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“सोया स्टेट’’ का भविष्य : दमोह के सोयबीन किसानों के लिए क्लाईमेट-स्मार्ट ब्लूप्रिन्ट

मध्य प्रदेश, देश का प्रमुख सोयाबीन उत्पादक राज्य, अब जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहा है। दमोह, सतना और राजगढ़ जैसे क्षेत्रों में अनियमित मानसून के चलते पैदावार 1000–1200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर ठहर गई है। भारी बारिश के बाद लंबे सूखे जैसे हालात छोटे किसानों के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। कैसे? आगे जानें।

KJ Staff
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दमोह के सोयबीन

मध्य प्रदेश को पूरे भारत मे “सोया स्टेट” के नाम से जाना जाता है , क्योंकि यह मध्य भारत की तिलहन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। यह फसल ज्यादातर छोटे और सीमांत किसानो द्वारा उगाई जाती है और देश के कुल सोयबीन उत्पादन व रकबे का आधे से ज्यादा हिस्सा इसी राज्य से आता है, लेकिन अगर आप विंध्य पठार और दमोह मे खेती कर रहे है, तो आप जानते होंगे की पिछले एक दशक मे सोयबीन की पैदावार 1000 से 1200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर रुक गई है। इसका सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है। मध्य भारत मे सोयाबीन पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है इसीलिए यह मानसून की अनिश्चितता के प्रति बेहद संवेदनशील है हाल के वर्षों मे दमोह सतना, राजगढ़ जैसे इलाकों मे भारी बारिश के बाद लंबे समय तक सूखा पड़ने जैसी स्थितिया आम हो गई है। इससे फसल की शुरुआती अवस्था मे जलभराव और फलिया भरते समय सूखे की मार पड़ती है। भविष्य मे मुनाफे और स्थिर विकास के लिए पारंपरिक खेती छोड़कर क्लाईमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर (CSA) की ओर बढ़ना अब एक जरूरत बन गया है। दमोह के सोयबीन उत्पादक के लिए एक विज्ञान आधारित क्लाईमेट-स्मार्ट रोडमैप यहा दिया गया है।

सही बीज चुनाव : उन्नत और जलवायु – अनुकूल (Climate-Resilient) किस्में- भविष्य की खेती के लिए सही बीज सबसे जरूरी है। दमोह, सागर, और सतना जैसे कृषि-जलवायु क्षेत्रों में वर्तमान मानसून की अनिश्चितताओं और परिवर्तन को देखते हुए अब पुरानी किस्मों की जगह नई उन्नत और जलवायु –अनुकूल किस्मों को अपनाना आवश्यक हो गया है।

जलवायु – अनुकूल (Climate-Resilient) किस्मों का महत्व: जलवायु परिवर्तन के कारण काम बारिश (Dry spells) या अचानक भारी जल भराव का खतरा बढ़ गया है । जलवायु – अनुकूल किस्में इन चरम मौसम स्थितियों को सहने , नमी के तनाव से लड़ने और फसल खराब होने का जोखिम को कम करने के लिए विशेष रूप से विकसित की गई है 

सूखा और नमी तनाव सहनशील किस्में (Climate-Resilient) : NRC157, NRC131, NRC136 । ये किस्में जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सबसे बड़े हथियार हैं । बारिश के बीच लंबे अंतराल या सूखे की स्थिति में भी ये किस्में आसानी से जीवित रहती हैं। 

1. NRC 165 

श्रेणी : उच्च उपज और रोग प्रतिरोधी ( High-yielding)

पकने की अवधि : लगभग 95-100 दिन 

पैदावार : 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर 

प्रमुख विशेषएँ : मध्य प्रदेश (सेंट्रल जोन) के लिए अनुशंसित यह एक नई पीढ़ी की ताकतवर किस्म है। यह प्रमुख कीटों (जैसे तना मक्खी) और फफूंद जनित रोगों के खिलाफ बेहतरीन प्रतिरोधक क्षमता रखती है, जिससे किसानों का किततों पर होने वाला खर्च काफी बकता है। 

2. JS 22-12 (जवाहर सोया 22-12) 

श्रेणी : उच्च उपज और कीट प्रतिरोधी 

पकने की अवधि : 95-98 दिन 

पैदावार : 25-28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर 

प्रमुख विशेषएँ : गर्डल बीटल (Girdle beetle) और रस चूसक कीटों के शुरुआती हमले के प्रति यह किस्म काफी सहनशील है और किसानों को एक सुरक्षित बड़ी पैदावार देती है। 

3. JS 16 (जवाहर सोया 16) 

श्रेणी : उच्च उपज 

पकने की अवधि : 95-100 दिन 

पैदावार : 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर 

प्रमुख विशेषएँ : JS (जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय ) सीरीज की यह किस्म मध्य प्रदेश के किसानों के बीच अपने शानदार अंकुरण के(Germination रेट) लिए जानी जाती है। यह शुरुआती दिनों में कम नमी होने पर भी अच्छे से पनपती है और मौसम की मार को झेल सकती है।

खेती की  तैयारी : ब्रॉड बेड फ़रो तकनीक- विंध्य पठार की गहरी काली मिट्टी (वर्टिसॉल) नमी रोकती है , लेकिन इसमें जल निकासी की बड़ी समस्या होती है भारी बारिश में समतल खेत में पानी भर जाता है , जिससे जड़ें सड़ जाती हैं। सूखे के दौरान , मिट्टी कड़ी हो जाती है जिससे जड़ें नीचे नहीं जा पाती हैं। 

BBF तकनीक: खेत को समतल बोने के बजाय , ट्रैक्टर से चलने वाली मसीन से 120-150 सेमी चौड़ी और 15 सेमी ऊंची क्यारिया बनाए , जिनके बीच 30 सेमी चौड़ी नलिया हो। इन क्यारियों पर सोयबीन की चार कतारे बोई जाती है।

फायदा : भारी बारिश मे ये नालिया अतिरिक्त पानी खेत से बाहर निकाल देता है, और सूखे के समय यही नालियाँ नमी को सोखकर पौधौ तक पहुचाती है। (यदि मशीन न हो , तो आप रिज़ और फ़रो यानि मेड़ – नाली विधि भी अपना सकते है)

उच्च उपज और रोग प्रतिरोधी किस्में (high-Yielding): NRC 165, JS 22-12,और JS 16। ये किस्में आधुनिक कृषि के लिए बेहतरीन हैं , जो ना केवल बम्पर पैदावार देती हैं बल्कि बदलते मौसममें पनपने वाले कीटों और बीमारियों के प्रति भी अधिक सुरक्षित हैं। 

पैदावार : क्लइमेट–स्मार्ट तरीके से खेती करने पर ये किस्में 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक शानदार पैदावार दे सकती है।

दमोह और मध्य प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और मानसून की अनिश्चितता को देखते हुए सही सोयबीन किस्मों का चुनाव ही मुनाफे की गारंटी है। आपके द्वारा चुनी गई सभी किस्मे  नई तकनीक और बदलती जलवायु को ध्यान में रखकर विकसित की गई है। 

यह प्रत्येक उन्नत और जलवायु-अनुकूल (CLIMATE–RESILIENT) किस्म का विस्तरत विवरण दिया गया है । 

4. NRC 131 (इंदौर सोया-131) 

श्रेणी : जलवायु-अनुकूल (सूखा और जलभराव सहनशील)

पकने की अवधि : जल्दी पकने वाली (लगभग 92 दिन) 

पैदावार : 25 से 31 क्विंटल प्रति हेक्टेयर 

प्रमुख विशेषएँ : यह किस्म चारकोल रॉट और एन्थ्रेक्नोज जैसी भयंकर बीमारियों के प्रति पूरी तरह प्रतिरोधी है। इसके पोधों की ऊंचाई और संरचना ऐसी होती हैं। की इसे मशीन (MACHANICAL HARVESTING/हार्वेस्टर ) से बिना किसी के आसानी से काटा जा सकता है।

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NRC 131

प्रमुख विशेषएँ : यह किस्म चारकोल रॉट और एन्थ्रेक्नोज जैसी भयंकर बीमारियों के प्रति पूरी तरह प्रतिरोधी है। इसके पोधों की ऊंचाई और संरचना ऐसी होती हैं। की इसे मशीन (MACHANICAL HARVESTING/हार्वेस्टर ) से बिना किसी के आसानी से काटा जा सकता है।

5. NRC136

  • श्रेणी : जलवायु –अनुकूल (बेहतर सूखा सहनशील)

  • पकने की अवधि : माध्यम अवधि (लगभग 105-107 दिन)

  • पैदावार : 25 से 31 क्विंटल प्रति हेक्टेयर(अधिकतम उपज क्षमता)

  • प्रमुख विशेषताएँ : भारतीय  सोयबीन अनुसंधान संस्थान (ICAR-IISR) द्वारा विकसित यह किस्म सूखे की मार (DROUGHTSTRESS) को सहने के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है। बारिश के बीच लंबे अंतराल के दौरान भी इसके फूल और झाड़ियाँ झड़ने की समस्या न्यूंनतम होती हैं।

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NRC 136

6. NRC157

  • श्रेणी :  जलवायु –अनुकूल(नमी तनाव सहनशील)

  • पकने की अवधि : माध्यम अवधि(95-100 दिन)

  • पैदावार :20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

  • प्रमुख विशेषताएँ : यह किस्ममानसून की अनिश्चितताऔर तापमान में अचानक होने वाले बदलावों के बीच एक स्थिर उपज देने के लिए जानी जाती हैं। विपरीत मौसम में भी यह दानों का आकार सिकुड़ने नहीं देती और तेल की अच्छी मात्रा बनाए रखती हैं।

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NRC 157

बेजोपचार और पोषण : “FIR” प्रोटोकाल-  बुबाई से पहले बीजों को सुरक्षित करना बहुत जरूरी है। इसके लिए FIR (FUNGICIDE, INSECTICIDE,RHIZOBIUM) तरीका आपनाएं। अब किसानों के पास अलग-अलग रसायनों के बजाय उन्नत सयुंक्त मिश्रण (Combination blend) का विकल्प है :

  • F(फफूँदनाशी) और I (कीटनाशक) का सयुंक्त उपचार : उन्नत बीजोपचार के लिए क्रूजर मैक्स (Cruiser Maxx)का उपयोग एक बेहतरीन विकल्प है। यह एक संयुक्त मिश्रण है जिसमे सिस्टमिक कीटनाशक जैसे- इमिडाक्लोप्रिड या मेफेनोक्साम + थियोमेथक्सम शामिल होते है। इसमे मौजूद फफूँदनाशी बीजों को सड़ने और बीमारियों से बचाता है, जबकि कीटनाशक फसल की शुरुआती अवस्था में लगने वाले कीटों ( जैसे ताना मक्खी और सफेद मक्खी) से शानदार और लंबी सुरक्षा प्रदान करता है।   

  • R(राइज़ोबियम कल्चर): जड़ों मे नोडयूल (गांठें) बनाने के लिए राइज़ोबियम जैपोनिकम (5 ग्राम /किलो ) और मिट्टी के फॉसफोरस को पौधों तक पहुचानें के लिए PSB (5 ग्राम /किलो ) मिलाए।

पोषण: दमोह की मिट्टी मे नाइट्रोंजन , जिंक , सल्फर की कमी हो गई है। बुबाई के समय 20-25 किलो/हेक्टेयर सल्फर (जिप्सम के रूप मे ) जरूर डालें , क्योंकि यह तिलहन मे तेल और प्रोटीन बनाने के लिए सबसे अहम है।

पानी का सही प्रबंधन

  • सोयबीनमें फलियाँ आते समय (बुबाई के 65-85 दिन बाद ) नमी की सबसे ज्यादा जरूरत होती हैं अगर इस दौरान सूखा पढ़ जाए तो पैदावार में 40% तक की भारी गिरावट आ सकती है।

  • इसे रूकने के लिए खेत में एक छोटा तालाब (जैसे 20*15 फीट ) बनाए और जुलाई की भारी बारिश का पानी उसमे जमा करें।

  • फलिया भरते समय इसी पानी से  स्प्रिकलर  द्वारा 50 मिमी की एक “जीवन रक्षक सिंचाई” करने से अनाज की पैदावार 40% से अधिक बढ़ सकती हैं। 

इंटीग्रेटेड पेस्ट मेनेजमेंट [IPM]- गर्डल बीटल और तंबाकू इल्ली जैसे कीटों से बचाने के लिए सिर्फ महंगे रसायनों पर निर्भर ना रहे :

  • गहरी जुताई : मई की तीज धूप मे गहरी जुताईकरने से कीटों के प्यूपा हो जाते हैं।

  • ट्रैप और पक्षी आश्रय : कीटों पर निगरानी के लिए फेरोमॉन ट्रैप (10-12/ हेक्टेयर) और इल्लिओं को खाने वाले पक्षीयों के लिए खेत में अंग्रेजी के ‘T’ आकार की लकड़ियों को (50/ हेक्टेयर) लगाएं।

  • जरूरत पड़ने पर सटीक रसायनों का छिड़काव करेंक्लोरेंट्रानिलिप्रोल एक ब्रॉड स्पेक्ट्रम (व्यापक स्पेक्ट्रम) कीटनाशक है , जिसका उपयोग मुख्य रूप से विभिन्न फसलों मे लेपिडोप्टेराण कीटों (इल्ली या लार्वा ) को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।

आधुनिक क्लाइमेट – स्मार्ट युग की ओर कदम दमोह के सोयबीन किसानों के लिए आधुनिक क्लाइमेट – स्मार्ट कृषि (CSA) को अपनाना भविष्य की ओर एक बहुत ही निर्णायक कदम है। यह खेती को पुरानी और जोखिम भरी विधियों से निकाल कर एक सटीक और सुरक्षित प्रणाली मे बदल देता है आधुनिक मशीनीकरण जैसे ट्रैक्टर चालित ‘ब्रॉड बेड फ़रो’(BBF) प्लांटर्स का उपयोग FIR प्रोटोकाल के जरिए उन्नत जैविक बीजोपचार, जलवायु-अनुकूल बीज (NRC 136,131) और माइक्रो – इरीगेशन ( स्प्रिंकलर) के माध्यम से सटीक जल प्रबंधन को अपनाकर , किसान अपनी फसल को मौसम की मार से बचा सकते हैं।

इस आधुनिक दृष्टिकोण को पूरे क्षेत्र मे हकीकत मे बदलने के लिए इन प्रमुख कदमों की आवस्यकता हैं :

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  • आधुनिक‘कस्टम हायरिंग सेंटर’ नेटवर्क : ग्राम स्तरीय कस्टम हायरिंग सेंटर’ का तेजी से विस्तार किया जाना चाहिए ताकि BBF सीडड्रिल जैसी महंगी और आधुनिक मशीनें छोटे किसानों को आसानी से किराये पर मिल सके।

  • उन्नत तकनीक क्षमता विकास : कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों को बायो फर्टिलाइजर को सही इस्तेमाल और कीटों की सटीक पहचान का आधुनिक फील्ड स्तरीय प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

  • प्रीमियम बाजार से जुड़ाव : कम कार्बन उत्सर्जन वाली टिकाऊ तरीके से उगाई गई तिलहन फसलों के लिए विशेष खरीद बाजार या प्रीमियम मूल्य तंत्र स्थपित किए जाने चाहिए।

अंततः इन आधुनिक क्लाइमेट स्मार्ट तकनीकों को अपनाने से यह सुनिस्चित होगा की हमारा “सोया स्टेट’’ आने वाली पीड़ियों के लिए लाभदायक सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल बना रहे  

संदर्भ:

दुप्रे, बी.यू., खोले, एस., और बालासुब्रमणि, एन. (2021)। जलवायु अनुकूल सोयाबीन उत्पादन प्रौद्योगिकियाँ। आईसीएआर-भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान और राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान (MANAGE), हैदराबाद।

आईसीएआर-सीआरआईडीए (2025)। मध्य प्रदेश में कृषि के लिए आशाजनक जलवायु अनुकूल प्रौद्योगिकियाँ। शुष्क भूमि कृषि के लिए केंद्रीय अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद।

मिश्रा, एम.सी. (2003)। प्राकृतिक कृषि पद्धतियाँ मध्य प्रदेश के 'जलवायु अनुकूल' गाँवों को जलवायु प्रभावों का सामना करने में मदद करती हैं। मोंगाबे इंडिया।

आईसीएआर-आईआईएसआर (2023)। मध्य प्रदेश राज्य के लिए जिलावार अनुशंसित सोयाबीन किस्में। केंद्रीय अनुसंधान संस्थान, इंदौर। (एनआरसी 157, एनआरसी 131, एनआरसी 136, एनआरसी 165, जेएस 22-12, जेएस 16 सहित)।

लेखक: 

डॅा. मनोज कुमार अहिरवार

प्रभारी वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रमुख कृषि विज्ञान केंद्र दमोह (म.प्र.)

रविंद्र डोहले

पी.एच.डी. शोधार्थी , विभाग कृषि प्रसार शिक्षा, राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविधालय, ग्वालियर (म.प्र.)

डॉ. द्वारका

कीटशास्त्र विभाग, जे.एन.के.वी.वी., कृषि महाविद्यालय, पन्ना, (म.प्र.)

डेनिश अहिरवार

बी.एस.सी एग्रीकल्चर

राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविधालय, ग्वालियर (म.प्र.)

Corresponding Author Email- [email protected]

English Summary: Future soy State Climate Smart Blueprint Damoh Soybean farmers Published on: 25 May 2026, 11:50 AM IST

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