साकेत कोर्ट ने कृषि जागरण के खिलाफ जागरण प्रकाशन द्वारा दायर ट्रेडमार्क मुकदमे को खारिज कर दिया, ₹10 लाख की लागत लगाई, और स्वतंत्र कृषि मीडिया के अधिकारों को बरकरार रखते हुए किसानों की सेवा में समर्पित 30 वर्षों की विरासत की रक्षा की.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और पूर्व ट्रेडमार्क उपयोग (Prior Trademark Use) के सिद्धांतों को सुदृढ़ करने वाले एक ऐतिहासिक फैसले में, नई दिल्ली स्थित साकेत जिला न्यायालय ने भारत के अग्रणी कृषि मीडिया मंच कृषि जागरण के खिलाफ जागरण प्रकाशन लिमिटेड द्वारा दायर ट्रेडमार्क उल्लंघन (Trademark Infringement) और पासिंग ऑफ (Passing Off) के मुकदमे को खारिज कर दिया है.
एक कड़ी टिप्पणी करते हुए, जिसे न्यायालय ने "अनावश्यक और लंबे समय तक खींची गई मुकदमेबाजी" (Unnecessary and Protracted Litigation) बताया, जिला न्यायाधीश अरुल वर्मा ने न केवल वर्ष 2020 में लगाए गए अंतरिम निषेधाज्ञा (Interim Injunction) को निरस्त कर दिया, बल्कि जागरण प्रकाशन को कृषि जागरण को ₹10 लाख की लागत (Costs) का भुगतान करने का भी निर्देश दिया.
यह फैसला केवल कृषि जागरण के लिए ही नहीं, बल्कि उस व्यापक किसान और कृषि समुदाय के लिए भी एक ऐतिहासिक कानूनी जीत है, जिसकी यह संस्था पिछले लगभग तीन दशकों से अथक सेवा करती आ रही है.
किसानों के लिए यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है
यह ऐतिहासिक निर्णय स्वतंत्र कृषि मीडिया की आवाज़ की रक्षा करता है और यह सुनिश्चित करता है कि किसानों को जानकारी देने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए समर्पित मंचों को एकाधिकारवादी कानूनी कार्रवाइयों के माध्यम से चुप नहीं कराया जा सकता. यह फैसला किसानों के समुदाय के उस अधिकार को भी मजबूत करता है, जिसके तहत वे विविध, विश्वसनीय और निर्बाध कृषि पत्रकारिता तक पहुंच बना सकें.
न्यायालय ने "जागरण" जैसे सामान्य शब्द पर एकाधिकार स्थापित करने के प्रयास को खारिज किया
न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि कोई अन्य संस्था किसी शब्द का पहले से और लगातार उपयोग करती रही है, तो केवल ट्रेडमार्क पंजीकरण के आधार पर कोई भी स्वामी किसी सामान्य रूप से प्रचलित शब्द पर एकाधिकार स्थापित नहीं कर सकता.
अपने एक महत्वपूर्ण अवलोकन में न्यायालय ने कहा कि यदि ऐसे तर्कों को स्वीकार कर लिया जाए, तो इससे प्रकाशन उद्योग में हास्यास्पद परिणाम उत्पन्न होंगे. "टाइम्स" (Times) शब्द का उदाहरण देते हुए न्यायालय ने टिप्पणी की कि The Times of India, Hindustan Times और Navbharat Times जैसे प्रकाशनों को केवल इसलिए बंद नहीं कराया जा सकता कि किसी एक संस्था ने किसी सामान्य अभिव्यक्ति पर विशेष अधिकार होने का दावा किया है.
न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि यह मुकदमा कानून के विपरीत तरीकों का उपयोग करके "एक प्रतिस्पर्धी को समाप्त (Extirpate) करने का प्रयास" प्रतीत होता है और चेतावनी दी कि ट्रेडमार्क कानून का उपयोग वैध और लंबे समय से स्थापित प्रकाशनों को दबाने के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए.
न्यायालय ने कृषि जागरण की 30 वर्षों की विरासत को मान्यता दी
सितंबर 1996 में एम.सी. डोमिनिक के नेतृत्व में स्थापित कृषि जागरण आज भारत की सबसे सम्मानित कृषि मीडिया संस्थाओं में से एक बन चुका है. पिछले 30 वर्षों में इसने किसानों को ज्ञान, नीतिगत जानकारी, कृषि बाज़ार संबंधी जानकारी, ग्रामीण सफलता की कहानियाँ और कृषि क्षेत्र में तकनीकी प्रगति से लगातार सशक्त बनाया है.
आज कृषि जागरण प्रिंट, डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से भारत भर के लाखों किसानों तक 12 भारतीय भाषाओं में पहुंचता है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने स्वीकार किया कि कृषि जागरण द्वारा इस ट्रेडमार्क का उपयोग जागरण प्रकाशन द्वारा "JAGRAN" ट्रेडमार्क के लिए दिसंबर 2004 में किए गए आवेदन से पहले से हो रहा था.
15 वर्षों के संबंध के बावजूद दायर किया गया मुकदमा
सुनवाई के दौरान सामने आए सबसे महत्वपूर्ण तथ्यों में से एक यह था कि जागरण प्रकाशन को मुकदमा दायर करने से पहले 15 वर्षों से अधिक समय से कृषि जागरण के अस्तित्व और उसके कार्यों की पूरी जानकारी थी.
वास्तव में, जागरण प्रकाशन पहले कृषि जागरण के साथ मीडिया पार्टनर के रूप में जुड़ा हुआ था, जिससे वर्ष 2019 में दायर किया गया यह मुकदमा न्यायालय की दृष्टि में और भी अधिक संदिग्ध प्रतीत हुआ.
इस लंबे समय से चली आ रही जानकारी और साझेदारी के बावजूद, कृषि जागरण को वर्षों तक महंगी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी और वर्ष 2020 में उस पर अंतरिम निषेधाज्ञा भी लगाई गई, जिसका उसके संचालन और ब्रांडिंग पर प्रभाव पड़ा.
अब न्यायालय द्वारा मुकदमे को पूरी तरह खारिज किए जाने के साथ यह स्पष्ट रूप से सिद्ध हो गया है कि "जागरण" नाम का वैध पूर्व उपयोगकर्ता (Prior User) कृषि जागरण ही है.
किसानों की सेवा करने वाले स्वतंत्र मीडिया की जीत
इस फैसले को भारत में स्वतंत्र और विशिष्ट क्षेत्र आधारित पत्रकारिता, विशेषकर कृषि एवं ग्रामीण मीडिया के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है.
ट्रेडमार्क के दुरुपयोग और एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े होकर न्यायालय ने यह पुनः स्पष्ट किया है कि जनहित की सेवा करने वाली स्थापित संस्थाओं को आक्रामक कानूनी रणनीतियों के माध्यम से चुप नहीं कराया जा सकता.
कृषि जागरण के लिए यह फैसला केवल उसके कानूनी अधिकारों की बहाली नहीं है, बल्कि भारत के किसानों की ईमानदारी, पारदर्शिता और प्रतिबद्धता के साथ सेवा करने के उसके अटूट मिशन को भी और अधिक मजबूत करता है.
विस्तृत निर्णय
कृषि जागरण का बयान
"हम इस जीत को भारत के किसानों, कृषि समुदाय, अपने भागीदारों, समर्थकों और उन अनगिनत शुभचिंतकों को समर्पित करते हैं, जिन्होंने इस पूरी यात्रा के दौरान हमारा साथ दिया. लगभग तीन दशकों से कृषि जागरण विश्वसनीय पत्रकारिता और सार्थक सहभागिता के माध्यम से किसानों की आवाज़ को बुलंद करने तथा भारतीय कृषि को सशक्त बनाने के लिए निरंतर प्रतिबद्ध रहा है.
हम माननीय न्यायालय का हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं कि उन्होंने न्याय को कायम रखते हुए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पूर्व उपयोग (Prior Use) के सिद्धांतों की पुनः पुष्टि की. यह निर्णय केवल कृषि जागरण की कानूनी जीत नहीं है- यह किसानों के कल्याण और सशक्तिकरण के लिए निरंतर कार्य करने वाले प्रत्येक स्वतंत्र मंच की जीत है."
कृषि जागरण के बारे में
कृषि जागरण भारत के अग्रणी कृषि मीडिया हाउसों में से एक है, जिसकी स्थापना वर्ष 1996 में एम.सी. डोमिनिक ने की थी. बहुभाषी प्रिंट प्रकाशनों, डिजिटल प्लेटफॉर्म, आयोजनों और जमीनी स्तर पर किसानों के साथ जुड़ाव की विभिन्न पहलों के माध्यम से कृषि जागरण आज भी पूरे भारत के कृषि समुदाय की सेवा और उन्हें सशक्त बनाने के अपने मिशन पर निरंतर कार्य कर रहा है.
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