1. खेती-बाड़ी

शुष्क कृषि क्षेत्रों में फसलों और मिट्टी की जल उपयोग क्षमता बढ़ाने की तकनीक

Soil management

भारत में कुल कृषि जमीन के लगभग 55 % क्षेत्रफल पर वर्षा आधारित खेती होती है. इन क्षेत्रों से 100 में से 85 % मोटा अनाज, 70 % तिलहन, 8 % दाल एवं 40 % तक चावल का उत्पादन होता है. वर्षा आधारित कृषि मानसून के देरी से आने या कम होने पर पूरी तरह से उपज में उतार-चढ़ाव देखा जाता है. वर्षा आधारित क्षेत्रों में फसल उत्पादन में उचित तरीकों से जल का प्रबंधन किया जाए,

तो इन क्षेत्रों से सिंचित क्षेत्रों के समान उत्पादन प्राप्त कर खाद्य उत्पादन को अधिक बढ़ाया जा सकता है. आज के समय में जमीन का जल स्तर भी निरंतर कम होता जा रहा है. इन क्षेत्रों में कुछ ऐसे वैज्ञानिक तरीकों को अपनाया जा सकता है, जिनसे उगाई जाने वाली फसलों की जल उपयोग क्षमता को बढ़ाया जा सके. तो आइये जानते हैं कुछ वैज्ञानिक तरीके जिन्हे अपनाकर फसलों की जल उपयोग क्षमता में वृद्धि हो सके.

जमीन का प्रबंधन (Soil management)

सूखे क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा एवं वर्षा समय, दोनों ही कम होते हैं. जमीन का प्रबंधन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि मिट्टी में जल की उपलब्धता पौधों के लिए अधिक समय तक बनी रहे. सही तरह से जमीन प्रबंधन से वर्षा जल को काफी मात्रा में इकट्ठा किया जा सकता है. दो से तीन वर्ष के अंतराल पर गहरी जुताई एवं वर्षा से पहले गर्मी में जुताई कर दी जाए तो जमीन अधिक मात्रा में पानी सोखने की क्षमता बढ़ती है.

गहरी जुताई (Deep ploughing)

अगली फसल की बुवाई करने से पहले खेत को गर्मी में गहरी जुताई करके वर्षा जल, मिट्टी द्वारा पर्याप्त मात्रा में अवशोषित कर लिया जाता है. इससे आगामी फसल के जल भाग की पूर्ति की जा सकती है. मानसून से पहले खेत के चारों तरफ से मेड़बंदी व जुताई कर जल संरक्षण किया जा सकता है. गहरी जुताई से मिट्टी में नमी अधिक समय तक संरक्षित रहती है जिससे फसल की जल मांग भी पूरी होती है.

जमीन का समतलीकरण एवं मेड़बंदी (Land leveling and fencing)

अधिक ढालयुक्त जमीन से वर्षा का जल अधिक प्रवाह से बह जाता है. जमीन के समतलीकरण से पानी का बहना कम हो जाता है और मिट्टी जल मात्रा को बढ़ाया जाता है. खेत में कुछ अंतराल पर मेड़बंदी करके भी जल के प्रवाह को कम किया जा सकता है. मेड़बंदी से वर्षा का जल अधिक समय तक मिट्टी सतह पर रुकने से पर्याप्त मात्रा में मिट्टी द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है. इससे फसलों द्वारा अधिक समय तक जल की पूर्ति की जा सकती है.

समोच्च जुताई और समोच्च रेखाओं पर खेती (Contour ploughing and contour farming)

वर्षा जल जब मिट्टी की सतह पर संतृप्त होने के बाद जल अपवाह के रूप में ढलान के अनुरूप बहता है तब ढलान के समानांतर जुताई कर जल अपवाह को कम किया जा सकता है और मिट्टी द्वारा जल का अधिक अवशोषण किया जाता है. शुष्क क्षेत्रों में कंटूर ट्रेंच बनाकर भी वर्षा जल को संरक्षित किया जाता है. वर्षा जल का संरक्षण करने के लिए ट्रेंच का निर्माण ढाल के अनुरूप किया जाता है, जिससे कि वर्षा जल का पर्याप्त मात्रा में संचयन हो सके और ट्रेंच पर फसल उगाकर जल की कमी को पूरा किया जा सके.

सस्यन प्रबंधन और फसलों का चयन (Crop Management and Crop Selection)

वर्षा जल की कमी के कारण शुष्क क्षेत्रों पर फसल उत्पादन में कमी फसल आधारित भी होती है. इन क्षेत्रों में मक्का, ज्वार, अरहर, बाजरा, कपास जैसी फसल उगाकर अधिक जल मांग वाली फसलों की अपेक्षा अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. इन फसलों की गहरी और विस्तृत जड़ संरचना के कारण जल का उपयोग विपरीत परिस्थिति में भी कर पाने में सफल होती है.

उन्नत किस्में एवं परिपक्वता का समय (Improved Varieties and Maturity Time)

शुष्क क्षेत्रों में फसलों से अधिक पैदावार प्राप्त करने में फसल की पकने की अवधि का बहुत बड़ा योगदान होता है. इस अवधि के दौरान जो फसलें अपना जीवनचक्र पूरा कर लेती हैं, उनसे अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है. इसलिए फसलों की ऐसी किस्मों का चयन करना चाहिए, जो कम समय में परिपक्व होती हैं और मिट्टी में पर्याप्त नमी बने रहने तक अपना जीवन चक्र पूर्ण कर लेती हैं.

पौधों की संख्या एवं अंतराल (Number of plants and spacing)

शुष्क क्षेत्रों में मिट्टी जल की कमी के कारण इसका प्रभाव बीज अंकुरण पर पड़ता है. इसलिए इन क्षेत्रों में संचित क्षेत्रों की अपेक्षा बीज दर कुछ मात्रा में बढ़ाकर बुआई की जाती है. पौधों की संख्या अधिक होने पर फैलाव स्थान को ध्यान में रखकर पौधों की संख्या कम कर लेना चाहिए. इससे फसलों को कम मिट्टी आर्द्रता पर कम पौधों की संख्या होने से उपलब्ध जल का पर्याप्त मात्रा में वितरण हो जाता है.  

वाष्पन प्रतिरोधी पदार्थ का उपयोग (Use of evaporation resistant material)

शुष्क क्षेत्रों की फसलों में ऐसे पदार्थों का उपयोग जल की कमी होने पर पौधों के उन हिस्सों पर किया जाता है, जहां से वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया अधिक होती है. इसके उपयोग से पौधों के वायुवीय भागों से वाष्पोत्सर्जन कम मात्रा में होने लगता है. इससे पौधों द्वारा जल का हृास वाष्पोत्सर्जन के रूप में कम होता है. वाष्पन प्रतिरोधी पदार्थ कई प्रकार के होते हैं. जैसे-स्टोमेटा बंद करने वाले-फिनाईल मरक्यूरिक एसिटेट, एट्राजीन, एबीए आदि जो पौधों की पत्तियों से वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया को कम कर देते हैं. मोम, तैलीय, तरल सिलिकोन, मोबीलीफ, हेक्जाकेनोल आदि प्रकार के पदार्थ पत्तियों की सतह पर पतली फिल्म बनाकर वाष्पोत्सर्जन को कम करते हैं. इनके अतिरिक्त कुछ पदार्थ कावोलिन, साइकोसील इत्यादि प्रकाश का परार्वतन एवं पौधों की वृद्धि रोककर जल की उपयोग क्षमता बढ़ाते हैं. इनका उपयोग सामान्यतः पौधों को मरने से बचाने के लिए तब किया जाता है, जब मिट्टी में जल की मात्रा काफी कम हो गई हो.

फसल चक्र और मिश्रित खेती अपनाना (Adoption of crop rotation and mixed farming)

फसल चक्रण में गहरी जड़ वाली अधिक अवधि की एवं उथली जड़ वाली कम अवधि की फसलों का चयन आवश्यक है. फसल चक्र में जमीन का कटाव अवरोधक फसलें जैसे कि तिलहनी, दलहनी, घास आदि का समावेश करना चाहिए. मिट्टी एवं जल को अधिक समय तक संरक्षित कर ज्यादा उपज प्राप्त की जा सकती है. मिश्रित खेती में दो या अधिक फसलें एक साथ उगाई जाती हैं जिससे शुष्क क्षेत्रों में इस प्रकार की खेती जमीन की सतह पर जल बहाव में अवरोध उत्पन्न कर मिट्टी एवं जल संरक्षण को बढ़ावा देती है. मिश्रित खेती में फसल द्वारा मिट्टी को समान रूप से ढक दिया जाता है. इससे मिट्टी सतह से होने वाले वाष्पीकरण की दर को कम किया जा सकता है.

जैविक खाद का उपयोग (Use of organic fertilizers)

जैविक खाद फसलों को पोषक तत्वों के साथ साथ जमीन की भौतिक अवस्था भी सुधारती है. जैविक खाद से मिट्टी जल धारण क्षमता में वृद्धि होने से सूखे की अवस्था में भी पौधों को पर्याप्त जल प्राप्त होता रहता है. जैविक खाद मिट्टी के कणों को बांधकर रखती है. इस मिट्टी में पर्याप्त सूक्ष्म छिद्र होते हैं. वर्षा जल का संचयन इन सूक्ष्म छिद्र में अधिक समय तक मिट्टी कणों के साथ बना रहता है. इससे मिट्टी भुरभुरी, मिट्टी में वायु संचार, पारगम्यता बढ़ना, जल उपयोग क्षमता में वृद्धि एवं जल अप्रवाह वेग में काफी कमी होती है.

खरपतवार नियंत्रण (Weed management)

खरपतवार फसलों के साथ नमी एवं पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा कर उपयोग करने में फसलों की अपेक्षा अधिक प्रभावी होते हैं. खरपतवार एवं फसलों के मध्य मुख्यतः 25-30 दिनों तक की अवस्था तक अधिक प्रतिस्पर्धा होती है. खरपतवार द्वारा मिट्टी जल का अवशोषण फसलों की अपेक्षा अधिक मात्रा में किया जाता है और ये फसलों के लिए जल की कमी उत्पन्न कर देते हैं.

English Summary: techniques to increase the water use efficiency of crops and soils in arid agricultural areas

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