डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में 21वीं अनुसंधान परिषद खरीफ की तीन दिवसीय बैठक का भव्य शुभारंभ हुआ. विद्यापति सभागार में आयोजित उद्घाटन सत्र में पिछले वर्ष के अनुसंधान कार्यों की समीक्षा की जायेगी और आधुनिक, जलवायु-अनुकूल एवं तकनीक-आधारित कृषि अनुसंधान की रूपरेखा तय करने पर विचार किया जायेगा.
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और विश्वविद्यालय कुलगीत के साथ हुई. इस अवसर पर कृषि अनुसंधान निदेशालय द्वारा प्रकाशित तकनीकी पुस्तकों, शोध बुलेटिन और विस्तार पुस्तिकाओं का विमोचन किया गया. मक्का एवं बीज पर स्टेटस रिपोर्ट का भी लोकार्पण किया गया. ये प्रकाशन किसानों को नई तकनीकों की जानकारी देने में मददगार साबित होंगे.
कार्यक्रम के दौरान
अध्यक्षीय संबोधन में बोलते हुए कुलपति डॉ. पी. एस. पांडेय ने कहा कि जलवायु परिवर्तन आज कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. ऐसे में डिजिटल तकनीकों को अपनाना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता बन गई है. उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों का प्राथमिक लक्ष्य है अनुसंधान को 'लैब टू लैंड' पहुंचाना है. उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला में विकसित तकनीक तभी सार्थक है जब वह किसान के खेत तक पहुंचे और उसकी आय बढ़ाए.
डॉ. पांडेय ने वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कहा कि कृषि में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, ड्रोन तकनीक और प्राकृतिक खेती का समावेश अब भविष्य की जरूरत है. उन्होंने कहा विश्वविद्यालय कुछ गांवों में में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित फसल निगरानी और ड्रोन से छिड़काव के पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर चुका है.
जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय और नवसारी कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. ए. आर. पाठक ने कहा कि विश्वविद्यालय ने पिछले लगभग चार वर्षों में देश भर में अपना महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया है. उन्होंने कहा कि यहां के अनुसंधान और विकसित प्रभेदों से सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि देश भर के कृषि को फायदा हो रहा है. उन्होंने कहा कि डिजिटल एग्रीकल्चर के क्षेत्र में विश्वविद्यालय के प्रयास अन्य विश्वविद्यालयों को भी नई राह दिखा रहे हैं.
उन्होंने कहा कि यहां लीची, मखाना और मक्का जैसी फसलों पर उच्च स्तरीय अनुसंधान हो रहे हैं जो आने वाले समय में देश की कृषि को नई दिशा देंगे. उन्होंने कहा फसल के साथ पशुपालन, मत्स्य और बागवानी को जोड़ना भी आवश्यक है ताकि जोखिम घटे और आमदनी बढ़े. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के महिला किसानों के नेतृत्व वाले मॉडल को अन्य विश्वविद्यालयों को भी अपनाना चाहिए.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. इंदु शेखर सिंह, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक ने कहा कि विश्वविद्यालय ने मखाना के क्षेत्र में उत्कृष्ट अनुसंधान संस्थान की शुरुआत की है और इसमें उन्नीस वैज्ञानिकों की टीम लगाई गई है. मखाना के खेती, प्रसंस्करण , यंत्र और पूरे मार्केट चेन पर वैज्ञानिक ने विश्विद्यालय में कार्य शुरू कर दिया है. इन अनुसंधान के परिणाम से मखाना अनुसंधान को काफी फायदा होगा. उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों को जलवायु स्मार्ट बीजों पर भी कार्य करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आंकड़ों का उपयोग कर उर्वरक का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना होगा.
अनुसंधान निदेशक डॉ. ए. के. सिंह स्वागत भाषण देते हुए पिछले वर्ष के दौरान अनुसंधान की प्रमुख उपलब्धियों का ब्योरा दिया. उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष सूखा रोधी धान की 3 किस्में, मक्का की 2 संकर किस्में और दलहन में रोग प्रतिरोधी लाइनें विकसित की गईं.
21वीं अनुसंधान परिषद की बैठक तीन दिनों तक चलेगी. इस दौरान विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों के डीन और विभिन्न वैज्ञानिक अपनी अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं एवं विश्वविद्यालय संपोषित शोध परियोजनाओं की प्रस्तुति देंगे. इन परियोजनाओं को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारत सरकार, बिहार सरकार, नाबार्ड और यूनिसेफ जैसी संस्थाओं का सहयोग प्राप्त है.
तकनीकी सत्रों में मिलेट्स, मखाना और लीची संवर्धन, प्राकृतिक व जैविक खेती, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मूल्य एवं मौसम पूर्वानुमान और फसल सुरक्षा से जुड़े 61 नए शोध प्रस्तावों पर भी चर्चा होगी. बैठक में मक्का की दो नई उन्नत संकर किस्मों राजेन्द्र हाइब्रिड मक्का 5 एवं और राजेन्द्र हाइब्रिड मक्का 6 की पहचान और विमोचन को लेकर भी बाह्य विशेषज्ञो के द्वारा अंतिम निर्णय लिया जाएगा.
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