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नारियल के रस से चीनी बनाने की ऊर्जा लागत 53.4% तक घटाने का दावा, पेड़ पर ही होगा शुरुआती प्रसंस्करण
कासरगोड/नई दिल्ली, 27 अक्टूबर 2026। नारियल की खेती करने वाले किसानों के लिए नारियल के रस से चीनी बनाने की प्रक्रिया को कम खर्चीला बनाने की दिशा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय बागान फसल अनुसंधान संस्थान (सीपीसीआरआई), कासरगोड ने एक पोर्टेबल इलेक्ट्रिक उपकरण विकसित किया है। इसकी मदद से नारियल के पेड़ से निकाले गए रस को उसी स्थान पर गर्म करके गाढ़ा किया जा सकता है। इससे रस को प्रसंस्करण केंद्र तक पहुंचाने और शुरुआती चरण में उसे ठंडा रखने की जरूरत कम हो सकती है।
संस्थान के अनुसार, इस तकनीक से नारियल के रस से चीनी बनाने की प्रक्रिया में ऊर्जा पर होने वाला खर्च 53.4 प्रतिशत तक कम हो सकता है। हालांकि, यह बचत ऊर्जा लागत की तुलना पर आधारित है, न कि चीनी की कुल उत्पादन लागत में प्रमाणित कमी पर। उपकरण अभी व्यावसायिक बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है। इसके व्यापक प्रसार और किसानों के बीच प्रदर्शन के लिए संस्थान ने नारियल विकास बोर्ड (सीडीबी) को परियोजना प्रस्ताव भेजा है।
10 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित चिनिमंडी की रिपोर्ट में इस तकनीक का विवरण दिया गया था। इसके बाद आईसीएआर-सीपीसीआरआई से प्राप्त तकनीकी जानकारी में उपकरण की अनुमानित कीमत, बिजली की खपत, क्षेत्रीय परीक्षण, सौर ऊर्जा से संचालन और व्यावसायीकरण की स्थिति जैसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आए हैं।
क्या है पाम-टॉप कंसंट्रेटर तकनीक?
इस उपकरण का नाम ‘ए पोर्टेबल इलेक्ट्रिक पाम सैप कंसंट्रेटर’ है। इसे नारियल के फूलों के गुच्छे से निकलने वाले रस, जिसे नीरा या नारियल का रस कहा जाता है, को पेड़ के पास ही गाढ़ा करने के लिए तैयार किया गया है। इस तकनीक का विकास आईसीएआर-सीपीसीआरआई ने नारियल विकास बोर्ड की वित्तीय सहायता से किया है।
नारियल के रस में प्राकृतिक शर्करा होती है। लेकिन सामान्य तापमान पर इसमें किण्वन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, जिससे रस की गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा रहता है। ऐसे में रस को इकट्ठा करने, सुरक्षित रखने और प्रसंस्करण केंद्र तक पहुंचाने के दौरान शीतलन व्यवस्था की जरूरत पड़ सकती है। इससे ऊर्जा, उपकरण और परिवहन पर खर्च बढ़ता है।
नई तकनीक में रस को खाद्य उपयोग के लिए उपयुक्त पाइप के माध्यम से सीधे हीटिंग चैंबर तक पहुंचाने की व्यवस्था है। उपकरण में दोहरी परत वाला इन्सुलेटेड बाहरी पात्र, अंदरूनी कंटेनर, स्टेनलेस स्टील में जड़ा इमर्शन हीटर, तापमान और रस के स्तर को मापने वाले सेंसर तथा रस के प्रवेश और निकास की व्यवस्था दी गई है। हीटर की मदद से रस को गर्म किया जाता है। गर्म होने पर उसमें मौजूद पानी वाष्पित होता है और रस का आयतन घटने के साथ शर्करा की सांद्रता बढ़ती है। इस प्रक्रिया को कंसंट्रेशन यानी सांद्रण कहा जाता है। इसके बाद गाढ़े रस को आगे की प्रक्रिया से गुजारकर चीनी बनाई जा सकती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि पेड़ पर ही तैयार चीनी बनकर निकलती है। पेड़ के पास होने वाला काम शुरुआती प्रसंस्करण है; अंतिम उत्पाद के लिए आगे की प्रक्रिया जरूरी रहती है।
30 लीटर रस से 4.5 किलोग्राम चीनी: ऊर्जा खर्च में कितनी बचत?
आईसीएआर-सीपीसीआरआई की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, 30 लीटर नीरा से लगभग 4.5 किलोग्राम चीनी तैयार करने के लिए कंसंट्रेटर आधारित प्रक्रिया की तुलना पारंपरिक शीतलन और कुकिंग व्यवस्था से की गई।
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लागत का आधार| कंसंट्रेटर आधारित प्रक्रिया| चिलर और पारंपरिक कुकर
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संसाधित नीरा| 30 लीटर| 30 लीटर
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तैयार चीनी| 4.5 किलोग्राम| 4.5 किलोग्राम
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कुल ऊर्जा खर्च| ₹294.44| ₹632.02
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प्रति किलोग्राम चीनी पर ऊर्जा खर्च| ₹65.43| ₹140.45
स्रोत: आईसीएआर-सीपीसीआरआई की ओर से उपलब्ध कराई गई तकनीकी जानकारी।
इन आंकड़ों के अनुसार, दोनों प्रक्रियाओं के बीच ऊर्जा खर्च में ₹337.58 का अंतर है। यानी नई प्रक्रिया में ऊर्जा पर होने वाला खर्च लगभग 53.4 प्रतिशत कम होने का अनुमान है।
इस तुलना में कंसंट्रेटर से रस को पहले गाढ़ा किया जाता है और फिर एकत्रित गाढ़े रस को पारंपरिक कुकर में आगे संसाधित किया जाता है। संस्थान की गणना में कंसंट्रेटर के हीटर और कंट्रोल बॉक्स, कुकर के स्टिरर मोटर तथा एलपीजी का खर्च शामिल है। दूसरी प्रक्रिया में बर्फ बनाने, बर्फ के भंडारण, नमूने के भंडारण और शीतलन व्यवस्था के साथ एलपीजी तथा स्टिरर मोटर की ऊर्जा लागत शामिल की गई है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। संस्थान ने 53.4 प्रतिशत की बचत ऊर्जा लागत के संदर्भ में बताई है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उपकरण अपनाने पर किसान की कुल उत्पादन लागत भी इतनी ही कम हो जाएगी। कुल लागत में उपकरण की कीमत, श्रम, रखरखाव, मरम्मत, अन्य प्रसंस्करण खर्च और तैयार चीनी की पैकेजिंग व विपणन जैसी मदें भी शामिल हो सकती हैं।
बिजली की खपत और एक दिन की प्रसंस्करण क्षमता
संस्थान के जवाब के अनुसार, मध्यम मात्रा में रस देने वाले एक नारियल के पेड़ से सुबह और शाम दो बार नीरा निकाला जाता है। मानक परिस्थितियों में कंसंट्रेटर को दिनभर लगभग 10–11 घंटे चलाने की व्यवस्था बताई गई है।
एक उपकरण की बिजली खपत लगभग 1.15 यूनिट प्रतिदिन बताई गई है। 30 लीटर नीरा के प्रसंस्करण की गणना में 30 कंसंट्रेटर का उपयोग माना गया है। इस हिसाब से कुल खपत 34.5 यूनिट बैठती है। यदि बिजली की दर ₹6.20 प्रति यूनिट मानी जाए, तो कुल बिजली खर्च ₹213.90 होता है।
यह गणना बताती है कि इस प्रक्रिया में कई उपकरणों को एक साथ चलाने की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए किसी किसान के लिए वास्तविक खर्च का आकलन करते समय यह जानना जरूरी होगा कि उसके पास कितने रस देने वाले पेड़ हैं, प्रत्येक पेड़ से कितना रस मिलता है और उपकरणों का उपयोग किस तरह व्यवस्थित किया जा सकता है।
संस्थान के अनुसार, एक कंसंट्रेटर की प्रोटोटाइप कीमत लगभग ₹35,000 है। बड़े पैमाने पर निर्माण और पहले से तैयार सांचों के इस्तेमाल से इसकी कीमत घटकर लगभग ₹15,000 से ₹20,000 प्रति इकाई हो सकती है। यह संभावित कीमत है; बड़े पैमाने पर उत्पादन और बिक्री शुरू होने के बाद ही इसकी वास्तविक कीमत स्पष्ट होगी।
तीन स्थानों पर हुआ क्षेत्रीय प्रदर्शन
आईसीएआर-सीपीसीआरआई ने बताया है कि उपकरण का प्रदर्शन कर्नाटक के कुंदापुरा और हरिहर तथा तमिलनाडु के कोयंबटूर में किया गया। इन स्थानों पर किसानों और संबंधित हितधारकों को उपकरण उपलब्ध कराकर इसके कामकाज का आकलन किया गया।
संस्थान की जानकारी के अनुसार, प्रत्येक स्थान पर उपकरण को सीधे नारियल के पेड़ पर लगाया गया और लगभग 95 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 11 घंटे तक चलाकर तीन-तीन परीक्षण किए गए। अलग-अलग जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद उपकरण का प्रदर्शन संतोषजनक बताया गया।
परीक्षणों में गाढ़े रस की गुणवत्ता का आकलन टीएसएस यानी कुल घुलनशील ठोस पदार्थों के आधार पर किया गया, जिसे डिग्री ब्रिक्स (°Brix) में मापा जाता है। यह माप रस में घुली शर्करा सहित अन्य घुलनशील पदार्थों की सांद्रता का संकेत देता है।
कोयंबटूर में टीएसएस का औसत मान 69.6 डिग्री ब्रिक्स, कुंदापुरा में 63.8 और हरिहर में 63.4 दर्ज किया गया। इन स्थानों पर गाढ़े रस की उपज क्रमशः लगभग 240, 254 और 250 ग्राम बताई गई।
हालांकि, ये आंकड़े गाढ़े रस की उपज से संबंधित हैं, तैयार चीनी की उपज से नहीं। इसलिए इन्हें 30 लीटर नीरा से 4.5 किलोग्राम चीनी तैयार होने के अलग-अलग आर्थिक आकलन के साथ सीधे मिलाकर नहीं देखना चाहिए।
सौर ऊर्जा से चलाने की भी संभावना
नारियल उत्पादक क्षेत्रों में बिजली की उपलब्धता और उसकी लागत उपकरणों को अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए कंसंट्रेटर को सौर ऊर्जा प्रणाली से चलाने की संभावना भी परखी गई है।
आईसीएआर-सीपीसीआरआई के अनुसार, एक उपकरण के परीक्षण के लिए 590 वॉट का सौर पैनल, 98.9 प्रतिशत दक्षता वाला एमपीपीटी नियंत्रक, 950 वॉट का प्योर साइन वेव इन्वर्टर और 12 वोल्ट, 100 एम्पियर-घंटे की लिथियम-आयन बैटरी इस्तेमाल की गई।
संस्थान का कहना है कि धूप के दौरान सौर पैनल उपकरण को बिजली उपलब्ध करा सकता है, जबकि बादल या बारिश की स्थिति में बैटरी और इन्वर्टर मदद कर सकते हैं। इससे उन स्थानों पर उपयोग की संभावना बनती है जहां नियमित बिजली आपूर्ति सीमित है।
हालांकि, सौर ऊर्जा से संचालन की व्यापक आर्थिक उपयोगिता समझने के लिए पैनल, बैटरी और इन्वर्टर की खरीद, बैटरी बदलने, रखरखाव और अलग-अलग मौसम में प्रदर्शन का खर्च भी जोड़ना होगा। उपलब्ध जानकारी में एक उपकरण के सौर ऊर्जा परीक्षण का विवरण है; इससे सभी परिस्थितियों में निर्बाध संचालन या कुल लागत में निश्चित बचत का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
भंडारण और खाद्य सुरक्षा पर अभी और अध्ययन जरूरी
नीरा को गाढ़ा करने का एक प्रमुख उद्देश्य उसकी शर्करा की सांद्रता बढ़ाना और शुरुआती प्रसंस्करण को आसान बनाना है। लेकिन गाढ़े रस को कितने समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है, यह उसके उपयोग और गुणवत्ता के लिए महत्वपूर्ण सवाल है।
आईसीएआर-सीपीसीआरआई के अनुसार, शुरुआती अवलोकनों में 70 डिग्री ब्रिक्स से अधिक सांद्रता वाले गाढ़े रस को स्वच्छ परिस्थितियों में कमरे के तापमान पर एक महीने तक और 65–70 डिग्री ब्रिक्स वाले रस को लगभग 10 दिन तक रखने की संभावना बताई गई है।
लेकिन संस्थान ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन अवलोकनों की पुष्टि के लिए सूक्ष्मजीव सुरक्षा और शेल्फ लाइफ से जुड़े अध्ययन अभी किए जाने हैं। इसलिए इन अवधियों को अंतिम रूप से प्रमाणित भंडारण अवधि नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक सुरक्षा रस की गुणवत्ता, प्रसंस्करण के दौरान स्वच्छता, भंडारण पात्र और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
किसानों और छोटे प्रसंस्करण उद्यमों के लिए उपकरण अपनाने से पहले यह जानना जरूरी होगा कि रस को गाढ़ा करने के बाद उसे किस तापमान पर, किस प्रकार के पात्र में और कितने समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। तैयार चीनी की गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा और बाजार की आवश्यकताओं का आकलन भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए।
पेटेंट मिला, लेकिन व्यावसायिक बिक्री अभी शुरू नहीं
आईसीएआर-सीपीसीआरआई की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, ‘ए पोर्टेबल इलेक्ट्रिक पाम सैप कंसंट्रेटर’ को पेटेंट संख्या 591074 के तहत 3 जून 2026 को पेटेंट प्रदान किया गया। इस तकनीक का औपचारिक शुभारंभ 28 सितंबर 2026 को कासरगोड स्थित संस्थान में आयोजित नारियल किसानों और नारियल आधारित उद्योगों के हितधारकों की बैठक में किया गया।
हालांकि, पेटेंट मिलना और तकनीक का बाजार में उपलब्ध होना दो अलग-अलग चरण हैं। संस्थान ने स्पष्ट किया है कि अभी तकनीक का व्यावसायिक हस्तांतरण या व्यावसायीकरण नहीं हुआ है। किसान या किसान उत्पादक संगठन इसे अपने खेतों में अपनाने के लिए संस्थान के साथ समझौता ज्ञापन कर सकते हैं।
तकनीक को अधिक किसानों तक पहुंचाने के लिए सीडीबी को परियोजना प्रस्ताव भेजा गया है। प्रस्ताव स्वीकृत होने पर किसान उत्पादक संगठनों के माध्यम से प्रदर्शन, सत्यापन और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने की योजना है। भविष्य में तकनीक हस्तांतरण और व्यावसायीकरण की प्रक्रिया संस्थान की प्रौद्योगिकी प्रबंधन इकाई के माध्यम से आगे बढ़ाई जा सकती है।
इसका मतलब है कि उपकरण का उपयोग करने में रुचि रखने वाले किसानों को फिलहाल इसकी खरीद, उपलब्धता, तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण की शर्तों के लिए संस्थान से संपर्क करना होगा। बड़े पैमाने पर निर्माण और नियमित बिक्री की स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।
किसानों की आय बढ़ाने में कितनी उपयोगी हो सकती है तकनीक?
नारियल के रस से चीनी बनाना किसानों के लिए मूल्य संवर्धन का अवसर हो सकता है। यदि शुरुआती प्रसंस्करण को खेत के पास ही करना संभव होता है, तो रस के संग्रह, परिवहन और शीतलन से जुड़ी कुछ चुनौतियां कम हो सकती हैं। इससे छोटे प्रसंस्करण उद्यमों, किसान उत्पादक संगठनों और नारियल उत्पादक समूहों को स्थानीय स्तर पर कारोबार विकसित करने का अवसर मिल सकता है। लेकिन किसी तकनीक की उपयोगिता केवल उसके ऊर्जा खर्च से तय नहीं होती। किसानों के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि उपकरण की खरीद पर कितना निवेश करना होगा, प्रतिदिन कितने पेड़ों से रस संसाधित किया जा सकता है, तैयार चीनी की गुणवत्ता कैसी होगी और बाजार में उसकी कितनी मांग है। इसके अलावा, श्रम की उपलब्धता, बिजली की दर, रखरखाव और अंतिम उत्पाद के विपणन की व्यवस्था भी आर्थिक लाभ को प्रभावित करेगी।
आईसीएआर-सीपीसीआरआई का पोर्टेबल कंसंट्रेटर शुरुआती प्रसंस्करण को आसान बनाने की दिशा में एक संभावित तकनीकी विकल्प है। अब इसकी व्यापक उपयोगिता का आकलन किसानों के खेतों पर प्रदर्शन, स्वतंत्र आर्थिक अध्ययन, खाद्य सुरक्षा परीक्षण और व्यावसायिक उपलब्धता के आधार पर किया जाना होगा। तभी यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रयोगशाला और सीमित क्षेत्रीय परीक्षणों में सामने आए लाभ किसानों की वास्तविक परिस्थितियों में कितने कारगर साबित होते हैं।
कृषि जागरण के पाठकों के लिए मुख्य बात: इस तकनीक से ऊर्जा खर्च में उल्लेखनीय कमी की संभावना है, लेकिन 53.4 प्रतिशत बचत को कुल उत्पादन लागत में कमी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। किसानों के लिए इसका वास्तविक लाभ उपकरण की कीमत, प्रसंस्करण क्षमता, गुणवत्ता, बाजार और स्थानीय परिचालन खर्च पर निर्भर करेगा।
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