खरीफ सीजन में अरहर (तूर) की खेती के लिए उत्तम समय माना जाता है. यदि किसान अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता प्राप्त करना चाहते हैं, तो भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा द्वारा विकसित उन्नत किस्मों का चयन करना फायदेमंद साबित हो सकता है. इन किस्मों में अधिक पैदावार, जल्दी पकने की क्षमता, रोग प्रतिरोधकता गुण मौजूद हैं. आइए जानते हैं ऐसी टॉप-3 पूसा अरहर किस्मों के बारे में जो खरीफ सीजन में किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर सकती हैं-
1. पूसा अरहर संकर-5 (पूसा अरहर यमुना)
पूसा अरहर संकर-5, जिसे पूसा अरहर यमुना के नाम से भी जाना जाता है, वर्ष 2024 में विकसित की गई उन्नत संकर किस्म है. यह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली क्षेत्र के सिंचित इलाकों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त मानी जाती है. ऐसे में अगर किसान भाई इस खरीफ सीजन इस किस्म की पैदावार करते हैं, तो वह इस किस्म से 23.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त कर सकते हैं. साथ ही इसकी फसल लगभग 140 दिनों में तैयार हो जाती है.
किस्म की विशेषता- इस किस्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके 100 बीजों का वजन 8.77 ग्राम होता है और यह फाइटोपथोरा तना झुलसा रोग के प्रति प्रतिरोधी है. रोग प्रतिरोधक क्षमता होने के कारण किसानों को फसल सुरक्षा पर कम खर्च करना पड़ता है और उत्पादन बेहतर मिलता है.
2. पूसा जवाहर अरहर ड्वार्फ 22-02
वर्ष 2025 में विकसित पूसा जवाहर अरहर ड्वार्फ 22-02 मध्य प्रदेश के सिंचित क्षेत्रों के लिए अनुशंसित किस्म है. यह किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है क्योंकि इसकी फसल केवल 125 से 128 दिनों में तैयार हो जाती है. साथ ही किसान अगर इस किस्म का चुनाव करते हैं, तो वह इससे 18.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं.
किस्म की विशेषता- इस किस्म की विशेषता है कि यह किस्म उच्च घनत्व रोपण (45×20 सेमी) के लिए उपयुक्त है और यंत्रीकृत खेती में भी बेहतर प्रदर्शन करती है. समकालिक परिपक्वता होने के कारण कटाई एक साथ की जा सकती है, जिससे किसानों की समय और लागत दोनों की बचत हो सकती है.
3. पूसा जवाहर अरहर ड्वार्फ 22-01
पूसा जवाहर अरहर ड्वार्फ 22-01 भी वर्ष 2025 में विकसित नई किस्म है. इसे मध्य प्रदेश के सिंचित क्षेत्रों के लिए अनुशंसित किया गया है और यह किस्म इन क्षेत्रों के किसानों के लिए सही विकल्प साबित हो सकती है. किसान अरहर की इस किस्म से 132 से 138 दिनों में 17.8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज आसानी से प्राप्त कर सकते हैं.
किस्म की विशेषता- इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका बौना पौधा (लगभग 84.40 सेंटीमीटर ऊंचाई) है. कम ऊंचाई होने के कारण खेत में कीटनाशी और फफूंदनाशी दवाओं का छिड़काव बेहद आसान हो जाता है. इसके अलावा यह किस्म शीघ्र एवं समकालिक परिपक्वता वाली है, जिससे किसान यांत्रिक कटाई आसानी से कर सकते है और श्रम लागत कम होती है.
लेखक: रवीना सिंह
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