पढ़िए, क्या है राठी नस्ल विकास परियोजना...

राठी गाय को थर प्रदेश के किसानों की जीवन रेखा माना गया है राठी अनके दुधारू नस्लों में से इस क्षेत्र के लिए यह सर्वोतम साबित हो चुकी है।  इसके नाम की उत्पति को खानाबदोश चरवाहे जिन्हें राठ कहा जाता था, से हुई मानी गई है। राठी नस्ल वर्तमान में प्रमुख रूप से राजस्थान के बीकानेर, श्री गंगानगर, हनुमानगढ़ और चूरू जिले में पाली जाती है। स्वभाव से सीधी –  सादी, शांत और आकर्षक दिखने वाली नस्ल होने के कारण क्षेत्र के प्रगतिशील किसानों द्वारा इसे अपनाया गया है।  राठी गाय का दूध मरूस्थल की कठिन परिस्थितियों में उत्पन्न होने वाला सभी के लिए पौष्टिक आहार है।

थार क्षेत्र के बिकानेर, चूरू, हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिले में रहने वाले पशुपालकों के लिए राष्ट्रीय डेयरी योजना – 1 के अंतर्गत राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एन.डी.डी.बी) ने राठी नस्ल की गायों के विकास की पंचवर्षीय योजना स्वीकृत की है। यह परियोजना राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन, जयपुर और उरमूल ट्रस्ट, बीकानेर के सक्रिय भागदारी एवं सहयोग से चलाई जा रही है। ग्राम स्तर पर परियोजना को सुचारू रूप से चलाने के लिए गाँव में पशु विकास समितियों का गठन भी किया जाएगा।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य अधिक दुधारू राठी नस्ल की गायों को प्रयोग में लेते हुए दूध उत्पादन को बढ़ाना है। परियोजना में वैज्ञानिक तकनीक से उत्तम कोटि के राठी नस्ल के सांडों को तैयार करके उनके बीज का अधिकतम उपयोग कर कृत्रिम गर्भाधान, पशु रोगों का तुरंत उपचार, पशुओं को उच्च पोषकता वाला पशुआहार और उनका बेहतर तरीके से रखरखाव करके दूध के उत्पादन को बढ़ाया जाएगा जिससे कि पशुपालक को अधिक से अधिक आर्थिक लाभ हो। पशुपालकों की आय बढ़े इसके लिए पशुओं की उन्नत नस्ल का वीर्य, अच्छी गुणवत्ता का पशु आहार, हरा चारा एवं विभिन्न रोगों के टीकों के सुलभ रहने की जितनी आवश्यकता है उतनी ही आवश्यकता है पशुपालन प्रजनन और पशु आहार से संबंधित वैज्ञानिक जानकारियों को पशुपालन, प्रजनन और पशुआहार से संबंधित वैज्ञानिक जानकारियों को पशुपालकों तक पंहुचाने की। इसलिए इस पुस्तिका का निर्माण किया गया है। आप इसमें दी गई बातों को पढ़ें, समझें और दूसरों को भी समझाएं जिससे की गाँव का प्रत्येक पशुपालक आर्थिक लाभ पाकर  खुशहाल रहे।

राष्ट्रीय डेयरी योजना : भारत विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है।  वर्ष 2010 – 11 में भारत का कुल दूध उत्पादन 12.18 करोड़ टन रहा।  योजना आयोग के अनुमान एवं सकलघरेलू उत्पाद की लगातार उच्च वृद्धि के कारण हुए सुधार के पश्चात् यह संभावना है कि दूध की मांग वर्ष 2016 – 17 तक लगभग 15.5 करोड़ टन तथा वर्ष 2021 -22 तक लगभग 20 करोड़ टन होगी। दूध की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अगले 15 वर्षों में वार्षिक वृद्धि को 4 प्रतिशत से अधिक रखना आवश्यक है।

अत: प्रजनन तथा पोषण पर केन्द्रित कार्यक्रम द्वारा वर्तमान पशु जनसंख्या की उत्पादकता में वृद्धि करने के लिए एक वैज्ञानिक तरीके से योजनाबद्ध बहुराज्य पहल करना अत्यावश्यक है। राष्ट्रीय डेयरी योजना (एन.डी.पी.) की परिकल्पना पन्द्रह वर्षों की अवधि को ध्यान में रखते हुए की गई है, क्योंकि एक अधिक उत्पादक पशु को उत्पन्न करने में तीन से पांच वर्ष की अवधि अपेक्षित होती है तथा दूध उत्पादन वृद्धि के लिए प्रणाली को विकसित तथा विस्तार करने में इतना समय लगता है।

राष्ट्रीय डेयरी योजना चौदह मुख्य दूध उत्पादन करने वाले राज्यों जो कि आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओड़िसा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल पर केन्द्रित रहेगी। देश का 90 प्रतिशत से अधिक दूध उत्पादन इन राज्यों में होता है, इनके पास 97 प्रतिशत प्रजनन योग्य गाय एवं भैंस तथा 98 प्रतिशत चारा संसाधन है। इसका लाभ संपूर्ण देश में होगा। उदहारण के लिए उच्च अनुवांशिक गुण (एच.जी.एम) वाले सांड सारे ए और बी वीर्य स्टेशनों पर उपलब्ध रहेंगे और उच्च गुणवत्ता वाला रोग मुक्त वीर्य देश के सभी दुग्ध उत्पादकों तक पहुंचेगा। राष्ट्रीय डेयरी योजना का प्रथम चरण, 2242 करोड़ रूपये की परियोजना परिव्यय पर है, जो मुख्यत: विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित किया जाएगा।

यह छ: वर्षो की अवधि में लागू किया जाएगा। इसके निम्नलिखित उद्देश्य होंगे –

- दुधारू पशुओं की उत्पादक और वृद्धि में सहायता करना तथा इसके द्वारा दूध की तेजी से बढ़ती हुई मांग को पूरा करने के लिए दूध उत्पादन में वृद्धि करना।

- ग्रामीण दूध उत्पादकों को संगठित दूध – संसाधनों क्षेत्र की बृहत् पहुँच उपलब्ध करने में सहायता करना

गायों की स्थानीय नस्लें : कृत्रिम गर्भाधान में, उच्च अनुवांशिक योग्यता के सांड़ों से प्राप्त वीर्य के प्रयोग से ही किसी भी बड़ी आबादी में अनुवांशिक प्रगति लायी जा सकती है। दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने के लिए दुधारू पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 35 प्रतिशत करने की आवश्यकता है। यह रोग मुक्त एवं उच्च अनुवांशिक योग्यता के गाय, भैंस और साँड़ों के अंतराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित संतान परिक्षण और वंशावली चयन द्वारा उत्पदान एवं जर्सी और होल्सटिन फ्रीजियन (एच. एफ) सांड/भ्रूण अथवा वीर्य का आयात करके किया जा सकता है। इस योजना में संतान परिक्षण (पी.टी.) और वंशावली चयन (पी.एस.) के माध्यम से विभिन्न नस्लों के 2500 उच्च अनुवांशिक योग्यता के साँड़ों का उत्पादन और 400 विदेशी साँड़ों/भ्रूण का आयात किया जाएगा।

वंशावली चयन (पी एस) के माध्यम से आय नस्लें – राठी, साहिवाल, गिर, कांकरेज, थारपारकर और हरिआना।

इस योजना ए और बी श्रेणी के वीर्य उत्पादन केन्द्रों को मजबूत बनाया जाएगा और उच्च गुणवत्ता तथा रोग मुक्त वीर्य का उत्पादन किया जाएगा।  योजना के अंतिम वर्ष में लगभग 10 करोड़ उच्च गुणवत्ता के रोग मुक्त वीर्य खुराकों के सालाना उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।

इस योजना में मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का अनुकरण करते हुए एक पेशेवर सेवा प्रदाता के माध्यम से कृत्रिम गर्भाधान वितरण सेवाओं के लिए प्रायोगिक मॉडल की स्थापना की जाएगी।  ऐसा इसलिए किया जाएगा क्योंकि, कृत्रिम गर्भाधान सेवाओं में जवावदेही और विश्वसनीय आंकड़ो के संग्रह एवं ट्रैकिंग के द्वारा ही अनुवांशिक प्रगति के लाभ की मात्रा को मापा जा सकता है।

इस योजना के तहत : लगभग 3000 प्रशिक्षित मोबाईल कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियन यह सुनिश्चित करेंगे कि मानक संचालन प्रक्रिया का पालन, आंकड़ों का संग्रह और ट्रेकिंग करते हुए पेशेवर सेवाएँ किसान के दरवाजे पर वितरित हो रही हैं।

प्रायोगिक मॉडल एक आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मॉडल का मार्ग दिखलाएगा और कृत्रिम गर्भधान वितरण के लिए एक पूरी तरह से नया दृष्टिकोण पेश करेगा।

राष्ट्रीय डेयरी योजना के अंत प्रतिवर्ष, चालीस लाख कृत्रिम गर्भाधान किसान के दरवाजे पर किए जाएंगे।

यह सब तभी संभव है जब जैव सुरक्षा के ऐसे उपाय किए जाएँ जो सांड उत्पादन क्षेत्रों और वीर्य उत्पदान केन्द्रों में पशुओं के रोगों को निरोध और नियंत्रित करें।  राज्य सरकारों को सांड उत्पदान क्षेत्रों और वीर्य उत्पदान केन्द्रों को पशुओं में संक्रामक और स्पर्शजन्य रोगों की रोकथाम और नियंत्रण अधिनियम 2009 के तहत रोग नियंत्रण क्षेत्र घोषित करने, नियमित टीकाकरण और टीकाकरण पश्चात निगरानी, कान – टैगिंग के माध्यम से टीका लगाए हुए पशुओं की पहचान और रोग निदान प्रयोगशलाओं को मजबूत बनाने की जैसी गतिविधियाँ करनी अनिवार्य है। इससे यह सुनिश्चित होगा की कृत्रिम गर्भाधान के लिए रोग मुक्त उच्च अनुवांशिक योग्य वीर्य ही प्रयोग किया जाता है।

पोषण : सन्तुलित आहार खिलाने पर ही पशु अपनी अनुवांशिक क्षमता के अनुरूप दूध का उत्पादन करते हैं।  इस पद्धति द्वारा ने केवल उनके स्वास्थ और उत्पादकता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, बल्कि यह दुग्ध उत्पादन की लागत को भी काफी कम करता है, क्योंकि दूध उत्पादन में आने वाली लागत आहार का अनुमानत: 70 प्रतिशत का योगदान है, जिससे किसान की आय में बढ़ोतरी होती है।  आहार संतुलन के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास  बोर्ड द्वारा एक सरल एवं आसानी से उपयोग होने वला कंप्यूटरीकृत सोफ्टवेयर विकसित किया गया है। आहार संतुलन का एक अतिरिक्त लाभ मीथेन उत्सर्जन स्तर में कमी करना भी है, जो कि ग्रीन हाउस गैसों में एक महत्वपूर्ण कारक है।

इस योजना में दूध उत्पादकों को दुधारू पशुपओं के लिए राशन संतुलन एवं पोषक तत्वों के बारे में 40,000 प्रशिक्षित स्थानीय जानकर व्यक्ति परामर्श सेवाओं द्वारा उनके घर – घर जाकर उन्हें शिक्षित करेंगे।  किसानों को उन्नत किस्मों के उच्च गुणवत्ता चारा बीज उपलब्ध करा कर चारे की पैदावार बढ़ाई जाएगी तथा साइलेज बनाने और चारा संवर्धन का प्रदर्शन भी किया जाएगा।  इस योजना में 40,000 प्रशिक्षित स्थानीय जानकर व्यक्तियों के द्वारा आहार संतुलन के बारे में 40,000 गांवों के लगभग 27 लाख दुधारू पशुओं पर परामर्श प्रदान करें का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।  इसके साथ ही 7,500 टन प्रमाणित चारा बीज का उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।

गाँव आधारित अधिप्राप्ति प्रणाली को मजबूत करना : दूध उत्पादन कार्य में लगभग 7 करोड़ ग्रामीण परिवार संलग्न हैं, जिसमें अधिकतर छोटे, सीमांत और भूमिहीन किसान है। डेयरी सहकारिता छोटे पशुपालक, विशेषकर महिलाओं के समवेश और आजीविका का  सुनिश्चित करती है। यह वांछित है कि सहकारी क्षेत्र बेचने योग्य अतिरिक्त दूध से संगठित क्षेत्र द्वारा प्रबंधन किए जाने वाले वर्तमान 50 प्रतिशत के हिस्से को बनाए रखे।

इस योजना में दूध को उचित तथा पारदर्शी तरीके से इकट्ठा करने और समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की गाँव आधारित दूध संकलन प्रणाली स्थापित करके उसका विस्तार किया जाएगा।  वर्तमान डेयरी सहकारिता को सुदृढ़ करना और उत्पादक कंपनियों अथवा नई पीढ़ी की सहकारिताओं को ग्रामीण स्तर पर दूध मापन, परिक्षण, संकलन और दूध प्रशीतन से संबंधित बुनियादी ढाँचा स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।  संस्थागत ढाँचा निर्माण तथा प्रशिक्षण के लिए सहायता भी दी जाएगी। योजना के अंत में 23,800 अतिरिक्त गांवों को सम्मिलित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

प्रशिक्षित एवं क्षमता निर्माण : इस योजना के सफल कार्यान्वयन के लिए कुशल  तथा प्रशिक्षित मानव संसाधन अनिवार्य तथा महत्वपूर्ण है।  फिल्ड में काम करने वाली कार्मिकों का प्रशिक्षण एवं विकास करना इस योजना के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण क्षेत्र होगा। क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण तथा प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहन के लिए शिक्षा अभियान और गाँव स्तर पर उन्नत प्रक्रियाओं को अपनाना भी एक मुख्य पहल होगी।  यह अनुमान है कि एनडीपी के अंतर्गत लगभग सभी स्तर के 60,000 कार्मिकों को प्रशिक्षण तथा पुन: अभिविन्यास की आवश्यकता होगी।

योजना प्रंबधन तथा गहन अध्ययन : राष्ट्रीय डेयरी योजना के अंतर्गत की जाने वाली पहल, विभिन्न भौगिलिक स्थानों पर फैली हुई हैं। इसलिए विभिन्न गतिविधियों के संचालन के लिए आई.सी.टी. (सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी) पर आधारित प्रणालियों को एकीकृत करना आवश्यक है। विभिन्न गतिविधियों के एकीकरण के साथ – साथ विभिन्न स्तरों पर निगरानी तथा रिपोर्टिंग के लिए आई. सी. टी. पर आधारित सूचना प्रणाली लागू करना, आवश्यक विश्लेषण करना तथा योजना कार्यान्वयन में आवश्यक परिवर्तन में सहायता देना अनिवार्य है। इस योजना में सभी स्तर पर आधारभूत, मध्य – कालिक एवं योजना समापन पर सर्वेक्षण एवं विशिष्ट सर्वेक्षण/अध्ययन किया जाएगा। अध्ययन अनुभवों का दस्तावेज बनाकर ग्रामीणों और संस्थानों में अनुभव बांटे जाएंगे।

इससे योजना की गतिविधियों की प्रभावशाली निगरानी तथा समन्वय में आसानी होगी।  वार्षिक योजनाओं को समय पर तैयार करके सरलता से लागू किया जा सकेगा।  योजना की प्रगति तथा परिणामों की नियमित समीक्षा तथा प्रतिवेदन में भी खासा मदद मिलेगी।

इस परियोजना के दीर्घकालिक लाभ को समझना अत्यंत जरूरी है।  दरअसल, सभी लाभों के रूप में योजना से वैज्ञानिक पद्धति तथा व्यवस्थित प्रक्रियाएं स्थापित होंगी, जिससे यह आशा की जाती है कि देश में दूध उत्पादन करने वाले पशुओं की आनुवांशिकी अनुकूल और निरंतर सुधार के पथ पर आगे बढ़ेगी।

गर्भाधान :

  • गाय या भैंस जोर से रंभाती हैं।
  • गाय या भैंस तार देती है। (ऊपर से नीचे की ओर लटकता है और इसका रंग साफ होता है तथा कोई बदबू नहीं आती है)।
  • गाय या भैंस की योनि के होठ लाल रंग के हो जाते है (अंतर की तरफ) तथा होठ सूज/फूल जाते हैं और वह बार – बार पेशाब करती है।
  • गाय या भैंस चारा बहुत कम खाती है और जुगाली बंद कर देती है।
  • दूध बहुत कम और पतला हो जाता है तथा दूध में फैट तथा एस. एन. एफ. की मात्रा बहुत कम हो जाती है।
  • गाय या भैंस उत्तेजित रहती है तथा रस्सा तोड़ कर घर से बाहर सांड के पास भाग जाती है। सांड/झोटा भी गाय या भैंस का पीछा करता है।

कृत्रिम गर्भाधान

आधुनिक कृत्रिम गर्भाधान पशुपालन की तकनीकों में सबसे अधिक स्वीकृत एवं प्रचलित तकनीक है। इससे पशुओं की नस्ल में सुधार आता है तथा मादा पशुओं में वीर्य जनित बीमारियाँ नहीं फैलती हैं। इस विधि में उत्तम नस्ल के सांड की उपयोगिता में कई सौ गुना वृद्धि हो जाती है।  प्राकृतिक रूप से एक सांड साल में केवल 50 से 100 गायों को भी गर्भित कर सकता है।  इसके विपरीत कृत्रिम गर्भाधान द्वारा वीर्य को अतिहिमीकृत करके साल में 5,000 से 10,000 गायों को गर्भित किया जा सकता है।  किसान की दृष्टि से कृत्रिम गर्भाधान बहुत सस्ती एवं उपयोगी तकनीक है क्योंकि उसे सांड के रख रखाव व खान – पान पर खर्च करने की जरूरत नहीं होती है।

कृत्रिम गर्भाधान द्वारा गर्भधारण दर अधिक हो इसके लिए अनेक सावधानियों की आवश्यकता पड़ती है। यह सावधानियाँ एवं सुझाव, गौ पालक तथा कृत्रिम गर्भाधानकर्ता दोनों के लिए अपने स्तर पर अलग – अलग होते हैं।  गाय पालक इन सुझावों को प्रयोग में लाकर गाय में गर्भाधान दर में वृद्धि कर सकते हैं तथा कृत्रिम गर्भाधानकर्ता अपनी विश्वसनीयता को बढ़ा सकते हैं।

कृत्रिम गर्भाधान के लिए जरूरी सावधानियां :

  • योनि नव यदि गदी है, छेछ्ड़े हैं, सफेद या पीली है तो ऐसा पशु कृत्रिम गर्भाधान के लिए उपयुक्त नहीं है। ऐसे पशु का पहले संक्रमण मुक्त करने के लिए इलाज करना चाहिए।
  • गाय को कृत्रिम गर्भाधान करने पर लेन के बाद 15 मिनट तक आराम कराना चाहिए।
  • गर्भाधान उचित वीर्य, समय और तकनीकी द्वारा ही किया जाए।
  • गर्भाधान करते समय स्वच्छता बहुत ही महत्वपूर्ण है ताकि बाहर का संक्रमण गर्भाशय में न पहुँचने पाये।  अत: योनिद्वार को अच्छी तरह धोकर – पोछकर साफ कर लेना चाहिए। ऐसा न करने पर कृत्रिम गर्भाधान की बजाय कृत्रिम संक्रमण होने का खतरा रहता है।
  • अतिहिमीकृत वीर्य की स्ट्रा को तरल नाइट्रोजन से निकालकर आधे से एक मिनट के लिए गुनगुने 37 से 40 डिग्री सेल्सियस पानी में अवश्य डाला गया हो।
  • कृत्रिम गर्भाधान नलिका तथा शीथ अच्छी गुणवत्ता की होनी चाहिए। शीथ का वह हिस्सा जो पशु की योनि में डाला जाता है किसी भी परिस्थिति में हाथ या अन्य वस्तुओं के संपर्क में नहीं आना चाहिए।
  • मदकाल के समय गाय को कभी भी गर्भित कराया जा सकता हैं परन्तु मद के मध्य समय से आखिरी मद के दौरान गर्भाधान कराने से गर्भधारण दर अधिक होती है।  यदि गाय का गर्भाधान मद की शुरूआत में किया गया है तो 12 से 24 घंटे बाद एक बार और गर्भाधान करा लेना चाहिए।  यदि 12 घंटे के अन्तराल पर दो बार गर्भाधान कराया जाए तो गर्भाधान दर बढ़ जाती है परंतु एक साथ दो वीर्य स्ट्रा प्रयोग करने का कोई लाभ नहीं होती है।
  • कृत्रिम गर्भाधान के बाद योनिद्वार पर स्थित भंग शिश्निका को क्षणिक देर मलने से गर्भधारण दर लगभग 16 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
  • गर्भधान के बाद गाय को लगभग 15 मिनट तक वहीँ रखना चाहिए तथा गाय को उत्तेजित नहीं करना चाहिए। मद में आये और कृत्रिम गर्भाधान के लिए लाए गए पशु की पिटाई बिल्कुल न करें।
  • गर्मियों के दिनों में गाय को कृत्रिम गर्भाधान के बाद लगभग 15 दिनों तक छायादार स्थान पर बांधना चाहिए तथा उसे खूब नहलाते रहना चाहिए।  ठंडा वातावरण प्रदान करने से गाय की गर्मी दूर हो जाती है तथा गर्भाधारण दर बढ़ जाती है।  गर्म वातावरण शुक्राणुओं की गतिशीलता कम करता है जिससे भ्रूण के नष्ट होने की संभावना रहती है।
  • गाय को पर्याप्त मात्रा में हरा चारा खिलाना चाहिए तथा दाना मिश्रण में 40 – 50 ग्राम खनिज लवण मिश्रण जरूर मिलाना चाहिए।  यदि गाय तालाब में पानी पीने जाती है या क्षेत्र में कृमियों का प्रकोप है तो कृमिनाशक दवा भी पिलानी चाहिए।
  • गाय पालक को कृत्रिम गर्भाधान के बाद 19 से 22 दिन के आस पास गाय पर कड़ी नजर रखनी चाहिए कि कहीं वह दोबारा गरमी में तो नहीं हैं।  यदि गाय में गर्मी के लक्षण दोबारा नहीं मिलते हैं तो दो महीने बाद गाय की गर्भ जाँच जरूर करा लेनी चाहिए।
  • गाय योनिनव गंदा है तो गर्भाशय में एंटीबायोटिक दवा रखनी चाहिए तथा अगले मद में गाय का कृत्रिम गर्भाधान कराना चाहिए।

खनिज मिश्रण : पशुओं के स्वास्थ्य तथा अधिक उत्पादन के लिए उनके आहार में कई प्रकार के खनिज पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है, जैसे कि कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, तांबा, जस्ता, मैंगनीज, कोबाल्ट, आयोडीन तथा नमक इत्यादि जिनकी पूर्ति आहार द्वारा की जाती है। खनिज मिश्रण या मिनरल मिश्रण ऊपर लिखित खनिजों का मिश्रण है तथा इन खनिजों को निश्चित मात्रा में पशु की आवश्यकतानुसार ही बनाया जाता है जिनकी संरचना आगे दी गई है।

खनिज मिश्रण (मिनरल मिश्रण) क्यों आवश्यक है :  पुराने ज़माने में विस्तार खेती के समय पशु खेतों में चरने के लिए जाया करते थे। खेतों में पशुओं के लिए विभिन्न प्रकार की घास होती थी। एक घास किसी एक सूक्ष्म खनिज पर पर्याप्त होती थी तो दूसरी किसी अन्य सूक्ष्म खनिज में । इस प्रकार खेतों में मिश्रित घास खाने से सूक्ष्म खनिजों की आपूर्ति हो जाती थी।  सघन खेती होने से पशुओं का खेतों में चराई के लिए जाना बंद हो गया। आजकल पशुओं को सर्दियों में बरसीम, जई और गर्मियों में ज्वर, मक्का खिलाया जाता है। जिसके कारण कुछ सूक्ष्म खनिजों की पशुओं में कमी होने लगी है। जिसका सीधा प्रभाव पशु उत्पादन एवं प्रजनन क्षमता पर पड़ता है। इसलिए गायों की उत्पादन एवं प्रजनन क्षमता बनाए रखने के लिए खनिज मिश्रण खिलाना अति आवश्यक है।

जैसे कि ऊपर बताया गया है कि पशु आहर में जौ की खल, आटा, भूसा तथा किसी भी हरे चारे को मिलकर की गई सानी से यह खनिज पर्याप्त मात्रा में पशु को नहीं मिलते, इसलिए उन्हें ऊपर से मिलाना पड़ता है।  अधिक दूध देने वाले पशु को तो इन खनिजों (कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, जस्ता, तांबा, मैगनीज, कोबाल्ट इत्यादि) की आवश्यकता और भी अधिक होती है क्योंकि यह दूध का एक अंश है। किसी भी एक खनिज की कमी अगर पशु को हो जाए तो उस पशु के स्वास्थ्य तथा दूध उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है जैसे कि भूख न लगना दूध में कमी आना, बच्चा न होना या बच्चा न ठहरना इत्यादि।

गायों में खनिज तत्वों के आभाव से उत्पन्न रोग :

बछड़ी का देर से जवान होना (विलंबित यौवन) : बछड़ी का देर से जवान होना जनन की एक प्रमुख समस्या है।  यदि बछड़ी को जीवन की प्रारंभिक अवस्था में पर्याप्त मात्रा में सन्तुलित पोषण नहीं दिया जाता है तो वह अक्सर गर्मी में नहीं आती है।  बछड़ी की यौवनवस्था उनकी उम्र की अपेक्षा वजन पर निर्भर करती है। वजन पूरा न होने के कारण बछड़ी के जननांग क्रियाशील नहीं हो पाते हैं।  गर्भधारण के समय बछड़ी की वजन लगभग 250 किलोग्राम होना चाहिए।  यदि बछड़ी को अच्छी खुराक दी जाए तो वह वजन 24 से 30 महीने में आ जाता है। बछड़ी में सही समय पर यौवनावस्था लाने के लिए उन्हें संतुलित आहार खिलाना चाहिए तथा उनके राशन में 15 – 20 ग्राम खनिज लवण मिश्रण जरूर मिला देना चाहिए।

गाय की गर्मी में न आना : जनन की ऐसी अवस्था जिसमे मद चक्र बंद हो जाता है अथवा पशु में गर्मी के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, अमदकाल कहलाता है।  अमदकाल कोई बीमारी नहीं है परंतु इसमें पशु की उत्पादकता घट जाती है।  अमदकाल की अवस्था को दो भागों में बाँटा जा सकता है

वास्तविक अमदकाल : वास्तविक अमदकाल जननहीनता की एक ऐसी अवस्था है जिसमें गाय वास्तविक रूप से गर्मी में नहीं आती है। गायों में वास्तविक अमदकाल अधिक दूध उत्पादन, वातावरण की अधिक गर्मी, संतुलित आहार की कमी अथवा अन्य शारीरिक रोग के कारण हो सकता है।  इस स्थिति में डिंब ग्रंथियों की निष्क्रियता के कारण गाय का मद चक्र पूरी तरह से बंद हो जाता है। संतुलित आहार में कमी के कारण और ब्याने के बाद गाय अक्सर ऋणात्मक ऊर्जा संतुलन के कारण गाय न तो ताव में आती है और न ही गाभिन हो पाती है। शारीरिक ऊर्जा में गिरावट रोकने के लिए गाय को संतुलित आहार खिलाना चाहिए तथा दाने में मक्का/गेहूं की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।  खनिज लवणों की कमी के कारण भी गाय गर्मी में नहीं आती है। खनिज लवणों की पूर्ति के लिए गाय को रोजाना 40 से 50 ग्राम खनिज लवण चारे अथवा दाने में मिलाकर खिलाने चाहिए।

शांत अमदकाल – शांत अमदकाल में गाय गर्मी में आती है परंतु उसका स्वभाव अत्यंत शांत रहता है जिसे पशुपालक समझ नहीं पाता।

गाय का फूल दिखाना : फूल दिखाना अर्थ प्रोलेप्स गाभिन गायों की एक प्रमुख समस्या है।  इस रोग में योनि अथवा बच्चेदानी, योनिद्वार से बाहर निकल आती है। यह समस्या गर्भावस्था के आखिरी महीनों से लेकर बच्चा देने के 1 से 2 महीने तक कभी भी हो सकती है।  गायों में प्रोलेप्स के अनके कारण हो सकते हैं परंतु शरीर में कैल्शियम की कमी इसका प्रमुख कारण होता है। अन्य कारणों में पशु को कब्ज होना, प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन की कमी तथा पिछले ब्यांत में कठिन प्रसव व बच्चे को गलत तरीके से खींचना हो सकता है।  गायों में फूल दिखाने की समस्या प्रसव से लगभग 15 से 60 दिन पहले, प्रसव के दौरान अथवा प्रसव के 1 से 2 महीने तक देखी जाती है।

प्रसव से पहले प्रोलेप्स : अगर प्रसव से पहले प्रोलेप्स हो तो गाय का बाड़ा चारों तरफ से  सुरक्षित व बंद होना चाहिए ताकि कुत्ते और कौवे ऐसे स्थान से दूर रहें।  कुत्ते और कौवे, शरीर के बाहर निकले हुए भाग को काटकर खाने लगते हैं जिससे पशु को काफी नुकसान पंहुच सकता है।  गाय के बांधने का स्थान साफ – सुथरा होना चाहिए। फर्श पर भूसा व गंदगी नहीं चाहिए।  भूसा व गंदगी चिपकने के कारण गाय को जलन होती है और वह पीछे की ओर जोर लगाना शुरू कर देती है।  गाय को ऐसे फर्श को सूखा चारा (तूड़ी/भूसा) न खिलाएं। हरा चारा खिलाएं तथा दाने में चोकर की मात्रा बढ़ा दें।  गाय को कब्ज न होने दें।  चारा ऐसा हो कि गोबर पतला रहे। गाय के दाने में रोजाना 60 से 70 ग्राम खनिज लवण मिश्रण जरूर मिलाएँ। ये खनिज मिश्रण दवा विक्रेता के यहाँ अनेक नामों (एग्री.मिन, मिनिमिन, मिल्कमिन इत्यादी) से मिलते हैं।  रोग की शुरूआत में आयुर्वेदिक दवाईयाँ जैसे प्रोलेप्स इन अथवा प्रोलेप्स – क्योर आदि का प्रयोग किया जा सकता है। होम्योपैथिक दवाई – सीपिया 200  X  की 10 बूँदे रोजाना पिलाने से भी लाभ मिलता है।

योनि के बाहर निकले भाग को साफ व ठंडे पानी से धो लें जिससे उस पर भूसा, मिट्टी व धुल के कण न लगे रहे।  पानी में लाल दवा (पोटेशियम परमैंनेट) डाल सकते हैं।  पानी में डिटोल आदि दवा जो योनि में जलन करे, नहीं डालनी चाहिए।  हाथ योनि के अंदर करने से पहले नाखुन काट लेने चाहिए तथा साफ हाथों से योनि को धीरे – धीरे  अंदर धकेलना चाहिए।  योनि अंदर हो जाने के बाद उस पर नर्म रस्सी की ईडूनी बांध देनी चाहिए।  यह ध्यान रखना चाहिए की ईडूनी अधिक कसी न हो तथा पेशाब करने के लिए 3-4 अंगुलियों जितनी जगह रहे।  यह ईडूनी प्रसव की शुरूआत होने पर खोल देनी चाहिए।  शरीर में कैल्शियम की पूर्ति के लिए कैल्शियम की बोतल खून में चढ़वा लेनी चाहिए।

प्रसव के बाद प्रोलेप्स : प्रसव के दौरान होने वाला प्रोलेप्स सबसे अधिक खतरनाक माना जाता है।  समय पर उपचार न किया जाए तो गाय के मरने की संभावना बढ़ जाती है।  यह प्रोलेप्स मुख्य रूप से ब्याने के तुरंत बाद या 4-6 घंटे के अंदर सबसे अधिक होता है।  प्रोलेप्स होने पर गाय बैठी रहती है तथा गर्भाशय बाहर निकल आता है। बाहर निकले भाग पर लड्डू जैसे संरचनाएँ दिखाई देती हैं।  इन पर जेर भी चिपकी हो सकती है। यदि प्रोलेप्स की समस्या प्रसव के कुछ दिनों बाद आती है तो उसका मुख्य कारण बच्चेदानी में कोई घाव या संक्रमण होता है।  यह घाव व संक्रमण प्रसूति के समय गलत तरीके से बच्चा खींचने से अथवा जेर रूकने व गंदे हाथों से जेर निकालने से हो सकता है।  योनि से अक्सर बदबूदार, लालिमा लिए मवाद निकलता है।  योनि में जलन के कारण गाय अक्सर पीछे की ओर जोर लगाती रहती है।  जिससे बच्चेदानी बाहर निकल आती है।

रोकथाम व उपचार : प्रसव के बाद प्रोलेप्स होने पर गाय को अन्य पशुओं से अलग बांध कर रखें। गर्भाशय को लाल दवा युक्त ठंडे/बर्फीले पानी से धो दें ताकि इस पर भूसा व गोबर न चिपका रह। गर्भाशय को एक गीले तौलिए से ढक दें ताकि गर्भाशय सूखने ने पाये तथा उस पर मक्खियाँ न बैठें। शरीर के निकले भाग की सफाई पर विशेष ध्यान चाहिए।  उसे जुती द्वारा कभी अंदर न करें।  प्रसव के दौरान होने वाला प्रोलेप्स काफी खरतनाक होता है अत: तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क कर उचित ईलाज कराना चाहिए।  गर्भाशय में बच्चा फंसने पर उसे जबरदस्ती अथवा नीम हकीम द्वारा नहीं निकलवाना चाहिए।  जेर रूकने पर उसे निकालने के लिए अधिक जोर नहीं लगाना चाहिए।  प्रोलेप्स अक्सर वंशानुगत भी होता है।  अत: ऐसा बछड़ा जिसकी माँ को प्रोलेप्स की शिकायत रही हो प्रजनन के लिए प्रयोग नहीं करना चाहिए।  गाय को 40 से 50 ग्राम कैल्शियम युक्त खनिज लवण मिश्रण नियमित रूप से खिलाना चाहिए। गर्भाशय में संक्रमण के कारण प्रोलेप्स है तो गाय को एंटीबायोटिक के इंजेक्शन 3 से 5 दिन में लगवाने चाहिए।  बच्चेदानी में भी दवाई रख सकते हैं।  गाय के चारे में रोजाना 60 से 70 ग्राम खनिज मिश्रण जरूर मिलाएँ। ये खनिज मिश्रण विक्रेता के यहाँ अनेक नामों (एग्रिमिन, मिनिमान, मिल्कमिन इत्यादि) से मिलते हैं।

असामान्य/दोषपूर्ण गर्भस्थिति : एक अथवा दोनों अगले पैर बच्चेदानी के अंदर मुड़े होना, अगले पैरों का गर्दन के ऊपर चढ़ना, सिर का पैरों के बीच नीचे को झुका होना, सिर और गर्दन का पीछे की ओर मुड़ जाना, अगले पैरों का गर्दन के ऊपर चढ़ना, सिर का पैरों तथा थूथन का साथ – साथ आना, पिछले दोनों पैर बच्चेदानी में मुड़ जाना आदि कई ऐसी स्थितियां हैं जिनमें बच्चा अक्सर फंस जाता है।  बच्चे में विकास संबंधी दोष के कारण भी बच्चा फंस सकता है।

दुग्ध  ज्वार : अधिक दूध देने वाली गायें अक्सर इस रोग से प्रभावित होती हैं।  यह रोग मुख्य रूप से कैल्शियम की कमी के कारण होता है।  गर्भावस्था के दौरान माँ के शरीर में उपस्थित कैल्शियम की काफी मात्रा बच्चे की हड्डियों के विकास के लिए स्थानांतरित हो जाती है।  ब्याने के बाद कैल्शियम की काफी मात्रा दूध में भी चली आती है। एक अनुमान के अनुसार प्रति किलोग्राम, दूध में लगभग 1.2 ग्राम तथा खीस में 2.3 ग्राम कैल्शियम पशु के शरीर से निकल जाता है है।  यदि गर्भावस्था के दौरान गाय के आहार में कैल्शियम की पर्याप्त मात्रा नहीं है तो इससे शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाती है।  रोग के लक्षण आमतौर पर ब्याने के लगभग 72 घंटे के अंदर प्रकट हो जाते हैं।  गाय का शरीर ठंडा पड़ जाता है।  कमजोरी के कारण गाय खड़ी नहीं रह पाती है और बैठ जाती है।  गाय की कंपकपी महसूस होती है तथा बेहोशी छायी रहती है।  गाय अपनी गर्दन को कोख के ऊपर रख लेती है तथा जुगाली करना बंद कर देती है पशु कड़ा गोबर करता है।

उपचार के लिए गाय को कैल्शियम का इंजेक्शन लगाया जाता है।  कैल्शियम की आधी दवा खून में तथा आधी दवा चमड़ी के नीचे लगाई जाती है।   दवा का असर एकदम होता है तथा गाय तुरंत खड़ी होकर जुगाली करने लगती है।  चमड़ी के नीचे लगाए टीके की सिकाई कर देनी चाहिए।  रोग की रोकथाम के लिए गाय को 50 से 70 ग्राम खनिज लवण मिश्रण दाने में मिलाकर रोजाना खिलाना चाहिए। ब्याने के 2 से 3 दिन बाद तक सारा दूध एक साथ नहीं दुहना चाहिए।

पशुओं को खनिज मिश्रण खिलाने के लाभ : एक अध्ययन के मुताबिक हमारे प्रदेश में 60 प्रतिशत से भी अधिक गायों में समय पर नई न होना जैसे  कुप्रभाव पाये जाते हैं।  क्षेत्रीय स्वरूप उत्तम गुणवत्ता वाले मिनरल मिश्रण खिलाने से इन कूप्राभावों को रोका जा सकता है।  इनको नियमित रूप से खिलाने के और भी कई लाभ हैं।

  • पशुओं का हाजमा दुरूस्त रखता है वा पाचन शक्ति को बढ़ाता है।  पशु का दूध की मात्रा तथा शारीरिक भार को बढ़ाता है।
  • दो ब्यांत के बीच में कम समय करता है व पशु को बच्चा देते समय दिक्कत नहीं आती।
  • पशुओं को नया न होना (बच्चा न ठहरना) या गर्मी में न आने की परिशानी को रोकना।
  • पशु कपड़ा, मिट्टी या लकड़ी आदि नहीं खाते।
  • खनिज मिश्रण कितना खिलाएं
  • बछड़ा व बछिया 15 – 20 ग्राम (एक चाय का चम्मच) प्रति पशु प्रतिदिन
  • सांड व गाय 30 - 40  ग्राम (दो चाय के चम्मच) प्रति पशु प्रतिदिन
  • दुधारू गायों को 50 ग्राम (तीन चम्मच) प्रति पशु प्रतिदिन

नमक : नमक भी पशु आहार में खनिज जितना ही आवश्यक है।  इसका पाचन पर क्रिया सीधा असर पड़ता है।  नमक  मुख्यत: दो खनिज होते हैं – सोडियम व क्लोरिन ।  नमक की आवश्यकता कूल आहार में आधा प्रतिशत होती है।  सानी करते समय पशु आहार में इसे इस तरह मिलाया जा सकता है-

  • बछड़े व बछिया – 10 ग्राम (दो चाय के चम्मच) प्रति पशु प्रतिदिन
  • बड़े पशुओं के लिए – 20-25 ग्राम (चार चाय के चम्मच) प्रति पशु प्रतिदिन

ऊपरलिखित मात्रा में प्रात: सानी करते समय खनिज मिश्रण और नमक को अच्छी तरह मिला दें परंतु यदि कुछ किसान भाई दाना मिश्रण इकट्ठा बनाकर रखते हैं तो दाने मिश्रण में खनिज मिश्रण दो प्रतिशत तथा साधारण नमक (मोटा) एक प्रतिशत मिलकर रख दें।  प्रतिदिन इन्हें मिश्रित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

गाय के रोगों की रोकथाम के उपाय :

  • खींस में रोग प्रतिरोधक तत्व होते हैं।  नवजात को जल्द से जल्द खींस पीला देनी चाहिए और पशुओं को रोग से बचाव के टीके समयानुसार लगवाने चाहिए।
  • रोगग्रस्त पशु को आय पशुओं से अलग बांधना चाहिए तथा उचित इलाज कराना चाहिए और रोगी पशु के संपर्क में आये स्वस्थ पशु पर निगाह रखनी चाहिए।
  • संक्रमण के स्रोत जैसे संक्रमित चारा, दाना, दूध, पानी, मल, मूत्र, जेर, मृत भ्रूण, योनि स्राव, बिछावन आदि को ठीक प्रकार से नष्ट कर देना चाहिए ताकि संक्रमण न फ़ैल सके।
  • संक्रमण से मरे पशुओं को जला देना चाहिए, या गहरा गड्ढा खोदकर चुने के साथ दबा देना चाहिए।
  • स्वस्थ पशुओं को ऐसे स्थान जहाँ पर संक्रमण होने का खतरा हो जैसे चारागाह , तालाब, प्रदर्शनी, पशु चिकित्सा कैंप, मेला, संक्रमित क्षेत्र आदि में भेजने से बचना चाहिए।
  • बाहर से ख़रीदे पशु को कुछ दिन अन्य पशुओं से अलग रखें क्योंकि हो सकता है उस पशु में रोग के जीवाणु हों, और रोग के लक्षण प्रकट होने में कुछ देरी हो।
  • बाड़ा स्वच्छ व हवादार होना चाहिए तथा अधिक भीड़ नहीं होनी चाहिए।  बाड़े में मक्खी, मच्छर व अन्य परजीवी नहीं पनपने चाहिए।  इसके लिए सूखी घास जलाकर धूँआ किया जा सकता है।
  • मैलाथियोन का 2 प्रतिशत घोल भी बाड़े में स्प्रे कर सकते हैं।  मैलाथियोन का 5 प्रतिशत घोल पशु के ऊपर भी स्प्रे (छिड़काव) कर सकते हैं।  ब्यूटोक्स दवाई 1 मि. ली दवाई को एक लीटर पानी में घोलकर बाड़े में छिड़काव भी किया जा सकता है।  यह ध्यान अवश्य रखें कि इन कीटनाशक दवाओं को चारा, दाना, पानी तथा नांद (चरी) आदि पर न छिड़कें।

गायों में होने वाले संक्रमण रोग :

गलाघोंटू :  इस रोग को घुर्रखा, घुड़का व घोटुआ भी कहते है।  गायों में फैलने वाला यह एक भयानक संक्रामक रोग है। लक्षण प्रकट होने पर 80 से 90 प्रतिशत गायों की मृत्यु हो जाती है। वर्षा ऋतू के आगमन पर यह रोग अधिक फैलता है। यह रोग दूषित चारा, दाना, पानी के खाने से, रोगी पशु के संपर्क में आने से तथा मक्खी, मच्छरों आदि के काटने से फैलता है।

लक्षण - रोग में पशु को बहुत तेज बुखार हो जाता है।  आंख व मुहं की अंदरूनी त्वचा गहरे लाल रंग की हो जाती है।  मुंह से लार गिरती है तथा नथूनों से गाढ़ा स्राव निकलता है।  गले के नीचे तथा अगले पैरों के बीच में सूजन आ जाती है। सूजन को दबाने से गड्ढा नहीं पड़ता है।  पशु जीभ को बाहर लटकाए रहता है।  पशु को साँस लेने में कठिनाई होती है।  साँस लेते समय घुर  – घुर की आवाज निकलती है।  सांस लेने में भारी तकलीफ के कारण पशु की 12 से 24 घंटे में मौत हो जाती है।

रोकथाम – हर साल बारिश शुरू होने से पहले लगभग मई – जून के महीने में गलाघोंटू  का टिका लगवाएं। पहला टिका छ:  माह की उम्र पर लगवा लेना चाहिए।

लंगड़ा बुखार : इस रोग में शारीरिक रूप से स्वस्त व तगड़े पशु जो लगभग छ: माह से तीन वर्ष की उम्र के बीच होते हैं, अधिक प्रभावित होते हैं।  एक बार लक्षण प्रकट होने पर 80 से 90 प्रतिशत पशुओं  की मौत हो जाती है।  तीन साल की उम्र के बाद यह रोग बहुत कम होता है।

लक्षण – शुरूआत में पशु अन्य पशुओं से अलग खड़ा होता है।  पशु को तेज बुखार होता है।  पशु के कंधे, गर्दन तथा पुट्ठे की मांसपेशियों पर सूजन आ जाती है।  पशु लंगड़ाकर चलता और चलने में दर्द होता है।  जिससे पशु अक्सर बैठ जाता है।  सूजन को दबाकर देखने से चर – चर की आवाज आती है।

रोकथाम – प्रत्येक वर्ष छ: माह से तीन साल की आयु तक के पशुओं को बी क्यू का टिका लगवाना चाहिए।

खुरपका – मुंहपका रोग

विषाणु द्वारा तेजी से फैलने वाला यह एक संक्रामक रोग है।  रोगी पशु के संपर्क में आने से यह रोग स्वस्थ पशुओं को लग जाता है। संक्रमित चारा, दाना, पानी, गोबर, मूत्र, मांस आदि में विषाणु उपस्थित होते हैं जो अन्य पशुओं को रोग फैला सकते है} इस रोग से प्रभावित पशुओं की संख्या तो बहुत का होती है। इस रोग के कारण पशु पालकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।  क्योंकि रोग के ठीक होने के बाद भी पशुओं की कार्यक्षमता तथा दूध उत्पादन क्षमता काफी घट जाती है।  रोग ठीक होने के बाद पशु अक्सर हांफते रहते हैं।

लक्षण -  शुरू में तेज बुखार होता है तथा वह चारा खाना व जुगाली करना बंद कर देता है।  मूँह से लार टपकने लगती है तथा जीभ थोड़ी सी बाहर निकली रहती है।  पशु के मूँह, जीभ व मसूढ़ों पर छाले बन जाते हैं जो लगभग 24 घंटे के अंदर फूट जाते हैं।  छाले फूट जाने से जीभ पर लाल धब्बे जैसे अल्सर (घाव) बन जाते हैं पशु के खुरों के बीच व ऊपर की ओर भी सूजन आ जाती है तथा वहाँ भी छाले पड़ जाते हैं।  ये छाले भी बाद में फूट जाते हैं।  पशु लंगड़ा कर चलता है।  खुरों के बीच घावों में कीड़े (मेगट) भी पड़ जाते हैं।

रोकथाम – क्षेत्र में खुरपका – मुंहपका होने पर जानवरों की आवाजाही तथा तालाब में नहाने  पर रोक लगा देनी चाहिए।  रोग की रोकथाम के लिए पशु को एफ.एम.डी का टिका लगवानी चाहिए।  यह टिका पहली बार 4 माह की उम्र पर लगवाएं।  इसके बाद हर 4 से 6 महीने बाद टीकाकरण कराना चाहिए।

ब्रूसेलोसिस : यह रोग ब्रूसेला नामक जीवाणु द्वारा होता है।  गर्भपात के बाद योनि से निकला स्राव, जेर व  बच्चा पशु के चारा, दाना, पानी को दूषित कर देते हैं।  संक्रमित पानी व चारा खाने से रोग के जीवाणु शरीर में प्रवेश कर जाते हैं तथा गर्भपात का कारण बनते हैं
इस रोग के कारण अनके पशु एक साथ प्रभावित हो जाते हैं अत: रोग को संक्रामक गर्भपात के नाम से भी जाना जाता है।  पशुओं से यह रोग मनुष्यों में भी फ़ैल जाता है।  बछड़ों  में इस रोग के कारण अंडकोषों में सूजन आ जाती है।  रोग के जीवाणु वीर्य में उपस्थित रहते हैं तथा प्राकृतिक गर्भाधान के समय गाय को संक्रमित कर देते हैं।

लक्षण – इस रोग से प्रभावित गायों में गर्भावस्था के छठे महीने के बाद गर्भपात होने लगता है।  गर्भपात आमतौर पर केवल एक बार ही होता है।  गर्भपात से पहले योनि में सूजन आ जाती है तथा बादामी रंग का स्राव योनि से निकलता है। गर्भपात के समय प्राय: मरा बच्चा बाहर आता है।  कभी – कभी जीवित बच्चा भी बाहर आ सकता है जो थोड़ी देर में मर जाता है। गर्भपात के बाद जेर आमतौर पर रूक जाती है।  कुछ पशुओं में रोग के कारण जोड़ों में सूजन आ जाती है तथा घुटने में पानी भर जाता है इसे हाइग्रोमा कहते हैं। यह ब्रूसेलोसिस का एक मुख्य लक्षण है।

रोकथाम होने पर गाय को अन्य पशुओं से अलग बांध कर रखें ताकि रोग अन्य पशुओं में न फैले। योनि स्राव, जेर व मरे बच्चे को जला दें अथवा गहरा गड्ढा खोद कर दबा देना चाहिए।  जिस स्थान पर गाय का बच्चा फेंका है उसे अच्छी तरह फिनाइल से साफ कर दें।  जेर को मजबूत दस्ताना पहनकर निकाले। बगैर दस्ताना पहने हाथ को योनि में न डालें।  रोग की रोकथाम के लिए कोटन स्ट्रेन – 19 नमक वैक्सीन 4 से 8 माह की उम्र में लगवाएं।  यह वैक्सीन केवल मादा कटड़ियों को ही लगाईं जाती है।  गाय को कृत्रिम गर्भाधान द्वारा गाभिन कराएं।  प्राकृतिक गर्भाधान द्वारा गाय को आवारा सांड से न मिलवाएँ।  रोगग्रस्त गाय की छटनी कर दें।  गाय का कच्चा दूध न पीएं।  दूध हमेशा उबालकर पीना चाहिए।

थनैला रोग : पशुओं के प्रबंधन में लापरवाही जैसे बाड़े के गंदे और दूषित फर्श, सफाई की कमी, कीचड़ की अधिकता, मक्खियों की भरमार, बैठने का स्थान का उबड - खाबड़ या छोटे पत्थरों की बहुतायत, गंदे हाथों से दूध निकालना, थनों आदि पर घाव होना, थनैला रोग को पैदा करने में सहायक होते हैं।  ऐसे पशु जो अधिक दूध देते हैं वे इस रोग की चपेट में ज्यादा आते हैं।  ब्यांत बढ़ने के साथ – साथ रोग होने की संभावना भी बढ़ती रहती है।  यह रोग मुख्य रूप से थनों पर गंदगी लगने के कारण फैलता है।

लक्षण – थनैला रोग में थन में सूजन आ जाती है।  दबाने पर थन में दर्द होता है तथा वह कठोर लगता है।  शुरू में दूध में छिछ्ड़े आते है तथा फिर पानी जैसे हो जाता है।  इसके बाद दूध मवाद की भांति हो जाता है।  कभी – कभी दूध का रंग लाल हो सकता है।  पशु को हल्का बुखार हो सकता है।  कभी – कभी थनैला रोग में पशु में कोई लक्षण नहीं आते।  दूध  उत्पादन धीरे – धीरे घट जाता है।  किसान भ्रम की स्थिति में रहता है कि खान – पान की वजह से दूध कम हो रहा है।

उपचार- थनैल रोग होने पर तुरंत ईलाज कराएं।  एक दो दिन की देरी होने पर थन पूरी तरह खराब हो जाता है तथा फिर थन में सामान्य रूप से पूरा दूध नहीं बन पाता है।  इससे पशु का दूध उत्पादन हमेशा के लिए घट जाता है।  थनैला रोग उपचार के लिए एंटीबायोटिक की ट्यूब थन में चढ़वानी चाहिए तथा एंटीबायोटिक का इंजेक्शन मांस या खून में लगवाना चाहिए।  प्रभावी ईलाज के लिए एंटीबायोटिक 3 से 5 दिन तक लगातार लगानी चाहिए।

रोकथाम – थनैला रोग से बचाव के लिए पशु का बाड़ा साफ़ होना चाहिए।  बाड़े में अधिक भीड़ – भाड़ व कीचड़ नहीं होनी चाहिए।  यदि मक्खियों का प्रकोप है तो कीटनाशक दवा का प्रयोग करें।  यदि थन पर खरोंच या चोट है तो तुरंत ईलाज कराएं।  चोटिल या रोगग्रस्त थन को बच्चे को न चूसने दें।  दूध दूहने से पहले थन को अच्छी तरह साफ करके पोटैशियम परमैगनेट के पानी से धो लें तथा ग्वाले भी इसी पानी से हाथ साफ करें।  दूध निकालने के बाद थनों को पोटैशियम परमैगनेट के पानी में डूबोएँ।  दूध सुखाने के अंतिम दिन थन में इंट्रामैमोरी एंटीबायोटिक ट्यूब चढ़ाएँ।  थोड़ी सी भी आंशका होने पर थनैला रोग का तुरंत उपचार कराएँ।

गायों में परजीवी रोग : पशुओं में दो प्रकार के परजीवी पाये जाते हैं – आंतरिक परजीवी और बाहरी परजीवी।   ये परजीवी पोषण पशु के ख़ून से लिए हैं।  इससे पशु कमजोर हो जाता है तथा उसका उत्पादन घट जाता है।  आंतरिक परजीवी पशु के शरीर के अंदर रहते हैं जबकि बाहरी परजीवी मुख्य रूप से शरीर के बाहर त्वचा पर रहते हैं।

आन्तरिक परजीवी : इन परजीवियों में यकृत फ्ल्यूक (लिवर फ्ल्यूक) चपटे कृमि, गोलकृमि, फीताकृमि (टेप वर्म) और चपेटा कृमि प्रमुख हैं। लीवर फ्ल्यूक के कारण पशु को दस्त लग जाते हैं, एनीमिया हो जाता है, जबड़े के नीचे तथा पेट में पानी भर जाता है।  पशु को ऐसे स्थान पर न चरने दें जहाँ कि घास में घोंघे अधिक हो।  दूषित तालाबों व पोखरों का पानी न पिलाएं।  गोलकृमि मुख्य रूप से पशुओं की छोटी आंत में रहता है तथा कभी-कभी वे इतने ज्यादा हो जाते हैं कि वे आंत में रूकावट कर पूरी तरह बंद लगा देते हैं।  इस रोग में बच्चों को दस्त, पेट दर्द, सुस्ती तथा बढ़वार में कमी हो जाती है।  अधिक संख्या में होने पर पेट दर्द के कारण बच्चे पैर मरते हैं तथा तड़फन होती है।  फीताकृमि शरीर के सभी अंग जैसे फेफड़ा, मस्तिष्क, आंत आदि में पाया जाते हैं।  नवजात बछड़ा – बछड़ी को 10 दिन की आयु पर, फिर 21 दिन बाद तथा फिर हर 3 से 6 महीने के अंतराल पर कृमिनाशक दवा पिलानी चाहिए।

बाहरी परजीवी : बाहरी परजीवियों में मक्खियाँ, मच्छर, फाइलेरिया, चिचड़ियाँ, माईट्स, जूएँ आदि आती हैं, ये परजीवी पशु का खून चूसने के साथ – साथ अनके बीमारियाँ के कीटाणु भी शरीर में छोड़ देते हैं।  पशु को झूंझलाहट होती है तथा उसका दूध उत्पादन काफी घट जाती है।  इसके रोकथाम व उपचार के लिए कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए।  ब्यूटोक्स नामक दवा की 1 मि. ली. मात्रा को 1 लीटर पानी में घोलकर अथवा मैलाथियोन 0.5 प्रतिशत दवा का घोल पशु पर स्प्रे करें।

पशु पालकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें :

  • ब्याने से 2 माह पहले पशुओं का दुग्ध निकलना बंद कर देना चाहिए व इस समय के दौरान पशु को 2 से 3 किलो चारा आवश्यक रूप से खिलाना।
  • ब्याने से 10 दिन पहले से उसे घर पर ही रखें।
  • गाय या भैंस के ब्याते ही बच्चे तथा माँ को साफ कपड़े से साफ करना चाहिए।  बच्चे को पानी से नहीं नहलाना चाहिए।  बच्चे के आंख, नाक को हाथ से साफ़ करना चाहिए।
  • बच्चे की छाती को मसलकर साँस दिलवाने में मदद करनी चाहिए।
  • बच्चे के खुर हाथ से निकाल देने चाहिए।
  • बच्चे को एक घंटे के अंदर खींस अवश्य पिलाना चाहिए (जेर गिरने का इंतजार नहीं करना चाहिए)।
  • कम से कम 2 किलो दूध बच्चे को अवश्य पिलाए व दिन में तीन बार दूध पिलाएं।
  • बच्चे को कम से कम तीन माह तक 2 किलो दूध पिलाने तथा 3 माह बाद दूध को धीरे – धीरे कम कर व चारा खिलाना शुरू कर देना चाहिए।
  • गाय को दूध का 40 प्रतिशत तथा भैंस को दूध का 50 प्रतिशत चारा दोनों समय मिलना चाहिए (अगर गाय 10 किलो दूध देती है तो उसे चार किलो चार दिन न में देना चाहिए)
  • जब बच्चा 21 दिन के हो जाए तो उसे पेट के कीड़े मारने की दवा खिलानी चाहिए।  बड़े पशु को 6 माह में यह दवा अवश्य खिलाएं।
  • ब्यांत के बाद गाय के गर्भाशय की सफाई के लिए रिपलेंटा पाउडर को 3 -4 दिन तक पिलाएं।
  • कब्ज दूर करने के लिए महीने में 2 बार दूध के साथ अरंडी का तेल (50 ग्राम) पिलाएं।
  • पशुओं के दूध निकालने का व चरने का स्थान अलग – अलग होना चाहिए।
  • दूध निकालने के बाद गाय को आधा या एक घंटे तक बैठने नहीं देना चाहिए।
  • बछड़ी को 250 से 300 किलो वजन होने पर ही गाभिन कराना चाहिए।
  • बियाई हुई गाय या भैंस को ब्यात के 2 महीने बाद ही गाभिन करना चाहिए।
  • दुधारू गाय को दिन में तीन बार पानी अवश्य पिलाएं।  रात्रि में पानी की व्यवस्था दुधारू पशु के पास होनी चाहिए।

संतुलित आहार व्यवस्था : हर किसान के मन में ज्यादा दूध देने वाली गाय की चाहत होती है।  दूध उत्पादन और प्रजनन, गाय पालन में साथ-साथ चलने चाहिए।  पशु आहार, दूध उत्पादन और प्रजनन क्षमता दोनों को प्रभावित करता है।  एक सफल गाय पालक बनने के लिए ज्यादा दूध उत्पादन के अतिरिक्त गाय भी 12 – 14 महीने में ब्या जानी चाहिए।  थोड़े ही किसान ऐसे हैं जिनकी गाय 12 से 14 माह के अंतराल पर दोबारा ब्याती है।

शुरू के तीन महीनों में गायों में दूध उत्पादन ज्यादा होता है, ऐसे में यदि उनको उचित मात्रा में सन्तुलित आहार न मिले तो शरीर में जमी हुई वसा, विटामिन व खनिज तत्व दूध उत्पादन के लिए प्रयोग कर लिए जाते हैं।  इससे शरीर का भार कम हो जाता है।  इसका सीधा प्रभाव दूध उत्पादन और प्रजनन क्षमता पर पड़ता है।  गाय गर्मी में नहीं आती और धीरे – धीरे दूध देना बंद कर देती है शरीर में वसा एवं अन्य आवश्यक तत्व जमा होने में फिर लगभग एक साल से ज्यादा समय लग जाता है।  जब यह तत्व काफी मात्रा में एकत्र हो जाते हैं।  तब जाकर गाय गर्मी में आती है।  इस प्रकार गाय का अगला ब्यांत आने तक डेढ़ से दो साल का समय लग जाता है।  कई गाय तो इससे भी ज्यादा समय ले लेती हैं।  ज्यादा दूध देने वाली गायों में यह प्रवृति और भी ज्यादा देखी गई है।  ऐसा दूध देने वाली गायों में यह प्रवृति और भी ज्यादा देखी गई है।  ऐसा होने सा गाय पालन घाटे का धंधा बन जाता है।

संतुलित पशु आहर इस समस्या का काफी हद तक समाधान कर सकता है।  हमें पता होना चाहिए कि संतुलित आहार क्या है? इसे कैसे बनाया जाता है? कब – कब और कितना खिलाना चाहिए? इस बारे  में निम्नलिखित जानकारियाँ पशुपालकों के लिए लाभदायक हैं –

संतुलित आहार – संतुलित आहार अथवा संतुलित राशन उस भोजन सामग्री को कहते हैं  जो किसी विशेष पशु की 24 घंटे की निर्धारित पौषाणिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।  संतुलित राशन में मिश्रण के विभिन्न पद्धार्तों की मात्रा मौसम, पशु भार तथा उसकी उत्पादन क्षमता के अनुसार रखी जाती है।  एक राशन की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है।

एक गाय 24 घंटे में जितना भोजन खाती है, वह एक राशन कहलाता है।  असंतुलित राशन वह होता है जो कि गाय को 24 घंटों में जितने पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है वह देने में असफल रहता है। जबकि संतुलित राशन गाय को ठीक समय पर ठीक मात्रा में पोषक तत्व प्रदान करता है।

संतुलित आहार में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज तत्वों तथा विटामिनों की मात्रा पशु की आवश्यकता अनुसार रखी जाती है।  इसे दो भागों में बांटा जा सकता है।

अनुरक्षण राशन – पशु यदि कोई कार्य या उत्पादन न भी करें, फिर  भी जीवित रहने के लिए आवश्यक शारीरिक क्रियाओं जैसे भोजन पचाना, हृदय का कार्यशील रहना, श्वास लेना, रक्त रक्त का नव आदि में भी ऊर्जा खर्च होती है।  शारीरिक तन्तुओं की मरम्मत एवं स्वत: कार्य करने वाली मांशपेशियों द्वारा भी ऊर्जा खर्च होती है।  पशु की खुराक का वह भाग जो उपरोक्त कार्यों में उपयोग होता है, अनुरक्षण राशन कहलाता है।

उत्पादन राशन – अनुरक्षण राशन के अतिरिक्त जो पोषक तत्व राशन में उपलब्ध होते हैं उनका उपयोग उत्पादन के लिए किया जाता है जैसे शरीर बढ़ोतरी, मोटापा, दुग्ध उत्पादन आदि इसलिए प्रत्येक गाय में दुग्ध उत्पादन राशन की आवश्यकता उसके दूध की मात्रा तथा वसा पर निर्भर करती है।  गाय की पूर्ण आवश्यकता ज्ञात करने के लिए उत्पादन राशन को अनुरक्षण राशन में जोड़ दिया जाता है।  पशु भोजन की समस्त सामग्री दो स्रोतों से उपलब्ध होती है।

पशुओं का चारा : पशुओं के राशन में चारे का होना अत्यंत आवश्यक है।  दुधारू पशुओं में सामान्य वसा प्रतिशत बनाए रखने में चारे के कार्य में अव्यवस्था आने से भी रोकता है।  दुधारू पशुओं से अधिक उत्पादन के लिए चारा अधिक से अधिक मात्रा में खिलाना चाहिए।  हरे चारे से पोषक तत्व पशुओं को आसानी से मिल जाते हैं और उनमें विटामिन की मात्रा भी अधिक होती है। पशु भी इसे चाव से खाते हैं। कई साधारण सी विधियाँ विकसित की गई हैं जिनके द्वारा राशन में चारे की मात्रा की निर्धारण किया जा सकता है।

उदहारण के लिए राशन में कुल शुष्क पदार्थ का 1/3 पदार्थ चारे से प्राप्त होना चाहिए।  दलहनी चारों में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है और जब यह चारा पशु को खिलाया जाता है तो  राशन में दाना मिश्रण की मात्रा को कम किया जा सकता है।  साधारण तौर पर चारे तीन प्रकार के होते हैं।

साधारण चारे – जैसे ज्वार, बाजरा, मक्का, जई, हाथी घास, गिनी घास इत्यादि।

दो दाने वाले या दलहनी चारे – जैसे बरसीम, लूसर्न, लोबिया, ग्वार आदि।

सूखे चारे – जैसे गेहूं का भूसा, ज्वार व बाजरा कड़बी आदि।

दाना मिश्रण – साधारण भोज्य सामग्री में तकनीकी रूप से वह सभी भोज्य पदार्थ आते हैं जो कि मुख्य पोषक तत्व प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, तथा वसा प्रचुर मात्रा में प्रदान करते हैं और जिनमें दुष्पचनीय तन्तुओं की मात्रा 18 प्रतिशत से अधिक नहीं होती।  साधारण भोज्य आमतौर पर मिश्रण ही होते हैं और ये मिश्रण इस प्रकार बनाये जाते हैं  कि पशु को संतुलित रूप से सभी पोषक तत्व आवश्यकतानुसार प्राप्त हो जाएँ।  सांध पदार्थों का इस प्रकार वर्गीकरण कर सकते हैं।

पशु स्रोत - मछली का चूरा, रक्त का चूरा मक्खन निकले दूध का पाउडर, मांस का चूरा  आदि।

वनस्पति स्रोत - जौ, ज्वार, मक्का, जई, चना आदि।

खली – मूंगफली की खली, तिल के खली, नारियल की खली, बिनौले, बिनौले का खली अलसी की खली, तारामीरा की खली, मक्का की खली, आदि।

अन्य उत्पाद – चोकर, दाल, चुनी, मान का चोकर, मक्का का ग्लूटन, चने का छिलका, शीरा आदि।

संतुलित दाना मिश्रण कैसे बनायें – संतुलित आहार तैयार करने के लिए अनाज, खल, चोकर, छिलका व दी आयल्ड राईस ब्रान, खनिज मिश्रण एवं नमक की आवश्यकता होती है।  एक अच्छे संतुलित आहार में 18 प्रतिशत या इससे अधिक कच्ची प्रोटीन एवं 70 प्रतिशत या अधिक टी. डी. एन. होना चाहिए, इसको प्राप्त करने के लिए खाद्य सामग्रियों को एक निश्चित अनुपात में मिलाना पड़ता है।  गाय के संतुलित आहार में सरसों की खल एवं बाजरा 20 कि ग्रा. प्रति क्विंटल से अधिक नहीं होनी चाहिए।  

विशेष ध्यान रखने योग्य बातें एवं देखभाल :

  • दुधारू पशुओं की आवश्यक पौष्टिक तत्वों की मात्रा जहाँ तक संभव हो, हरे चारे से पूरी की जाए, जिससे कम से कम दाना मिश्रण की आवश्यकता पड़े और दूध उत्पादन पर कम खर्च हो।
  • 8 - 10 किलोग्राम दूध देने वाली गाय को 20 – 25 किलोग्राम हरा चारा खिलाकर या दलहनी ग्वार, लोबिया और ज्वार, मक्का, बाजरा आदि को चारे में मिलाकर खिलाने से सभी आवश्यक तत्व प्राप्त किये जा सकता हैं।
  • हरे चारे के साथ 3 - 4 किलोग्राम भूसा/कड़बी को खिलाने से आवश्यक शुष्क पदार्थ पूरे किया जा सकते हैं।
  • 10 - 15 किलोग्राम दूध उत्पादन के लिए लगभग 30 - 35 किलोग्राम हरा तथा 5 किलोग्राम दाना मिश्रण खिलाकर पौष्टिक तत्वों की पूर्ति की जा सकती है।
  • इससे अधिक दूध देने वाली गाय के आहार में 35 - 50 किलोग्राम हरे चारे, 5 – 7 किलोग्राम भूसा व 5 – 6 किलोग्राम दाना मिश्रण की मात्रा होना आवश्यक है।  इसे गाय के दाने मिश्रण से कम अपघटन होने वाली प्रोटीन के अवयव जैसे बिनौला या बिनौला की खल या सोयाबीन की खल मिलानी चाहिए।
  • 20 लीटर या अधिक दूध देने वाली गायों को प्रति लीटर दूध पर 10 मिलीग्राम तेल व 25 ग्राम गुड़ देना चाहिए।  ज्यादा तेल देने से पाचन तंत्र कमजोर होता है।
  • पशुओं को प्रतिदिन 40 – 50 ग्राम खनिज मिश्रण 25 – 30 ग्राम साधारण नमक व भरपेट स्वच्छ पानी देना आवश्यक है।
  • अधिक दूध देने वाली गायों के आहार में गुड़, शीरा व तेल जैसे पदार्थ आवश्यकतानुसार मिलाये जा सकते हैं, जिनसे उनकी ऊर्जा की आवश्यकता पूरी हो सके।
  • गाभिन गाय के अंतिम 3 महीनों में 1 से डेढ़ कि. ग्रा. दाना मिश्रण बढ़ा देना चाहिए।
  • 10 कि. ग्रा. हरे चारे की कमी पर डेढ़ से 2 कि. ग्रा. संतुलित आहर एवं इतना ही सूखा चारा पशु के आहार में बढ़ा देना चाहिए।
  • विभिन्न पदार्थों की उपलब्धता व उनकी कीमत को ध्यान में रखकर हम संतुलित व सस्ता दाना तैयार कर सकते हैं।  दाना बनाने में काम आने वाले विभिन्न पदार्थो को उस  समय खरीद कर भंडार में रख लें जब इनका मौसम हो और ये बाजार में बहुतायत में और सस्ती दरों पर उपलब्ध हों।

यह भी याद रखें :

  • दुधारू गायों को घी/ तेल नाल द्वारा देने से कोई लाभ नहीं होता।  इसके विपरीत लागत में वृद्धि हो जाती है।
  • यदि गाय के गोबर में दाने दिखाई पड़ें तो राशन को थोड़ा बारीक़ पीस कर खिलाएं।
  • खनिज लवण, सादा नमक व विटामिन को संतुलित आहार में एक निश्चित मात्रा में मिलाना चाहिए ताकि राशन पूरी तरह पचनीय व लाभदायक बन जाए।
  • जहाँ तक संभव हो गायों के खानपान में दलहनी चारा जैसे बरसीम, रिजका, ग्वार, लोबिया आदि एवं फलीदार चारा जैसे मन, ज्वार, जई, हाथी घास, बाजरा आदि को 1:2 के अनुपात में मिलाकर खिलाना चाहिए।
  • सूखाग्रस्त या कम सिंचाई वाले क्षेत्रों में जब ज्वार की बढ़वार कम हो और उसके पत्ते पीले पड़ गये हों तो गायों को नहीं खिलानी चाहिए।  यह जहरीली हो सकती है।
  • गायों की विशेष देख भाल की बातें
  • गाभिन गाय – दुधारू पशुओं में ब्याने के अंतिम 3 महीने बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।  इस समय गर्भ में बच्चे का दो तिहाई वनज बढ़ता है और इसी काल में पशु अगले ब्यांत में अच्छा दूध देने के लिए अपना वजन बढ़ाते हैं और पिछले ब्यांत में अच्छा दूध देने के लिए अपना वजन बढ़ाते हैं और पिछले ब्यांत में हुई विभिन्न तत्वों की कमी को पूरा करते हैं।  शुरू में गाभिन होते ही पशुपालक को यह देखना चाहिए कि पशु दोबारा 21 दिन बाद गर्मी में आता है या नहीं।  शुरू में पशु को किसी भी प्रकार की बेदखली से गर्भपात हो सकता है।
  • गर्भकाल के अंतिम 3 महीनों में पेट बड़ा होने के कारण, पेट में बच्चे को किसी भी प्रकार का नुकसान न हो।
  • गाभिन पशु अपने को विनम्र बना लेता है एवं अपने को अन्य पशुओं से अलग रखना पसंद करता है।
  • किसानों को गाभिन पशुओं के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए
  • आमतौर पर गाय ब्याने से 2 महीने पहले दूध देना बंद कर देती हैं।  लेकिन संकर नस्ल की गाय एवं ज्यादा दूध देने वाली भैंस ब्याने से 15 – 30 दिन पहले तक दूध देती रहती हैं।  ऐसे पशुओं को ब्याने से 2 महीने पहले दूध से सुख देना चाहिए, नहीं तो बच्चे  कमजोर पैदा होंगे एवं अगले ब्यांत में ये पशु कम दूध देंगे एवं इनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित होगी।
  • जल्दी ब्याने वाली गाय का आवास अलग होना चाहिए तथा इसके लिए उसे 100 – 120 वर्ग फूट ढका क्षेत्र तथा 180 – 200 वर्ग फुट खुला क्षेत्र जरूर देना चाहिए।
  • गाभिन पशुओं को ज्यादा दूर तक नहीं चलना चाहिए क्योंकि  लंबा चलने पर थकान होती है।
  • बाड़े में किसी भी प्रकार की फिसलन नहीं होनी चाहिए।  इससे गाभिन पशुओं को चोट लगने का खतरा रहता है।  जिससे कि गर्भ में पल रहे बच्चे की जान को खतरा हो सकता है।  दरवाजे से अकेले पशु को निकालना चाहिए।
  • गाय के बांधने की जगह अगले पैरों में थोड़ा नीची तथा पिछले पैरों की तरफ थोड़ा ऊँची होनी चाहिए।  यदि बांधने की जगह इसके उलट है तो गाभिन गाय में शरीर दिखाने की संभावना बढ़ जाती है।
  • इस दौरान गाभिन पशु को अलग रखें क्योंकि सांड/झोटा गर्मी में आई गाय/भैंस गाभिन पशु पर चढ़कर नुकसान पंहुचा सकते हैं।
  • गाभिन पशुओं को ताजा पानी पीने के लिए देवें एवं गर्मी सर्दी से बचाव करें।
  • गाभिन पशुओं का आहार इस प्रकार होना चाहिए कि वे पिछले ब्यांत में अपने वजन एवं लवणों में आई कमी को पूरा कर सकें।  गाभिन पशुओं के आहार में कैल्शियम एवं फास्फोरस लवणों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

गाभिन गायों को अगर संतुलित आहार दिया जाए तो वे ब्याने पर 25 प्रतिशत अधिक दूध एवं वसा दे सकती है। गाभिन होने के 6 महीने बाद पशु के आहार पर विशेष ध्यान देने की जरूरत पड़ती है।  गर्भ में बच्चे का दो – तिहाई विकास इन्हीं अंतिम दिनों में होता है। प्रथम बार ब्याने वाले पशुओं में शरीर का विकास बड़ी तेजी से इन्हीं 3 महीनों में होता है।

गाभिन पशुओं को इस प्रकार खिलाया जाए कि वो न ज्यादा मोटे एवं न ज्यादा पतले दिखाई पड़ें।  सामान्यत: गाय को 3 – 4 कि. ग्रा. संतुलित दाना जिसमें गेहूं,छान्नस एवं खल बराबर मात्रा में मिलकर खिलाएं।  कम दाना, कम दूध देने वाले पशुओं को एवं ज्यादा  दाना, ज्यादा दूध देने वाले पशुओं को खिलाएं।  इसके साथ 30 - 40 ग्फ्रम अच्छी क्वालिटी का खनिज मिश्रण हर रोज खिलाएं।  हरा चारा जी भरकर गाभिन पशुओं को खिलाएं।  हरा चारा खिलाने से पशुओं में विटामिन ए की कमी पूरी हो जाती है एवं पशु आगे के लिए उसे अपने शरीर में जमा कर लेते हैं।

पशुओं में दूध सुखाने की विधियाँ – दूध को सुखाने के लिए मुख्यता यह तीन तरीके अपनाएँ जाते हैं-

आधा दूध निकालना – इस विधि द्वारा पशु का सारा दूध नहीं निकाला जाता है एवं कुछ दूध छोड़ किया जाता है।

रूक – रूक कर दूध निकालना – इस विधि द्वारा पशु का एक वक्त का दूध निकाल लेते है एवं एक वक्त का दूध छोड़ दिया जाता है।  शुरूआत में दिन में एक बार, फिर दो दिन में एक बार फिर तीन दिन में एक बार, ऐसा करके अंत में दूध निकालना बंद कर दिया जाता है।

पूर्ण रूप से बंद करना – इस विधि में दूध निकालना बंद करने से तीन दिन पहले से सारा दाना खिलाना बंद कर दिया जाता है।  खाने की कमी से दूध उत्पादन में कमी आएगी।  इस विधि सुखाए जाने वाले पशुओं में पहले से थनैला रोग नहीं होना चाहिए।

प्रसूति गाय – प्रसूति गाय के बच्चे देने की पूर्व अनुमानित तिथि को कहीं लिखकर अवश्य रखें।

ब्याने के लक्षणों में सबसे पहले लियोटी और सांचा पर सूजन आती है।  उसके बाद पूँछ के पास मसलों के तन्तु टूट जाते हैं।  इस समय पर पशु को अलग कर देवें।  इसके बाद पशु 4-8 घंटों बाद बच्चा जन देता है।  ब्याने की जगह साफ, हवादार एवं फर्श पर तूड़ी या पराली पड़ी होनी चाहिए।  वैसे तो गया अपने आप ब्या जाती हैं, लेकिन जरूरत होने पर विशेषज्ञ की सहायता लेनी चाहिए।  अगर प्रसव पीड़ा 4 घंटे से ज्यादा हो गई हो तो पशु चिकित्सक की सहायता लेवें।

  • प्रसूति मादाओं को समुचित मात्रा में हरा चारा व संतुलित आहार देना चाहिए। जिससे उन्हें कब्ज न रहे। अमिक कब्ज या दस्त होने के कारण पशुओं बच्चेदानी या योनि का संपूर्ण या कुछ हिस्सा बाहर आ जाता है।
  • प्रसूति से एक या दो सप्ताह पूर्व पशु को दूसरे पशुओं से अलग किसी अन्य पशुघर में रखें।  पशु घर में सफाई, रोशनी एवं हवा की उचित व्यवस्था हो।
  • अधिक सर्दी के दिनों में पशुघर में ही प्रसव करने दें।  अगर संभव हो सके तो कुछ गर्मी का इंतजाम कर लें।
  • गर्मी के दिनों में पशु को पशुशाला के अंदर में ही प्रसव होने दें।  किन्तु पशुशाला में साफ पानी, छाया एवं सफाई का पूरा प्रबंध हो।
  • पशुशाला का फर्श साफ हो और उस पर साफ मिट्टी, रेत, पुआल या भूसे का बिछावन पड़ा हो।
  • बच्चा जब योनि मुंह से बाहर आने लगे तो बच्चे को हाथों द्वारा बाहर निकलने में सहायता करें।  अगर पशु को प्रसव में अधिक समय लगता है या बच्चा बाहर नहीं आ रहा है या बच्चा मर गया हो तो तुरंत पशु चिकित्सक द्वारा उचित चिकित्सा करवा लें
  • पशु को ब्याने के समय अकेला न छोड़ें तथा प्रसव के समय पशु के आसपास अधिक मनुष्य इकट्ठा न हों।
  • योनि, बच्चे के खुर या आंखे ओ ब्याते समय बाहर आ जाती हैं, ध्यान रखें कि कुत्ता, कौवा, चील आदि पक्षी उसे जख्मी न कर सकें।
  • अगर पशु खड़े – खड़े ब्या रहे हो तो ध्यान रखें कि बच्चा जमीन पर जोर से न गिरे।
  • ब्याने के बाद, सांचा, लियोटी एवं पूँछ को पोटैशियम परमैंगनेट के घोल से पोछे एवं ब्याने के 2 घंटे के अंदर – अंदर खीस nikaनिकालकर बच्चे को पिलाएं।
  • पशु के ब्याने के पश्चात पशु की जेर का ध्यान रखें।  कभी – कभी पशु जेर खाकर बीमार हो जाता है।  इसको रोकने की व्यवस्था करें।
  • तुरंत ब्याई गाय – तुरंत ब्याई गाय की जेर ब्याने के 8 घंटे के अंदर गिर जानी चाहिए।  अगर न गिरे तो पशु चिकित्सक की राय लेनी चहिए।
  • ज्यादा दूध देने वाली गाय में ब्याने पर दूध का बुखार हो जाता है।  जिसमें पशु एक तरफ अपनी गर्दन मोड़ कर पड़ा रहता है।  इसको रोकने का उत्तम उपाय यह है कि सारा दूध एक साथ न निकालें
  • पशु को 2 - 3 दिन तक हल्का न नर्म आहार जिसमें हरा चारा व गेहूं का दलिया ही दें।  दाना मिश्रण पशु को धीरे – धीरे बढ़ाना शुरू करें ताकि पशु उसे आसानी से पचा सके।

परियोजना की प्रमुख विशेषताएं निम्न है :

  • घर पर ही उत्तम कोटि के राठी नस्ल के साँड़ों के बीज से कृत्रिम गर्भाधान की सेवा 24 घंटे उपलब्ध है।
  • कृत्रिम गर्भाधान का शुल्क मात्र 75 रूपये प्रारंभ में रखा गया है क्योंकि क्षेत्र में कृत्रिम गर्भाधान की परंपरा बहुत कम है।
  • प्रत्येक पशु के कान में रेंग कृत्रिम गर्भधारण से पहले लगाया जाएगा।  यह अनिवार्य एवं नि: शुल्क हैं।
  • गर्भाधान करने के 3 महीने बाद घर पर ही गर्भ की जाँच राठी प्रजनन कर्मचारी द्वारा नि: शुल्क की जाएगी।
  • प्रत्येक पशुपालक को प्रजनन कार्ड दिया जाएगा।
  • अगर पशु 3 बार (3 गर्मी) में गाभिन नहीं होता है तब पशुपालक को परियोजना के डॉक्टर द्वारा नि:शुल्क सलाह प्रदान की जाएगी।  उपचार में दवा पर होने वाला खर्च पशुपालक स्वयं वहन करेंगे।
  • ब्यांत होने पर पशुपालक ब्यांत की जानकारी राठी प्रजनन कर्मचारी को देंगे तथा बच्चे को टैग लगवाएंगे।
  • अधिक दूध देने वाली गायों का दूध – मापन परियोजना द्वारा किया जायेगा।  पशुपालकों को 10 रिकार्ड (10 माह) पूरा होने पर 1000 रूपये दिए जायेंगे।

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