में दुग्ध उत्पादन की वृद्धि दर मात्र 2 प्रतिशत प्रतिवर्ष है, हम 6 प्रतिशत की दर से आगे बढ़ रहे हैं. यह कोई संयोग नहीं है — यह लाखों हाथों की मेहनत का परिणाम है, जिनमें से अधिकतर हाथ महिलाओं के हैं.
प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता की बात करें तो 2014-15 में यह 319 ग्राम प्रति दिन थी, जो आज 485 ग्राम प्रति दिन हो गई है. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने 300 मिलीलीटर प्रतिदिन की अनुशंसा की है — हम उससे कहीं आगे निकल चुके हैं. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र — ये पाँच राज्य इस श्वेत क्रांति के मुख्य स्तंभ हैं. डेयरी क्षेत्र आज राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 5 प्रतिशत का योगदान दे रहा है और इस क्षेत्र में 8 करोड़ से अधिक किसान जुड़े हुए हैं.
यह कहानी सिर्फ आँकड़ों की नहीं है. यह कहानी उन करोड़ों परिश्रमी पशुपालकों एवं किसानों की है जिन्होंने इसे संभव बनाया.
अदृश्य नींव: महिलाओं का योगदान
डेयरी क्षेत्र की कुल श्रमशक्ति में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएँ हैं. चारा काटना, पानी लाना, पशुओं को नहलाना, दूध दुहना, उसे सहकारी समिति तक पहुँचाना — दूध से जुड़े कुल काम का 70 से 90 प्रतिशत महिलाएँ करती हैं. देश के अधिकतर डेयरी परिवारों में 2 से 3 पशु हैं, और इन पशुओं की रोज़मर्रा की देखभाल मुख्यतः घर की महिलाएँ ही करती हैं.
फिर भी एक विडंबना है जो खलती है: इतना श्रम देने के बाद भी अधिकतर महिलाओं के नाम पर न ज़मीन है, न पशु का कागज़, न बैंक में कर्ज़ का अधिकार. निर्णय लेने की शक्ति उनके पास नहीं. कृषि ऋण उनके नाम पर नहीं मिलता. सरकारी योजनाओं के लाभ की सूचना पहले उन तक नहीं पहुँचती. काम महिला करती हैं पर नाम घर के पुरुष का होता है. यह अन्याय महज व्यक्तिगत नहीं है; यह एक संरचनात्मक खामी है जो हमारी नीतियों में भी प्रतिबिंबित होती है.
कहते हैं "जो दिखता है, वो बिकता है." पर जो नहीं दिखता, उसका क्या? डेयरी की इस अदृश्य नींव को न देखना हमारी सामूहिक नाकामी है.
श्वेत क्रांति का असली इतिहास: महिलाएँ मूल में थीं
जब हम ऑपरेशन फ्लड की बात करते हैं, जिसे श्वेत क्रांति के नाम से जाना जाता है, तो हमारे ज़हन में आता है डॉ. वर्गीज़ कुरियन का नाम, अमूल का ब्रांड, आनंद का मॉडल. और यह सब सही भी है. गुजरात के आनंद से शुरू हुई यह यात्रा 1970 में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के माध्यम से पूरे देश में फैली और भारत को दुनिया के दुग्ध मानचित्र में शीर्ष पर स्थापित किया.
लेकिन इस इतिहास का एक पन्ना अक्सर अनकहा रह जाता है: उस समय जो हज़ारों महिलाएँ हर सुबह दूध लेकर सहकारी केंद्र तक पहुँचती थीं: यही थीं श्वेत क्रांति की असली सिपाही. कुरियन साहब ने जो सहकारी ढाँचा खड़ा किया, उसकी नींव में महिलाओं का श्रम था. आनंद मॉडल की सफलता का राज़ यह नहीं था कि कहीं कोई बड़ी मशीन लगाई गई — राज़ यह था कि लाखों छोटे उत्पादकों को एक सूत्र में पिरोया गया, और उन उत्पादकों में महिलाएँ अग्रणी थीं. आज जब हम श्वेत क्रांति 2.0 की बात कर रहे हैं, तो यह याद रखना ज़रूरी है कि पहली श्वेत क्रांति भी महिलाओं के बिना अधूरी थी.
नई नीतियाँ, नया संकल्प: श्वेत क्रांति 2.0
25 दिसंबर 2024 को श्वेत क्रांति 2.0 का औपचारिक शुभारंभ हुआ. यह केवल एक योजना का नाम नहीं है अपितु एक व्यापक दृष्टि है. वर्ष 2025-26 में 21,902 नई डेयरी सहकारी समितियाँ स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए 407.37 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है. इनमें विशेष रूप से महिला दुग्ध सहकारी समितियाँ (WDCS) बनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है, यानी वे समितियाँ जहाँ निर्णय लेने की बागडोर महिलाओं के हाथ में हो.
राष्ट्रीय गोकुल मिशन और राष्ट्रीय कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम जैसी योजनाएँ पशु नस्ल सुधार और उत्पादकता बढ़ाने के लिए काम कर रही हैं. राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम (NPDD) के अंतर्गत बुनियादी ढाँचे का विस्तार हो रहा है. ये सब ज़रूरी कदम हैं. पर कदम और मंज़िल के बीच अभी काफी रास्ता बाकी है.
जो अभी भी बाकी है: असली सवाल
नीति की भाषा और ज़मीन की हकीकत के बीच का फ़ासला हमें पहचान में रखना चाहिए. महिला दुग्ध सहकारी समितियाँ बनाना एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन अगर उन समितियों की सदस्यों को संस्थागत ऋण नहीं मिलता, तो समिति का लाभ सीमित रहेगा. अगर महिलाओं के नाम पर पशु का रजिस्ट्रेशन नहीं है, तो बीमा योजना का लाभ उन तक नहीं पहुँचेगा. अगर डिजिटल तकनीक का प्रशिक्षण उनकी भाषा में, उनकी समझ के हिसाब से नहीं दिया गया, तो स्मार्टफोन एक खिलौना बनकर रह जाएगा.
मुद्दे कई हैं — ऋण और संस्थागत वित्त तक पहुँच, भूमि और पशु के स्वामित्व की कानूनी पहचान, प्रौद्योगिकी तक सुगम पहुँच, निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में वास्तविक भागीदारी, और सबसे बड़ी बात — उनके श्रम की औपचारिक गिनती. जब तक महिलाओं के डेयरी श्रम को राष्ट्रीय आँकड़ों में ठीक से दर्ज नहीं किया जाएगा, तब तक उनके लिए नीति बनाना अँधेरे में तीर चलाने जैसा होगा.
यह भी सोचना ज़रूरी है कि जलवायु परिवर्तन, चारे की कमी, और पशुओं की घटती उत्पादकता — ये सब चुनौतियाँ सबसे पहले उन महिलाओं पर पड़ती हैं जो रोज़ सुबह उठकर यह काम करती हैं. नीति को उनकी इस असुरक्षा को भी संबोधित करना होगा.
विश्व दुग्ध दिवस 2026: एक अवसर, एक प्रतिज्ञा
पहली जून 2026 को जब हम विश्व दुग्ध दिवस मना रहे हों, तो आइए एक पल के लिए उस महिला के बारे में सोचें जो सुबह चार बजे उठती है. जिसके हाथ ठंडी रात में भी गर्म दूध दुहते हैं. जो न तो किसी पुरस्कार की माँग करती है, न किसी मंच पर चढ़ने की इच्छा रखती है. वह बस अपना काम करती है: इस देश की, इस और भावी पीढ़ी की पोषण-सुरक्षा के लिए.
247.87 मिलियन टन दूध के पीछे लाखों ऐसी ही महिलाओं की कहानी है. विश्व के दुग्ध उत्पादन का 24 प्रतिशत हिस्सा उनके परिश्रम की बदौलत है. जब हम कहते हैं कि भारत विश्व में पहले नंबर पर है तो यह पहला नंबर उन्हीं का है.
सम्मान सिर्फ शब्दों से नहीं होता. सम्मान का अर्थ है उनके नाम पर कर्ज़, उनके नाम पर ज़मीन का अधिकार, उनके नाम पर सहकारिता में स्थान. सम्मान का मतलब है कि जब भी कोई डेयरी नीति बने, वे उसके केंद्र में हों, परिधि पर नहीं.
श्वेत क्रांति 2.0 एक शुभ संकल्प है. लेकिन यह तभी सार्थक होगी जब इस क्रांति की सबसे बड़ी वाहक महिला किसान को उसका उचित स्थान मिले. नीतियाँ तभी काम करती हैं जब वे उन लोगों तक सार्थक रूप में पहुँचती हैं जिनके लिए बनाई जाती हैं.
आज, विश्व दुग्ध दिवस 2026 पर, उन सभी महिलाओं को नमन जो राष्ट्र की दुग्ध-शक्ति की असली एवं ठोस नींव हैं. उनका श्रम अदृश्य रहा है बहुत लंबे समय तक. अब समय है कि वह दिखे — नीतियों में, बजट में, आँकड़ों में, और सबसे पहले हमारे मन में.
लेखक: तरुण श्रीधर
पूर्व सचिव, मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय, भारत सरकार
Share your comments