कल्पना कीजिए कि आप उसी खेत में अपना उर्वरक तैयार कर रहे हैं जहाँ फसल उगाई जानी है. न भारी बोरे उठाने की आवश्यकता, न महँगी यूरिया खरीदने की चिंता, और न ही खेत में टनों गोबर की खाद ढोने की परेशानी. सुनने में यह किसी सपने जैसा लगता है, है न?
यही कार्य हरित खाद (Green Manuring) करती है. यह ऐसी पद्धति है जिसमें हरी-भरी, तीव्र वृद्धि करने वाली फसलें—मुख्यतः दलहनी फसलें—उगाई जाती हैं और कोमल एवं हरी अवस्था में ही उन्हें मिट्टी में पलट दिया जाता है. यह प्राचीन कृषि पद्धति मिट्टी को प्राकृतिक रूप से पुनर्जीवित करती है तथा भीतर से उसकी उर्वरता, संरचना और कार्बनिक पदार्थ की मात्रा को समृद्ध बनाती है.
हरित खाद (Green Manuring) क्या है?
हरित खाद एक सक्रिय जैविक कृषि तकनीक है, जिसमें विशेष पौधों को केवल इस उद्देश्य से उगाया जाता है कि बाद में उन्हें मिट्टी में दबाया जा सके. जब ये पौधे विघटित होते हैं, तो वे मिट्टी में छिपे पोषक तत्वों को उपलब्ध कराते हैं, कार्बनिक अम्लों का उत्सर्जन करते हैं तथा लाभकारी मृदा सूक्ष्मजीवों के लिए प्रचुर मात्रा में भोजन प्रदान करते हैं.
प्रदान करते हैं.
हरित खाद (Green Manuring) बनाम हरी पत्ती खाद (Green Leaf Manuring): क्या अंतर है?
किसान अक्सर इन दोनों शब्दों को लेकर भ्रमित हो जाते हैं. यद्यपि दोनों सुनने में एक जैसे लगते हैं, लेकिन इन्हें खेत में पहुँचाने की विधि पूरी तरह अलग होती है:
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हरित खाद (Green Manuring): हरित खाद की फसल उसी खेत में (in-situ) उगाई जाती है और जहाँ वह उगी होती है, वहीं उसे मिट्टी में पलट दिया जाता है.
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हरी पत्ती खाद (Green Leaf Manuring): इसमें खेत के बाहर स्थित वृक्षों, झाड़ियों या मेड़ों (जैसे ग्लिरिसिडिया, करंज या नीम) से हरी पत्तियाँ, कोमल टहनियाँ एवं शाखाएँ एकत्र कर खेत में लाई जाती हैं और फिर मिट्टी में दबाई जाती हैं.
प्रमुख हरित खाद फसलें: जैवभार (Biomass) एवं नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता
दलहनी हरित खाद फसलों की जड़ों में गांठें (नोड्यूल्स) होती हैं, जिनमें लाभकारी जीवाणु निवास करते हैं. ये जीवाणु वायुमंडल से नाइट्रोजन को सीधे अवशोषित कर पौधों में संचित करते हैं. दूसरी ओर, गैर-दलहनी फसलें (जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण नहीं करतीं), जैसे कि कुट्टू (Buckwheat), सरसों तथा जई (Oats) भी हरित खाद फसलों के रूप में उपयोग की जाती हैं. इनका मुख्य उद्देश्य मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाना तथा पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण कर उन्हें मिट्टी में वापस उपलब्ध कराना होता है.
किसानों द्वारा उपयोग की जाने वाली प्रमुख हरित खाद फसलें
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हरित खाद फसल |
वैज्ञानिक नाम |
जोड़ा गया ताजा जैवभार (टन/हेक्टेयर) |
स्थिर की गई नाइट्रोजन (किग्रा/हेक्टेयर) |
बचाए जा सकने वाले यूरिया के बोरे |
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ढैंचा |
सेसबानिया एक्यूलेटा (Sesbania aculeata) |
20 – 25 |
75 – 130 |
1.7 – 2.9 |
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सनई |
क्रोटेलारिया जुनसिया (Crotalaria juncea) |
25 – 30 |
80 – 130 |
1.8 – 2.9 |
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लोबिया |
विग्ना अनगुइकुलेटा (Vigna unguiculata) |
15 – 20 |
60 – 70 |
1.3 – 1.6 |
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पिल्लीपेसरा |
फेजियोलस ट्राइलोबस (Phaseolus trilobus) |
15 – 18 |
50 – 60 |
1.1 – 1.3 |
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ग्वार |
सायामोप्सिस टेट्रागोनोलोबा (Cyamopsis tetragonoloba) |
15 – 20 |
60 – 70 |
1.3 – 1.6 |
बुवाई का सही समय और मिट्टी में पलटने का स्वर्णिम नियम
हरित खाद में समय का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. यदि सही समय का पालन नहीं किया जाए, तो इसके अधिकांश लाभ प्राप्त नहीं हो पाते.
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बुवाई कब करें?
आमतौर पर हरित खाद फसलों की बुवाई मानसून-पूर्व वर्षा (मई–जून) शुरू होते ही की जाती है. इसके अतिरिक्त, रबी फसल की कटाई के बाद जब खेत में पर्याप्त अवशिष्ट नमी उपलब्ध हो, तब भी इनकी बुवाई की जा सकती है.
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मिट्टी में पलटने की सही अवस्था
हरित खाद फसल को मिट्टी में पलटने का सर्वोत्तम समय 50 प्रतिशत पुष्पन अवस्था (आमतौर पर बुवाई के 40–45 दिन बाद) माना जाता है. इस अवस्था में पौधे अपने अधिकतम हरे जैवभार तक पहुँच चुके होते हैं तथा उनके तने कोमल, रसीले और मुलायम होते हैं. परिणामस्वरूप वे मिट्टी में आसानी से विघटित हो जाते हैं.
पोषक तत्वों की अस्थायी अनुपलब्धता (नाइट्रोजन लॉक) से बचाव
जब बड़ी मात्रा में कार्बनिक पदार्थ मिट्टी में मिलाया जाता है, तो उसे विघटित करने के लिए मृदा सूक्ष्मजीव तेजी से सक्रिय हो जाते हैं. यदि यह पदार्थ अधिक काष्ठीय और रेशेदार हो, तो सूक्ष्मजीव उसके विघटन हेतु मिट्टी में उपलब्ध नाइट्रोजन का उपयोग करने लगते हैं. इस स्थिति को पोषक तत्वों की अस्थायी अनुपलब्धता (Nutrient Immobility) अथवा नाइट्रोजन लॉक (Nitrogen Lock) कहा जाता है. परिणामस्वरूप, मिट्टी में अगली फसल के लिए उपलब्ध नाइट्रोजन की मात्रा अस्थायी रूप से कम हो जाती है, जिससे फसल में नाइट्रोजन की कमी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं. पौधे पीले पड़ सकते हैं, उनकी वृद्धि धीमी हो सकती है तथा उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
इस समस्या की रोकथाम कैसे करें?
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पर्याप्त नमी सुनिश्चित करें: हरित खाद फसल को मिट्टी में पलटते समय खेत में पर्याप्त नमी या हल्का जलभराव अवश्य होना चाहिए. मृदा सूक्ष्मजीवों को कार्बनिक पदार्थों के विघटन के लिए पानी की आवश्यकता होती है. नमी की कमी से विघटन की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है.
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"प्रतीक्षा अवधि" का पालन करें: हरित खाद को मिट्टी में पलटने के बाद मुख्य फसल की बुवाई या रोपाई करने से पहले 1 से 2 सप्ताह का अंतराल रखें. इससे मिट्टी को प्रारंभिक तीव्र विघटन प्रक्रिया पूरी करने का पर्याप्त समय मिल जाता है.
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नाइट्रोजन की छोटी प्रारंभिक मात्रा दें: यदि किसी कारणवश हरित खाद फसल अधिक परिपक्व अवस्था में मिट्टी में पलटी गई हो, तो सूक्ष्मजीवों की आवश्यकता पूरी करने हेतु रासायनिक नाइट्रोजन (जैसे थोड़ी मात्रा में यूरिया) का प्रारंभिक प्रयोग किया जा सकता है. इससे सूक्ष्मजीव मिट्टी में उपलब्ध नाइट्रोजन को अत्यधिक मात्रा में नहीं खींचते और मुख्य फसल को पोषण की कमी नहीं होती.
धान उत्पादन में ढैंचा की भूमिका: एक आदर्श समन्वय
भारतीय कृषि में सबसे सफल उदाहरणों में से एक है धान की रोपाई से पूर्व ढैंचा का उपयोग. ढैंचा अत्यंत सहनशील फसल है, जो जलभराव, लवणीयता तथा सूखे जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अच्छी तरह विकसित हो जाती है.
फसल अनुक्रम (Cropping Sequence)
हरित खाद की बुवाई, मिट्टी में पलटने तथा धान की रोपाई का समय विभिन्न क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा एवं सिंचाई जल की उपलब्धता के अनुसार भिन्न हो सकता है.
ग्रीष्मकालीन परती/मानसून-पूर्व अवधि (मई)
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ढैंचा की बुवाई करें.
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बीज दर: 25–30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
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फसल को 40–45 दिनों तक बढ़ने दें.
जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक
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खेत में पानी भरें.
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ढैंचा को कीचड़युक्त मिट्टी में पलट दें.
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विघटन हेतु 7–10 दिन का समय दें.
जुलाई के मध्य में
- धान की पौध की रोपाई करें.
यह प्रणाली इतनी प्रभावी क्यों है?
ढैंचा की जड़ें कठोर एवं सघन मृदा परतों को भुरभुरा बनाती हैं. जब धान के लिए खेत में पानी भरा जाता है, तब मिट्टी में दबा हुआ ढैंचा विघटित होकर कार्बनिक अम्ल उत्पन्न करता है. ये अम्ल क्षारीय मिट्टियों को संतुलित करने में सहायता करते हैं तथा फास्फोरस एवं जस्ता जैसे पोषक तत्वों को धान की पौध के लिए अधिक उपलब्ध बनाते हैं.
ब्राउन मैन्यूरिंग (Brown Manuring) क्या है? एक आधुनिक समाधान
जो किसान धान की सीधी बुआई (Direct Seeded Rice - DSR) अपनाते हैं और खेत में कीचड़ बनाने के लिए पानी नहीं भरते, उनके लिए पारंपरिक हरित खाद अपनाना कठिन हो सकता है. ऐसी स्थिति में ब्राउन मैन्यूरिंग एक प्रभावी विकल्प है. ब्राउन मैन्यूरिंग में मुख्य फसल (जैसे धान या मक्का) तथा हरित खाद फसल (आमतौर पर ढैंचा) को एक साथ कतारों में बोया जाता है. लगभग 25–30 दिन बाद जब ढैंचा मुख्य फसल पर छाया डालने लगता है, तब 2,4-डी जैसे खरपतवारनाशी का छिड़काव किया जाता है. यह खरपतवारनाशी ढैंचा को नष्ट कर देता है, जिससे उसका हरा रंग समाप्त होकर वह सूखकर भूरा हो जाता है और मिट्टी की सतह पर ही बिछ जाता है. यह सूखा जैविक आवरण (मल्च) निम्नलिखित लाभ प्रदान करता है:
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खरपतवारों की वृद्धि को रोकता है.
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मिट्टी की नमी का संरक्षण करता है.
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धीरे-धीरे विघटित होकर मुख्य फसल को पोषक तत्व उपलब्ध कराता है.
हरित खाद के लिए उपयुक्त फसल प्रणालियाँ
हरित खाद सभी परिस्थितियों में संभव नहीं होती. इसके लिए फसल चक्र में पर्याप्त समय उपलब्ध होना आवश्यक है. यह निम्नलिखित प्रणालियों में विशेष रूप से उपयुक्त है:
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धान–गेहूँ प्रणाली: धान की रोपाई से पूर्व मई–जून के दौरान हरित खाद फसल उगाई जा सकती है.
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गन्ना आधारित प्रणाली: गन्ने की चौड़ी कतारों के बीच हरित खाद फसल उगाकर मिट्टी चढ़ाने (Earthing-up) के समय उसे मिट्टी में दबाया जा सकता है.
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मक्का–दलहन/गेहूँ प्रणाली: मानसूनकालीन मक्का की बुवाई से पूर्व हरित खाद फसल उगाई जा सकती है.
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वर्षा आधारित एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्र: शीतकालीन फसलों से पहले लोबिया अथवा कुल्थी जैसी अल्पावधि दलहनी फसलें उगाकर नमी संरक्षण तथा मृदा सुधार किया जा सकता है.
हरित खाद के बहुआयामी लाभ
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लागत में कमी: यह प्रति हेक्टेयर 30–50 किलोग्राम रासायनिक नाइट्रोजन की आवश्यकता को कम कर सकती है.
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क्षारीय एवं कमजोर मिट्टियों का सुधार: हरित खाद क्षारीय मिट्टियों के पीएच को कम करने तथा मृदा स्वास्थ्य सुधारने में सहायक होती है.
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मृदा अपरदन की रोकथाम: यह गर्मियों की तेज हवाओं और मानसून के प्रारंभिक दौर की भारी वर्षा से मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत को बहने से बचाती है.
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पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण: गहरी जड़ें मिट्टी की निचली परतों से पोषक तत्वों को अवशोषित कर सतही परत में उपलब्ध कराती हैं, जिससे अगली फसल को लाभ मिलता है.
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मृदा जैविक पदार्थ में वृद्धि: विघटित जैवभार मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाता है, जिससे मिट्टी की संरचना, जलधारण क्षमता तथा सूक्ष्मजीवी गतिविधियाँ बेहतर होती हैं.
हरित खाद की सीमाएँ
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पानी पर निर्भरता: यदि मानसून-पूर्व वर्षा विफल हो जाए या सिंचाई की सुविधा उपलब्ध न हो, तो हरित खाद फसल उगाना कठिन हो सकता है.
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"खोई हुई अवधि" की धारणा: कई किसानों को लगता है कि हरित खाद के लिए 40–50 दिन देने से वे मूंग या सब्जियों जैसी लाभकारी ग्रीष्मकालीन नकदी फसलें नहीं उगा पाएँगे. ऐसी परिस्थितियों में ग्रीष्मकालीन मूंग जैसी अल्पावधि फसलें उपयुक्त विकल्प हो सकती हैं, जो अनाज भी देती हैं और उनका जैवभार मिट्टी में मिलाकर हरित खाद के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है.
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अतिरिक्त प्रारंभिक लागत: यद्यपि हरित खाद रासायनिक उर्वरकों की लागत कम करती है, फिर भी किसानों को बीज खरीदने तथा फसल को मिट्टी में पलटने के लिए ट्रैक्टर एवं जुताई पर कुछ व्यय करना पड़ता है.
मुख्य संदेश
हरित खाद खेत के लिए एक प्राकृतिक स्वास्थ्यवर्धक टॉनिक के समान है. मुख्य फसल से पहले केवल 40–45 दिनों का समय देकर किसान अपनी मिट्टी को अधिक भुरभुरी, उपजाऊ, जैविक पदार्थों से समृद्ध तथा दीर्घकाल तक उत्पादक बनाए रख सकते हैं. स्वस्थ मिट्टी ही टिकाऊ कृषि और बेहतर उत्पादन की आधारशिला है, और हरित खाद इस दिशा में एक सरल, किफायती तथा पर्यावरण-अनुकूल उपाय है.
लेखकगण : डॉ. गौस अली, डॉ. अनुप दास एवं डॉ. संजीव कुमार
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना
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