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Success Story: 50 एकड़ में गन्ने और केले की खेती, इंटरक्रॉपिंग मॉडल और 1 करोड़ का टर्नओवर - हिमांशु नाथ की सफलता की कहानी

Success Story of Progressive Farmer Himanshu Nath Singh: उत्तर प्रदेश के सीतापुर के प्रगतिशील किसान हिमांशु नाथ सिंह 50 एकड़ में गन्ना और केले की आधुनिक खेती कर सालाना करीब 1 करोड़ रुपये का टर्नओवर हासिल कर रहे हैं। ट्रेंच विधि, इंटरक्रॉपिंग, हाई डेंसिटी फार्मिंग और देसी जुगाड़ तकनीकों से उन्होंने लागत कम और उत्पादन बढ़ाया है। गन्ने में 2470 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन हासिल कर चुके हिमांशु आज गन्ना किसानों के लिए प्रेरणा बन गए हैं।

विवेक कुमार राय
Success Story of Progressive Farmer Himanshu Nath Singh
Success Story of Progressive Farmer Himanshu Nath Singh

Success Story of Progressive Farmer Himanshu Nath Khan: उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के रहने वाले प्रगतिशील किसान हिमांशु नाथ सिंह आज आधुनिक खेती, नवाचार और वैज्ञानिक सोच के दम पर देशभर के किसानों के लिए मिसाल बन चुके हैं। जहां एक ओर खेती को लेकर युवाओं में निराशा देखने को मिलती है, वहीं हिमांशु नाथ सिंह ने यह साबित कर दिखाया है कि यदि खेती को वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो यह किसी उद्योग से कम नहीं है।

करीब 50 एकड़ भूमि में गन्ना, केला और अन्य फसलों की खेती कर रहे हिमांशु नाथ सिंह आज सालाना लगभग 1 करोड़ रुपये का टर्नओवर प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने खेती में ट्रेंच विधि, इंटरक्रॉपिंग, हाई डेंसिटी फार्मिंग, जैविक उपायों और देसी जुगाड़ तकनीकों को अपनाकर लागत कम की है और उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।

उनकी खेती का मॉडल आज उन किसानों के लिए प्रेरणा है जो कम लागत में अधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं। पेश है उनसे हुई विस्तृत बातचीत के संपादित अंश-

Success Story of Progressive Farmer Himanshu Nath Singh

सवाल: सबसे पहले अपने बारे में बताइए?
जवाब:
मैं हिमांशु नाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले से हूं। हमारा फार्म बिसवां तहसील में स्थित है, जिसे लोग खंबापुर फार्म के नाम से जानते हैं। खेती हमारे परिवार में पिछले 50-60 वर्षों से हो रही है। मेरे पिता जी खेती में लगातार नए प्रयोग करते थे और वही चीज मुझे बचपन से प्रेरित करती रही।

मैंने खेती की शुरुआत किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि रुचि और लगाव से की। जब मैं ग्रेजुएशन कर रहा था, उसी दौरान महसूस हुआ कि पिता जी को एक हेल्पिंग हैंड की जरूरत है। धीरे-धीरे मैं उनके साथ खेतों में जाने लगा और फिर खेती मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गई।

आज मैं उसी विरासत को आगे बढ़ा रहा हूं। वर्तमान में लगभग 50 एकड़ भूमि में खेती कर रहे हैं। हमारी मुख्य फसलें गन्ना और केला हैं, लेकिन खेती के रोटेशन के अनुसार गेहूं, सरसों और दूसरी फसलें भी लेते रहते हैं। सभी फसलों को मिलाकर सालाना टर्नओवर करीब 1 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है।

सवाल: अभी आप गन्ने की कौन-कौन सी किस्मों की खेती कर रहे हैं?
जवाब:
इस समय मेरे पास 9-10 गन्ने की वैरायटी हैं क्योंकि मैं बीज उत्पादन का काम भी करता हूं। इनमें मुख्य रूप से 0118, 0238, 16202, 13231, 15023, 14201, 13235 जैसी किस्में शामिल हैं।

अभी तक 0238 वैरायटी को पूरी तरह कोई दूसरी किस्म रिप्लेस नहीं कर पाई है। हालांकि नई किस्में भी काफी अच्छी आ रही हैं। 0118 और 14201 बहुत अच्छी वैरायटी हैं। वहीं 18231 नई रिलीज हुई है और काफी प्रॉमिसिंग लग रही है।

सवाल: गन्ने की बुवाई का सबसे अच्छा समय कौन-सा मानते हैं?
जवाब:
मेरी ज्यादातर बुवाई सितंबर-अक्टूबर में होती है। इससे इंटरक्रॉपिंग आसानी से हो जाती है और खेत का रोटेशन भी सही रहता है। फरवरी-मार्च की बुवाई मैं कम करता हूं।

सवाल: आप गन्ने की खेती में कौन-सी आधुनिक तकनीक अपनाते हैं?

जवाब: हम ट्रेंच विधि से खेती करते हैं। इसमें लाइन टू लाइन दूरी लगभग 5 से 5.5 फीट रखते हैं और बड टू बड दूरी 1 से 1.5 फीट तक रहती है।

जब हमने ट्रेंच विधि की शुरुआत की थी तब तीन बड इस्तेमाल करते थे, लेकिन धीरे-धीरे हमने सिंगल बड तकनीक अपनाई। इससे बीज की लागत काफी कम हो गई, जबकि उत्पादन में कोई कमी नहीं आई।

ट्रेंच विधि का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें बीच में पर्याप्त जगह बचती है। उस जगह में हम इंटरक्रॉपिंग करते हैं। जैसे सरसों, आलू और सब्जियां। इससे गन्ने की शुरुआती लागत लगभग निकल जाती है और किसान को अतिरिक्त आय मिलती है।

सवाल: अभी आप प्रति हेक्टेयर कितना उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं?
जवाब:
औसतन हम 1000 से 1100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक गन्ना उत्पादन ले लेते हैं। लेकिन एक बार हमने 2470 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन हासिल किया था, जिसके लिए मुझे उत्तर प्रदेश में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ था। यह उपलब्धि मेरे लिए बहुत खास रही क्योंकि इससे यह साबित हुआ कि यदि किसान सही तकनीक अपनाए तो उत्पादन कई गुना बढ़ाया जा सकता है।

सवाल: आज गन्ने की खेती में किसान सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
जवाब:
सबसे बड़ी गलती किसान मिट्टी की तैयारी में करते हैं। बहुत से किसान बस खेत जोतकर बुवाई कर देते हैं, जबकि सही मिट्टी तैयारी सबसे जरूरी चीज है।

इसके अलावा अच्छे बीज का चयन, सही सिंचाई व्यवस्था और समय पर खरपतवार नियंत्रण बहुत जरूरी है। खेती में टाइम मैनेजमेंट सबसे अहम है। जिस समय जिस काम की जरूरत हो, वह उसी समय होना चाहिए।

सवाल: लागत कम और उत्पादन ज्यादा कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
जवाब:
सबसे पहले किसानों को ट्रेंच विधि अपनानी चाहिए। इसके साथ इंटरक्रॉपिंग जरूर करनी चाहिए। इससे अतिरिक्त आय मिलती है और लागत कम हो जाती है।

दूसरी महत्वपूर्ण चीज है मैकेनाइजेशन। किसानों को धीरे-धीरे मशीनों की तरफ बढ़ना चाहिए ताकि मजदूरी लागत कम हो सके।

साथ ही ग्रीन मैन्योरिंग, गोबर की खाद और जैविक तरीकों का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। इससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है और लंबे समय में उत्पादन बढ़ता है।

सवाल: कौन-सी इंटरक्रॉप सबसे ज्यादा फायदेमंद रहती है?
जवाब:
यह हर क्षेत्र की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। पहले मैं आलू और सब्जियों की खेती करता था। उससे अच्छा फायदा भी मिलता था। लेकिन हमारे इलाके में बंदरों की समस्या बहुत ज्यादा है, जिससे नुकसान होने लगा।

इसी वजह से अब मैं पीली सरसों की खेती ज्यादा कर रहा हूं। हालांकि आलू अभी भी बहुत अच्छी इंटरक्रॉप मानी जाती है क्योंकि इससे गन्ने पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।

सवाल: आपने केले की खेती क्यों शुरू की?
जवाब:
लगातार गन्ने की खेती करने से जमीन कमजोर हो जाती है। इसलिए फसल चक्र अपनाना जरूरी है। इसी सोच के साथ हमने केले की खेती शुरू की।

केले की फसल मिट्टी में ह्यूमस बढ़ाती है। इसके पौधों के अवशेष प्राकृतिक खाद का काम करते हैं। जब उसी खेत में बाद में गन्ना लगाया जाता है तो उत्पादन काफी अच्छा मिलता है।

सवाल: केले में प्रति पौधा कितना उत्पादन मिल जाता है?
जवाब:
हम औसतन 25 किलो प्रति पौधा उत्पादन मानकर चलते हैं। कई पौधों में यह 28 से 30 किलो तक भी पहुंच जाता है। लेकिन हम हमेशा औसत के हिसाब से ही कैलकुलेशन करते हैं।

सवाल: आपने केले की खेती में कौन-कौन से इनोवेशन किए हैं?
जवाब:
केले की खेती में सबसे ज्यादा खर्च पौधों पर मिट्टी चढ़ाने में आता था। इसमें काफी मजदूरी लगती थी। इसलिए मैंने मिनी ट्रैक्टर में प्लाऊ को उल्टा जोड़कर एक देसी जुगाड़ मशीन तैयार की।

अब वही काम जो पहले 5-7 मजदूर 10 दिनों में करते थे, वह एक दिन में लगभग 20 बीघा खेत में हो जाता है। इससे मजदूरी लागत में भारी कमी आई है।

इसके अलावा हमने हाई डेंसिटी फार्मिंग भी शुरू की है। पहले एक एकड़ में करीब 1100 पौधे लगाए जाते थे, लेकिन अब 1550-1600 पौधे लगाए जा रहे हैं।

सवाल: क्या हाई यील्ड के लिए केमिकल जरूरी है?
जवाब:
नहीं, मैं ऐसा नहीं मानता। हम सबसे ज्यादा ध्यान मिट्टी की तैयारी पर देते हैं। गोबर की खाद, ढैंचा, जीवामृत और घन जीवामृत जैसी चीजों का इस्तेमाल करते हैं। धीरे-धीरे हम ऑर्गेनिक खेती की तरफ भी बढ़ रहे हैं।

समस्या यह है कि किसान तुरंत रिजल्ट चाहते हैं। केमिकल खाद डालते ही असर दिखाई देता है, जबकि जैविक तरीकों में समय लगता है। लेकिन लंबे समय में यही तरीके मिट्टी को बचाते हैं।

आज मिट्टी की नमी रोकने की क्षमता कम होती जा रही है। जमीन बंजर हो रही है। जड़ों का विकास सही नहीं हो पा रहा। अगर अभी किसान नहीं संभले तो आने वाले समय में खेती और मुश्किल हो जाएगी।

सवाल: क्या भविष्य में लेबर फ्री फार्मिंग संभव है?
जवाब:
पूरी तरह लेबर फ्री खेती अभी संभव नहीं है। लेकिन 80-90 प्रतिशत तक मैकेनाइजेशन जरूर हो सकता है।

आज कई मशीनें आ चुकी हैं, लेकिन उनकी कीमत अभी छोटे किसानों की पहुंच से बाहर है। आने वाले समय में जब मशीनें सस्ती होंगी तो खेती और आसान हो जाएगी।

सवाल: क्या कभी लगा कि खेती छोड़कर नौकरी करनी चाहिए?

जवाब: नहीं, ऐसा कभी नहीं लगा। मेरे पिता जी लगातार खेती में प्रयोग करते थे। लोग उनके खेत देखने आते थे। वह चीज मुझे हमेशा मोटिवेट करती थी। खेती में जब मेहनत का परिणाम दिखाई देता है तो उससे बड़ा संतोष कहीं नहीं मिलता।

सवाल: किसानों के लिए आपका क्या संदेश है?
जवाब:
आज के समय में खेती को सिर्फ परंपरागत तरीके से नहीं किया जा सकता। किसानों को नई तकनीकों को अपनाना होगा। मिट्टी की सेहत पर ध्यान देना होगा और खेती को बिजनेस की तरह समझना होगा।

अगर किसान सही योजना, वैज्ञानिक सोच और धैर्य के साथ काम करें तो खेती भी शानदार मुनाफा देने वाला क्षेत्र बन सकती है।

English Summary: success story of progressive farmer Himanshu Nath Singh sugarcane banana farming intercropping model 1 crore turnover Published on: 15 May 2026, 04:46 PM IST

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