Success Story of Progressive Farmer Sartaj Khan: उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर प्रगतिशील किसान सरताज खान ने यह साबित कर दिया है कि अगर खेती को आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक सोच और सही प्रबंधन के साथ किया जाए, तो यह करोड़ों का कारोबार बन सकती है। कभी दिल्ली एयरपोर्ट पर नौकरी करने वाले सरताज खान आज “शाहीद फार्म्स एंड गन्ना नर्सरी” के जरिए गन्ने की उन्नत खेती, इंटरक्रॉपिंग और मैकेनाइजेशन का सफल मॉडल तैयार कर चुके हैं। लगभग 72 एकड़ भूमि पर खेती करते हुए उन्होंने पारंपरिक कृषि को आधुनिक बिजनेस मॉडल में बदला और आज उनका सालाना टर्नओवर करीब 2 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
सरताज खान की सफलता केवल गन्ने की खेती तक सीमित नहीं है। वे अब सस्टेनेबल और ऑर्गेनिक फार्मिंग की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उनका मानना है कि भविष्य की खेती केवल उत्पादन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ी होगी। खेती के साथ डेयरी आधारित मॉडल को जोड़कर वे जैविक खेती को मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। उनका उद्देश्य आने वाले समय में खेती को पूरी तरह ऑटोमेशन और कम लागत वाले मॉडल में बदलना है।
कृषि जागरण द्वारा आयोजित मिलेनियर फार्मर ऑफ इंडिया अवार्ड्स - 2025 समारोह में उन्हें नेशनल अवार्ड सम्मानित किया गया। आज वे हजारों किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। प्रस्तुत है प्रगतिशील किसान सरताज खान से विशेष बातचीत के संपादित अंश -
सवाल: खेती की शुरुआत कैसे हुई और आपने नौकरी छोड़कर खेती में आने का फैसला क्यों किया?
जवाब: हमारी लगभग 72 एकड़ पैतृक जमीन थी, जहां पारंपरिक तरीके से खेती होती थी। मैं दिल्ली एयरपोर्ट पर नौकरी करता था, लेकिन जब रिसेशन आया तो बहुत लोगों की तरह मेरी नौकरी भी प्रभावित हुई। इसके बाद मैं वापस गांव आया।
गांव आने के बाद मैंने देखा कि खेती तो हो रही है, लेकिन उसे बिजनेस की तरह नहीं किया जा रहा था। मैंने सोचा कि क्यों न खेती को आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक सोच के साथ एक बिजनेस मॉडल में बदला जाए। फिर मैंने अपने पिता और भाइयों से चर्चा की और “शाहीद फार्म्स एंड गन्ना नर्सरी” की शुरुआत की। हमने इसे रजिस्टर कराया और उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद के रजिस्टर्ड सीडर भी बने।
सवाल: पारंपरिक गन्ना खेती से आधुनिक खेती की ओर आपका रुझान कैसे बढ़ा?
जवाब: जब मैंने दूसरे राज्यों और बड़े किसानों के मॉडल देखे तो समझ आया कि हमारे यहां खेती पुराने तरीके से हो रही है। यहां लाइन टू लाइन दूरी बहुत कम रखी जाती थी, लगभग सवा दो फीट। इससे गन्ने को हवा और धूप नहीं मिलती थी, बीमारियां बढ़ती थीं और वजन भी कम रहता था।
मैंने 4 से 4.5 फीट दूरी वाला मॉडल अपनाया। इससे फसल में हवा और पानी का संतुलन बेहतर हुआ। पौधों की ग्रोथ अच्छी हुई और उत्पादन भी बढ़ गया। आज हमारे क्षेत्र के कई किसान इसी मॉडल को अपना रहे हैं।
सवाल: आपने “शाहीद फार्म्स” को किस तरह विकसित किया?
जवाब: हमने खेती को पूरी तरह योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया। आज हमारे पास लगभग 72 एकड़ भूमि है, जिसमें बड़े स्तर पर गन्ने की खेती की जाती है। हम गन्ने की उन्नत किस्मों जैसे 13235, 0118, 14201 और 16202 की खेती कर रहे हैं।
इसके साथ हमने गन्ना बीज उत्पादन का काम भी शुरू किया। आसपास के किसानों और शुगर मिलों को उचित दर पर बीज उपलब्ध कराते हैं।
सवाल: ट्रेंच विधि अपनाने से आपको क्या फायदा मिला?
जवाब: ट्रेंच विधि ने हमारी खेती की तस्वीर बदल दी। पहले खेतों में मशीनों का इस्तेमाल करना मुश्किल था, लेकिन अब 4 से 4.5 फीट दूरी होने की वजह से मिनी ट्रैक्टर, पावर वीडर और स्प्रेयर आसानी से चल जाते हैं।
इससे लेबर कॉस्ट काफी कम हो गई। गन्ना बड़ा होने के बाद भी हम खेत के अंदर जाकर स्प्रे और खाद दे सकते हैं। इंटरकल्चर करना आसान हो गया है और फसल की निगरानी भी बेहतर हो रही है।
सवाल: अभी आप कितने क्षेत्र में गन्ने की खेती कर रहे हैं?
जवाब: पिछले साल की तरह इस बार भी 72 एकड़ भूमि पर गन्ना लगाया गया है। इसमें 20-25 एकड़ क्षेत्र गन्ना बीज उत्पादन के लिए रखा गया है। आज गन्ने की अच्छी प्रजातियों की काफी कमी है। इसलिए हम किसानों को सलाह देते हैं कि वे एक ही किस्म पर निर्भर न रहें, बल्कि कम से कम तीन प्रजातियों की बुवाई करें।
सवाल: प्रति एकड़ अधिकतम कितना उत्पादन हासिल किया है?
जवाब: अगर हेक्टेयर के हिसाब से बात करें तो हमने लगभग 2200 से 2300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन हासिल किया है। इसका सबसे बड़ा कारण सही दूरी, गहरी जुताई, उन्नत प्रजातियां और वैज्ञानिक प्रबंधन है।
सवाल: इंटरक्रॉपिंग मॉडल से किसानों को क्या फायदा हो सकता है?
जवाब: इंटरक्रॉपिंग किसानों के लिए बहुत फायदेमंद मॉडल है। गन्ने के बीच खाली जगह में हम दूसरी फसलें ले सकते हैं। इससे अतिरिक्त आमदनी होती है और मुख्य फसल की लागत भी निकल जाती है।
हम सरसों, मसूर, उड़द, मूंग, गेहूं, चना और कई तरह की सब्जियां उगा रहे हैं। अभी हमने गन्ने के साथ रंगीन शिमला मिर्च की खेती की है, जिसे देखने दूर-दूर से किसान आ रहे हैं। ब्रोकली और गांठ गोभी जैसी फसलों से भी अच्छा मुनाफा मिल रहा है।
सवाल: ऑर्गेनिक और सस्टेनेबल फार्मिंग की ओर आपका रुझान कैसे बढ़ा?
जवाब: कुछ साल पहले मैं दिल्ली में आयोजित “Make India Organic, Natural and Profitable” कार्यक्रम में गया था। वहां देशभर के कृषि वैज्ञानिक और किसान मौजूद थे। वहां जाकर मुझे महसूस हुआ कि रासायनिक खेती लंबे समय में स्वास्थ्य और मिट्टी दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकती है।
इसी वजह से मैंने धीरे-धीरे ऑर्गेनिक और नेचुरल फार्मिंग की ओर कदम बढ़ाना शुरू किया। आज हम जीवामृत, धनामृत और जैविक खादों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
सवाल: ऑर्गेनिक खेती अपनाने में सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?
जवाब: ऑर्गेनिक खेती में सबसे बड़ी चुनौती धैर्य की होती है। पहले साल उत्पादन थोड़ा कम हो सकता है क्योंकि किसान को पूरी जानकारी नहीं होती। मेरे साथ भी ऐसा हुआ। लोग मजाक उड़ाते थे कि बिना यूरिया और डीएपी के खेती कैसे होगी। लेकिन दूसरे साल हमारी उपज में 20-25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई। इसलिए मैं किसानों से कहता हूं कि धीरे-धीरे छोटे क्षेत्र से ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत करें।
सवाल: मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए आप क्या करते हैं?
जवाब: मिट्टी की सेहत सबसे महत्वपूर्ण है। हम गहरी जुताई पर बहुत जोर देते हैं। लगातार रोटावेटर चलाने से मिट्टी की नीचे की परत कठोर हो जाती है, इसलिए सबसॉइलर और डिस्क प्लाव जैसे उपकरणों का इस्तेमाल जरूरी है। इससे पानी नीचे तक जाता है और मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है। सिंचाई की जरूरत भी कम हो जाती है और उत्पादन बढ़ता है।
सवाल: गन्ने की खेती में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
जवाब: सबसे बड़ी चुनौती लेबर कॉस्ट है। गन्ने की कटाई, सफाई, बंडलिंग और लोडिंग में बहुत ज्यादा मजदूर लगते हैं। खेती का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा मैकेनाइजेशन पर आ चुका है, लेकिन गन्ना कटाई के लिए अभी भी सस्ती और प्रभावी मशीनों की कमी है। अगर सस्ता और अच्छा शुगरकेन हार्वेस्टर उपलब्ध हो जाए, तो किसानों की लागत काफी कम हो सकती है।
सवाल: क्या भारत में पूरी तरह केमिकल फ्री फार्मिंग संभव है?
जवाब: यह थोड़ा कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं है। अगर किसान धीरे-धीरे छोटे स्तर पर ऑर्गेनिक खेती शुरू करें और उसका परिणाम देखें, तो यह संभव हो सकता है।
आज खादों की कमी, महंगे दाम और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसे में प्राकृतिक खेती एक बेहतर विकल्प बन सकती है।
सवाल: क्या सरकार की योजनाएं पर्याप्त हैं?
जवाब: मेरे हिसाब से अभी किसानों में जागरूकता की कमी है। सरकार योजनाएं चला रही है, लेकिन गांव स्तर पर किसानों को ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाती। बहुत किसान आज भी ऑर्गेनिक खेती को गंभीरता से नहीं लेते। जरूरत इस बात की है कि किसानों को ट्रेनिंग और प्रैक्टिकल जानकारी ज्यादा दी जाए।
सवाल: अगले पांच वर्षों में अपने फार्म को किस रूप में देखना चाहते हैं?
जवाब: मेरा सपना है कि अगले पांच वर्षों में मेरा फार्म पूरी तरह ऑटोमेशन और मैकेनाइजेशन आधारित हो। मैं लेबर कॉस्ट को लगभग जीरो तक लाना चाहता हूं। इसके साथ मैं अपने क्षेत्र में एक “फार्मर स्कूल” भी शुरू करना चाहता हूं, जहां किसानों को आधुनिक खेती, ऑर्गेनिक फार्मिंग और नई तकनीकों की ट्रेनिंग दी जा सके।
सवाल: अभी आपका कुल सालाना टर्नओवर कितना है?
जवाब: इस समय हमारा सालाना टर्नओवर लगभग 2 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुका है। आगे हमारा लक्ष्य इसे और बढ़ाने के साथ खेती को पूरी तरह सस्टेनेबल मॉडल में बदलना है।
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