हाल के वर्षों में भारतीय कृषि एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है. एक ओर खाद्यान्न उत्पादन की मांग निरंतर बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर कृषि की आधारशिला अर्थात् मृदा स्वास्थ्य लगातार कमजोर होता जा रहा है. इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए 1 से 30 जून 2026 तक चलने वाले देशव्यापी “खेत बचाओ अभियान” मृदा स्वास्थ्य की पुनर्स्थापना तथा कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में तेजी से गति प्राप्त कर रहा है. इस अभियान ने संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन की आवश्यकता को पुनः केंद्र में ला दिया है, जिससे समेकित पोषक तत्व प्रबंधन सतत् कृषि रणनीतियों का प्रमुख आधार बनकर उभर रहा है. समेकित पोषक तत्व प्रबंधन अब केवल एक पोषण संबंधी अनुशंसा नहीं रह गया है, बल्कि यह ऐसी आवश्यकता बन गया है जो उत्पादकता बढ़ाने, लागत घटाने तथा कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
भारतीय कृषि का बदलता स्वरूप
भारतीय कृषि की सफलता की कहानी, विशेषकर हरित क्रांति के बाद, सर्वविदित है. उच्च उपज देने वाली किस्मों के विकास तथा रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग ने खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की. किंतु समय के साथ इस अधिक-आदान आधारित कृषि प्रणाली की सीमाएँ भी सामने आने लगीं. यूरिया जैसे नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता तथा फॉस्फोरस (विशेषकर डीएपी के असंतुलित उपयोग), पोटाश एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपेक्षा ने मृदा उर्वरता में गंभीर असंतुलन उत्पन्न कर दिया है. आज अनेक किसान यह अनुभव कर रहे हैं कि उर्वरकों की मात्रा बढ़ाने के बावजूद फसलों की प्रतिक्रिया घटती जा रही है. इसे सामान्यतः घटती कारक उत्पादकता (Declining Factor Productivity) कहा जाता है, जो मृदा स्वास्थ्य में गिरावट का स्पष्ट संकेत है.
यह स्थिति निम्न कारणों से और अधिक गंभीर हो गई है-
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पोषक तत्वों की पूर्ति किए बिना निरंतर फसल उत्पादन
• फसल अवशेषों का जलाना
• मृदा में जैविक पदार्थ की घटती मात्रा
• जैविक एवं जैव-आधारित आदानों का सीमित उपयोग
परिणामस्वरूप मृदा अपनी प्राकृतिक उर्वरता, संरचना तथा जैविक सक्रियता खोती जा रही है.
उर्वरक उपयोग का वर्तमान स्वरूप: चिंता का विषय
हाल के आंकड़े देश में उर्वरकों के उपयोग में बढ़ते असंतुलन को दर्शाते हैं. जहाँ आदर्श N:P:K अनुपात 4:2:1 माना जाता है, वहीं वर्तमान में यह बढ़कर लगभग 9.8:3.7:1 हो गया है, जो नाइट्रोजन के अत्यधिक उपयोग को दर्शाता है. दूसरी ओर, आयातित उर्वरकों पर भारत की निर्भरता भी लगातार बढ़ रही है. देश में कुल पोषक तत्व खपत लगभग 32.93 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँच चुकी है, जो बढ़ती मांग तथा बाहरी संसाधनों पर बढ़ते दबाव को दर्शाती है. वैश्विक मूल्य अस्थिरता एवं भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने भी इस चुनौती को बढ़ाया है, जिसका सीधा प्रभाव किसानों पर बढ़ती उत्पादन लागत के रूप में पड़ रहा है.
समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM)
समेकित पोषक तत्व प्रबंधन एक समग्र दृष्टिकोण है जो रासायनिक उर्वरकों, जैविक खादों, जैव उर्वरकों तथा उन्नत कृषि पद्धतियों के संतुलित एवं विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देता है. इसका मूल सिद्धांत है—
“मृदा को पोषण दें, ताकि मृदा पौधों को पोषण दे सके.”
केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय, समेकित पोषक तत्व प्रबंधन दीर्घकाल तक मृदा उर्वरता बनाए रखने तथा पोषक तत्वों के कुशल उपयोग पर बल देता है. यदि इसे प्रभावी ढंग से अपनाया जाए तो समय के साथ रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता में लगभग 25 प्रतिशत या उससे अधिक की कमी लाई जा सकती है.
समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) के प्रमुख घटक
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रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग
रासायनिक उर्वरक (जैसे यूरिया, डीएपी, एमओपी आदि) फसलों की तात्कालिक पोषक तत्व आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक हैं. किंतु इनका उपयोग मृदा परीक्षण रिपोर्ट (मृदा स्वास्थ्य कार्ड) तथा वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुसार किया जाना चाहिए. स्थल-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन (SSNM) पोषक तत्वों के सटीक उपयोग को सुनिश्चित करता है, जिससे पोषक तत्वों की हानि कम होती है तथा उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ती है.
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जैविक खाद
जैविक खाद मृदा स्वास्थ्य सुधारने एवं कृषि की स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इन्हें दो वर्गों में विभाजित किया जाता है— भारी (FYM, कम्पोस्ट आदि) तथा सघन (तेल खली, अस्थि चूर्ण आदि). ये स्रोत मृदा में जैविक कार्बन बढ़ाते हैं, जल धारण क्षमता में सुधार करते हैं तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को प्रोत्साहित करते हैं.
तालिका 1: सामान्य जैविक स्रोतों की पोषक तत्व संरचना
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स्रोत |
नाइट्रोजन (%) |
फॉस्फोरस (%) |
पोटाश (%) |
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गोबर की खाद (FYM) |
0.45–0.80 |
0.20–0.40 |
0.50–0.70 |
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वर्मीकम्पोस्ट |
1.50–2.50 |
1.20–1.80 |
1.50–2.40 |
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पोल्ट्री खाद |
1.50–3.00 |
0.40–0.70 |
1.00–1.40 |
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सरसों खली |
5.20 |
1.80 |
1.20 |
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नीम खली |
5.20 |
1.00 |
1.40 |
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हरी खाद
हरी खाद (ग्रीन मैन्योर) फसलें वायुमंडल से नाइट्रोजन ग्रहण करके मिट्टी में संचित करती हैं तथा उनके सड़ने-गलने पर मिट्टी में जैविक पदार्थ (बायोमास) और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है. ढैंचा जैसी हरी खाद फसलों को लगभग 45 दिन की अवस्था में, जब उनमें पर्याप्त कोमल हरा जैविक पदार्थ उपलब्ध होता है, खेत में पलट दिया जाता है. ये फसलें प्राकृतिक रूप से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं तथा रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करने में मदद करती हैं.
तालिका 2: हरी खाद फसलों का योगदान
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फसल |
बीज दर (कि.ग्रा./हेक्टेयर) |
जैव द्रव्यमान (क्विंटल/हे.) |
नाइट्रोजन योगदान (कि.ग्रा./हे.) |
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सनई |
20-40 |
152 |
84 |
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ढैंचा |
20-40 |
144 |
77 |
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लोबिया |
40-45 |
108 |
56 |
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बरसीम |
25-35 |
111 |
60 |
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जैव उर्वरक
जैव उर्वरक लाभकारी सूक्ष्मजीव होते हैं जो फसलों के लिए पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाते हैं तथा मृदा स्वास्थ्य में सुधार करते हैं.
तालिका 3: जैव उर्वरकों की भूमिका
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जैव उर्वरक |
बीज उपचार हेतु आवश्यक मात्रा (कि.ग्रा./हेक्टेयर) |
पोषक तत्व योगदान (कि.ग्रा. N/हे.) |
उपज वृद्धि (%) |
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राइजोबियम (दलहनी फसलें) |
0.5-2.0 |
25–35 |
10–30 |
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एजोटोबैक्टर/एजोस्पिरिलम (अनाज एवं सब्जियाँ) |
0.5-2.0 |
20–25 |
10–20 |
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पीएसबी (सभी फसलें) |
0.5-2.0 |
10–20 |
10–30 |
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एजोला (निम्नभूमि धान फसल) |
500-1000 (प्रक्षेत्र में अनुप्रयोग हेतु) |
40–60 |
10–20 |
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फसल अवशेष पुनर्चक्रण
फसल अवशेषों को प्रायः अनुपयोगी समझा जाता है, जबकि वास्तव में वे पोषक तत्वों के महत्वपूर्ण स्रोत हैं. एक टन फसल अवशेष से लगभग 3–15 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2–7 किलोग्राम फॉस्फोरस तथा 3–20 किलोग्राम पोटाश प्राप्त हो सकता है. इससे बाहरी आदानों की आवश्यकता कम होती है तथा मृदा में जैविक पदार्थ एवं सूक्ष्मजीव गतिविधि बढ़ती है.
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कृषि-औद्योगिक उपोत्पाद
औद्योगिक उपोत्पाद एवं खनिज आधारित संसाधन देश में विभिन्न प्रकार की समस्याग्रस्त मृदाओं के सुधार में प्रभावी मृदा संशोधक के रूप में कार्य करते हैं. उदाहरण के लिए, क्षारीय मृदा के सुधार हेतु जिप्सम अथवा फॉस्फोजिप्सम तथा अम्लीय मृदाओं के सुधार हेतु चूना, डोलोमाइट अथवा बेसिक स्लैग का उपयोग किया जाता है. इसी प्रकार रॉक फॉस्फेट एवं ग्लॉकोनाइट फॉस्फोरस तथा पोटाश की आपूर्ति के लिए किफायती एवं टिकाऊ विकल्प प्रदान करते हैं. इनका उपयोग मृदा संरचना एवं पोषक तत्व उपलब्धता में सुधार करता है तथा महंगे आयातित रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करता है.
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कृषि प्रबंधन पद्धतियाँ
फसल चक्र, फसल विविधीकरण, दलहनी फसलों का समावेशन, मिश्रित खेती, संरक्षण कृषि तथा जल एवं पोषक तत्वों का कुशल प्रबंधन जैसी कृषि पद्धतियाँ मृदा स्वास्थ्य को बढ़ावा देती हैं. दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर प्रति हेक्टेयर 40–90 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध कराती हैं तथा मृदा उर्वरता को समृद्ध बनाती हैं. मृदा की उर्वरता बनाए रखने के लिए फसल चक्र में कम-से-कम एक दलहनी फसल को अवश्य शामिल करना चाहिए.
फसल उत्पादकता पर समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) का प्रभाव
भारत के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में किए गए दीर्घकालिक उर्वरक प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है कि रासायनिक उर्वरकों के 25 से 50 प्रतिशत भाग को जैविक एवं जैव-आधारित पोषक स्रोतों से प्रतिस्थापित करने पर केवल 100 प्रतिशत रासायनिक उर्वरकों के उपयोग की तुलना में समान अथवा अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है. इससे स्पष्ट है कि INM फसल उत्पादकता बढ़ाने में प्रभावी है.
तालिका 4: समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) के अंतर्गत उपज में वृद्धि
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फसल प्रणाली |
INM रणनीति |
उपज वृद्धि |
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धान–गेहूँ |
75% NPK + 10 टन/हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद (एफ.वाई.एम.) + जैव उर्वरक |
12–18% |
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मक्का–सोयाबीन |
50% एन.पी.के. + 5 टन/हेक्टेयर वर्मी कम्पोस्ट + बीज उपचार |
15–22% |
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गन्ना |
75% NPK + फसल अवशेष पुनर्चक्रण+ ट्राइकोडर्मा |
10–15% |
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कपास–दलहन |
100%NPK + हरी खाद |
18–25% |
यह वृद्धि बेहतर मृदा संरचना, पोषक तत्वों की उपलब्धता तथा जल धारण क्षमता में सुधार के कारण होती है.
किसानों एवं पर्यावरण के लिए INM के लाभ
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मृदा उर्वरता एवं उत्पादकता में वृद्धि
• पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार
• फसल उपज की स्थिरता
• फसल गुणवत्ता में सुधार
• पर्यावरण प्रदूषण में कमी
• जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक अनुकूलन क्षमता
सरकारी पहल
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना तथा कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम किसानों को समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) अपनाने हेतु प्रोत्साहित कर रहे हैं. हालांकि इसके व्यापक प्रसार के लिए निम्न प्रयास आवश्यक हैं—
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सशक्त विस्तार सेवाएँ
• किसानों की जागरूकता एवं प्रशिक्षण
• खेत स्तर पर जैविक आदानों को बढ़ावा
• गुणवत्तायुक्त जैव उर्वरकों का अधिक उपयोग
• डिजिटल परामर्श सेवाओं का विस्तार
निष्कर्ष
समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) को व्यापक स्तर पर अपनाने से कृषि प्रणाली अधिक अनुकूल, लाभकारी तथा पर्यावरणीय दृष्टि से अधिक टिकाऊ बनेगी. यह न केवल वर्तमान पीढ़ी की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक होगा, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी स्वस्थ एवं उत्पादक मृदा संसाधनों का संरक्षण सुनिश्चित करेगा.
लेखकगण : डॉ. अनुप दास, डॉ. रेशमा शिंदे, डॉ. संतोष एस. माली
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना
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