भारत आज विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता देश है. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023-24 में देश में कुल उर्वरक खपत लगभग 64-65 मिलियन टन (NPK पोषक तत्व आधार) रही. कुल उर्वरक खपत में नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों, विशेषकर यूरिया, की हिस्सेदारी लगभग 55-60 प्रतिशत है. हरित क्रांति के बाद खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में उर्वरकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, लेकिन लंबे समय तक नाइट्रोजन प्रधान उर्वरक उपयोग के कारण देश के कई हिस्सों में पोषक तत्वों का असंतुलन तेजी से बढ़ा है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद तथा विभिन्न मृदा स्वास्थ्य सर्वेक्षणों के अनुसार देश की लगभग 36 प्रतिशत कृषि भूमि में जिंक की कमी, 23 प्रतिशत भूमि में बोरॉन की कमी, 11-12 प्रतिशत क्षेत्रों में आयरन की कमी तथा 5 प्रतिशत से अधिक क्षेत्रों में मैंगनीज की कमी पाई गई है. इसके अतिरिक्त अनेक राज्यों में सल्फर की कमी भी गंभीर रूप से उभरकर सामने आई है. यह स्थिति दर्शाती है कि केवल यूरिया आधारित पोषण अब टिकाऊ कृषि के लिए पर्याप्त नहीं है और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन समय की आवश्यकता बन चुका है.
मिट्टी की सेहत भी एक बड़ी चिंता का विषय है. भारत सरकार की मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) योजना के अंतर्गत प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है कि देश की लगभग 45-50 प्रतिशत कृषि भूमि में जैविक कार्बन (SOC) की मात्रा 0.5 प्रतिशत से कम है, जो स्वस्थ एवं उत्पादक मिट्टी के लिए आवश्यक स्तर से काफी कम है. कई क्षेत्रों में मिट्टी का pH असंतुलित होता जा रहा है, जिससे पोषक तत्वों की उपलब्धता प्रभावित होती है. विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाने से न केवल मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है बल्कि उसकी जल धारण क्षमता भी बढ़ती है, जिससे फसलें सूखे की परिस्थितियों को बेहतर ढंग से सहन कर सकती हैं.
उर्वरकों की उपयोग दक्षता भी अपेक्षाकृत कम है. विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार नाइट्रोजन की उपयोग दक्षता केवल 30-35 प्रतिशत, फास्फोरस की 15-20 प्रतिशत तथा पोटाश की लगभग 40-50 प्रतिशत तक ही रहती है. इसका अर्थ है कि किसान द्वारा खेत में डाले गए उर्वरकों का एक बड़ा हिस्सा फसल द्वारा उपयोग नहीं किया जा पाता और वह वायुमंडल, भूजल या सतही जल में पहुंचकर पर्यावरण प्रदूषण का कारण बनता है. इससे किसानों की लागत बढ़ती है तथा प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है.
इसी परिप्रेक्ष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग (ML), सेंसर, ड्रोन और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) आधारित स्मार्ट पोषक तत्व प्रबंधन की आवश्यकता बढ़ गई है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार वर्ष 2050 तक विश्व की जनसंख्या लगभग 9.7 अरब तक पहुंच सकती है, जबकि भारत की जनसंख्या भी 1.6 अरब के आसपास होने का अनुमान है. बढ़ती आबादी की खाद्यान्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कृषि उत्पादन में 50-60 प्रतिशत तक वृद्धि की आवश्यकता होगी, जबकि कृषि भूमि और सिंचाई जल संसाधनों का विस्तार सीमित है. जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि उत्पादन जोखिम भी लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में केवल “More Crop per Drop” ही नहीं, बल्कि “More Crop per Nutrient” की अवधारणा को अपनाना आवश्यक हो गया है. AI आधारित पोषक तत्व प्रबंधन प्रणाली मिट्टी, फसल और मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण कर किसानों को सही उर्वरक, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान पर उपयोग की सलाह प्रदान कर सकती है. इससे उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ेगी, उत्पादन लागत कम होगी, मिट्टी की सेहत सुधरेगी और कृषि अधिक टिकाऊ एवं लाभकारी बन सकेगी.
स्मार्ट पोषक तत्व प्रबंधन क्या है?
स्मार्ट पोषक तत्व प्रबंधन भविष्य की कृषि का एक महत्वपूर्ण घटक है, जिसमें आधुनिक डिजिटल तकनीकों, सेंसर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग (ML), ड्रोन, सैटेलाइट एवं इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) का उपयोग करके फसलों की वास्तविक पोषक तत्व आवश्यकता का आकलन किया जाता है.
पारंपरिक कृषि में किसान अक्सर अनुभव या सामान्य सिफारिशों के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करते हैं, जबकि स्मार्ट पोषक तत्व प्रबंधन मिट्टी की वर्तमान स्थिति, मौसम की परिस्थितियों, फसल की वृद्धि अवस्था और उत्पादन लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए उर्वरकों के उपयोग का निर्णय लेता है. इसका मुख्य उद्देश्य पौधों को आवश्यक पोषक तत्व सही समय पर उपलब्ध कराना, उर्वरकों की बर्बादी रोकना, उत्पादन लागत कम करना और पर्यावरणीय प्रभावों को न्यूनतम करना है. यह प्रणाली संतुलित उर्वरक उपयोग के 4R सिद्धांत अर्थात सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान के सिद्धांत पर आधारित है, जो कृषि को अधिक उत्पादक, लाभकारी और टिकाऊ बनाती है.
सेंसर कैसे बदलेंगे उर्वरक प्रबंधन?
भविष्य की कृषि में सेंसर तकनीक उर्वरक प्रबंधन की पूरी अवधारणा को बदल देगी. वर्तमान में अधिकांश किसान मिट्टी की वास्तविक स्थिति जाने बिना उर्वरकों का उपयोग करते हैं, जबकि स्मार्ट सेंसर खेत की स्थिति की निरंतर निगरानी करेंगे. ये सेंसर मिट्टी की नमी, pH, विद्युत चालकता (EC), जैविक कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा तापमान जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां वास्तविक समय में उपलब्ध कराएंगे. सेंसरों द्वारा प्राप्त डेटा सीधे मोबाइल ऐप या क्लाउड प्लेटफॉर्म पर पहुंच जाएगा, जिससे किसान यह जान सकेंगे कि खेत के किस भाग में कौन-सा पोषक तत्व कम है. उदाहरण के लिए यदि किसी खेत में नाइट्रोजन पर्याप्त मात्रा में मौजूद है तो किसान अतिरिक्त यूरिया डालने से बच सकता है. इससे न केवल उर्वरकों की बचत होगी बल्कि पर्यावरण प्रदूषण और उत्पादन लागत भी कम होगी.
फसल सेंसर की भूमिका
मृदा सेंसरों के साथ-साथ फसल आधारित सेंसर भी भविष्य के पोषक तत्व प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. SPAD Meter, GreenSeeker, Canopy Sensors तथा Hyperspectral Sensors जैसे उपकरण फसल की पत्तियों और छत्र (Canopy) का विश्लेषण करके पौधों की पोषण स्थिति का आकलन करते हैं. ये उपकरण पौधों में नाइट्रोजन, जिंक अथवा अन्य पोषक तत्वों की कमी को प्रारंभिक अवस्था में पहचान सकते हैं. उदाहरण के लिए यदि गेहूं की फसल में नाइट्रोजन की कमी विकसित हो रही है, तो GreenSeeker सेंसर तुरंत इसकी पहचान कर सकता है और किसान को आवश्यक मात्रा में नाइट्रोजन देने की सलाह दे सकता है. इससे फसल में पोषण तनाव कम होता है तथा अधिक उत्पादन प्राप्त होता है.
ड्रोन और सैटेलाइट से होगी खेत की निगरानी
ड्रोन और सैटेलाइट तकनीक कृषि के लिए नई संभावनाएं खोल रही है. मल्टीस्पेक्ट्रल और हाइपरस्पेक्ट्रल कैमरों से लैस ड्रोन खेतों की उच्च-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें लेकर फसलों की पोषण स्थिति, रोग एवं कीट प्रकोप तथा नमी की स्थिति का विश्लेषण कर सकते हैं. ये ड्रोन पोषक तत्वों की कमी वाले क्षेत्रों की पहचान कर "न्यूट्रिएंट मैप" तैयार करते हैं. इसी प्रकार सैटेलाइट आधारित निगरानी बड़े क्षेत्रों में फसल स्वास्थ्य और पोषण स्थिति का आकलन कर सकती है. AI इन आंकड़ों का विश्लेषण करके किसानों को यह जानकारी देगा कि खेत के किस हिस्से में अधिक उर्वरक की आवश्यकता है और कहाँ कम. इससे पूरे खेत में समान मात्रा में उर्वरक डालने के बजाय आवश्यकता आधारित उर्वरक उपयोग संभव होगा.
AI और मशीन लर्निंग: डिजिटल कृषि सलाहकार
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग (ML) भविष्य के कृषि सलाहकार बनकर उभर रहे हैं. ये तकनीकें मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट, सेंसर डेटा, ड्रोन चित्र, मौसम पूर्वानुमान, पिछले उत्पादन रिकॉर्ड तथा उर्वरक उपयोग इतिहास जैसे विशाल आंकड़ों का विश्लेषण करके किसानों को सटीक सलाह प्रदान करती हैं. AI यह निर्धारित कर सकता है कि फसल को किस पोषक तत्व की आवश्यकता है और किस समय उर्वरक देने से अधिकतम लाभ मिलेगा. वहीं मशीन लर्निंग मॉडल लगातार नए डेटा से सीखते रहते हैं. उदाहरण के लिए यदि किसी क्षेत्र में लगातार कई वर्षों से जिंक की कमी देखी जा रही है, तो मशीन लर्निंग मॉडल भविष्य में पहले से ही इस कमी का पूर्वानुमान लगा सकता है. इससे किसानों को समय रहते सुधारात्मक उपाय अपनाने का अवसर मिलेगा.
मोबाइल बनेगा कृषि विशेषज्ञ
डिजिटल कृषि के युग में मोबाइल फोन किसानों के लिए एक शक्तिशाली कृषि सलाहकार बन जाएगा. AI आधारित मोबाइल एप्लीकेशन और चैटबॉट किसानों को स्थानीय भाषा में खेत-विशिष्ट सलाह प्रदान करेंगे. किसान अपने मोबाइल पर मिट्टी की स्थिति, मौसम पूर्वानुमान, फसल की वृद्धि अवस्था और पोषक तत्वों की आवश्यकता संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकेंगे. केवल फसल की तस्वीर अपलोड करके किसान यह जान पाएंगे कि कौन-सी खाद डालनी है, कितनी मात्रा में डालनी है और कब डालनी है. इससे कृषि विशेषज्ञों पर निर्भरता कम होगी और वैज्ञानिक सलाह सीधे किसानों तक पहुंच सकेगी.
4R सिद्धांत: संतुलित उर्वरक उपयोग का आधार
संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन का आधार 4R Nutrient Stewardship है. इसका पहला सिद्धांत है "Right Source" अर्थात मिट्टी और फसल की आवश्यकता के अनुसार उचित उर्वरक का चयन. दूसरा सिद्धांत "Right Rate" है, जिसके अनुसार उर्वरकों की मात्रा आवश्यकता आधारित होनी चाहिए. तीसरा सिद्धांत "Right Time" है, जिसके अंतर्गत फसल की वृद्धि अवस्था के अनुसार उर्वरक देने की सलाह दी जाती है. चौथा सिद्धांत "Right Place" है, जिसमें उर्वरक को पौधों की जड़ क्षेत्र के निकट पहुंचाया जाता है ताकि उसका अधिकतम उपयोग हो सके. 4R सिद्धांत अपनाने से उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ती है, लागत कम होती है और पर्यावरणीय प्रभाव घटता है.
नैनो उर्वरक: भविष्य का समाधान
नैनो प्रौद्योगिकी कृषि में पोषक तत्व प्रबंधन का नया अध्याय खोल रही है. नैनो यूरिया और नैनो डीएपी जैसे उर्वरकों में पोषक तत्व अत्यंत सूक्ष्म कणों के रूप में होते हैं, जो पौधों द्वारा अधिक दक्षता से अवशोषित किए जाते हैं. पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में नैनो उर्वरकों की मात्रा कम होती है, लेकिन उनकी प्रभावशीलता अधिक होती है. ये नियंत्रित रूप से पोषक तत्वों का उत्सर्जन करते हैं, जिससे उर्वरकों की हानि कम होती है और पर्यावरण प्रदूषण घटता है. साथ ही परिवहन एवं भंडारण लागत भी कम होती है. भविष्य में नैनो उर्वरक संतुलित पोषण प्रबंधन की प्रमुख तकनीक के रूप में उभर सकते हैं.
वैरिएबल रेट टेक्नोलॉजी (VRT)
वैरिएबल रेट टेक्नोलॉजी (VRT) एक ऐसी उन्नत प्रणाली है, जिसमें GPS और सेंसर आधारित मशीनें खेत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग मात्रा में उर्वरक डालती हैं. चूंकि खेत के सभी भागों की मिट्टी और पोषण स्थिति समान नहीं होती, इसलिए VRT तकनीक प्रत्येक क्षेत्र की आवश्यकता के अनुसार उर्वरक का प्रयोग सुनिश्चित करती है. इससे उर्वरक की बचत, उत्पादन में वृद्धि और पर्यावरण संरक्षण संभव होता है. विकसित देशों में यह तकनीक तेजी से अपनाई जा रही है और भविष्य में भारतीय कृषि में भी इसका व्यापक उपयोग होने की संभावना है.
किसानों को क्या होंगे लाभ?
स्मार्ट पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने से किसानों को अनेक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होंगे. उर्वरकों की आवश्यकता आधारित उपयोग से उत्पादन लागत कम होगी और लाभांश बढ़ेगा. फसलों को संतुलित पोषण मिलने से उपज एवं गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा. उर्वरकों की बर्बादी कम होने से भूजल और सतही जल प्रदूषण घटेगा तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आएगी. इसके अतिरिक्त मिट्टी में जैविक गतिविधियां बढ़ेंगी, पोषक तत्वों का संतुलन बना रहेगा और दीर्घकालीन उर्वरता सुरक्षित रहेगी. इस प्रकार स्मार्ट पोषक तत्व प्रबंधन आर्थिक, कृषि, पर्यावरणीय और सामाजिक सभी दृष्टियों से लाभकारी सिद्ध होगा.
भविष्य का स्मार्ट खेत कैसा होगा?
भविष्य का स्मार्ट खेत पूरी तरह डेटा आधारित और डिजिटल तकनीकों से संचालित होगा. खेत में स्थापित सेंसर मिट्टी की स्थिति की निगरानी करेंगे, ड्रोन फसल स्वास्थ्य का आकलन करेंगे, स्वचालित मौसम स्टेशन मौसम संबंधी आंकड़े उपलब्ध कराएंगे और AI इन सभी सूचनाओं का विश्लेषण करके निर्णय लेगा. मोबाइल ऐप किसानों तक तुरंत सलाह पहुंचाएंगे, जबकि GPS आधारित मशीनें उर्वरकों और सिंचाई जल का सटीक अनुप्रयोग करेंगी. इस प्रकार भविष्य का खेत एक एकीकृत डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र (Digital Ecosystem) होगा, जहां संसाधनों का अधिकतम उपयोग, न्यूनतम लागत और अधिकतम उत्पादन सुनिश्चित किया जा सकेगा.
निष्कर्ष
भारत की कृषि तेजी से डेटा-आधारित, सटीक और स्मार्ट कृषि प्रणाली की ओर अग्रसर है, जहाँ उर्वरक प्रबंधन केवल अनुभव पर नहीं बल्कि वैज्ञानिक आंकड़ों और आधुनिक तकनीकों पर आधारित होगा. मृदा स्वास्थ्य कार्ड, सेंसर, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग (ML), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) तथा नैनो उर्वरक जैसी उन्नत तकनीकें किसानों को खेत-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने में सहायता प्रदान कर रही हैं. इन तकनीकों के माध्यम से मिट्टी की वास्तविक पोषण स्थिति, फसल की आवश्यकता तथा मौसम की परिस्थितियों का सटीक आकलन संभव हो रहा है, जिससे उर्वरकों का उपयोग अधिक प्रभावी और संतुलित बनाया जा सकता है.
आने वाले समय में कृषि की सफलता केवल अधिक उर्वरक उपयोग पर नहीं, बल्कि "सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान" अर्थात 4R पोषक तत्व प्रबंधन सिद्धांत के प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी. संतुलित एवं स्मार्ट पोषक तत्व प्रबंधन अपनाकर किसान न केवल फसल उत्पादकता और गुणवत्ता में वृद्धि कर सकते हैं, बल्कि उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाकर उत्पादन लागत को भी कम कर सकते हैं. साथ ही, मिट्टी की दीर्घकालीन उर्वरता, जल गुणवत्ता तथा पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित करते हुए कृषि को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और जलवायु-स्मार्ट बनाया जा सकता है. भविष्य में वही किसान अधिक प्रतिस्पर्धी और समृद्ध होंगे जो डिजिटल तकनीकों और वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन को अपनी खेती का अभिन्न हिस्सा बनाएंगे.
भविष्य की खेती का मंत्र है—"डेटा आधारित निर्णय, संतुलित पोषण और टिकाऊ उत्पादन".
लेखकगण: आरती कुमारी, अनुप दास, आशुतोष उपाध्याय एवं पवन जीत
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना
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