Poetry

स्वप्न सुंदरी

था मेरा स्वप्न बड़ा ही सुंदर

जिस जगह तुम निखर रही थी

सांसों में थी तुम सुगंधित

बाजुओं में बिखर रही थी

बड़ी ही जालिम थी निगाहें

चाबूक सी मुझ पर जो चल रही थी

कितना पावन था वो लम्हा, कितनी प्यारी सी जमीं थी

एक तरफ था संसार सारा, दूजी ओर तुम खड़ी थी

ज़रा सा हंस कर जो तुमको देखा, तेरे नैनों से अमृत झलक रही थी

था मेरा स्वप्न बड़ा ही सुदंर, जिस जगह तुम निखर रही थी

 

उन्माद राग से थी तुम नहाई, अनुराग राग से था मैं रंगा

था मेरा मन जैसे बनारस, जहां से तुम बह रही थी गंगा

पतझड़ से मेरे इस जीवन में, बनकर बसंत तुम लहलहाई

था मेरा स्वप्न बड़ा ही सुंदर, जिस जगह तुम निखर रही थी



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