खेती की दुनिया में एक बड़ा बदलाव आ रहा है — धीरे-धीरे, लेकिन बहुत गहराई से। और भारत इस बदलाव के ठीक मुहाने पर खड़ा है।
2025 में ब्राज़ील ने एक ऐसा काम किया जो पहले कभी नहीं हुआ था — उसने यूरिया से ज़्यादा अमोनियम सल्फेट मँगाया। पूरे साल में 7.78 मिलियन टन का आयात हुआ। यह कोई एक साल की बात नहीं — 2018 से 2024 के बीच ब्राज़ील का अमोनियम सल्फेट आयात तीन गुना हो चुका है। जो किसान पाँच साल पहले यूरिया का दो गुना उपयोग करते थे, वही आज अमोनियम सल्फेट की तरफ झुक गए हैं।
दुनिया ने संदेश दे दिया है। सवाल यह है कि हम भारत में इसे सुन रहे हैं या नहीं।
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ऐतिहासिक आँकड़ा — ब्राज़ील 2025 7.78 मिलियन टन अमोनियम सल्फेट का आयात पहली बार यूरिया का आयात पीछे छूटा। 2018–2024 के बीच amsul आयात करीब तीन गुना बढ़ा। |
पैसे का हिसाब — किसान के नज़रिए से
यूरिया की असली कमज़ोरी यह है कि उसमें लिखा तो 46% नाइट्रोजन होता है, लेकिन खेत की मिट्टी उसका 20–25% ही सोख पाती है। बाकी हवा में उड़ जाता है, पानी में बह जाता है, या ज़मीन में इतना गहरा चला जाता है कि जड़ें पकड़ नहीं पातीं।
यानी ₹5,000–6,000 का यूरिया खरीदकर किसान को मिलता क्या है? — मुश्किल से 10–12 किलो वह नाइट्रोजन जो फसल वाकई इस्तेमाल कर सके। और यह भी 15–20 दिन बाद, जब यूरिया मिट्टी में टूटकर अमोनियम में बदलता है।
अमोनियम सल्फेट इस पूरे झंझट से मुक्त है। ₹20 प्रति किलो में मिलता है, और जो नाइट्रोजन देता है वह सीधे अमोनियाकल रूप में — मतलब जड़ें तुरंत ले सकती हैं, कोई इंतज़ार नहीं। उपयोग दक्षता 70–90% तक पहुँचती है। और ऊपर से 24% सल्फर मुफ्त में मिलता है — जो खुद भी नाइट्रोजन की उपयोगिता बढ़ाता है।
सरकारी नज़रिए से भी देखें तो तस्वीर साफ है। किसान के खेत में 10–15 किलो उपलब्ध नाइट्रोजन पहुँचाने के लिए आज सरकार ₹5,000–6,000 का बोझ उठाती है। वही काम 50 किलो अमोनियम सल्फेट से ₹1,250–1,500 में हो सकता है — और साथ में मिट्टी भी सुधरती है, सल्फर की कमी भी दूर होती है।
यूरिया बनाम अमोनियम सल्फेट: तुलना
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पैरामीटर |
यूरिया |
अमोनियम सल्फेट |
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मूल्य (लगभग) |
₹50–60/किलो |
₹20/किलो |
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नाइट्रोजन सामग्री |
46% |
21% |
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सल्फर सामग्री |
शून्य |
24% |
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नाइट्रोजन उपयोग दक्षता |
20–25% |
70–90% |
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नाइट्रोजन का रूप |
विलंबित (यूरिया-N) |
तत्काल (अमोनियाकल-N) |
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रूपांतरण में समय |
15–20 दिन |
कोई देरी नहीं |
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मिट्टी पर pH असर |
क्षारीयता बढ़ाता है |
अम्लीय करता है (लाभकारी) |
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आपूर्ति जोखिम |
मध्य पूर्व पर निर्भर |
चीन / घरेलू उत्पादन |
हमारी मिट्टी खुद माँग रही है बदलाव
दशकों से यूरिया और डीएपी का बेलगाम इस्तेमाल हमारी मिट्टी की सेहत बिगाड़ता रहा है। देश के बड़े हिस्से में मिट्टी क्षारीय हो चुकी है — pH 7.5 से ऊपर। राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब — कहीं न कहीं यही कहानी है। अमोनियम सल्फेट स्वभाव से ही अम्लीय प्रतिक्रिया देता है, यानी यह उर्वरक नहीं बल्कि मिट्टी का इलाज भी है।
दूसरी बड़ी समस्या है सल्फर की कमी — जो चुपचाप फसलों का नुकसान कर रही है। हवा में घुला सल्फर पहले खेतों तक पहुँचता था, लेकिन औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण के चलते यह प्राकृतिक स्रोत सूख गया है। सरसों, तिलहन, दलहन, गन्ना — इन सभी को सल्फर चाहिए, प्रोटीन बनाने के लिए, तेल की मात्रा के लिए, और नाइट्रोजन के बेहतर उपयोग के लिए। अमोनियम सल्फेट यह काम भी कर देता है।
सरकार का मृदा स्वास्थ्य कार्ड कार्यक्रम भी यही बता रहा है — देश के कई हिस्सों में सल्फर की कमी एक बड़ी और बढ़ती चुनौती है। इसका जवाब किसी अलग खर्च में नहीं, बल्कि अमोनियम सल्फेट जैसे एकीकृत उर्वरक में है।
भू-राजनीति ने खोली आँखें
यूरिया की एक और कमज़ोरी है जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ करते हैं — हमारी आपूर्ति श्रृंखला की नाज़ुकता। वैश्विक यूरिया व्यापार का लगभग एक तिहाई और निर्यात का 49% हिस्सा मध्य पूर्व से आता है।
2026 में ईरान संघर्ष ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बाधित किया और यूरिया की कीमतें आसमान छू गईं। बाल्टिक FOB यूरिया 2025 में $375/टन था, फरवरी 2026 में $418 हुआ, और मार्च के मध्य तक $563–586/टन पर पहुँच गया — कुछ ही हफ्तों में 40% की उछाल। यह कोई पहली बार नहीं हुआ, और आखिरी बार भी नहीं होगा।
अमोनियम सल्फेट इस जोखिम से पूरी तरह अलग है। यह मुख्यतः उद्योगों का उपोत्पाद है — नायलॉन बनाने वाले संयंत्रों से, कोयले के रासायनिक संयंत्रों से। इसका उत्पादन किसी अलग कच्चे माल पर नहीं, बल्कि पहले से चल रही प्रक्रियाओं का स्वाभाविक परिणाम है। न चीनी कोटे का डर, न मध्य पूर्व की अनिश्चितता।
और सबसे अहम बात — Grasim Industries, Reliance Industries और GSFC जैसी भारतीय कंपनियाँ पहले से ही अमोनियम सल्फेट बना रही हैं। यानी हमें किसी और पर निर्भर नहीं रहना। यह केवल कृषि का नहीं, खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता का सवाल है।
दुनिया भर में बाज़ार बदल रहा है
वैश्विक अमोनियम सल्फेट बाज़ार 2025 में $4.16 बिलियन का था और 2030 तक $6.54 बिलियन तक पहुँचने की राह पर है — 9.7% की सालाना वृद्धि दर के साथ। S&P Global Platts ने ब्राज़ील के लिए विशेष साप्ताहिक मूल्य सूचकांक शुरू किए हैं — यह इस बात का प्रमाण है कि बाज़ार परिपक्व हो रहा है।
अमेरिका में मक्का, गेहूँ और सोयाबीन पट्टी में amsul की माँग बढ़ रही है। यूरोप में EU का CBAM नियम ऊँचे कार्बन वाले उर्वरकों को महँगा बना रहा है — और कम-कार्बन amsul को फायदा दे रहा है। अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया भी इसी राह पर हैं। भारत की बारी है।
Scimplify की भूमिका और भारत का अवसर
भारत में यूरिया से अमोनियम सल्फेट की ओर जाना कोई कल्पना नहीं — यह एक व्यावहारिक और अपरिहार्य निर्णय है। तर्क तीन मज़बूत आधारों पर टिका है:
• कृषि विज्ञान के आधार पर: बेहतर उपयोग दक्षता, तत्काल नाइट्रोजन, मिट्टी सुधार और सल्फर पोषण — एक ही उर्वरक में।
• अर्थव्यवस्था के आधार पर: प्रति किलो उपलब्ध नाइट्रोजन की कम लागत, सरकारी सब्सिडी बोझ में बड़ी बचत, और किसान को ज़्यादा फायदा।
• राष्ट्रीय रणनीति के आधार पर: घरेलू उत्पादन की क्षमता, मध्य पूर्व पर निर्भरता खत्म, और खाद्य सुरक्षा मज़बूत।
Scimplify में हम इसी दिशा में काम कर रहे हैं — अमोनियम सल्फेट को ह्यूमेट्स, जैव-उर्वरकों और फसल-विशिष्ट पोषण कार्यक्रमों के साथ जोड़कर एक ऐसा समाधान तैयार कर रहे हैं जो किसान की खेती को नई ऊँचाइयों पर ले जाए।
यूरिया से अमोनियम सल्फेट की ओर जाना भारतीय कृषि के लिए कोई उलटफेर नहीं है। यह उस गलती को सुधारने का वक़्त है जो दशकों से चली आ रही थी।
लेखकों के बारे में
सुधीर के. Scimplify में सीईओ – एग्रोकेमिकल्स हैं। Scimplify, पुणे स्थित एक एकीकृत एग्रोकेमिकल और बायोलॉजिकल्स प्लेटफ़ॉर्म है।
मोहनीश दुसरिया Scimplify में एवीपी एवं बिज़नेस हेड – उर्वरक हैं। वे घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों बाज़ारों में कंपनी की उर्वरक रणनीति का नेतृत्व करते हैं।
Scimplify, 20 से अधिक देशों में फसल संरक्षण, जैविक उत्पाद, बायोस्टिमुलेंट और विशेष उर्वरकों के क्षेत्र में सक्रिय है।
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