खरीफ सीजन में किसानों को ऐसी उन्नत फसलों की तलाश में रहते हैं, जो कम समय में अच्छा उत्पादन देने में सक्षम हो और ऐसे में ICAR द्वारा विकसित खरीफ सीजन की बाजरा की ये टॉप 3 किस्में पूसा 1801 संकर, पूसा 1201 संकर, पूसा कम्पोजिट 701 ये नई उन्नत किस्में किसानों को कम समय में अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा दिलाने में अच्छा विकल्प साबित हो सकती है, तो यहां जानिए टॉप 3 उन्नत किस्में, जो आपके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती हैं.
1.पूसा 1801 (संकर)
पूसा 1801 वर्तमान समय की सबसे उन्नत और हाई-यील्डिंग बाजरा किस्म मानी जा रही है. यह किस्म खासतौर पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (दिल्ली) और आसपास के सिंचित क्षेत्रों के लिए विकसित की गई है. इन क्षेत्रों के किसान इस फसल से 83 दिनों के भीतर 33.3 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज पा सकते हैं.
मुख्य विशेषताएं
यह किस्म डाउनी मिल्ड्यू, ब्लास्ट, दाना एर्गोट, स्मट और रतुआ जैसे प्रमुख रोगों के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी है. इसके अलावा इसमें लौह (70 पीपीएम) और जिंक (57 पीपीएम) की मात्रा अधिक होती है, जिससे यह पोषण के लिहाज से भी बेहतर है. ज्यादा उत्पादन और रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण यह किसानों की पहली पसंद बनती जा रही है.
2.पूसा 1201 (संकर)
पूसा 1201 भी एक उन्नत संकर किस्म है, जो किसान भाइयों को कम समय में अच्छी पैदावार देने के लिए जानी जाती है. यह खासकर सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है. ऐसे में किसान लगभग 80 दिन के भीतर 28.1 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार पा सकते हैं.
मुख्य विशेषताएं
बाजरा की यह किस्म डाउनी मिल्ड्यू और ब्लास्ट जैसे रोगों के प्रति उच्च प्रतिरोधी है. साथ ही इसमें लौह (55 पीपीएम) और जिंक (48 पीपीएम) की मात्रा अच्छी पाई जाती है. जल्दी तैयार होने वाली यह किस्म उन किसानों के लिए बेहतर है, जो कम समय में फसल लेकर दूसरी फसल की तैयारी करना चाहते हैं.
3.पूसा कम्पोजिट 701
पूसा कम्पोजिट 701 एक ऐसी किस्म है, जो उत्पादन के साथ-साथ पोषण के मामले में भी संतुलित मानी जाती है. यह उत्तर भारत के इन इन राज्यों जिनमें राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली इन इलाकों में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है. साथ ही इन क्षेत्रों के किसान 80 दिन के भीतर बाजरा की इस किस्म से औसत पैदावार 23.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त कर सकते हैं.
मुख्य विशेषताएं
यह किस्म डाउनी मिल्ड्यू के प्रति उच्च प्रतिरोधी है और इसमें लौह (48 पीपीएम) व जिंक (41 पीपीएम) की अच्छी मात्रा होती है. कम संसाधनों में भी अच्छी पैदावार देने के कारण यह छोटे और मध्यम किसानों के लिए उपयुक्त विकल्प है.
लेखक: रवीना सिंह
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