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हरे चारे की वैज्ञानिक खेती से बढ़ेगी किसानों की आय, पशुधन होगा अधिक उत्पादक

कृषि विज्ञान केंद्र, बिरौली एवं हाइफर इंटरनेशनल के सहयोग से आयोजित कार्यशाला में 30 महिला किसानों को वैज्ञानिक हरा चारा उत्पादन, पशु पोषण और रोग प्रबंधन की आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई. विशेषज्ञों ने नेपियर घास, बरसीम, जई और मक्का जैसी चारा फसलों की उन्नत खेती पर मार्गदर्शन दिया. कार्यक्रम का उद्देश्य पशुपालन को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और आयवर्धक बनाना था.

रामजी कुमार

पशुपालन को लाभकारी बनाने और दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र, बिरौली द्वारा हाइफर इंटरनेशनल के सहयोग से "हरे चारे के उत्पादन एवं पशु पोषण में उसके उपयोग" विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यशाला में समस्तीपुर जिले की 30 महिला किसानों ने भाग लेकर वैज्ञानिक चारा उत्पादन और पशु पोषण संबंधी आधुनिक तकनीकों की जानकारी प्राप्त की.

कार्यक्रम का उद्घाटन विश्वविद्यालय के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. आर.के. झा ने किया. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पशुधन विकास और किसानों की आय में वृद्धि के लिए गुणवत्तायुक्त हरे चारे की उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है. उन्होंने किसानों से वैज्ञानिक पद्धति से चारा उत्पादन अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि संतुलित पोषण मिलने पर पशुओं की उत्पादकता और स्वास्थ्य दोनों में उल्लेखनीय सुधार होता है.

कार्यक्रम की शुरुआत में कृषि विज्ञान केंद्र, बिरौली के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. आर.के. तिवारी ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया तथा कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत की. उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पशुपालन क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक पशुओं को संतुलित एवं पौष्टिक आहार उपलब्ध कराना है, जिसमें हरे चारे की महत्वपूर्ण भूमिका है.

तकनीकी सत्र में डॉ. तिवारी ने पशुओं के पोषण प्रबंधन और हरे चारे के वैज्ञानिक उपयोग पर विस्तार से चर्चा की. वहीं डॉ. कौशल किशोर तथा भारती उपाध्याय ने हरे चारे की विभिन्न फसलों, उन्नत किस्मों, वर्षभर चारा उपलब्धता की रणनीति तथा उत्पादन तकनीकों की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि नेपियर घास, बरसीम, जई और मक्का जैसी चारा फसलों की वैज्ञानिक खेती से पशुओं के लिए पोषक चारे की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है.

कार्यशाला के अगले सत्र में सुमित कुमार सिंह ने चारा फसलों में लगने वाले प्रमुख कीटों एवं रोगों की पहचान तथा उनके समेकित प्रबंधन उपायों पर प्रकाश डाला. उन्होंने किसानों को रासायनिक दवाओं के संतुलित उपयोग और जैविक नियंत्रण विधियों को अपनाने की सलाह दी.

कार्यक्रम का समापन इं. विनीता कश्यप के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ. उन्होंने सभी अतिथियों, विशेषज्ञों, हाइफर इंटरनेशनल तथा सहभागी महिला किसानों के प्रति आभार व्यक्त किया.

कार्यशाला के दौरान महिला किसानों ने वैज्ञानिक चारा उत्पादन, पशु पोषण एवं रोग प्रबंधन से जुड़े विभिन्न प्रश्न पूछे, जिनका विशेषज्ञों ने विस्तार से उत्तर दिया. आयोजन का मुख्य उद्देश्य किसानों, विशेषकर महिला पशुपालकों को उन्नत चारा उत्पादन तकनीकों से जोड़कर पशुपालन को अधिक लाभकारी एवं टिकाऊ बनाना था.

English Summary: scientific green fodder production and animal nutrition workshop for women farmers Published on: 22 June 2026, 05:43 PM IST

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