उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के मझोला स्थित गिल फार्म आज आधुनिक और टिकाऊ खेती का एक बेहतरीन उदाहरण बन चुका है. यहां के प्रगतिशील किसान गुरुजंत सिंह पिछले लगभग 30 वर्षों से खेती से जुड़े हैं. लंबे समय तक उन्होंने रासायनिक खेती की, लेकिन बढ़ती लागत, मिट्टी की गिरती गुणवत्ता और उत्पादन पर पड़ रहे असर ने उन्हें नई दिशा में सोचने के लिए मजबूर किया. ऐसे समय में उन्होंने जायडेक्स कंपनी की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित जैविक उत्पादों को अपनाया. इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी खेती की लागत कम होने लगी, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार आया, फसलों की बढ़वार बेहतर हुई और प्रति एकड़ करीब 4 से 5 हजार रुपये तक की बचत होने लगी.
आज गुरुजंत सिंह का अनुभव बताता है कि यदि किसान सही तकनीक और वैज्ञानिक तरीके से जैविक खेती अपनाएं, तो कम लागत में बेहतर खेती करना संभव है. यही कारण है कि वे अब धीरे-धीरे पूरी खेती को जैविक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. ऐसे में आइए उनकी सफलता की कहानी के बारे में विस्तार से जानते हैं-
30 वर्षों का खेती का अनुभव
गुरुजंत सिंह बताते हैं कि यह गिल फार्म सरदार शरणवीर सिंह गिल का है. वे पिछले लगभग तीन दशकों से इस फार्म से जुड़े हुए हैं. शुरुआत में उन्होंने खेती करना सीखा और समय के साथ खेती का पूरा संचालन संभाल लिया. आज वे लगभग 70 से 80 एकड़ में फसलों की खेती और पेड़ों सहित करीब 100 एकड़ क्षेत्र का प्रबंधन कर रहे हैं.
उनका मानना है कि खेती केवल फसल उगाने का काम नहीं है, बल्कि यह मिट्टी, पानी और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है. इसी सोच ने उन्हें जैविक खेती की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया.
100 एकड़ में होती है विभिन्न फसलों की खेती
गुरुजंत सिंह मुख्य रूप से गन्ना, धान और गेहूं की खेती करते हैं. इसके अलावा जरूरत के अनुसार मटर और मक्का जैसी फसलें भी उगाते हैं.
वे बताते हैं कि उनके क्षेत्र की जमीन लो-लैंड है, जो गन्ने की खेती के लिए काफी उपयुक्त मानी जाती है. यही वजह है कि उनके फार्म में सबसे अधिक क्षेत्र गन्ने के लिए आरक्षित है.
वर्तमान में लगभग 65 एकड़ में गन्ने की खेती की जा रही है, जबकि 20 से 25 एकड़ में गेहूं लगाया जाता है. बाकी क्षेत्र में धान, मक्का, मटर तथा अन्य आवश्यक फसलें उगाई जाती हैं. इसके साथ ही फार्म में यूकेलिप्टस और पॉपलर जैसे पेड़ों का भी अच्छा प्रबंधन किया जाता है.
पहले करते थे पूरी तरह रासायनिक खेती
गुरुजंत सिंह बताते हैं कि पहले उनकी खेती पूरी तरह रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर आधारित थी. शुरुआत में उत्पादन अच्छा मिलता था, लेकिन समय के साथ रासायनिक खेती की चुनौतियां सामने आने लगीं.
उन्होंने देखा कि हर साल उर्वरकों और कीटनाशकों की मात्रा बढ़ानी पड़ रही थी. खेती की लागत लगातार बढ़ रही थी, जबकि मिट्टी की उर्वरता धीरे-धीरे कम होती जा रही थी. जमीन पहले जैसी मुलायम नहीं रही और उत्पादन पर भी इसका असर दिखाई देने लगा.
इसी दौरान उनके अंकल सरदार शरणवीर सिंह गिल ने खेती को जैविक विधि से करने का सोचा. उनका मानना था कि यदि मिट्टी स्वस्थ रहेगी, तभी खेती भी लंबे समय तक लाभदायक बनी रहेगी.
जैविक खेती की शुरुआत दो एकड़ से
करीब तीन वर्ष पहले गुरुजंत सिंह ने जैविक खेती की शुरुआत की. शुरुआत में उन्होंने केवल दो एकड़ क्षेत्र में प्रयोग किया. वे बताते हैं कि उन्होंने जायडेक्स कंपनी की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित ‘जायटॉनिक गोधन’ उत्पाद का उपयोग करके गोबर की खाद तैयार करनी शुरू की.
पहले वे खेतों में केवल सामान्य गोबर की खाद डालते थे, लेकिन बाद में उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से खाद तैयार करने का निर्णय लिया. इसके लिए गोबर में जायटॉनिक गोधन मिलाया गया और उसे 30 से 65 दिनों तक सड़ने के लिए रखा गया.
जब खाद पूरी तरह भुरभुरी हो गई, उसकी बदबू समाप्त हो गई और वह अच्छी तरह तैयार हो गई, तब उसमें फसल की आवश्यकता के अनुसार जायटॉनिक किट मिलाकर खेतों में प्रयोग किया गया.
इस तरीके से तैयार की गई जैविक खाद का असर उन्हें पहले ही सीजन से दिखाई देने लगा.
जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों से मिला बेहतर परिणाम
गुरुजंत सिंह बताते हैं कि आज वे जायडेक्स कंपनी की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित जायटॉनिक गोधन, जायटॉनिक किट और जायटॉनिक सुरक्षा सहित कई उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं.
उनका कहना है कि इन उत्पादों के नियमित उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में काफी सुधार आया है. पहले जहां जमीन सख्त होती जा रही थी, वहीं अब खेत पहले की तुलना में अधिक मुलायम हो गए हैं.
मिट्टी में जैविक गतिविधियां बढ़ी हैं और फसलों की जड़ों का विकास बेहतर हुआ है. पौधों की बढ़वार पहले की तुलना में अधिक अच्छी दिखाई देती है और फसलें भी स्वस्थ रहती हैं.
प्रति एकड़ 4 से 5 हजार रुपये तक की बचत
गुरुजंत सिंह के अनुसार जैविक खेती अपनाने का सबसे बड़ा फायदा लागत में कमी के रूप में मिला है.
वे बताते हैं कि रासायनिक खेती की तुलना में अब प्रति एकड़ लगभग 4 से 5 हजार रुपये तक की बचत हो रही है.
रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की आवश्यकता कम होने से खेती का कुल खर्च घटा है. साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होने से भविष्य में उत्पादन पर भी सकारात्मक असर देखने को मिल रहा है.
उनका मानना है कि यदि किसान लगातार जैविक तरीकों को अपनाते रहें, तो आने वाले वर्षों में लागत और भी कम हो सकती है.
पेड़ों में भी मिला अच्छा लाभ
गुरुजंत सिंह ने केवल फसलों में ही नहीं, बल्कि यूकेलिप्टस और पॉपलर के पौधों में भी जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों का उपयोग किया.
वे बताते हैं कि पहले इन पौधों में दीमक और फंगस की समस्या अक्सर देखने को मिलती थी. कई बार पेड़ खड़े-खड़े सूख जाते थे, जिससे काफी नुकसान होता था.
लेकिन उत्पादों के उपयोग के बाद यह समस्या काफी हद तक नियंत्रित हो गई. नए पौधों की बढ़वार बेहतर हुई और पौधे पहले की तुलना में अधिक स्वस्थ दिखाई देने लगे.
इससे उन्हें विश्वास हुआ कि जैविक तकनीक केवल फसलों में ही नहीं, बल्कि वृक्षों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है.
जैविक खेती में धैर्य जरूरी
गुरुजंत सिंह का कहना है कि जैविक खेती में शुरुआत में थोड़ी अधिक मेहनत करनी पड़ती है.
आज अधिकांश किसान जल्दी परिणाम चाहते हैं. इसी कारण वे रासायनिक उर्वरकों पर अधिक निर्भर हो जाते हैं. लेकिन जैविक खेती का लाभ धीरे-धीरे दिखाई देता है और इसका असर लंबे समय तक बना रहता है.
वे कहते हैं कि यदि किसान धैर्य रखें और लगातार जैविक तरीके अपनाएं, तो उन्हें निश्चित रूप से बेहतर परिणाम मिलेंगे.
मिट्टी को बचाना सबसे बड़ी जिम्मेदारी
गुरुजंत सिंह मानते हैं कि खेती की असली ताकत मिट्टी है. यदि मिट्टी स्वस्थ रहेगी, तो फसल भी अच्छी होगी.
वे बताते हैं कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता कम होती है और उसकी प्राकृतिक संरचना भी प्रभावित होती है.
इसके विपरीत जैविक खेती मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाती है, जिससे मिट्टी लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है.
इसी सोच के साथ वे धीरे-धीरे अपने पूरे फार्म को जैविक खेती की ओर ले जाने का प्रयास कर रहे हैं.
किसानों के लिए दिया खास संदेश
गुरुजंत सिंह ने सभी किसानों से अपील करते हुए कहा कि वे एक साथ पूरी खेती बदलने के बजाय छोटे स्तर से शुरुआत करें.
वे कहते हैं कि पहले दो या चार एकड़ में जैविक खेती का प्रयोग करें. जब उसके परिणाम दिखाई देने लगें, तब धीरे-धीरे पूरे खेत में इसे अपनाएं.
उनका कहना है कि आज रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. इससे खेती की लागत भी हर साल बढ़ती जा रही है.
यदि किसान जैविक खेती अपनाते हैं, तो उनका खर्च कम होगा, मिट्टी की सेहत सुधरेगी और आने वाली पीढ़ियों को भी उपजाऊ जमीन मिलेगी.
Share your comments