Success Story of Organic Farmer Lekhram Yadav: राजस्थान के कोटपूतली क्षेत्र से निकलकर देशभर में अपनी अलग पहचान बनाने वाले लेखराम यादव आज उन किसानों में शामिल हैं जिन्होंने यह साबित कर दिया है कि खेती और पशुपालन को यदि सही सोच, वैज्ञानिक समझ और पारंपरिक ज्ञान के साथ किया जाए तो यह किसी बड़े उद्योग से कम नहीं है। एक साधारण किसान परिवार में जन्मे लेखराम यादव ने कभी केवल खेती को रोज़गार नहीं माना, बल्कि उसे एक संपूर्ण जीवन पद्धति के रूप में अपनाया। यही वजह है कि आज वह जैविक खेती, देसी पशुपालन, एग्री टूरिज्म और वैल्यू एडेड डेयरी प्रोडक्ट्स के क्षेत्र में एक सफल मॉडल बन चुके हैं।
लेखराम यादव ने बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर्स की पढ़ाई की है और लगभग साढ़े छह साल तक मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट के रूप में काम किया। कॉर्पोरेट सेक्टर में अच्छा अनुभव होने के बावजूद उनका मन हमेशा प्रकृति और कृषि की ओर खिंचता रहा। उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने एक महिला क्वालिटी मैनेजर से बातचीत की। वह महिला रिटायरमेंट के बाद फार्म हाउस में शांत जीवन बिताना चाहती थीं। इस बातचीत ने लेखराम यादव को सोचने पर मजबूर कर दिया कि जब जीवन के अंत में इंसान प्रकृति की ओर लौटना चाहता है, तो फिर शुरुआत से ही उसी रास्ते को क्यों न चुना जाए। यहीं से उन्होंने खेती और पशुपालन को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।
उन्होंने लगभग 120 एकड़ जमीन से जैविक खेती की शुरुआत की थी, लेकिन आज वह 1250 एकड़ से अधिक क्षेत्र में ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने देसी नस्ल की गायों पर आधारित डेयरी मॉडल तैयार किया, जो आज कई किसानों के लिए प्रेरणा बन चुका है। वर्तमान में उनका सालाना टर्नओवर लगभग 40 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। उनकी इस सफलता के पीछे सबसे बड़ी सोच यह रही कि खेती और पशुपालन को अलग-अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे का पूरक मानकर किया जाए।
हाल ही में Millionaire Farmer of India Awards 2025 में उन्हें ‘मिलियनेयर ऑर्गेनिक फार्मर ऑफ इंडिया’ कैटेगरी में ‘फर्स्ट रनर अप’ अवार्ड से सम्मानित किया गया। कृषि जागरण ने डेयरी फार्मिंग, ऑर्गेनिक खेती, देसी नस्लों और युवाओं के भविष्य को लेकर उनसे विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश -
सवाल: आपकी डेयरी फार्मिंग की शुरुआत कब और कैसे हुई? शुरुआती दौर में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
जवाब: डेयरी फार्मिंग की शुरुआत करने से पहले हमने बहुत ज्यादा रिसर्च किया। हम यह समझना चाहते थे कि आखिर भारत में डेयरी फार्मिंग को लोग घाटे का सौदा क्यों मानते हैं। शुरुआत में हमने बैंक से संपर्क किया था क्योंकि हम लगभग 100 देसी गायों के साथ बड़े स्तर पर डेयरी शुरू करना चाहते थे। लेकिन बैंक ने साफ मना कर दिया। उनका कहना था कि भारत में डेयरी फार्मिंग प्रॉफिटेबल नहीं है और इस सेक्टर में रिस्क बहुत ज्यादा है।
यह बात मेरे मन में घर कर गई। मैंने सोचा कि जिस देश में हर घर में दूध, दही, घी और मक्खन की जरूरत होती है, वहां डेयरी घाटे का व्यवसाय कैसे हो सकता है। इसके बाद मैंने कई राज्यों में जाकर डेयरी फार्म का अध्ययन किया। मैंने देखा कि ज्यादातर लोग बहुत महंगा इंफ्रास्ट्रक्चर बना देते हैं। करोड़ों रुपये केवल शेड और मशीनरी में खर्च कर देते हैं। लेकिन गाय प्राकृतिक वातावरण में रहना पसंद करती है। जब उसे बंद माहौल में रखा जाता है तो वह तनाव में आने लगती है और धीरे-धीरे बीमार पड़ जाती है।
दूसरी बड़ी समस्या बाहर से आने वाले पशु आहार की थी। लोग बाजार के पैक्ड फीड और केमिकल युक्त चारे पर बहुत निर्भर हो चुके हैं। इससे पशुओं की सेहत खराब होती है और लागत भी बढ़ती है। हमने इन सभी कमियों को समझा और एक ऐसा मॉडल तैयार किया जिसमें प्राकृतिक वातावरण, देसी नस्ल और अपने खेत का चारा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हो।
सवाल: पारंपरिक डेयरी और मॉडर्न डेयरी में सबसे बड़ा अंतर क्या मानते हैं?
जवाब: आज की मॉडर्न डेयरी पूरी तरह प्रोडक्शन आधारित हो चुकी है। लोग केवल यह सोचते हैं कि एक गाय कितना ज्यादा दूध दे सकती है। इसी कारण विदेशी नस्लों जैसे एचएफ और जर्सी गायों पर ज्यादा फोकस किया जाने लगा। लेकिन इन नस्लों को संभालना बहुत महंगा पड़ता है। ये कुछ महीनों तक ज्यादा दूध देती हैं, लेकिन बाद में इनका ड्राई पीरियड बहुत लंबा हो जाता है। किसान को लगातार खर्च उठाना पड़ता है और कई बार उसे नुकसान होने लगता है।
पारंपरिक डेयरी का मॉडल बिल्कुल अलग था। पहले लोग देसी गाय पालते थे, उन्हें प्राकृतिक वातावरण में रखते थे और अपने खेत का चारा खिलाते थे। गाय परिवार का हिस्सा होती थी। आज हम उसी मॉडल को फिर से अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। हमने साहीवाल, गिर, राठी और थारपारकर जैसी देसी नस्लों पर काम किया क्योंकि ये भारतीय जलवायु में ज्यादा टिकाऊ हैं। इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है और इनका दूध भी आसानी से पच जाता है।
सवाल: फिलहाल आपके डेयरी फार्म में कौन-कौन सी नस्लें हैं?
जवाब: अभी हमारे फार्म में लगभग 85 प्रतिशत साहीवाल नस्ल की गायें हैं। इसके अलावा गिर और थारपारकर नस्ल की गायें भी हैं। हमने देसी नस्लों पर इसलिए फोकस किया क्योंकि ये भारतीय मौसम के अनुसार खुद को बेहतर तरीके से ढाल लेती हैं। इनकी देखभाल की लागत भी अपेक्षाकृत कम होती है और इनका दूध A2 क्वालिटी का होता है, जिसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
सवाल: आपने ऑर्गेनिक खेती और डेयरी को कैसे जोड़ा?
जवाब: खेती और पशुपालन हमेशा से एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। अगर खेती से पशुपालन को अलग कर दिया जाए तो दोनों ही अधूरे हो जाते हैं। हमारे यहां गायों से मिलने वाला गोबर, गोमूत्र और पंचगव्य ऑर्गेनिक खेती में इस्तेमाल होता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है।
दूसरी तरफ खेती से मिलने वाला चारा पशुओं के काम आता है। आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसान खेती और पशुपालन को अलग-अलग बिजनेस मानने लगे हैं। जबकि असली सफलता तब मिलती है जब दोनों को एक साथ जोड़ा जाए। हमने यही मॉडल अपनाया और इससे लागत काफी कम हुई।
सवाल: डेयरी फार्मिंग में सबसे ज्यादा खर्च किस चीज पर आता है?
जवाब: आज की मॉडर्न डेयरियों में सबसे ज्यादा खर्च इंफ्रास्ट्रक्चर पर किया जाता है। लोग करोड़ों रुपये के बड़े-बड़े शेड और लोहे के स्ट्रक्चर बना देते हैं। लेकिन असल में गाय को खुला और प्राकृतिक वातावरण चाहिए। जब आप उसे पूरी तरह बंद कर देते हैं तो वह तनाव महसूस करने लगती है। तनाव की वजह से पशु बीमार पड़ता है और दूध उत्पादन भी प्रभावित होता है।
दूसरी बड़ी समस्या मक्खी-मच्छर और गंदगी की होती है। कॉम्प्लिकेटेड स्ट्रक्चर में यह समस्या ज्यादा बढ़ जाती है। इसलिए हमने बहुत सिंपल और नेचुरल डेयरी मॉडल बनाया।
सवाल: पशुओं के चारे और देखभाल में आपने कौन-कौन से इनोवेशन किए?
जवाब: मैं अपने गुरु ताराचंद बेल जी को फॉलो करता हूं। उन्होंने वृक्षा आयुर्वेद और प्राकृतिक कृषि पर बहुत काम किया है। हमने उनके कई फार्मूलों को डेयरी में इस्तेमाल किया।
हमारे फार्म पर रोज सुबह और शाम अग्निहोत्र होता है। इससे सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और मक्खी-मच्छर नहीं आते। इसके अलावा हम गायों को बेलपत्र का बायो एंजाइम, अग्निहोत्र की भस्म, नींबू जैव रसायन और पारंपरिक चारा देते हैं।
हम काला नमक और बिना बुझा चूना भी उपयोग करते हैं ताकि पशुओं में कैल्शियम की कमी न हो। डीवार्मिंग के लिए इंद्रायणी फल का इस्तेमाल करते हैं। ये सभी तरीके पारंपरिक हैं लेकिन बेहद असरदार हैं।
जब देशभर में लंपी बीमारी फैली थी, तब हमारे फार्म की गायें सुरक्षित रहीं। इसका सबसे बड़ा कारण यही प्राकृतिक और पारंपरिक देखभाल थी।
सवाल: डेयरी बिजनेस में किसानों की सबसे बड़ी गलती क्या होती है?
जवाब: सबसे बड़ी गलती है बाहर के फीड और केमिकल वाले चारे पर निर्भर होना। किसान दूध बढ़ाने के लिए ज्यादा प्रोटीन वाला पैक्ड फीड इस्तेमाल करते हैं। शुरुआत में इससे दूध थोड़ा बढ़ जाता है, लेकिन धीरे-धीरे पशु कमजोर होने लगता है और कई बार बांझपन जैसी समस्याएं आने लगती हैं।
मैं हमेशा किसानों से कहता हूं कि कोशिश करें कि पशुओं को वही खिलाएं जो अपने खेत में पैदा हो रहा है। जैसे ज्वार, बाजरा, मक्का, गेहूं और पारंपरिक चारा। इससे लागत भी कम होगी और पशु लंबे समय तक स्वस्थ रहेंगे।
सवाल: सरकार को डेयरी सेक्टर में क्या बदलाव करने चाहिए?
जवाब: सरकार को केवल दूध उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि वैल्यू एडिशन पर भी फोकस करना चाहिए। तहसील स्तर पर ऐसी यूनिट बननी चाहिए जहां किसान अपने दूध से घी, पनीर, दही और चीज जैसे प्रोडक्ट बनाकर अपने ब्रांड से बेच सकें।
इसके अलावा कीटनाशकों पर नियंत्रण जरूरी है। आज केमिकल खेती का असर इंसानों, पशुओं और मिट्टी तीनों पर पड़ रहा है। सरकार को छोटे किसानों के लिए क्लस्टर मॉडल तैयार करना चाहिए और उन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर व पशुधन पर सहायता देनी चाहिए।
सवाल: घी, पनीर और दही जैसे प्रोडक्ट्स में कितना स्कोप देखते हैं?
जवाब: इन प्रोडक्ट्स में बहुत बड़ा भविष्य है। दूध जल्दी खराब हो जाता है, लेकिन घी, पनीर और चीज जैसे प्रोडक्ट की शेल्फ लाइफ ज्यादा होती है। इससे किसान को बेहतर दाम मिलता है और नुकसान कम होता है। आज लोग शुद्ध और हेल्दी प्रोडक्ट चाहते हैं। अगर किसान अपने स्तर पर वैल्यू एडिशन शुरू करे तो उसकी आमदनी कई गुना बढ़ सकती है।
सवाल: डेयरी सेक्टर का सबसे बड़ा मिथक क्या है?
जवाब: सबसे बड़ा मिथक यही है कि डेयरी फार्मिंग केवल बड़े निवेश और बाहर के इनपुट से ही सफल हो सकती है। असल में सफलता तब मिलती है जब खेती और पशुपालन को एक साथ जोड़ा जाए और अपने संसाधनों का ज्यादा उपयोग किया जाए।
सवाल: कम जमीन वाला किसान क्या सफल डेयरी फार्मिंग कर सकता है?
जवाब: बिल्कुल कर सकता है। अगर किसी किसान के पास आधा एकड़ जमीन भी है तो वह 5-10 देसी पशु आराम से पाल सकता है। उसे मोरिंगा, नेपियर घास, मक्का और गन्ने जैसी फसलें लगानी चाहिए ताकि सालभर चारे की व्यवस्था बनी रहे।
सवाल: डेयरी फार्मिंग में महिलाओं की भूमिका को कैसे देखते हैं?
जवाब: भारत में डेयरी सेक्टर की असली ताकत महिलाएं हैं। सुबह जल्दी उठना, पशुओं की देखभाल करना, दूध निकालना और घर संभालना - यह सब महिलाएं ही करती हैं। मातृत्व भाव के कारण वे पशुओं की बेहतर देखभाल करती हैं।
सवाल: आपने एग्री टूरिज्म को डेयरी से कैसे जोड़ा?
जवाब: हमारा पूरा मॉडल ऑन-फार्म सिस्टम पर आधारित है। खेती, डेयरी, प्रोसेसिंग और भोजन - सब कुछ फार्म पर ही होता है। लोग यहां आकर पारंपरिक भारतीय खेती और पशुपालन को करीब से देखते हैं। इससे उन्हें समझ आता है कि प्राकृतिक तरीके से खेती और डेयरी कितनी प्रभावी हो सकती है।
सवाल: युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे?
जवाब: कोरोना के बाद बड़ी संख्या में युवा खेती की तरफ लौटे हैं, जो बहुत सकारात्मक संकेत है। लेकिन मैं युवाओं से कहना चाहता हूं कि केवल ऑर्गेनिक खेती करने से सफलता नहीं मिलेगी। खेती के साथ पशुपालन भी जरूरी है। अगर 10 एकड़ खेती पर एक देसी गाय भी रख ली जाए तो ऑर्गेनिक खेती की आधी जरूरतें पूरी हो जाती हैं।
सवाल: ऑर्गेनिक खेती और डेयरी फार्मिंग को मिलाकर आपका सालाना टर्नओवर कितना है?
जवाब: पिछले साल हमारा कुल टर्नओवर लगभग 36 करोड़ रुपये था। इस साल यह 40 करोड़ रुपये से ऊपर जाने की संभावना है। लगातार ऑर्गेनिक खेती, देसी डेयरी और वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स की मांग बढ़ रही है, जिसका फायदा हमें मिल रहा है।
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