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Success Story: एक पौधे से 25 किलो हल्दी उत्पादन का रिकॉर्ड, बहुफसली खेती - प्रगतिशील किसान नरेंद्र सिंह मेहरा की सफलता की कहानी

उत्तराखंड के प्रगतिशील किसान नरेंद्र सिंह मेहरा प्राकृतिक और बहुफसली खेती के जरिए नई मिसाल कायम कर रहे हैं। उन्होंने 12 वर्षों की मेहनत से नरेंद्र-09 गेहूं किस्म विकसित की और एक पौधे से 25 किलो हल्दी उत्पादन का रिकॉर्ड बनाया। प्राकृतिक खेती, देसी बीज संरक्षण और जैविक तकनीकों से वे किसानों को कम लागत में बेहतर उत्पादन का संदेश दे रहे हैं।

विवेक कुमार राय
narendra singh mehra success story
प्रगतिशील किसान नरेंद्र सिंह मेहरा

उत्तराखंड के नैनीताल जनपद के हल्द्वानी विकासखंड स्थित देवला महल्ला, गोलापाट क्षेत्र के रहने वाले प्रगतिशील किसान नरेंद्र सिंह मेहरा आज प्राकृतिक खेती, जैविक खेती, देसी बीज संरक्षण और डेयरी आधारित खेती मॉडल के जरिए देशभर में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। पिछले 10 वर्षों से वे जहर मुक्त खेती को बढ़ावा देने के मिशन पर काम कर रहे हैं। सीमित भूमि होने के बावजूद उन्होंने प्राकृतिक खेती, बहुफसली खेती, बागवानी, देसी गाय आधारित डेयरी और जैविक उत्पादों के जरिए खेती को लाभकारी बनाया है।

नरेंद्र सिंह मेहरा का मानना है कि खेती का उद्देश्य केवल अधिक उत्पादन नहीं, बल्कि ऐसा भोजन तैयार करना होना चाहिए जो लोगों के स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित हो। उन्होंने रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती अपनाई और आज वे किसानों को देसी बीजों के संरक्षण, जैविक घोलों के उपयोग और कम लागत वाली खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

उन्होंने 12 वर्षों की मेहनत से नरेंद्र-09 गेहूं की उन्नत किस्म विकसित की, जो कम पानी और बदलते मौसम में भी अच्छा उत्पादन देती है। इसके अलावा एक पौधे से 25 किलो से अधिक हल्दी उत्पादन कर रिकॉर्ड भी बनाया। खेती, डेयरी, बागवानी और जैविक उत्पादों के जरिए उनका सालाना टर्नओवर 12 से 15 लाख रुपये तक पहुंच चुका है। कृषि के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है। प्रस्तुत है प्रगतिशील किसान नरेंद्र सिंह मेहरा से विशेष बातचीत के संपादित अंश-

सवाल: सबसे पहले अपने बारे में और खेती के सफर के बारे में बताइए?
जवाब: मैं पिछले कई वर्षों से खेती में लगातार प्रयोग कर रहा हूं और खेती को केवल व्यवसाय नहीं बल्कि समाज सेवा और स्वास्थ्य से जुड़ा मिशन मानता हूं। पिछले लगभग 10 वर्षों से मैं प्राकृतिक खेती, जैविक खेती और जहर मुक्त खेती की दिशा में काम कर रहा हूं। मेरा मुख्य उद्देश्य लोगों तक ऐसा भोजन पहुंचाना है जो पूरी तरह सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक हो।

इसके साथ-साथ मैं बीज संरक्षण, जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण पर भी लगातार काम कर रहा हूं। आज खेती में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसान अधिक उत्पादन के चक्कर में रासायनिक खेती पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो रही है और लोगों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है। इसलिए मैंने तय किया कि मैं खेती को प्राकृतिक तरीके से आगे बढ़ाऊंगा और किसानों को भी इसके लिए प्रेरित करूंगा।

सवाल: आपने रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती अपनाने का फैसला क्यों लिया?
जवाब: जब हम लगातार रासायनिक खेती करते हैं तो शुरुआत में उत्पादन जरूर बढ़ता है, लेकिन धीरे-धीरे मिट्टी की उर्वरता कम होने लगती है। मैंने खुद अपने खेतों में यह बदलाव देखा। पहले जहां कम खाद में अच्छी फसल हो जाती थी, वहीं बाद में ज्यादा रसायन डालने के बावजूद उत्पादन स्थिर होने लगा। इसके अलावा लोगों के स्वास्थ्य पर भी इसका बुरा असर देखने को मिला।

मुझे लगा कि अगर समय रहते बदलाव नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए खेती करना मुश्किल हो जाएगा। इसी सोच के साथ मैंने प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ाया। शुरुआत में कुछ चुनौतियां जरूर आईं, लेकिन धीरे-धीरे परिणाम बहुत अच्छे आने लगे। मिट्टी की गुणवत्ता सुधरी, लागत कम हुई और उत्पादन भी बेहतर होने लगा। सबसे बड़ी बात यह रही कि लोगों का भरोसा मेरे उत्पादों पर बढ़ा।

सवाल: प्राकृतिक खेती में देसी बीजों की क्या भूमिका है?
जवाब: प्राकृतिक खेती का सबसे मजबूत आधार देसी बीज हैं। अगर हम हाइब्रिड बीजों के साथ प्राकृतिक खेती करने की कोशिश करेंगे तो हमें पूरी सफलता नहीं मिल पाएगी। हमारे पुराने देसी बीज मौसम के अनुसार खुद को ढाल लेते थे और उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अधिक होती थी।

आज स्थिति यह हो गई है कि किसान हर साल बाजार से बीज खरीदने को मजबूर हैं। पहले किसान अपने घर का बीज खुद तैयार करते थे। मैं लगातार किसानों को यह समझाने का प्रयास करता हूं कि अगर हमें खेती को आत्मनिर्भर बनाना है तो देसी बीजों को बचाना होगा। आदिवासी क्षेत्रों में आज भी कई पारंपरिक बीज सुरक्षित हैं और हमें उन्हें संरक्षित करने की दिशा में गंभीर प्रयास करने चाहिए।

सवाल: आपने नरेंद्र-09 गेहूं की किस्म कैसे विकसित की?
जवाब: एक दिन मुझे अपने खेत में गेहूं का एक ऐसा पौधा दिखाई दिया जो बाकी पौधों से अलग था। उसकी बालियां और बढ़वार अन्य पौधों से बेहतर थी। मैंने जिज्ञासावश उस पौधे को अलग रखा और उसके बीज को अगले सीजन में बोया। धीरे-धीरे मैंने लगातार उस पर प्रयोग किए।

करीब 12 वर्षों तक लगातार मेहनत, परीक्षण और चयन की प्रक्रिया चलती रही। उसके बाद नरेंद्र-09 गेहूं की किस्म तैयार हुई। मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि यह पूरी तरह देसी और प्राकृतिक बीज है। इसमें किसी प्रकार का रासायनिक हस्तक्षेप नहीं किया गया। यह किस्म किसानों के लिए काफी उपयोगी साबित हो रही है।

सवाल: नरेंद्र-09 गेहूं की सबसे बड़ी खासियत क्या है?
जवाब: इस गेहूं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम पानी में भी अच्छी पैदावार देता है। आज जल संकट लगातार बढ़ रहा है और किसानों के लिए कम पानी में उत्पादन लेना बहुत जरूरी हो गया है। यह किस्म पर्वतीय क्षेत्रों, वर्षा आधारित खेती वाले इलाकों और बदलते मौसम में भी अच्छा प्रदर्शन करती है।

इसके अलावा इसकी अंकुरण क्षमता लंबे समय तक बनी रहती है। अगर किसान इस बीज को 2-3 साल बाद भी बोते हैं तो भी यह अच्छी तरह उग जाता है। यही विशेषता देसी बीजों को हाइब्रिड बीजों से अलग बनाती है।

सवाल: एक पौधे से 25 किलो हल्दी उत्पादन का रिकॉर्ड कैसे बना?
जवाब: जब मैंने जैविक खेती शुरू की तो लोग कहते थे कि प्राकृतिक खेती में उत्पादन कम होता है। मैंने इस सोच को बदलने के लिए हल्दी पर प्रयोग शुरू किया। मैंने एक पौधे को लगातार दो वर्षों तक जीवामृत, वर्मी कम्पोस्ट और प्राकृतिक तकनीकों से तैयार किया।

उसकी मिट्टी को समय-समय पर हल्का किया गया और पौधे को पूरी तरह प्राकृतिक पोषण दिया गया। जब उसकी खुदाई हुई तो एक पौधे से 25 किलो से अधिक हल्दी निकली। यह मेरे लिए बहुत गर्व का क्षण था क्योंकि इससे यह साबित हुआ कि प्राकृतिक खेती में भी बेहतर उत्पादन लिया जा सकता है।

सवाल: प्राकृतिक खेती में आप कौन-कौन से जैविक घोल इस्तेमाल करते हैं?
जवाब: मैं मुख्य रूप से बीजामृत, जीवामृत और घन जीवामृत का उपयोग करता हूं। बीजामृत का इस्तेमाल बीज उपचार के लिए किया जाता है ताकि बीज मजबूत बने और रोगों से सुरक्षित रहे। इसे गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और मिट्टी से तैयार किया जाता है।

जीवामृत मिट्टी में सूक्ष्म जीवों को सक्रिय करता है और पौधों को प्राकृतिक पोषण देता है। इसके अलावा मैं नीम और अन्य स्थानीय वनस्पतियों से बने अर्क का भी उपयोग करता हूं। इससे रासायनिक कीटनाशकों की जरूरत नहीं पड़ती और खेती पूरी तरह सुरक्षित रहती है।

सवाल: प्राकृतिक खेती से लागत और मुनाफे पर कितना असर पड़ा?
जवाब: जब मैं रासायनिक खेती करता था तब उर्वरक, दवाइयों और कीटनाशकों पर सालाना 80 से 90 हजार रुपये तक खर्च हो जाते थे। लेकिन प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद मेरी लागत काफी कम हो गई। अब खेत में इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर चीजें मुझे अपने आसपास से ही मिल जाती हैं।

गोबर, गोमूत्र, नीम और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से लागत घटकर लगभग 5 से 10 हजार रुपये तक रह गई। वहीं दूसरी तरफ मेरे उत्पादों की बाजार में मांग बढ़ गई। लोग सीधे मेरे घर से अनाज, फल और सब्जियां खरीदने आते हैं क्योंकि उन्हें भरोसा है कि ये उत्पाद पूरी तरह जहर मुक्त हैं।

सवाल: आपके उत्पाद बाजार में कितनी कीमत पर बिकते हैं?
जवाब: प्राकृतिक खेती के कारण मेरे उत्पादों को सामान्य बाजार से बेहतर कीमत मिलती है। उदाहरण के लिए जहां सामान्य गेहूं बाजार में 2500 से 3000 रुपये प्रति क्विंटल बिकता है, वहीं मेरा गेहूं 5000 रुपये प्रति क्विंटल तक बिक जाता है।

इसी तरह दाल, फल, सब्जियां और अन्य उत्पाद भी अच्छी कीमत पर बिकते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि मुझे अपने उत्पाद मंडी में ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती। ग्राहक सीधे मेरे घर से खरीदारी करते हैं।

सवाल: बहुफसली खेती को आप कितना जरूरी मानते हैं?
जवाब: बहुफसली खेती खेती का पुराना और बेहद सफल मॉडल है। पहले किसान एक ही खेत में कई तरह की फसलें उगाते थे। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती थी और किसानों को अलग-अलग स्रोतों से आय मिलती थी।

अगर हम लगातार एक ही फसल बोते रहेंगे तो मिट्टी कमजोर हो जाएगी और रोग बढ़ेंगे। इसलिए मैं गेहूं के साथ चना, मटर और अन्य फसलें लगाने की सलाह देता हूं। इससे मिट्टी में प्राकृतिक संतुलन बना रहता है।

सवाल: खेती और डेयरी से आपका सालाना टर्नओवर कितना है?
जवाब: मैं बहुत बड़े स्तर पर खेती नहीं करता। मेरे पास लगभग 8 एकड़ भूमि है, जिसमें लेकिन खेती, डेयरी, बागवानी और जैविक उत्पादों को मिलाकर मेरा सालाना टर्नओवर लगभग 12 से 15 लाख रुपये तक पहुंच जाता है।

सवाल: युवाओं को खेती के बारे में क्या संदेश देना चाहेंगे?
जवाब: आज का युवा पढ़ा-लिखा है और नई तकनीकों को समझता है। अगर उसे सही दिशा और  सही अवसर मिलें तो वह खेती में बड़ा बदलाव ला सकता है। मेरा मानना है कि खेती को उद्योग का दर्जा मिलना चाहिए ताकि किसान केवल कच्चा माल बेचने तक सीमित न रहें बल्कि उसका प्रसंस्करण करके अधिक लाभ कमा सकें।

मैं युवाओं से कहना चाहूंगा कि वे खेती को छोटे काम के रूप में न देखें। प्राकृतिक खेती, जैविक खेती, प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन के जरिए कृषि को एक सफल व्यवसाय बनाया जा सकता है। यही भविष्य की खेती है और यही आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ जीवन दे सकती है।

English Summary: narendra singh mehra success story natural farming multicropping 25kg turmeric production record Published on: 16 May 2026, 06:14 PM IST

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