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सूखी सीधी बुवाई (Dry DSR) धान की खेती में क्रांति किसानों की आय में वृद्धि और पर्यावरण में सुधार

धान की सूखी सीधी बुवाई (डी.एस.आर.) का इतिहास: धान उगाने का एक प्राचीन तरीका डी.एस.आर. भी है और साथ ही आज के समय का एक आधुनिक विकल्प भी। प्राचीन प्रणाली: धान उगाने का सबसे पुराना तरीका “सूखी सीधी बुवाई” ही है। पुराने समय में धान को अक्सर सूखे खेतों में बोया जाता था।

KJ Staff

धान की सूखी सीधी बुवाई (डी.एस.आर.) का इतिहास: धान उगाने का एक प्राचीन तरीका डी.एस.आर. भी है और साथ ही आज के समय का एक आधुनिक विकल्प भी।

प्राचीन प्रणाली: धान उगाने का सबसे पुराना तरीका “सूखी सीधी बुवाई” ही है। पुराने समय में धान को अक्सर सूखे खेतों में बोया जाता था।

  • 20वीं सदी के मध्य (1960 के दशक) तक कई क्षेत्रों में यही मुख्य तरीका था। इससे यह स्पष्ट होता है कि धान की खेती के लिए रुके हुए पानी की जरूरत अनिवार्य नहीं है।

धान को खड़े पानी की ज़रूरत नहीं होती: धान के खेतों में पानी भरकर रखने का तरीका सदियों पहले चीन में शुरू हुआ था । तब लोगों को लगा कि रुका हुआ पानी खेतों में उगने वाली खरपतवार (weeds) को रोकने का एक आसान तरीका है ।

  • उस समय खरपतवार को संभालना बड़ी चुनौती थी और ताज़ा पानी बहुत था, इसलिए यह “रोपाई(TPR)” वाला तरीका लोकप्रिय हो गया ।

  • लेकिन अब खरपतवार को रोकने के लिए आधुनिक मशीनें और चुनिंदा खरपतवारनाशी दवाएं (weedicides / herbicides) भी हैं, जिनका इस्तेमाल सोयाबीन, मक्का और गेहूं जैसी फसलों में पहले से हो रहा है ।

  • आज पानी की कमी, मज़दूरों की किल्लत और पर्यावरण पर पड़ता बुरा असर बहुत बड़ी चिंताएं बन गई हैं।

हरित क्रांति और सूखी सीधी बुवाई (डी.एस.आर.) में गिरावट: 1970 के दशक के आसपास हरित क्रांति की तकनीकों के आने से दुनिया के अधिकांश हिस्सों में धान की सूखी सीधी बुवाई (डी.एस.आर.) की जगह रोपाई (TPR) ने ले ली।

  • बदलाव के कारण:अधिक उपज देने वाली नई किस्मों, सिंचाई की बेहतर सुविधाओं (जैसे नहरें) और रसायनों के उपयोग ने रोपाई वाली विधि को बढ़ावा दिया। साथ ही, जब यह महसूस किया गया कि खड़ा पानी खेत में खरपतवार को रोकने में मदद करता है, तो रोपाई विधि और भी लोकप्रिय हो गई।

डी.एस.आर. की आधुनिक वापसी: पर्यावरण और आर्थिक चुनौतियों के कारण अब डी.एस.आर. फिर से एक टिकाऊ विकल्प के रूप में लोकप्रिय हो रहा है।

  • मजदूरों की कमी और लागत:रोपाई में बहुत मेहनत लगती है। डी.एस.आर. नर्सरी और रोपाई की जरूरत को खत्म कर देता है, जिससे खर्च बचता है।

  • पानी की कमी:रोपाई विधि में बहुत अधिक पानी चाहिए जो अब घटते जल स्तर के कारण संभव नहीं है। डी.एस.आर. पानी के उपयोग को काफी कम करता है।

  • मिट्टी का स्वास्थ्य:डी.एस.आर. में मिट्टी को ज्यादा छेड़ा नहीं जाता, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता अगली फसल के लिए बेहतर बनी रहती है।

  • पर्यावरण की चिंता:रोपाई खेती से मीथेन गैस निकलती है, डी.एस.आर. इसे कम करने में मदद करता है।

  • पैदावार:आपकी फसल की मात्रा में कोई गिरावट नहीं होगी।

तकनीकी प्रगति: डी.एस.आर. के आधुनिकीकरण को नई तकनीकों से काफी सहारा मिला है:

  • किस्मों का विकास:वैज्ञानिक अब खास तौर पर डी.एस.आर. के लिए किस्में बना रहे हैं जो सूखे में भी अच्छी तरह उग सकें।

    • आज IRRI,ICAR, IIRR, NRRI जैसे बड़े सरकारी अनुसंधान संस्थानों और निजी कंपनियों के लिए यह विशेष शोध का विषय बन चुका है। वे सब इस तकनीक को और बेहतर बनाने पर काम कर रहे हैं।

  • खरपतवार प्रबंधन:डी.एस.आर. में खरपतवार एक बड़ी समस्या थी, लेकिन अब मशीनों और सही दवाओं के आने से इसे नियंत्रित करना आसान हो गया है।

  • यंत्रीकरण (Mechanization):'सीड ड्रिल', पावर वीडर और ब्रश कटर जैसी मशीनों के विकास ने बड़े पैमाने पर और सटीक बुवाई और खरपतवार प्रबंधन को मुमकिन बना दिया है।

सीधी बिजाई (DSR) मुख्य रूप से 3 तरीकों से की जाती है

 

Dry-DSR

Dry-Broadcast

Wet-DSR

मिट्टी की स्थिति

सूखी या नम मिट्टी (कीचड़ नहीं)

कद्दू / कीचड़

बीज का प्रकार

सूखा बीज

अंकुरित बीज

बुवाई का तरीका

सीड ड्रिल

हाथ द्वारा

ड्रम सीडर

बीज की मात्रा

20–25 kg/ha

80–100 kg/ha

25–35 kg/ha

मजदूरी का खर्च

सबसे कम

कम

अधिक (पानी के रखरखाव)

ड्राई डायरेक्ट सीडेड राइस (DDSR: डीडी.एस.आर.): यह एक ऐसा तरीका है जिसमें धान के सूखे बीजों को सीधे सूखी मिट्टी में बोया जाता है।

  • इसमें न नर्सरी की ज़रूरत है, न कीचड़ करने की, न रोपाई की और सबसे महत्वपूर्ण, फसल के किसी भी चरणमें पानी जमा रखने की ज़रूरत नहीं है। इससे पारम्परिक तरीके (TPR) के मुकाबले पानी, बीज, खाद और मज़दूरी का खर्च बहुत कम हो जाता है ।

  • ड्राई-डी.एस.आर.की किस्में सोयाबीन या मक्का की तरह उगाई जा सकती हैं । इस तकनीक से 25-30% कम पानी में भी उतनी ही पैदावार मिलती है ।

  • हमने पौधों को ऐसा बनाया है कि वे सूखे और बीमारियों को झेलें और बिना पानी भरे खेतों में भी अच्छा उत्पादन दें ।

  • धान उगाने के कई तरीकों को 'सूखी सीधी बिजाई' नहीं माना जा सकता: यह समझना बहुत ज़रूरी हैकि केवल नर्सरी, रोपाई और कीचड़ (puddling) को खत्म कर देना ही पर्याप्त नहीं है।

  • रोपाई वाले बीजों को डी.एस.आर.प्रणाली के लिए इस्तेमाल करना और फिर “कम पैदावार” आने पर उसे “कम लागत” के नाम पर सही ठहराना किसानों के साथ नाइंसाफी है।

  • AWD (बारी-बारी से सुखाना और सींचना):यह तकनीक Dry-DSR (सूखी सीधी बिजाई) नहीं है। AWD में भी आपको रोपाई करनी पड़ती है। इसमें पानी को सावधानी से बार-बार खेत से निकालने और फिर से भरना पड़ता है।

डी.एस.आर. के लिए, खास तौर पर वैज्ञानिक रूप से तैयार की गई डी.एस.आर. किस्मों का ही उपयोग करना चाहिए।

महत्वपूर्ण: (a) बहुत अधिक बारिश वाली जगह, (b) खारी मिट्टी, (c) खराब जल निकासी वाले क्षेत्र, (d) “काली कपास मिट्टी” या (e) ऐसे क्षेत्र जहां तापमान 15 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है, वहां डी.डी.एस.आर.नहीं उगाया जाता है।

खरपतवार प्रबंधन: बहुत से किसान चिंता करते हैं कि प्रतिरोपित गीली भूमि प्रणाली की तुलना में धान की सूखी-सीधी बुवाई (डी.डी.एस.आर.) में खरपतवार अधिक होती है। लेकिन, खरपतवारों को इस प्रकार नियंत्रित किया जा सकता है:

बुआई से पहले (Pre-sowing):

  • सिंचाई:बुआई से 15 दिन पहले (मानसून आने से पहले) खेत में पानी दें।

  • जुताई:सिंचाई के 7-10 दिन बाद, जब खरपतवार निकल आएं, तो MB Plough (मोल्ड बोर्ड हल) से खेत की गहरी जुताई (20–30 सेमी) करें।

  • फायदा:जैसा कि ऊपर बताया गया है, इससे न केवल खेत अच्छे से तैयार होता है, बल्कि खरपतवारों का प्रबंधन भी बेहतर होता है। इससे उगे हुए खरपतवारों के बीज प्राकृतिक रूप से मर जाते हैं, जिससे बिना रसायनों के ही खरपतवारों का बोझ काफी कम हो जाता है।

बुआई के समय (Sowing): बुआई के 2-3 दिन बाद, खरपतवार उगने से पहले वाली दवा (जैसे पेंडिमेथलिन 3 लीटर प्रति हेक्टेयर) का छिड़काव करें, जो 2-3 हफ्तों तक खरपतवारों को रोकने में मदद करती है।

  • यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण हैकि इन दवाओं के छिड़काव के समय खेत की स्थिति बहुत मायने रखती है।

  • पेंडिमेथलिन जैसी दवाएं मिट्टी की सतह पर एक पतली परत बना लेती हैं, जिसे उगते हुए खरपतवार सोख लेते हैं और मर जाते हैं।

  • इसलिए, मिट्टी में नमी सही होनी चाहिए; न तो मिट्टी सूखी हो और न ही खेत में पानी भरा हो।

  • सूखी मिट्टी का मतलब है कि परत नहीं बनेगी, और पानी भरने से दवा बह जाएगी।

बुआई के बाद (Post-sowing): खरपतवारों की 2-3 पत्ती वाली अवस्था में (आमतौर पर बुआई के 5-10 दिन बाद) बिस्पायरीबैक सोडियम (जैसे नॉमिनी गोल्ड 10% SC) की 200 मिली प्रति हेक्टेयर मात्रा का छिड़काव करने की सलाह दी जाती है।

  • उसके बाद, निराई-गुड़ाई जैसे अन्य कार्य किए जा सकते हैं।

  • यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि यह दवा छोटे खरपतवारों पर ही काम करती है; अगर खरपतवार बड़े हो गए हैं और उनमें 4से ज़्यादा पत्तियां आ गई हैं, तो यह असरदार नहीं हो सकती।

  • दवा डालने में देरी होना ही इसके विफल होने का मुख्य कारण है।

  • छिड़काव से 24घंटे पहले खेत से पानी निकाल देना चाहिए और छिड़काव के 24 घंटे बाद ही सिंचाई करनी चाहिए।

  • तेज़ धूप या गर्मी के तनाव के दौरान छिड़काव से बचना चाहिए। मौसम के पूर्वानुमान का ध्यान रखना ज़रूरी है, क्योंकि छिड़काव के कम से कम 6घंटे बाद तक बारिश नहीं होनी चाहिए।

  • शुरुआती और बाद वाली दवाओं का सही संयोजन (मेल) शुरुआती चरणों में ही खरपतवारों को नियंत्रित कर लेता है।

बुआई के बाद निराई-गुड़ाई: बुआई के 15-20 दिन बाद, चूंकि कतारों के बीच 20 सेमी की दूरी होती है, कोनो वीडर, रोटरी वीडर या ब्लेड हैरो का उपयोग करके मशीनी निराई करना आसान होता है।

  • मशीनी निराई का अतिरिक्त लाभ यह भी है कि इससे मिट्टी ढीली हो जाती है।

  • अंत में, बुआई के 45दिन बाद मशीनी या हाथों से निराई और अन्य कृषि कार्य किए जाने चाहिए।

  • ज़रूरत पड़ने पर हाथों से भी खरपतवार निकालनाचाहिए।

ड्राई डायरेक्ट सीडेड राइस के लाभ

  • सस्ती और आसान खेती:नर्सरी, कीचड़ बनाने या रोपाई की जरूरत नहीं।

    • ड्राई-डी.एस.आर.धान को मक्के जैसी सूखी जमीन वाली फसलों की तरह, बिना पानी भरे, उगाया जाता है।

    • मजदूरों का खर्च कम होता है और मशीनों का उपयोग आसान है।

  • समय की बचत:फसल 7-10 दिन पहले तैयार हो जाती है।

    • रोपाई तरीके से 10-15 दिन पहले बुवाई की जा सकती है। इससे अगली फसल से पहले पराली को गलने का समय मिल जाता है और उसे जलाना नहीं पड़ता।

  • पानी की बचत:पानी का उपयोग 30% तक कम हो जाता है। खेत में पानी खड़ा न रहने से खाद बहती नहीं है और बीमारियाँ भी कम लगती हैं।

  • खेतीकी सामग्री में कम खर्च

    • DDSR में केवल 20–25 किलो बीज प्रतिहेक्टेयर लगता है।

    • खाद और कीटनाशक के उपयोग में 20 से 25% की बचत।

    • मिट्टी की बनावट सही रहती है, जिससे दूसरी फसलें उगाना आसान और सस्ता हो जाता है।

  • किसान की आय:किसानक्राफ्ट की R&D टीम ने खरीफ 2025 के दौरान 10 राज्यों से खेती की वास्तविक लागत के आंकड़े इकट्ठे किए हैं।

  • यह डेटा किसानक्राफ्ट के प्रदर्शन क्षेत्रों और किसानों (जो धान की सूखी सीधी बुवाई और रोपाई दोनों खेती करते हैं) से लिया गया है।

  • यह डेटा दिखाता है कि एक सीजन किसानों की आय ₹ 16,000 से ₹ 40,000 प्रति हेक्टेयर तक बढ़ सकती है।

  • पर्यावरणऔर प्रकृति को लाभ: मीथेन गैस का उत्सर्जन कम होने से यह "पर्यावरण के अनुकूल" है।

सरकार की प्राथमिकता: केंद्र सरकार और कई राज्यों की सरकारें भी किसानों के बीच धान की सीधी बिजाई (DSR) को बढ़ावा देने पर पूरा जोर दे रही हैं। सरकार का लक्ष्य है कि ज्यादा से ज्यादा किसान इस आधुनिक तकनीक को अपनाएं।

किसानों का बदलता रुझान: यही कारण है कि अब हमारे किसान भाई भी बड़ी संख्या में और बहुत तेजी से DSR तकनीक को अपना रहे हैं, ताकि वे खेती में आने वाली दिक्कतों को कम कर सकें।

यह धान उगाने का सबसे सस्ता और सतत तरीका है। इससे सरकार का भी बिजली और खाद पर सब्सिडी का खर्च कम होगा और उत्पादन के साथ किसानों की आय भी बढ़ेगी।

राज्य

किसान की खेती की A1 लागत

(₹ /हेक्टेयर)

अतिरिक्त सरकारी खर्च

(₹ /हेक्टेयर)

किसान +

शासन

(₹ /हेक्टेयर)

TPR

DDSR

बचत

%

TPR

DDSR

बचत

%

कुल बचत

आंध्र प्रदेश

89,055

49,326

39,729

44.61%

66,796

47,033

19,763

29.59%

59,491

छत्तीसगढ़

50,752

31,854

18,898

37.24%

58,060

40,773

17,286

29.77%

36,184

हरियाणा

67,661

44,707

22,955

33.93%

34,973

24,657

10,316

29.50%

33,270

कर्नाटक

82,883

44,343

38,540

46.50%

85,038

59,578

25,460

29.94%

64,000

मध्य प्रदेश

53,273

36,152

17,121

32.14%

24,906

17,221

7,685

30.86%

24,806

महाराष्ट्र

51,897

32,846

19,051

36.71%

66,330

46,238

20,092

30.29%

39,143

ओडिशा

58,859

38,894

19,966

33.92%

79,050

55,366

23,684

29.96%

43,650

तेलंगाना

81,296

47,085

34,211

42.08%

56,241

39,353

16,888

30.03%

51,099

तमिलनाडु

100,026

62,096

37,930

37.92%

61,422

43,154

18,268

29.74%

56,198

उत्तर प्रदेश

58,307

42,103

16,204

27.79%

27,310

19,055

8,254

30.22%

24,459

लेखिका: यह लेख डॉ. सौजन्या एम.एस. द्वारा लिखा गया है। वे किसानक्राफ्ट लिमिटेड में बीज अनुसंधान एवं विकास विभाग की सीनियर मैनेजर हैं। उन्होंने बैंगलोर के कृषि विश्वविद्यालय से पौधों की उन्नत किस्में तैयार करने (Plant Breeding & Genetics) में पीएचडी की डिग्री हासिल की है। उनके विशेष शोध का विषय धान की सीधी बिजाई (DSR) के लिए चावल की ऐसी नई किस्में तैयार करना है, जो कम पानी में अच्छी पैदावार दे सकें।

English Summary: Dry Direct Seeded Rice (Dry DSR): A Revolution in Paddy Cultivation—Increasing Farmers' Income and Improving the Environment Published on: 25 May 2026, 04:56 PM IST

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