टिकाऊ खेती - एक पहल

भारत एक कृषि प्रधान देश है और जब से खेती की शुरूआत हुई तब से मनुष्य ने अपनी खेती में प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया और उसने धीरे-धीरे अपने अनुभवों से सीखकर इसमें आवष्यकतानुसार सुधार किया। परन्तु जनसंख्या के निरन्तर बढ़ने से खाद्यान्न में कमी होने से भारत को विदेषों से अन्न का आयात करना पड़ा, इससे निजात पाने के लिए एक समिति का सन् 1967 में गठन किया गया, जिसकी अध्यक्षता कृषि सलाहकार एवं वैज्ञानिक डा0 एम0 एस0 स्वामीनाथन ने की और निर्णय लिया गया कि उत्पादन बढ़ाने के लिए नई तकनीक का प्रयोग किया जाय, जिसमें उन्नत किस्म के बीजों तथा रासायनिक खादों का प्रयोग किया जाना तय हुआ, जिसे हरित क्रांति का नाम दिया गया।

हरित क्रांति की शुरूआत बहुत अच्छी रही तथा हिन्दुस्तान खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर होने लगा। धीरे-धीरे समय बीतता गया और हमारा देश खाद्यान्न का रिकार्ड तोड़ उत्पादन करने लगा। परन्तु इसी दौर में, अधिक उत्पादन की चाह में किसान ने खेती में अज्ञानतावष रासायनिक खादों का अधिक प्रयोग किया, जिससे फसलों में अधिक बीमारियों व कीटों का प्रकोप होने लगा और फसल की सुरक्षा के लिए पेस्टीसाइडस का प्रयोग किया, जिसके तत्कालिक प्रभाव ने हमारे भोजन, हवा, पानी, स्वास्थ्य तथा भूमि को प्रदूषित कर दिया। इसका प्रभाव हमारे दैनिक जीवन पर भी पड़ रहा है मनुष्यों तथा जीवों में विभिन्न प्रकार रोग पनप रहे हैं। जैसे – कैंसर, किडनी खराब होना, त्वचा सम्बन्धी रोग, पेट सम्बन्धी रोग, डायबीटिज आदि। साथ ही फसल की उत्पादन लागत बढ़ने लगी और उत्पादन में गिरावट आने लगी। इस तरह खेती में गिरावट के चलते खेती घाटे का सौदा मानी जाने लगी। रासायनिक खेती में खादों तथा पेस्टीसाइडस के प्रयोग से मृदा की उर्वरा शक्ति क्षीण होने के साथ मृदा में पाये जाने वाले सूक्ष्म जीव जैसे – केंचुआ, मित्र फफूंद, मित्र जीवाणु एवं एक्टीनोमाईसिटिज की संख्या घटने लगी।

एक तरफ तो खेती की लागत बढ़ रही थी, वहीं दूसरी तरफ मृदा, फसलों में रोगों एवं कीटों की संख्या बढ़ रही है तथा आमदनी घट रही है। इन सब कारणों के चलते किसानों को रसायनों से बचाव के लिए तथा खेती में टिकाउपन लाने के लिए  गंभीरता से सोचना पडे़गा। आज किसान सस्ती, सरल एवं टिकाउ खेती की आवष्यकता महसूस कर रहे है। जैविक खेती को अपना कर हम उक्त समस्याओं से निजात पा सकते है। जैविक खेती करने से एक ओर जहां पर्यावरण स्वच्द्द व संतुलित बना रहता है वहीं इससे मृदा की संरचना और उर्वरता में भी सुधार होता है। जैविक खेती एक ओर जहां सस्ती-सरल व टिकाऊ है वही इससे हमें स्वास्थ्यवर्धक फसलोत्पादन भी प्राप्त होता है, जोकि आज की हमारी जरूरत है जिसका बाजार में अच्छा मूल्य आसानी से मिल जाता है। जैविक खेती में जहां पर कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट तथा अन्य प्राकृतिक आदानों का प्रयोग किया जाता है, वहीं पर रोग नियंत्रण के लिए मित्र फफूंद ट्रांइकोडर्मा (संजीवनी), स्यूडोमोनास (फसल रक्षक) तथा कीट निंयत्रण के लिए मेटाराईजियम (कालीचक्रा), ब्यूवेरिया बेसियाना (दमन), बी0 टी0 (महास्त्रा), वर्टीसिलियम लेकेनाई (वर्टीफायर-एल), हिरसूटेला थोम्पसोनी (अलमाईट) व जैव-खाद जेसे - एजोटोबैक्टर (साइल गोल्ड), पी0एस0बी0 (फास्टर) पोटाश मोबिलाईजिंग जीवाणु (पोटाश एक्टिवा) आदि का भी प्रयोग करके जैविक खेती कर सकते हैं ये सभी उत्पाद बाजार में मिलते हैं और मानकों के आधार पर भारत सरकार इन उत्पादों की सिफारिश भी करती है। इसके अलावा कुछ खाद बनाने के देशी तरीकों की विधि निम्नलिखित है जिनको किसान अपने खेत या फार्म पर तैयार करके जैविक खेती या टिकाउ खेती की शुरूआत कर सकते हैं। 

कम्पोस्ट खाद - 
लादेप (हीप कम्पोस्ट) यह जैविक खाद बनाने की एक ऐसी सस्ती व सरल विधि है जिसमें कि कम लागत में बहुत अधिक खाद आसानी से तैयार की जा सकती है। यह विधि पष्चिमी उ0प्र0 की स्थिति-परिस्थितियों के अनुरूप विकसित की गई है। इसमें गन्ने की पत्ती, धान की पुआल, हरे खरपतवार अथवा ऐसा कोई भी जैव पदार्थ जो आसानी से गल-सड़ सकता है, खाद बनाने के कार्य में लाया जाता है। लादेप को कहीं भी खुले स्थान जमीन की ऊपरी सतह पर आसानी से बनाया जा सकता है। लादेप से लगभग शून्य लागत पर किसान भाई अपनी आवष्यकतानुसार पर्याप्त मात्रा में 4 से 6 माह में कम्पोस्ट खाद बना सकते हैं। यह विधि उन किसान भाइयों के लिए अधिक कारगर है जिनके पास पषुधन कम है और वह बडे़ स्तर पर जैविक खेती करना चाहते हैं। एक अनुमान के अनुसार एक एकड़ गन्ने के खेत की पत्ती से उस खेत के लिए में 5 से 6 टन कम्पोस्ट खाद आसानी से तैयार हो जाती है।

 

बनाने के लिए आवष्यक सामग्री:

  • एक एकड़ गन्ने के खेत की सूखी पत्ती      - 20 से 30 कुन्तल
  • पशुओं का गोबर                         - 5 कुन्तल
  • खेत की मिट्टी                          - 5 कुन्तल
  • ताजा पानी                              - 20,000 लीटर
  • हरी अवस्था में खरपतवार                  - 20 से 30 कुन्तल
  • बिना बुझा चूना                           - 30 किलोग्राम
  • चूल्हे की राख                            - 30 किलोग्राम
  • लकडी के लट्ठे या बेकार पड़े पत्थर         - 2 कुन्तल 

लादेप कम्पोस्ट बनाने की विधि: लादेप बनाने के लिए 25 फीट लम्बाई, 8 फीट चैडाई व 5 फीट ऊंचाई के आकार में उक्त सामग्री की परत दर परत निम्न प्रकार लगाते हैं।

  • पहली परत लकडी के लठ्ठों की उक्त आकार के बीच में लम्बाई में लगा दें।
  • दूसरी परत एक फीट ऊंचाई में सूखी पत्ती।
  • तीसरी परत एक फीट ऊंचाई में हरे खरपतवार। 
  • चैथी परत सूखी पत्ती पुनः प्रयोग करें। 
  • पांचवी परत एक फीट ऊंचाई में हरे खरपतवार का प्रयोग करें।  
  • छटवीं परत के रूप में चूल्हे की राख का इस्तेमाल करें।  
  • सातवीं परत के रूप में सूखी पत्ती पुनः प्रयोग करें। 
  • आठवीं परत के रूप में बिना बुझा चूना लगाकर दें। 
  • नौवीं परत एक फीट ऊंचाई में हरे खरपतवार का प्रयोग करें।  
  • दसवी परत पुनः सूखी पत्तीयों का इस्तेमाल करें। 

नोट - इन परतों को लगभग पांच फीट ऊंचाई तक इसी प्रकार लगाते रहते हैं तथा प्रत्येक परत पर गोबर व मिटटी की 3 इंच की तह का प्रयोग करें तथा अन्तिम परत के रूप में गोबर की तह लगाकर इसके ऊपर गोबर व मिट्टी का लेप बनाकर लिपाई कर दें। लादेप को बनाने के दो तीन दिन पष्चात् यदि कहीं दरारे पड़ जाये तो इनको पुनः भर दें। लगभग तीन माह पष्चात् इससे अच्छी गुणवत्ता की कम्पोस्ट की खूष्बू आने लगती है। 

नाडेप: जैविक खाद बनाने की इस विधि को महाराष्ट्र के किसान नारायण देवराज पण्डरी पांडे ने विकसित किया। नाडेप बनाने के लिए एक घनाकार जालीदार ईंटों का 10 फीट लम्बाई, 6 फीट चैडाई व 3 फीट ऊंचाई के आकार का जालीदार ढांचा जमीन की ऊपरी सतह पर बनाया जाता है। इस ढांचे में पेड़-पौधों की पत्तियां, खरपतवार, गोबर व खेत की मिट्टी की परत दर परत बिद्दाई जाती हैं। नाडेप की प्रत्येक सरह परत पर पानी का भरपूर छिड़काव किया जाता है। ताकि जैव पदार्थ शीघ्र गल-सड़ सकें। इस प्रकार नाडेप को ऊपर तक झोपड़ीनुमा आकार में भर कर मिट्टी से ढक दिया जाता है ताकि इसमें नमी एवं पोषक तत्वों की मात्रा संरक्षित रहे और खाद बनने की प्रक्रिया षीघ्र पूरी हा जाय। नाडेप से तैयार खाद में लगभग 0. से 1.5 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.5  से 1 प्रतिशत फास्फोरस एवं 0.5 से 1 प्रतिशत तक पोटाष पायी जाती है। एक नाडेप से एक बार में 30-35 कुन्तल अच्छी सड़ी-गली कम्पोस्ट खाद आसानी से तैयार की जा सकती है। 

नाडेप को भरने के लिए आवष्यक सामग्री:

  • पषुओं का गोबर         - 20 कुन्तल
  • पेड़-पौधों की पत्तियां      - 20 कुन्तल 
  • खेत की मिट्टी                - 10 कुन्तल 
  • ताजा पानी                     - 5000 लीटर 

केंचुआ खाद: केंचुआ व किसान खेती के आरम्भ से ही एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। केंचुआ मृदा में मौजूद मृत जैविक पदार्थों (जोकि पेड़-पौधों की पत्तियों से प्राप्त होते हैं ) को खाकर अपना जीवन चक्र चलाते हैं। केंचुआ जैव पदार्थों को खाकर मल के रूप में जो पदार्थ बाहर निकालते हैं उसे केंचुआ खाद कहते है। इस खाद से मृदा की उर्वराषक्ति, जल धारण क्षमता व संरचना में सुधार होता है। इस कारण पौधों की जड़ों का अच्द्दा विकास होता है। किसान केंचुए से अच्द्दी गुणवत्ता की जैविक खाद बनाकर रासायनिक खाद व उर्वरकों से मुक्ति पा सकते हैं। केंचुआ खाद में पौधों के लिए आवष्यक सभी पोषक तत्व मौजूद होते हैं, इसमें लगभग 2.5 प्रतिशत नाइट्रोजन, फास्फोरस 1.5 प्रतिशत व पोटाष 1  प्रतिशत होता है। केंचुआ खाद बनाने के लिए केंचुए की सर्वोत्तम प्रजाति आइसीनिया फोटिडा का इस्तेमाल करते हैं, जोकि प्रतिदिन अपने वजन के बराबर खाद बनाता है। 

केंचुआ खाद बनाने की विधि: केंचुआ खाद बनाने के लिए 10 से 12 फीट लम्बाई व 4 फीट चैड़ाई के आकार में जमीन की ऊपरी सतह पर पक्का फर्श बनाकर इसमें 10 फीट लम्बाई व 3 फीट चैड़ाई क्यारी बना लेते है। इसके पष्चात् 50किलोग्राम पेड़-पौधों की पत्तियां अथवा अन्य कोई जैव पदार्थ जो गल-सड़ सकता हो बिद्दाकर उसके ऊपर 15 दिन पुराना ठण्डा तीन कुन्तल बारीक गोबर फावड़े से काट कर डाल देते हैं। इसके पष्चात् इस प्रति क्यारी में पांच किलोग्राम केचुए छोडकर पानी का द्दिड़काव आवष्यकतानुसार करते रहते हैं। इसके ऊपर इतना पानी द्दिड़कतें हैं कि क्यारी़ पानी से तर हो जाए लेकिन ध्यान रखें कि पानी इससे बाहर न निकले।  तत्पष्चात् उसे पुराल या टाटपट्टी से ढक देते हैं। केचुआ खाद की क्यारी़ में 35-40 प्रतिशत नमी तथा 15-30 डिग्री सेन्टीग्रेट तापक्रम उपयुक्त माना गया है। क्योंकि केंचुए को भली प्रकार कार्य करने के लिए यह वातावरण जरूरी है। तापमान जानने के लिए केचुआ खाद की क्यारी में हाथ डालकर देखने पर हाथ को गर्म अथवा ठण्डा महसूस नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार केचुए के शरीर पर यदि खाद चिपकी है तो समझना चाहिये कि नमी की कमी है। इस प्रकार एक माह पष्चात् केंचुआ खाद की क्यारी से तैयार खाद उतार कर उस पर पुनः गोबर लगा दें।

खेती में प्रयोग करने की विधिः केचुआ खाद को 4 से 6 माह वाली फसलों में 5 से 10 कुन्तल तथा एक वर्ष वाली फसलों में 10 से 20 कुन्तल केंचुआ खाद प्रति एकड की दर से खेत की तैयारी के समय प्रयोग करना चाहिए। 

तरल खाद - 
बीजामृत: बीजामृत से बीजों का उपचार करके बुआई करने पर अंकुरण अच्द्दा होता है तथा रोग व बीमारियों से भी बीजों का बचाव होता है। बीजामृत से जमाव का प्रतिशत बढ़ जाता है तथा जड़ जल्दी निकलती हैं।

बनाने हेतु आवष्यक सामग्री:

  • गाय का गोबर            - 5 किलोग्राम
  • गौमूत्र                          - 5 लीटर 
  • चूना                             - 50 ग्राम 
  • खेत की मिट्टी                    - 500 ग्राम
  • ताजा पानी                    - 20 लीटर
  • एक प्लास्टिक का ड्रम      - 50 लीटर (क्षमता) 

बनाने की विधिः बीजामृत बनाने से एक दिन पूर्व 5 किलोग्राम गोबर को एक कपड़े में बांधकर 20 लीटर पानी में डुबोकर रख दें। इसी समय 50 ग्राम चूना 250 मिलीलीटर पानी में भिगोकर रख दें। अगले दिन कपड़े में बंधे गोबर को उसी पानी में मसलकर कपड़े सहित पानी से बाहर निकाल लें। इस प्रकार से प्राप्त घोल में चूने का घोल, 5 लीटर गौमूत्र व 500 ग्राम खेत की मिट्टी मिला लेनें से बीजामृत तैयार हो जाता है।

प्रयोग करने की विधिः बीजामृत में 15 से 30 मिनट तक बीज अथवा पौध को डुबोकर निकाल लेते हैं। इसके पश्चात बीज को द्दायादार स्थान पर 10 से 12 घण्टे तक रखते हैं, ताकि बीजामृत को बीज अच्द्दी तरह से सोख ले।

जीवामृतः यह एक तरल जैविक खाद है जिससे मृदा में सूक्ष्म जीवों की सख्ंया में वृद्धि होने के साथ-साथ मृदा की उर्वराशक्ति में सुधार होता है। खेत में जीवामृत का निरन्तर प्रयोग करने से मृदा में कार्बन व नाइट्रोजन के अनुपात में सुधार होता है जिससे फसलों बढवार अच्छी रहती है तथा पैदावार में बढोत्तरी होती है।

 

बनाने हेतु आवष्यक सामग्री:

  • गाय का गोबर                     - 15 किलोग्राम
  • गौमूत्र                                  - 15 लीटर
  • बेसन                                  - 2 किलोग्राम 
  • गुड़                                            - 2 किलोग्राम 
  • खेत की मिट्टी                 - 2 किलोग्राम 
  • ताजा पानी                                   - 150 लीटर 
  • एक प्लास्टिक का ड्रम            - 200 लीटर (क्षमता) 

बनाने की विधिः उपरोक्त सामग्री को ड्रम में डालकर अच्द्दी प्रकार से मिला लें। इसके पष्चात् इसकोे टाट-पट्टी की सहायता से 4 दिन के लिए ढ़ककर रख दें तथा इस दौरान इसको दिन में 3 से 4 बार अवश्य चलाते रहें। इससे गोबर व मूत्र में उपस्थित सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि होती है जोकि मृदा में जैविक क्रियाओं में सहायक होती हैं। ऐसा करने से इसकी गुणवत्ता बढ जाती है। इस प्रकार चौथे दिन जीवामृत तैयार हो जाता है। 

प्रयोग करने की विधि: तैयार जीवामृत को आगामी 2 से 3 दिन में अवश्य इस्तेमाल कर लेना चाहिए अन्यथा इसकी गुणवत्ता में कमी हो जाती है। उक्त मात्रा में तैयार जीवामृत को एक एकड़ के खेत में सिंचाई के पानी के साथ सायं के समय खेत में देने सेे अधिक लाभ होता है। 

हरित पानी: यह खेतों में व सड़क के किनारे खडे़ गैर-उपयोगी खरपतवारों से तैयार किया जाने वाला तरल जैविक खाद है, जोकि मृदा की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के अलावा मृदा एवं पौधों को रोग व बीमारियों से बचाने का कार्य भी करता है। यह पौधों की अच्छी बढ़वार में सहायक होता है इससे फसल उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी होती है।

 बनाने हेतु आवष्यक सामग्री:

  • हरी अवस्था में खरपतवार  - 25 किलोग्राम
  • इमली                  - 500 ग्राम
  • गुड़                    - 500 ग्राम 
  • पिसा हुआ नमक          - 250 ग्राम 
  • ताजा पानी               - 60 लीटर
  • एक प्लास्टिक का ड्रम      - 100 लीटर (क्षमता)  

बनाने की विधि: उपरोक्त सामग्री को आपस में मिलाकर 10 से 15 दिन तक सड़़ाते है, इसके पश्चात इस मिश्रण को कपड़े से छान लेते हैं। इस प्रकार तैयार घोल को हरित पानी कहते हैं। 

प्रयोग करने की विधि: इस प्रकार से तैयार हरित पानी की मात्रा में उसका 5 गुना साफ पानी मिला कर घोल तैयार करके तैयार घोल का प्रति एकड़ की दर से पहली सिंचाई करने के एक सप्ताह बाद फसलों पर द्दिड़काव करना चाहिए। हरित पानी को हम सिंचाई के पानी के साथ भी खेत में दे सकते हैं। 

वर्मीवाश : वर्मीवाश में पौधों के लिए आवष्यक पोषक तत्व प्राकृतिक रूप में मौजूद होते हैं। इसके प्रयोग से मृदा की उर्वराषक्ति एवं संरचना में सुधार होता है। इस कारण मृदा का पी.एच. मान भी सामान्य रहता है। मृदा में सूक्ष्म जीवों की संख्या में बढोत्तरी हो जाती है। 

बनाने हेतु आवष्यक सामग्री:

  • केंचुए                            - 5  किलोग्राम
  • गोबर                            - 50 किलोग्राम 
  • जैव-पदार्थ                       - 2  किलोग्राम 
  • ताजा पानी                        - 10 लीटर 
  • एक बाल्टी                        - 10 लीटर (क्षमता) 
  • एक चौड़ें मुँह का प्लास्टिक का ड्रम    - 100 लीटर (क्षमता) 
  • एक छोटे मुँह का प्लास्टिक का ड्रम    -  25 लीटर (क्षमता) 

बनाने की विधि: द्दोटे ड्रम के ऊपर बडे़ ड्रम को एक स्टैन्ड़ की सहायता से रख देते हैं। बडे़ ड्रम की तली में एक निकास द्वार बना कर इस पर एक टाट-पट्टी रख देते हैं। इसके पश्चात इस ड्रम में गोबर व केंचुए डालकर पानी द्दिड़क देते हैं। इसके ऊपर पानी से भरी द्दिद्रयुक्त बाल्टी लटका देते हैं। इस बाल्टी से धीरे-धीरे पानी टपकता रहता है और नीचे वाले ड्रम में वर्मीवाष इकट्ठा होता रहता है। 

प्रयोग करने की विधि: वर्मीवाश में 10 गुणा पानी मिलाकर फसलों पर द्दिड़काव करने से पौधों की अच्छी बढ़वार होती है तथा पौधों पर आने वाले रोग व बीमारियां भी बहुत कम हो जाती हैं। 

जैविक कीटनाशक - 
हर्बल स्प्रे - इसका प्रयोग फसलों पर करने से पौधों का विभिन्न रोग व बीमारियों से बचाव होता है। यह इल्ली व माहू आदि कीटों पर प्रभावी नियंत्रण करता है। जिससे पौधों की उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है।

बनाने हेतु आवष्यक सामग्री:

  • मट्ठा (द्दाद्द)              - 5 लीटर
  • गौमूत्र                   - 5 लीटर 
  • नीम की पत्ती             - 1 किलोग्राम 
  • बकायन की पत्ती          - 1 किलोग्राम 
  • आक्खे की पत्ती           - 1 किलोग्राम 
  • गुलाबी कनेर की पत्ती      - 1 किलोग्राम 
  • गिलोय की पत्ती           - 1 किलोग्राम                 
  • एक प्लास्टिक का ड्रम      - 50 लीटर (क्षमता)  

बनाने की विधि: उपरोक्त सामग्री को ड्रम में ड़ालकर अच्द्दी प्रकार से मिला लें। इसके पश्चात इसको 15 दिन तक सड़ा लें। इस मिश्रण को हर तीसरे दिन किसी लकड़ी की सहायता से चलाते रहें ताकि अच्द्दी गुणवत्ता का हर्बल स्प्रे तैयार हो जाये।

प्रयोग करने की विधि: तैयार मिश्रण को कपडे़ से द्दान लें और इसमें 150 लीटर पानी मिला कर फसलों पर प्रति एकड़ की दर से द्दिड़काव करने से कीट व बीमारियों से पौधों का बचाव होता है।

  हर्बल स्प्रे - हर्बल स्पे्र का प्रयोग फसलों पर करने से पौधों का चूसने-चबाने वाले कीटों के अलावा विभिन्न रोग व बीमारियों से बचाव होता है। इस कारण हमें अच्छी पैदावार प्राप्त होती है।

 बनाने हेतु आवष्यक सामग्री:

  • हरी मिर्च                - एक किलोग्राम
  • लहसुन                  - एक किलोग्राम 
  • ताजा पानी               - 10 लीटर 
  • एक प्लास्टिक का ड्रम       - 25 लीटर (क्षमता) 

बनाने की विधि: हर्बल स्प्रे को बनाने के लिए उपरोक्त सामग्री को पीसकर पानी में घोलकर एक दिन के लिए ढ़ककर रख देते है । इसके पश्चात इस मिश्रण को कपड़े से द्दान लेते हैं। इस प्रकार हर्बल स्प्रे तैयार हो जाता है। 

प्रयोग करने की विधि: हर्बल स्प्रे को 125 लीटर पानी में मिलाकर घोल तैयार कर लें। इस घोल का फसलों पर प्रति एकड़ की दर से सायं के समय द्दिड़काव करते हैं।

खाद्यान सुरक्षा चूर्ण: अनाज का घुन, सुंडी तथा कीड़ों से सुरक्षा के लिये एक जैविक कीट-नाशी चूर्ण तैयार किया जाता है। यह 500 ग्राम चूर्ण प्रति कुन्तल गेंहू की दर से टंकी में डालकर वायु व नमी का आवागमन रोक देने से अनाज एक वर्ष तक सुरक्षित रहता है। ध्यान रहे कि अनाज में 8 प्रतिशत से अधिक नमी न रहे।

बनाने हेतु आवष्यक सामग्री:

  • बकायन या नीम की सूखी निम्बोली   - 2.5  किलोग्राम
  • अग्निहोत्र की भस्म                 - 2.5   किलोग्राम 

बनाने की विधि: नीम की सूखी निम्बोली को कूटकर बारीक कर लें। इसके पश्चात इसमें अग्निहोत्र भस्म को मिला लेते  हैं। इस प्रकार यह खाद्यान्न सुरक्षा चूर्ण तैयार हो जाता है। 

प्रयोग करने की विधि: यह अनाज भण्डारण के लिए अच्द्दा जैविक कीटनाशी है। इस चूर्ण को बनाने के तुरन्त पश्चात अनाज की टंकी में थोड़ा-थोड़ा क्रमवार डालते रहते हैं और इसी क्रम में अनाज भी डालते रहते हैं। इस प्रकार 8 से 10परत दर परत लगाकर अन्त में सबसे ऊपर भस्म को द्दिड़ककर अनाज के टैंक को इस प्रकार बंद कर देते हैं ताकि इसमें वायु का आवागमन न हो सके।

 वातावरण शोधक, अग्निहोत्र -

अग्निहोत्र: यह एक छोटा सा यज्ञ है। जोकि प्रतिदिन सुबह-षाम सूयोदय एवं सूर्यास्त के समय किया जाता है। इसको करने के लिए लगभग-दस मिनट का समय एक बार में लगता है। यह प्रारम्भ में एक से तीन एकड के क्षेत्रफल में आसानी से कार्य करता है। इसके प्रभाव से फसलों की बढवार जल्दी होती है इसके साथ-साथ यह फसलों में रोग व बीमारियां नही आने देता क्यांेकि यज्ञ से निकलने वाली गैसे पर्यावरण के लिए लाभकारी होती है। इसी प्रकार इसकी भस्म भी अनाज भण्डारण से लेकर हमारी व हमारे पशुओं की विभिन्न बीमारियों की रोकथाम में कारगर साबित हो रही है। अग्निहोत्र पर विभिन्न देषो में षोध कार्य चल रहें है कि यह किस प्रकार इतना प्रभावकारी है। 

अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें।                                            

शिवकुमार सिंह
असिस्टेंट मैनेजर
इन्टरनैषनल पैनेसिया लिमिटेड - नई दिल्ली

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