जैव प्रौद्योगिकी द्वारा कीटों एवं रोगों का नियन्त्रण

जनसंख्या के आधार पर भारत विश्व भर में दूसरे पायदान पर आता है। यहां कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों पर अधिकांश जनसंख्या का जीवनयापन निर्भर है। कृषि फसलों के सफल उत्पादन में विभिन्न प्रकार की समस्यायें आती हैं जिनमें कीट एवं विभिन्न प्रकार की बीमारियां प्रमुख स्थान रखती हैं। एक तरफ बीमारियां पौधों कायिक अवस्था को प्रभावित कर उनकी वृद्धि एवं उत्पादन को प्रभावित करती हैं, तो कीट फसलों को खेतो से लेकर भण्डार गृह तक क्षतिग्रस्त कर सर्वाधिक आर्थिक नुकसान पहुंचाते हैं, जिसमें अन्ततः उत्पाद की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।

विभिन्न रोगों एवं कीटों की रोकथाम के लिये जिन कृषि रसायनों का उपयोग होता है, वे विभिन्न प्रकार की समस्यायें जैसे कि पर्यावरण प्रदूषण, स्वास्थ पर प्रतिकूल प्रभाव, द्वितीयक पेस्ट का प्रमुख पेस्ट में बदलना, कीटों का रसायनों के लिये प्रतिरोधी होना इत्यादि ,पैदा करते हैं। इन समस्याओं के कारण कीट एवं पादप रोग वैज्ञानिकों का ध्यान जैव प्रौद्योगिकी की ओर आकर्षित हुआ है। जैव प्रौद्योगिकी के द्वारा विभिन्न प्रकार के कीटरोधी एवं रोग प्रतिरोधी पौधों का विकास किया जा रहा है। उपरोक्त पौधों के विकास के लिये मुख्यतः मोलिकुलर बायलोजी एवं जेनेटिक इंजीनियरिंग विद्या का इस्तेमाल किया जा रहा हैं। जैव प्रौद्योगिकी का विकास एवं पादप विज्ञान में उसका उपयोग करके विभिन्न फसलों के कीट एवं रोग प्रतिरोधी पौधे विकसित किये गये हैं।

उपरोक्त पौधे/प्रजातियां प्रचलित फसलों के अंदर एक या एक से अधिक बाहरी जीन समावेशित करके विकसित किये गये है। सन् 1994 में सर्वप्रथम पराजीनी फसलों की खेती की शुरूआत अमेरिका में हुई थी जिसके आसानजनक परिणाम प्राप्त होने पर पराजीनी फसलों को विश्वभर में विभिन्न देशों द्वारा अपनाया गया है। सन् 1996 में कपास की फसल के कीटरोधी पौधों का विकास हुआ था एवं विभिन्न स्तरों पर निगरानी एवं परीक्षणों के बाद सन् 2002 में पराजीनी कपास को खेती का व्यवसायिक स्तर पर उपयोग शुरू हुआ जो कि शुरूआत में लगभग 29,307 हैक्टेर (2002) या तथा 8 वर्षो में बढकर लगभग 93,00,000 हैक्टेर (2010) तक पहुंच गया था। पराजीनी कपास को आमतौर पर बी. टी. कॉटन नाम से जाना जाता है।

कीटरोधिता: कीटरोधिता वह गुण है जिसमें एक ही पादप प्रजाति के कुछ विभेदो में अन्य विभेदों की तुलना में कीटों द्वारा अपेक्षाकृत कम नुकसान होता है। कीटरोधी पौधों के उत्पादन के लिये मुख्य रूप से निम्नलिखित पराजीनों का स्थानान्तर किया जाता है।

बेसिलस थुरिजेनेसिस का क्राई जीन . लोबिया का ट्रिप्सिन निरोधी जीन 3. सीरीन-प्रोटिएज निरोधी जीन. लेक्टिन उपरोक्त जीनों मे कोई जीन का उपयोग ज्यादा किया गया है। क्राई जीन या बी़.० टी० टाक्सिन जीन का स्रोत बेसिलस थुरिजेनेसिस नामक जीवाणु, है अब तक इस प्रोटीन के लगभग 16 विकल्पी ज्ञात किये जा चुके है और प्रत्येक विकल्पी एक भिन्न कीटनाषी गुणधर्म वाला प्रोटीन उत्पन्न करता है। जिससे इस क्रिया के फलस्वरूप कीटों की मृत्यु हो जाती है।

विषाणु रोधिता: जैवप्रौद्योगिकी के उपयोग से पौधों में पराजीन के द्वारा विषाणु रोधी पौधे प्राप्त करने में सफलता प्राप्त हुई है। उपरोक्त सफलता तम्बाकू, आलू, टमाटर, सोयाबीन, धान, नीबू, एवं संतरा, मक्का आदि फसलों में प्राप्त हुई है। पौधों में पराजीन के उपयोग से विषाणुरोधिता उत्पन्न करने के लिये निम्न विधियों का इस्तेमाल किया जाता हैः

  1. आवरण प्रोटीन जीन द्वारा
  2. संकरण सुरक्षा द्वारा
  3. त्रुटिपूर्ण विषाणु जीनोम द्वारा
  4. ऐटीसेस आर० एन.ए. द्वारा सुरक्षा
  5. व्याधिरोधिता: इसकी निम्नलिखित प्रकार प्राप्त किया जा सकता है।
  6. पी ० आर ० प्रोटीन द्वारा: पी आर प्रोटीन सामान्यतः बीमारी से ग्रसित ऊतक में इकट्ठा हो जाती है। ये प्रोटीन कम अणुभार वाली होती है। इन प्रोटीन को 5 भागों में बाटा गया है जैसे तम्बाकू, फंगल पैथोजन. की कोशिका भित्ति में उपस्थित काइटिन एवं ग्लूकेन का हाइड्रोलाइटिक ऐन्जाइमो द्वारा टूटना बीमारी रोधिता का आधार माना गया है। इस कार्य हेतु पौधों के बहुत सारे काइटिनेज जीन को निकाला एवं अध्ययन किया गया है। इस विधि द्वारा तम्बाकू, टमाटर, धान, सरसों, गाजर एवं आलू में जीवाणु एवं कवक के विरूद्ध बीमारी रोधिता प्राप्त करने में सफलता मिली है।
  7. फाइटो एलोक्सिन द्वारा: ये कम अणुभार वाले सेकेण्डरी मेटावोलाइट्स है, जो पौधो में इनफेक्सन के फलस्वरूप बनते है। ये पदार्थ व्याधि रोधिता उत्पन्न करने में सहायक है।

जीन स्थान्तरण  प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत जेनेटिक इंजीनियरिंग हेतु जो बाहरी जीन स्थान्तरित किये जाते है, उन्हें पराजीन कहते है तथा इस प्रकार जो पौधे प्राप्त होते हैं उन्हें पराजीनी पौधे कहते हैं।

निम्नलिखित विधियां में से किसी एक विधि द्वारा पौधों में समावेषित करा दिया जाता है।

  1. ऐग्रोबैक्टीरियम द्वारा
  2. इलेक्ट्रोपोरेशन द्वारा
  3. जीनगन द्वारा
  4. माइक्रोइंजेक्षन द्वारा
  5. मेक्ररोइंजेक्षन द्वारा
  6. सिलीकान कार्बाइड रेशे द्वारा

लिपोफेक्षन द्वारा जीन स्थान्तरण में आने वाली समस्यायें:

उपसंहार: हरित क्रांति का बडा उद्देष्य कृषि उत्पादन में बढोत्तरी करना था। हरित क्रांति द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की कृषि के क्षेत्र में पूरे विश्व विषेषकर ऐषिया महाद्वीप में भूख एवं गरीबी से लडने में समाज एवं सरकार को सहायता प्रदान की है। लेकिन आज जहां जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, वहीं दूसरी ओर कृषि योग्य भूमि में लगातार कमी आ रही है। अतः आज जो उत्पादन हमें मिल रहा है, यदि उसमें कीट एवं रोगों द्वारा होने वाले नुकसान को कम कर दिया जाये, तो यह दूसरे रूप में हमारे उत्पादन में वृद्धि को ही प्रदर्षित करेगा। जैव प्रौद्योगिकी द्वारा उत्पन्न किये गये पराजीनी पौधों में रोग एवं कीट नियंत्रण के लिये सामान्यतः अलग से किसी रसायन की आवष्यकता नहीं पडती है, जिससे किसानों पर आर्थिक दबाव कम हो जाता है और पर्यावरण प्रदूषण में भी कमी आती है। जैव प्रौद्योगिकी द्वारा तैयार की गयी पराजीनी फसलों का आज पूरे विश्व में लगभग 45 देशों में परीक्षण चल रहा है। आज कीट एवं रोगों के रोकथाम के बदलते हुये तरीके तथा ट्रांसजेनिक (पराजीनी) फसलों के महत्व व उपयोग को देखते हुये भारत सरकार ने इसके विकास पर ध्यान दिया है। विभिन्न अनुसंधान एवं षिक्षण संस्थाओं तथा निजी क्षेत्र की कम्पनियों द्वारा आलू, कपास, फूलगोभी, तम्बाकू, धान, सरसों, बैंगन, पत्ता गोभी, मिर्च इत्यादि फसलों की कीट एवं रोग प्रतिरोधी क्षमता वाली प्रजाजियां का विकास विभिन्न चरणों में है।

लेखक - डा. ऋशिपाल प्रक्षेत्रपर्यवेक्षक,जैविकनियन्त्रणप्रयोगषाला(कीटविज्ञानविभाग)सरदारवल्लभभाईपटेलकृषि एवंप्रौद्योगिकविश्वविधालय-मेरठ उ.प्र पिन-250110

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