उर्वरकों ने कृषि उत्पादकता बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, विशेषकर भारत जैसे देशों में. किंतु आज भारत में प्रतिवर्ष 60 मिलियन टन से अधिक उर्वरकों की खपत होती है, और प्रयोग किए गए नाइट्रोजन का केवल 30–40% ही फसलों द्वारा प्रभावी रूप से उपयोग किया जाता है. शेष नाइट्रोजन लीचिंग, अपवाह (रनऑफ), वाष्पीकरण तथा डीनाइट्रीफिकेशन के माध्यम से नष्ट हो जाती है, जिससे भूजल प्रदूषण, यूट्रोफिकेशन, मृदा क्षरण तथा ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में वृद्धि होती है. नाइट्रोजन के अत्यधिक उपयोग तथा फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों के अपर्याप्त प्रयोग ने पोषक तत्वों के असंतुलन को और बढ़ाया है तथा उर्वरक उपयोग दक्षता को कम किया है.
कृषि जलवायु प्रणाली में एक विशिष्ट स्थान रखती है क्योंकि यह ग्रीनहाउस गैसों का स्रोत भी है और अवशोषक (सिंक) भी. जहाँ यह क्षेत्र भारत के कुल GHG उत्सर्जन में लगभग 14% योगदान देता है, जिसका प्रमुख कारण उर्वरित मिट्टियों से होने वाला नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) उत्सर्जन है, वहीं इसमें बेहतर मृदा एवं पोषक तत्व प्रबंधन के माध्यम से कार्बन संचयन की भी पर्याप्त क्षमता है. संतुलित उर्वरीकरण उर्वरक-संबंधित उत्सर्जन को 20–40% तक कम कर सकता है तथा यह फसल उत्पादकता बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य सुधारने, खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने और भारत के नेट ज़ीरो 2070 लक्ष्यों का समर्थन करने का एक वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मार्ग प्रदान करता है.
पोषक तत्व असंतुलन की बढ़ती चुनौती
उर्वरकों का उपयोग अभी भी नाइट्रोजन-केंद्रित बना हुआ है. कई क्षेत्रों में N:P अनुपात 10:4:1 से अधिक है, जबकि अनुशंसित अनुपात 4:2:1 है. यह असंतुलन मृदा में पोषक तत्वों के संतुलन को बाधित करता है, उर्वरक उपयोग दक्षता को कम करता है तथा फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की व्यापक कमी का कारण बनता है. समय के साथ ऐसी प्रथाएँ मृदा उर्वरता में गिरावट, मृदा जैविक कार्बन में कमी तथा उर्वरकों के प्रति फसलों की प्रतिक्रिया में कमी का कारण बनती हैं.
असंतुलित उर्वरीकरण के पर्यावरणीय दुष्परिणाम
जलवायु परिवर्तन और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन
नाइट्रोजन उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) का एक प्रमुख स्रोत है, जो एक ऐसी ग्रीनहाउस गैस है जिसकी वैश्विक तापवर्धन क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में लगभग 273 गुना अधिक है. कृषि मिट्टियाँ सूक्ष्मजीवी नाइट्रीफिकेशन एवं डीनाइट्रीफिकेशन प्रक्रियाओं के माध्यम से N₂O उत्सर्जित करती हैं, जो अतिरिक्त नाइट्रोजन की उपस्थिति में और अधिक तीव्र हो जाती हैं. इसलिए, पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार कृषि क्षेत्र के जलवायु प्रभाव को कम करने की एक महत्वपूर्ण रणनीति है.
जल प्रदूषण और पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण
लीचिंग और सतही अपवाह के माध्यम से नष्ट होने वाले पोषक तत्व नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस को जल निकायों तक पहुँचाते हैं, जिससे भूजल प्रदूषण और यूट्रोफिकेशन की समस्या उत्पन्न होती है. पोषक तत्वों की उच्च सांद्रता शैवाल प्रस्फुटन (Algal Blooms) को बढ़ावा देती है, घुलित ऑक्सीजन के स्तर को कम करती है तथा जलीय पारिस्थितिक तंत्रों को बाधित करती है. इस प्रकार का पोषक तत्व प्रदूषण न केवल जल गुणवत्ता और जैव विविधता के लिए खतरा है, बल्कि समाज पर महत्वपूर्ण पारिस्थितिक एवं आर्थिक लागत भी थोपता है.
मृदा क्षरण
यूरिया जैसे नाइट्रोजन-प्रधान उर्वरकों का निरंतर उपयोग, अन्य पोषक तत्वों की पर्याप्त पूर्ति के बिना तथा जैविक पदार्थों के पुनर्चक्रण की उपेक्षा के साथ, मृदा क्षरण को तेज करता है. इसके सामान्य परिणाम निम्नलिखित हैं:
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मृदा अम्लीकरण तथा मृदा की भौतिक गुणवत्ता में गिरावट
• पोषक तत्वों का क्षय (न्यूट्रिएंट माइनिंग) एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी
• मृदा जैविक कार्बन में गिरावट एवं सूक्ष्मजीव विविधता में कमी
समय के साथ ये परिवर्तन मृदा उत्पादकता को घटाते हैं और बाहरी कृषि आदानों पर निर्भरता बढ़ाते हैं, जिससे पोषक तत्व उपयोग दक्षता में गिरावट, खराब मृदा स्वास्थ्य तथा बढ़ती उत्पादन लागत का एक दुष्चक्र उत्पन्न होता है.
संतुलन का वादा: पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा के लिए लाभ
संतुलित उर्वरक प्रबंधन आज उपलब्ध सबसे प्रभावी जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियों में से एक है.
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ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी
पोषक तत्वों के अनुकूलित उपयोग से मिट्टी में अतिरिक्त नाइट्रोजन की मात्रा कम होती है और परिणामस्वरूप नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन घटता है. अध्ययनों से संकेत मिलता है कि स्थान-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन (Site-Specific Nutrient Management) फसल उत्पादन से समझौता किए बिना उर्वरक-संबंधित ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 20–40% तक कम कर सकता है.
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कार्बन संचयन में वृद्धि
संतुलित पोषण फसलों की सशक्त वृद्धि और अधिक जैव द्रव्यमान (Biomass) उत्पादन को बढ़ावा देता है, जिससे मिट्टी में कार्बन का निवेश बढ़ता है. बेहतर जड़ विकास तथा जैविक पदार्थों का संचय दीर्घकालिक मृदा कार्बन संचयन और बेहतर मृदा स्वास्थ्य में योगदान देता है.
iii. जलवायु तनावों के प्रति अधिक सहनशीलता
संतुलित पोषण प्राप्त फसलें सूखा, ताप तनाव तथा अनियमित वर्षा जैसी परिस्थितियों को बेहतर ढंग से सहन करती हैं. उदाहरण के लिए, पोटाश जल उपयोग दक्षता को बढ़ाता है और प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों में पौधों की रक्षा प्रणाली को मजबूत करता है.
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किसानों के लिए आर्थिक लाभ
संतुलित उर्वरीकरण उर्वरकों की बर्बादी को कम करता है, जिससे कृषि लागत घटती है. साथ ही, उर्वरक प्रतिक्रिया दक्षता में वृद्धि होने से उत्पादन और कृषि लाभप्रदता दोनों में सुधार होता है.
कार्यान्वयन की चुनौतियाँ और आगे की राह
संतुलित उर्वरीकरण पद्धतियों की ओर संक्रमण चुनौतियों से रहित नहीं है. भारत के कृषि समुदाय का 85% से अधिक हिस्सा छोटे और सीमांत किसानों का है, जिन्हें प्रायः मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं, गुणवत्तापूर्ण जैविक आदानों तथा तकनीकी ज्ञान तक सीमित पहुँच प्राप्त होती है. पंजाब, हरियाणा तथा बिहार के कुछ हिस्सों जैसे गहन कृषि क्षेत्रों में, दशकों से चली आ रही यूरिया सब्सिडी ने गंभीर पोषक तत्व असंतुलन (अत्यधिक विकृत N:P अनुपात), भूजल प्रदूषण तथा स्थिर होती उत्पादकता जैसी समस्याएँ उत्पन्न की हैं.
फिर भी, मृदा स्वास्थ्य कार्ड अभियान, सटीक कृषि उपकरणों हेतु कस्टम हायरिंग सेंटर तथा नीम-लेपित यूरिया एवं जैव उर्वरकों को बढ़ावा देने वाली सार्वजनिक-निजी पहल जैसी सफल पहलों ने यह प्रदर्शित किया है कि लक्षित सहयोग के माध्यम से इन बाधाओं को दूर किया जा सकता है. डिजिटल सलाहकारी सेवाओं, मोबाइल अनुप्रयोगों तथा निम्न-उत्सर्जन कृषि के लिए कार्बन क्रेडिट प्रोत्साहनों का एकीकरण इस परिवर्तन को समावेशी, आर्थिक रूप से व्यवहार्य तथा विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर लागू करने योग्य बना सकता है.
लेखकगण: डॉ. रचना दुबे (वरिष्ठ वैज्ञानिक) एवं डॉ. अनुप दास (निदेशक)
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना
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