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संतुलित उर्वरीकरण: "खेत बचाओ अभियान" की सफलता की कुंजी

संतुलित उर्वरीकरण मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, फसल उत्पादकता वृद्धि और किसान समृद्धि का आधार है. मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन, 4R सिद्धांत, सूक्ष्म पोषक तत्वों का समावेश तथा जैविक एवं रासायनिक स्रोतों के संतुलित उपयोग से उर्वरक दक्षता बढ़ती है. इससे उत्पादन लागत घटती है, पर्यावरण संरक्षण होता है और कृषि अधिक टिकाऊ, लाभकारी एवं भविष्य के लिए सुरक्षित बनती है.

KJ Staff

मृदा स्वास्थ्य, फसल उत्पादकता एवं किसान समृद्धि के लिए एक समग्र दृष्टिकोण : भारत कृषि प्रधान देश है, जहाँ बढ़ती जनसंख्या की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन में निरंतर वृद्धि आवश्यक है. पिछले कुछ दशकों में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग ने कृषि उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, किन्तु असंतुलित एवं अंधाधुंध उर्वरक प्रयोग के कारण मृदा स्वास्थ्य, पर्यावरण तथा कृषि की दीर्घकालिक उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. इसी संदर्भ में "खेत बचाओ अभियान" का मुख्य उद्देश्य खेतों की उर्वरता, उत्पादकता एवं स्थिरता को बनाए रखना है, जिसमें संतुलित उर्वरीकरण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है.

संतुलित उर्वरीकरण क्या है? संतुलित उर्वरीकरण का अर्थ है फसल एवं मृदा की आवश्यकता के अनुसार सभी आवश्यक पोषक तत्वों-नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P), पोटाश (K), सल्फर (S), जिंक (Zn), बोरॉन (B) तथा अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों का उचित मात्रा एवं सही समय पर प्रयोग करना. इसका उद्देश्य केवल अधिक उत्पादन प्राप्त करना नहीं, बल्कि मृदा की दीर्घकालिक उर्वरता एवं पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना भी है.

असंतुलित उर्वरक उपयोग की समस्या: देश के अनेक क्षेत्रों में किसान मुख्य रूप से यूरिया का अधिक उपयोग करते हैं जबकि फास्फोरस, पोटाश तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपेक्षा की जाती है. इसके परिणामस्वरूप:

• मृदा में पोषक तत्वों का असंतुलन बढ़ता है.
• फसलों की पोषक तत्व उपयोग दक्षता कम होती है.
• उत्पादन लागत बढ़ती है तथा लाभ घटता है.
• मृदा कार्बनिक पदार्थ में कमी आती है.
• कीट एवं रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है.
•भूजल एवं पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है.
• समय के साथ खेतों की उत्पादकता घटने लगती है.

संतुलित उर्वरीकरण के प्रमुख सिद्धांत

  • मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन: प्रत्येक किसान को 2-3 वर्ष के अंतराल पर अपने खेत की मिट्टी की जांच अवश्य करानी चाहिए. मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करने से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं.

  • समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM): रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद एवं फसल अवशेषों का उपयोग करना चाहिए. इससे मृदा कार्बनिक पदार्थ बढ़ता है तथा पोषक तत्वों की उपलब्धता सुधरती है.

  • 4R पोषक तत्व प्रबंधन: संतुलित उर्वरीकरण के लिए 4R सिद्धांत अपनाना चाहिए: Right Source (सही उर्वरक स्रोत), Right Dose (सही मात्रा), Right Time (सही समय), Right Method (सही विधि)

  • सूक्ष्म पोषक तत्वों का समावेश : जिंक, बोरॉन, सल्फर एवं आयरन जैसे तत्वों की कमी अनेक क्षेत्रों में देखी जा रही है. इनकी पूर्ति के बिना केवल NPK उर्वरकों से अपेक्षित उत्पादन प्राप्त नहीं किया जा सकता.

  • धान-गेहूं प्रणाली में संतुलित उर्वरीकरण : पूर्वी भारत में धान-गेहूं फसल प्रणाली प्रमुख है. इस प्रणाली में लगातार केवल यूरिया आधारित पोषण देने से मृदा में पोटाश, सल्फर एवं जिंक की कमी बढ़ रही है. इसलिए:

    • अनुशंसित NPK मात्रा का प्रयोग करें.
    • जिंक सल्फेट एवं सल्फर का समुचित उपयोग करें.
    • फसल अवशेषों को खेत में वापस मिलाएं.
    • जैव उर्वरकों का उपयोग बढ़ाएं.
    • नीम कोटेड यूरिया का प्रयोग करें.

किसानों के लिए प्रमुख संदेश

  • मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरक उपयोग करें.
  • केवल यूरिया पर निर्भर न रहें.
  • NPK के साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों का भी प्रयोग करें.
  • जैविक एवं रासायनिक स्रोतों का संतुलित उपयोग करें.
  • फसल अवशेषों को न जलाएं, खेत में मिलाएं.
  • उर्वरकों का सही समय एवं सही विधि अपनाएं.
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिशों का पालन करें.
English Summary: balanced fertilization a holistic approach for soil health crop productivity and farmer prosperity Published on: 22 June 2026, 05:32 PM IST

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