दियारा का खीरा का देश के जिलों व राज्यों तक पहुंच

बिहार के कटिहार के गंगा दियारा के रेतीली भूमि पर उपजने वाली तरबूज, खरबूज, ककरी, खीरा सहित परवल, करैला, मेथी, सौंप आदि दूसरे प्रदेशों के व्यापारियों को भी खूब आकर्षित कर रहा हैे। दूर-दूर तक इसकी डिमांड है। अमूमन किसान बाढ़ की पानी उतरने के साथ नवंबर से इसकी बोआई शुरू कर देते है और करीब चार माह बाद इसका उत्पादन शुरु  हो जाता है। बेहतर क्वालिटी होने के चलते इसकी डिमांड ज्यादा होती है। यही यहां के किसानों का आर्थिक आधार भी है। 
कहां- कहां जाता है खीरा व सब्जी 
यहां के उत्पादित तरबूज खरबूज सहित परवल, करैला के लिए मार्च के अंतिम सप्ताह से ही दूरदराज से व्यपारियों का जमघट लगना शुरू हो जाता है। यहां से पटना, हाजीपुर, समस्तीपुर, बिहारशरीफ, सीतामढ़ी, मधेपुरा, भागलपुर, फारिबसगंज सहित असम, वाराणसी, इलाहाबाद आदि स्थानों को भेजा जाता है। 
बड़े क्षेत्र में होता उत्पादन 
गंगा दियारा के विस्तृत भू-भाग में फैले सर्वाराम, मोहनपुर, बकिया, गोबराही, जौनिया, कांतनगर आदि मौजा के हजारों एकड़ में इसकी खेती की जाती है। उपजाऊ मिट्टी होने के कारण कम लागत में बेहतर उत्पादन यहां की पहचान है। 
किसानों को मिला रहा लाभ
अमूमन अग्रतर तरबूज, खरबूज व सिब्जयों का भाव कर ब चालीस रूपये किलो तक होता होता है, लेकिन समय बीतने के साथ इसकी कीमत में नरमी आ जाती है। पंद्रह से बीस रूपये प्रति किलो का भाव भी मिले तो किसानो को प्रति एकड़ लगभग पचास से पचहत्तर हजार रु पये आमदनी हो जाती है।
क्या कहते हैं किसान 
किसान सुरेश महतो, रघुपत महतो, सदल महतो, रघु महतो, मु. कालू, मु. नेपाली, मु. बाखर, शंभू मंडल, बिन्हा मंडल आदि ने बताया कि संसाधन व सरकारी स्तर पर किसी भी तरह का प्रोत्साहन नहीं मिलने से उन्हे कांफी मंहगे दरो पर तरबूज, खरबूज का बीज व परवल का बीज  खरीदना पड़ता है। यही नहीं नाव से गंगा दियारा से काढ़ा गोलाघाट सहित अन्य घाटों पर लाने में चढ़ाव उतार करने में काफी परेशानी होती है।

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