बकरी पालन पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
भारत विश्व के प्रमुख बकरी पालन वाले देशों में से एक है. ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे एवं सीमांत किसानों, भूमिहीन परिवारों तथा महिलाओं के लिए बकरी पालन आय, पोषण सुरक्षा और रोजगार का एक विश्वसनीय स्रोत है. कम पूंजी, सीमित भूमि तथा स्थानीय संसाधनों के आधार पर बकरियों का पालन आसानी से किया जा सकता है. यही कारण है कि बकरी को अक्सर "गरीब किसान की गाय" कहा जाता है. बकरियाँ दूध, मांस, खाद तथा अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण स्रोत होने के साथ-साथ ग्रामीण परिवारों की आर्थिक सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) पशुपालन क्षेत्र के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, लंबे समय तक सूखा, अचानक बाढ़, लू तथा मौसम में तेजी से होने वाले परिवर्तन चारा उत्पादन, जल उपलब्धता और पशुओं के स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित कर रहे हैं. इन परिस्थितियों का सबसे अधिक प्रभाव छोटे किसानों पर पड़ता है, क्योंकि वे मुख्यतः प्राकृतिक चरागाहों और स्थानीय चारा संसाधनों पर निर्भर रहते हैं.
जब वातावरण का तापमान और आर्द्रता अत्यधिक बढ़ जाती है, तब बकरियाँ अपने शरीर की अतिरिक्त गर्मी बाहर नहीं निकाल पातीं. इस स्थिति को तापीय तनाव (Heat Stress) कहा जाता है. तापीय तनाव के दौरान बकरियाँ कम चारा खाती हैं, अधिक पानी पीती हैं, तेज-तेज साँस लेती हैं तथा सुस्त दिखाई देती हैं. इसके परिणामस्वरूप शरीर का वजन घटने लगता है, वृद्धि दर कम हो जाती है, दूध एवं मांस उत्पादन प्रभावित होता है तथा प्रजनन क्षमता में भी कमी आ सकती है (चित्र १). लंबे समय तक तापीय तनाव रहने पर रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे संक्रामक एवं परजीवी रोगों का खतरा बढ़ जाता है और उपचार पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल पशुओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किसानों की आय और आजीविका पर भी पड़ता है. चारे की कमी, पशुओं की घटती उत्पादकता तथा उपचार पर बढ़ता खर्च बकरी पालन की लाभप्रदता को कम कर देता है. इसलिए बदलती जलवायु में पारंपरिक प्रबंधन के साथ-साथ वैज्ञानिक एवं जलवायु-अनुकूल (Climate-smart) पोषण प्रबंधन अपनाना समय की आवश्यकता है. पोषण प्रबंधन का अर्थ केवल अधिक चारा खिलाना नहीं है, बल्कि बकरियों की आयु, शारीरिक अवस्था और उत्पादन क्षमता के अनुसार संतुलित आहार, स्वच्छ पेयजल, खनिज मिश्रण (Mineral Mixture), विटामिन तथा गुणवत्तायुक्त हरे एवं सूखे चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करना है.
इसके साथ ही वर्षभर चारे की उपलब्धता बनाए रखने के लिए हे (Hay), साइलेज (Silage), सूखा-सहिष्णु चारा फसलें, वृक्षीय चारा, कृषि अवशेषों का वैज्ञानिक उपयोग, एजोला तथा अन्य वैकल्पिक चारा स्रोतों को अपनाना लाभदायक सिद्ध होता है. यदि किसान मौसम के अनुसार पोषण प्रबंधन, पर्याप्त छाया, स्वच्छ पेयजल, नियमित कृमिनाशन एवं टीकाकरण तथा संतुलित आहार जैसी सरल वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाएँ, तो तापीय तनाव के दुष्प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है. इससे बकरियों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है, उत्पादन एवं प्रजनन क्षमता में सुधार होता है और कम लागत में अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है. इस प्रकार जलवायु-अनुकूल स्मार्ट पोषण एवं चारा प्रबंधन भविष्य में बकरी पालन को अधिक टिकाऊ, लाभकारी तथा किसानों की आय बढ़ाने वाला व्यवसाय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
पोषण प्रबंधन क्यों आवश्यक है?
जलवायु परिवर्तन, बढ़ती चारा लागत तथा प्राकृतिक संसाधनों की सीमित उपलब्धता के कारण बकरी पालन में स्मार्ट पोषण प्रबंधन की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है. इसका उद्देश्य उपलब्ध चारा, कृषि अवशेषों तथा स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक एवं कुशल उपयोग करते हुए बकरियों को उनकी आयु, शारीरिक अवस्था, उत्पादन स्तर तथा मौसम के अनुसार संतुलित एवं गुणवत्तापूर्ण आहार उपलब्ध कराना है. उचित पोषण से बकरियों की वृद्धि, प्रजनन क्षमता, दूध एवं मांस उत्पादन तथा बच्चों की जीवित रहने की दर में उल्लेखनीय सुधार होता है. साथ ही, तापीय तनाव (Heat Stress), पोषक तत्वों की कमी एवं अन्य पोषण संबंधी विकारों के दुष्प्रभाव कम होते हैं, जिससे पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता और समग्र स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है. संतुलित आहार एवं चारे के वैज्ञानिक उपयोग से चारा उपयोग दक्षता (Feed Efficiency) बढ़ती है, उत्पादन लागत कम होती है तथा टिकाऊ एवं लाभकारी बकरी पालन को बढ़ावा मिलता है.
मुख्य उद्देश्य
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वर्षभर संतुलित, पौष्टिक एवं गुणवत्तापूर्ण आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करना.
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स्थानीय, सस्ते एवं वैकल्पिक चारा संसाधनों का अधिकतम एवं वैज्ञानिक उपयोग करना.
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मौसम परिवर्तन एवं तापीय तनाव के दुष्प्रभावों को कम करना.
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वृद्धि, प्रजनन क्षमता, रोग प्रतिरोधक शक्ति एवं समग्र स्वास्थ्य में सुधार करना.
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चारे के वैज्ञानिक उपयोग द्वारा फीड एफिशिएंसी बढ़ाना तथा उत्पादन लागत कम करना.
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दूध, मांस एवं प्रजनन प्रदर्शन में सुधार कर किसानों की आय एवं लाभप्रदता बढ़ाना.
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उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए टिकाऊ (Sustainable) एवं जलवायु-स्मार्ट (Climate-smart) बकरी पालन को प्रोत्साहित करना.
आयु एवं उत्पादन अवस्था के अनुसार पोषण प्रबंधन
बकरियों की पोषण आवश्यकताएँ उनकी आयु, शारीरिक अवस्था, उत्पादन स्तर तथा मौसम के अनुसार भिन्न-भिन्न होती हैं. प्रत्येक अवस्था में संतुलित एवं गुणवत्तापूर्ण आहार उपलब्ध कराने से बेहतर वृद्धि, उच्च उत्पादन, अच्छी प्रजनन क्षमता तथा रोगों के प्रति प्रतिरोधक शक्ति विकसित होती है. यदि विभिन्न अवस्थाओं में पोषण संबंधी आवश्यकताओं की अनदेखी की जाए, तो वृद्धि रुक सकती है, प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है तथा उत्पादन में कमी आ सकती है. इसलिए प्रत्येक वर्ग की बकरियों के लिए अलग-अलग पोषण प्रबंधन अपनाना आवश्यक है.
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नवजात मेमने (0–3 माह)
जीवन के प्रारम्भिक दिनों में उचित पोषण बच्चों के स्वस्थ विकास एवं जीवित रहने के लिए अत्यंत आवश्यक है.
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जन्म के एक घंटे के भीतर खीस (कोलोस्ट्रम) अवश्य पिलाएँ.
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पहले 24 घंटों में शरीर के भार का लगभग 10–15% खीस उपलब्ध कराएँ.
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नाभि को आयोडीन से कीटाणुरहित करें तथा बच्चों को स्वच्छ, सूखे एवं गर्म वातावरण में रखें.
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10–15 दिन की आयु से किड स्टार्टर, कोमल हरा चारा एवं स्वच्छ पानी देना प्रारम्भ करें.
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बच्चों को नियमित रूप से खनिज मिश्रण एवं कृमिनाशन कार्यक्रम से जोड़ें.
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बढ़वार वाली बकरियाँ (3–12 माह)
इस अवस्था में संतुलित पोषण भविष्य की उत्पादन एवं प्रजनन क्षमता की नींव रखता है.
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हरा चारा, सूखा चारा एवं सान्द्र आहार का संतुलित मिश्रण उपलब्ध कराएँ.
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आहार में पर्याप्त ऊर्जा, प्रोटीन, खनिज एवं विटामिन शामिल करें.
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अच्छी गुणवत्ता वाले दलहनी चारे एवं वृक्षीय पत्तियों का उपयोग करें.
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स्वच्छ पेयजल, मिनरल मिक्सचर एवं सामान्य नमक हमेशा उपलब्ध रखें.
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मौसम के अनुसार चराई की व्यवस्था करें तथा गर्मी में सुबह-शाम चराई कराएँ.
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नियमित कृमिनाशन एवं संतुलित पोषण से बेहतर वृद्धि, मजबूत शरीर एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है.
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गर्भित बकरियाँ
गर्भावस्था के दौरान उचित पोषण स्वस्थ बच्चों के जन्म एवं भविष्य के दुग्ध उत्पादन के लिए आवश्यक है.
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गर्भावस्था के अंतिम 6–8 सप्ताह में अतिरिक्त सान्द्र आहार दें.
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उच्च गुणवत्ता वाला हरा एवं सूखा चारा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराएँ.
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कैल्शियम, फॉस्फोरस, मिनरल मिक्सचर एवं विटामिन का नियमित पूरक दें.
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अधिक मोटापा या अत्यधिक दुबलापन दोनों से बचाएँ.
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पर्याप्त स्वच्छ पानी उपलब्ध कराएँ तथा अचानक आहार परिवर्तन से बचें.
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दुग्ध देने वाली बकरियाँ
दूध उत्पादन के दौरान पोषक तत्वों की आवश्यकता सबसे अधिक होती है.
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दूध उत्पादन के अनुसार ऊर्जा एवं प्रोटीन की मात्रा बढ़ाएँ.
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उच्च गुणवत्ता वाला हरा चारा, सूखा चारा एवं संतुलित सान्द्र आहार दें.
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मिनरल मिक्सचर, सामान्य नमक एवं स्वच्छ पानी हमेशा उपलब्ध रखें.
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प्रसव के बाद पहले 2–3 महीनों में विशेष पोषण प्रबंधन अपनाएँ.
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संतुलित पोषण से दूध उत्पादन, बच्चों की वृद्धि एवं अगली प्रजनन क्षमता में सुधार होता है.
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प्रजनन हेतु नर बकरे (Breeding Bucks)
प्रजनन क्षमता बनाए रखने के लिए नर बकरों को भी विशेष पोषण की आवश्यकता होती है-
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पर्याप्त ऊर्जा एवं उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन युक्त आहार दें.
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जिंक, सेलेनियम, विटामिन A एवं E जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व नियमित रूप से उपलब्ध कराएँ.
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अत्यधिक मोटापा या कमजोरी से बचाएँ.
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स्वच्छ पानी एवं नियमित व्यायाम की व्यवस्था करें.
वर्षभर चारा उपलब्ध कराने के उपाय
जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, सूखा तथा बढ़ते तापमान के कारण वर्षभर गुणवत्तापूर्ण चारे की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है. चारे की कमी से बकरियों की वृद्धि, दूध एवं मांस उत्पादन, प्रजनन क्षमता तथा रोग प्रतिरोधक शक्ति प्रभावित होती है. इसलिए चारा उत्पादन, संरक्षण एवं वैकल्पिक चारा संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाकर पूरे वर्ष संतुलित पोषण सुनिश्चित किया जा सकता है.
वर्षभर चारा उपलब्ध कराने के प्रमुख उपाय
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हरे एवं सूखे चारे का संतुलित उपयोग कर पशुओं को आवश्यक ऊर्जा, प्रोटीन एवं रेशे की पूर्ति करें.
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अतिरिक्त हरे चारे का हे (Hay) एवं साइलेज (Silage) बनाकर भविष्य के लिए सुरक्षित रखें, ताकि सूखे एवं चारा संकट के समय उपयोग किया जा सके.
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सूखा-सहिष्णु एवं बहुवर्षीय चारा फसलों (जैसे नेपियर, बाजरा, ज्वार, बरसीम, लूसर्न आदि) की खेती को बढ़ावा दें.
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कृषि अवशेषों (धान एवं गेहूँ का भूसा, मक्का के डंठल आदि) का उपचार एवं वैज्ञानिक तरीके से उपयोग कर उनकी पोषण गुणवत्ता बढ़ाएँ.
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वृक्षीय चारा (सुबबूल, सेसबानिया, खेजड़ी, शीशम, बबूल आदि), एजोला, हाइड्रोपोनिक हरा चारा तथा अन्य वैकल्पिक चारा स्रोतों को अपनाएँ.
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उपलब्ध भूमि के अनुसार चारा उत्पादन की वार्षिक योजना बनाकर विभिन्न मौसमों में अलग-अलग चारा फसलों की खेती करें.
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ग्राम स्तर पर सामुदायिक चारा बैंक स्थापित कर आवश्यकता के समय चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करें.
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मौसम की परिस्थितियों के अनुसार चारा फसलों की समय पर बुवाई, सिंचाई एवं पोषक तत्व प्रबंधन अपनाएँ.
किसान क्या करें? (Do’s)
✔ बकरियों की आयु, उत्पादन अवस्था एवं मौसम के अनुसार संतुलित एवं पौष्टिक आहार दें.
✔ वर्षभर स्वच्छ, ताजा एवं पर्याप्त मात्रा में पेयजल उपलब्ध कराएँ.
✔ मिनरल मिक्सचर, सामान्य नमक एवं आवश्यक विटामिन नियमित रूप से आहार में शामिल करें.
✔ समय-समय पर कृमिनाशन, टीकाकरण एवं स्वास्थ्य परीक्षण अवश्य कराएँ.
✔ अतिरिक्त हरे चारे का हे (Hay) एवं साइलेज (Silage) बनाकर सुरक्षित रखें.
✔ पशुशाला को स्वच्छ, सूखा, हवादार एवं छायादार रखें तथा पर्याप्त वेंटिलेशन सुनिश्चित करें.
✔ मौसम के अनुसार चराई का समय निर्धारित करें तथा गर्मी में सुबह एवं शाम के समय चराई कराएँ.
✔ गर्भित, दुग्ध देने वाली एवं बढ़ते बच्चों को उनकी आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त पोषण उपलब्ध कराएँ.
क्या न करें? (Don'ts)
✘ फफूँदयुक्त, सड़ा-गला या दूषित चारा कभी न खिलाएँ.
✘ केवल भूसा या केवल दाना खिलाने के बजाय संतुलित आहार दें.
✘ आहार में अचानक परिवर्तन न करें; नया आहार धीरे-धीरे शामिल करें.
✘ गर्मी के मौसम में दोपहर की तेज धूप में चराई न कराएँ.
✘ गंदा, दूषित या अत्यधिक गर्म पानी न पिलाएँ.
✘ बीमार पशुओं को स्वस्थ पशुओं के साथ न रखें; आवश्यकता पड़ने पर उन्हें अलग (आइसोलेट) करें.
✘ खनिज मिश्रण एवं नियमित स्वास्थ्य देखभाल की अनदेखी न करें.
मुख्य संदेश
बदलती जलवायु में सफल एवं लाभकारी बकरी पालन के लिए पोषण एवं चारा प्रबंधन अपनाना आवश्यक है. संतुलित आहार, स्वच्छ पेयजल, मिनरल मिक्सचर, चारा संरक्षण तथा स्थानीय संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग से तापीय तनाव कम होता है, पशुओं का स्वास्थ्य एवं उत्पादन बेहतर रहता है. इन सरल उपायों को अपनाकर किसान कम लागत में अधिक उत्पादन एवं आय प्राप्त कर सकते हैं तथा बकरी पालन को टिकाऊ एवं जलवायु-अनुकूल बना सकते हैं.
लेखकगण:
रागिनी कुमारी1, राकेश कुमार2 एवं उमेश मिश्र2
1भ्रमणशील पशु चिकित्सा पदाधिकारी, दुल्हिन बाजार, पटना, दुग्ध, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग, बिहार सरकार।
2भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना–800014, बिहार।
3वरिष्ठ तकनीकी सहायक (हिंदी अनुवादक), 2भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना–800014, बिहार।
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