फॉस्फोरस (P), नाइट्रोजन (N) एवं पोटाश (K) के साथ पौधों के लिए आवश्यक तीन प्रमुख पोषक तत्वों में से एक है. यह फसलों की वृद्धि एवं विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह जड़ों के सशक्त विकास, फसल की बेहतर स्थापना, अधिक पुष्पन एवं फलन, बेहतर दाना निर्माण एवं उपज तथा पौधों को स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनाने में सहायक होता है. अनेक मृदाओं में फॉस्फोरस उपस्थित होता है, किन्तु इसका अधिकांश भाग मृदा में बंधित अवस्था में रहता है और पौधों द्वारा उपयोग नहीं किया जा सकता. परिणामस्वरूप किसान प्रायः अधिक मात्रा में फॉस्फेटिक उर्वरकों का प्रयोग करते हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है.
भारत में प्रतिवर्ष बड़ी मात्रा में फॉस्फेटिक उर्वरकों का उपयोग किया जाता है. तथापि, प्रयोग किए गए फॉस्फोरस का लगभग 70–80 प्रतिशत भाग मृदा में स्थिर (फिक्स) हो जाता है तथा पौधों के लिए अनुपलब्ध बना रहता है. परिणामस्वरूप रासायनिक उर्वरकों के माध्यम से दिए गए फॉस्फोरस का केवल एक छोटा भाग ही फसलों द्वारा उपयोग किया जा पाता है. फॉस्फेटिक उर्वरकों की उपयोग दक्षता अत्यंत कम (लगभग 15 प्रतिशत) होती है, जिससे उर्वरकों की आवश्यकता बढ़ती है और परिणामस्वरूप उत्पादन लागत में वृद्धि होती है. इसके अतिरिक्त, फॉस्फेटिक उर्वरकों के आयात पर देश की उच्च निर्भरता विदेशी मुद्रा भंडार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है.
फॉस्फोरस का समेकित प्रबंधन फसल उत्पादन बढ़ाने तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने का एक टिकाऊ उपाय है. इसके अंतर्गत फॉस्फोरस उर्वरकों की कम मात्रा को अन्य फॉस्फोरस स्रोतों, जैसे रॉक फॉस्फेट (विशेषकर अम्लीय मिट्टियों में), जैविक खाद तथा फॉस्फोरस जैव उर्वरकों के साथ मिलाकर प्रयोग किया जाता है. अम्लीय मिट्टी के नालियों (फरो) में चूना (250–400 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) देने से मिट्टी की अम्लता कम होती है, मिट्टी की स्थिति सुधरती है तथा फॉस्फोरस की आवश्यकता भी घट जाती है. कुट्टू (Buckwheat) एक उत्कृष्ट गतिशील पोषक संचायक फसल है, जो मिट्टी में उपलब्ध न हो पाने वाले फॉस्फोरस को घुलनशील बनाकर पुनः उपयोग योग्य बनाती है.
इससे अगली फसलों को भी लाभ मिलता है. इसलिए शुष्क क्षेत्रों में फसल चक्र में इसको शामिल करना फॉस्फोरस प्रबंधन का एक टिकाऊ विकल्प है. इसी प्रकार, हरी खाद तथा बायोचार के प्रयोग से भी फसलों की बाहरी फॉस्फोरस उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है.
फॉस्फेटिक जैव उर्वरक: फॉस्फोरस के वैकल्पिक स्रोत के रूप में
फॉस्फेटिक जैव उर्वरकों में फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु, फॉस्फेट घुलनशील फफूंद तथा माइकोराइजा जैसे लाभकारी सूक्ष्मजीव होते हैं, जो मृदा में पहले से उपस्थित स्थिर (फिक्स) फॉस्फोरस को मुक्त करने में सहायता करते हैं. ये मृदा में उपलब्ध अनुपयोगी फॉस्फोरस को ऐसे रूपों में परिवर्तित कर देते हैं, जिन्हें पौधे आसानी से अवशोषित कर सकते हैं. ये लाभकारी सूक्ष्मजीव "मृदा कर्मियों" की भांति कार्य करते हैं और मृदा में विद्यमान पोषक तत्वों को प्राकृतिक रूप से पौधों के लिए उपलब्ध कराते हैं. इस प्रकार, फॉस्फेटिक जैव उर्वरकों के उपयोग से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं—
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फॉस्फोरस उपयोग दक्षता में वृद्धि
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फॉस्फेटिक उर्वरकों की आवश्यकता में कमी
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खेती की लागत में कमी
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मृदा स्वास्थ्य एवं फसल उत्पादकता में सुधार
फॉस्फेटिक रासायनिक उर्वरकों एवं फॉस्फेटिक जैव उर्वरकों के स्वरूप, कार्यप्रणाली तथा प्रभावों में अनेक महत्वपूर्ण अंतर पाए जाते हैं. फॉस्फेटिक रासायनिक उर्वरकों एवं फॉस्फेटिक जैव उर्वरकों की संक्षिप्त तुलना सारणी-1 में प्रस्तुत की गई है.
फॉस्फेटिक जैव उर्वरकों के प्रकार एवं लाभ
मुख्यतः फॉस्फेटिक जैव उर्वरकों के तीन प्रकार उपलब्ध हैं. ये निम्नलिखित हैं—
1. फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु : उदाहरणार्थ बैसिलस, स्यूडोमोनास तथा राइजोबियम प्रजातियाँ
प्रमुख विशेषताएँ एवं लाभ:
• सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला फॉस्फेट घुलनशील जैव उर्वरक.
• मृदा में उपस्थित अघुलनशील फॉस्फोरस को पौधों के लिए उपलब्ध रूप में परिवर्तित करता है.
• कार्बनिक अम्लों का उत्पादन कर स्थिर (फिक्स्ड) फॉस्फोरस को घुलनशील बनाता है.
• अनाज, दलहन, तिलहन, सब्जियों तथा फल फसलों के लिए उपयुक्त है.
2.फॉस्फेट घुलनशील कवक: उदाहरणार्थ एस्परजिलस आवामोरी, पेनिसिलियम प्रजातियाँ
• कुछ प्रकार की मृदाओं में स्थिर (फिक्स्ड) फॉस्फोरस को अधिक प्रभावी ढंग से घुलनशील बनाते हैं.
• कार्बनिक अम्लों के स्राव द्वारा फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाते हैं.
• फॉस्फोरस की कमी वाली मृदाओं में विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होते हैं.
3. वेसिकुलर आर्बस्कुलर माइकोराइजा: उदाहरणार्थ ग्लोमस प्रजातियाँ
• पौधों की जड़ों के साथ लाभकारी सहजीवी संबंध स्थापित करता है.
• कवकीय तंतुओं (हाइफी) के माध्यम से जड़ों के अवशोषण क्षेत्र का विस्तार करता है.
• फॉस्फोरस, जल तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों के अवशोषण को बढ़ाता है.
• उद्यानिकी, बागान, सब्जी तथा वानिकी फसलों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है.
फॉस्फेटिक जैव उर्वरकों के प्रयोग की प्रक्रिया
• स्वस्थ बीजों का चयन करें.
• 1 लीटर पानी में 200 ग्राम गुड़ घोलकर घोल तैयार करें.
• इस घोल में 200–250 ग्राम फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु / फॉस्फेट घुलनशील सूक्ष्मजीव) मिलाएँ.
• घोल का लेप (स्लरी) तैयार कर बीजों पर समान रूप से लगाएँ.
• उपचारित बीजों को छाया में 20–30 मिनट तक सुखाएँ.
• इसके बाद उपचारित बीजों की बुवाई करें.
निष्कर्ष
फॉस्फेटिक जैव उर्वरक मृदा में फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने का एक प्रभावी, किफायती एवं पर्यावरण-अनुकूल उपाय हैं. इनके उपयोग से रासायनिक फॉस्फेटिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ती है, मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है तथा सतत कृषि उत्पादन को बढ़ावा मिलता है. पोषक तत्व प्रबंधन की समेकित रणनीतियों में फॉस्फेटिक जैव उर्वरकों का समावेश मृदा संरक्षण, कृषि निवेश लागत में कमी तथा दीर्घकालिक कृषि स्थिरता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है.
लेखकगण : धीरज कुमार सिंह, अनुप दास एवं उमेश कुमार मिश्र
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना
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