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टिकाऊ कृषि: मृदा, जल, पर्यावरण और किसान आय पर प्रभाव का वैज्ञानिक एवं तुलनात्मक अध्ययन - भारत के परिप्रेक्ष्य में बिहार का अनुभव

हरित क्रांति के बाद बढ़े रासायनिक उर्वरक उपयोग से मृदा स्वास्थ्य, जल गुणवत्ता और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़े हैं. बिहार में समेकित पोषक तत्व प्रबंधन, जैविक संसाधनों, फसल चक्र और संरक्षण कृषि से मिट्टी की उर्वरता, जल संरक्षण और किसानों की आय में सुधार हुआ है. टिकाऊ कृषि ही भविष्य की लाभकारी और जलवायु-अनुकूल खेती का आधार है.

KJ Staff

भारत में कृषि की वर्तमान स्थिति: उत्पादन से संरक्षण की ओर

हरित क्रांति के बाद भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की. वर्ष 1960 के दशक में जहाँ देश खाद्यान्न आयात पर निर्भर था, वहीं आज भारत विश्व के सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादक देशों में शामिल है. इस उपलब्धि में रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, उच्च उत्पादक किस्मों तथा सिंचाई सुविधाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.वर्तमान में भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता देश है. वर्ष 2023-24 में देश में कुल उर्वरक खपत लगभग 64.84 मिलियन टन रही, जबकि पोषक तत्वों (NPK) की खपत 30.64 मिलियन टन दर्ज की गई. अकेले यूरिया की खपत 35.78 मिलियन टन रही, जो कृषि में बढ़ती रासायनिक निर्भरता का संकेत है.हालाँकि, उत्पादन वृद्धि की इस यात्रा के साथ एक गंभीर संकट भी उभर कर सामने आया है. मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के अनुसार देश की 64 प्रतिशत मिट्टियाँ नाइट्रोजन, 48.5 प्रतिशत कार्बनिक कार्बन, 41 प्रतिशत सल्फर तथा 36.5 प्रतिशत जिंक की कमी से ग्रस्त हैं. उर्वरकों की बढ़ती खपत के बावजूद पोषक तत्व उपयोग दक्षता लगातार घट रही है. कई क्षेत्रों में एक किलोग्राम उर्वरक से प्राप्त अतिरिक्त उत्पादन पिछले दशकों की तुलना में आधे से भी कम रह गया है.

इसके अतिरिक्त भूजल प्रदूषण, मृदा जैव विविधता में कमी, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि तथा कृषि लागत में लगातार बढ़ोतरी ने भारतीय कृषि की स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है. यही कारण है कि आज कृषि वैज्ञानिक "अधिक उत्पादन" से आगे बढ़कर "टिकाऊ उत्पादन" पर बल दे रहे हैं. इसी संदर्भ में टिकाऊ कृषि  ऐसी वैज्ञानिक प्रणाली के रूप में उभर रही है जो उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण और किसान की आर्थिक समृद्धि—तीनों के बीच संतुलन स्थापित करती है.

टिकाऊ कृषि क्या है?

टिकाऊ कृषि वह कृषि प्रणाली है जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए वर्तमान एवं भविष्य की खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है. इसका उद्देश्य केवल अधिक उत्पादन नहीं बल्कि—

  • मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण,

  • जल संसाधनों का दक्ष उपयोग,

  • पर्यावरणीय प्रदूषण में कमी,

  • जैव विविधता का संरक्षण,

  • जलवायु परिवर्तन के प्रति कृषि की अनुकूलता,

  • तथा किसानों की आय में स्थायी वृद्धि सुनिश्चित करना है.

टिकाऊ कृषि में समेकित पोषक तत्व प्रबंधन, समेकित कीट प्रबंधन, संरक्षण कृषि/ पुनर्योजी कृषि, जैविक एवं प्राकृतिक कृषि, फसल विविधीकरण, कृषिवानिकी प्रणाली, समेकित कृषि प्रणाली, फसल चक्र, वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई तथा कृषि कार्यों में श्रम-भार कम करने के लिए यंत्रीकरण जैसी तकनीकों का समन्वित उपयोग किया जाता है.

बिहार: टिकाऊ कृषि की दिशा में उभरता मॉडल

बिहार की लगभग 76% आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है. गंगा के मैदानी भाग होने के कारण यहाँ की मिट्टी प्राकृतिक रूप से बहुत उपजाऊ रही है. हालांकि, पिछले कुछ दशकों में अधिक पैदावार लेने की होड़ में रासायनिक उर्वरकों (विशेषकर यूरिया) का असंतुलित उपयोग तेजी से बढ़ा है, जिसके कारण मिट्टी व फसलों में पोषक तत्वों की कमी, पाधों की जड़ के नीचे सूक्ष्म जीवों की कमी, जैविक कार्बन में कमी और उर्वरकों के प्रयोग से भी खाद्यान्न उत्पादन (जो पहले 1 किलोग्राम उर्वरक से 15 किलोग्राम तक होता था, अब मात्र 4.5 किलोग्राम तक होता है) में कमी दर्ज की गई है.  किन्तु पिछले कुछ वर्षों में राज्य में जैविक कॉरिडोर, समेकित पोषक तत्व प्रबंधन, हरी खाद, वर्मी कम्पोस्ट, फसल अवशेष प्रबंधन, फसल चक्र, संरक्षण कृषि तथा जलवायु अनुकूल कृषि जैसी तकनीकों को अपनाने से सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं.आज बिहार टिकाऊ कृषि के अनेक सफल उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है.

नीचे दिए गए चार्ट के माध्यम से यह समझा जा सकता है, कि बिहार में रासायनिक खेती की तुलना में समेकित और जैविक प्रबंधन किस प्रकार मिट्टी और पर्यावरण को पुनर्जीवित करता है:

बिहार के संदर्भ में पद्धतियों का तुलनात्मक ढांचा

मापदंड / सूचकांक

अंधाधुंध रासायनिक खेती

जैविक, प्राकृतिक और समेकित प्रबंधन

मिट्टी का जैविक कार्बन

बिहार की ताजा रिपोर्टों के अनुसार < 0.35% (अत्यंत चिंताजनक).

जैविक और हरी खाद के प्रयोग से 0.50–0.75% तक सुधार.

उर्वरक उपयोग अनुपात

आदर्श अनुपात 4:2:1 की तुलना में बिहार में यह (20:5:1) तक असंतुलित है.

रासायनिक उर्वरकों पर 50–70% कम निर्भरता अथवा बिना उर्वरक के संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन.

भूजल स्तर व शुद्धता

आर्सेनिक और नाइट्रेट लीचिंग के कारण भूजल तेजी से प्रदूषित और नीचे जा रहा है.

जल धारण क्षमता बढ़ने से सिंचाई में 35-40% की बचत और शुद्ध भूजल.

मानव स्वास्थ्य पर असर

खाद्यान्न में आर्सेनिक और रसायनों के प्रवेश से कैंसर और लिवर की बीमारियां बढ़ीं.

'जैविक कॉरिडोर' के उत्पादों से शुद्ध, न्यूट्रिशनल और रोग-मुक्त भोजन.

प्रकरण अध्ययन (केस स्टडी) 1 - रासायनिक आपदा (दक्षिण व उत्तर बिहार का संकट)

  1. पृष्ठभूमि

बिहार के नालंदा, बेगूसराय, समस्तीपुर और भोजपुर जैसे जिलों में सघन खेती के कारण यूरिया और डीएपी का रिकॉर्ड उपभोग होता है. मिट्टी की जांच किए बिना केवल यूरिया डालने से बिहार की 'गंगा जलोढ़ मिट्टी' अपनी प्राकृतिक ताकत खो रही है.

  1. मिट्टी, जल और पर्यावरण पर प्रदूषण के आंकड़े

  • मिट्टी का मरुस्थलीकरण: शोध के अनुसार, बिहार के 60% से अधिक कृषि क्षेत्रों में जैविक कार्बन का स्तर घटकर 3% के आसपास आ गया है, जबकि मिट्टी को स्वस्थ रखने के लिए यह न्यूनतम 0.5% होना अनिवार्य है. मिट्टी सख्त होकर 'ऊसर' या 'कड़ी' हो रही है.

  • भूजल में 'आर्सेनिक' और 'नाइट्रेट' का घातक मेल: अंधाधुंध रासायनिक खेती और अत्यधिक भूजल दोहन के कारण बिहार के 18 जिलों (विशेषकर भोजपुर, बक्सर, पटना, वैशाली) का भूजल आर्सेनिक से गंभीर रूप से प्रदूषित हो चुका है. रासायनिक खादों से निकलने वाला नाइट्रेट इस आर्सेनिक को मिट्टी से पौधों की जड़ों तक खींचने में उत्प्रेरक (Catalyst) का काम कर रहा है. भूजल में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित सीमा (45 mg/L) को पार कर 80-120 mg/L तक पहुँच चुकी है.

  1. फसल व मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव

  • सब्जियों और अनाज में भारी धातुएं: गंगा के तटीय इलाकों में उगाई जाने वाली कद्दू, परवल और गोभी जैसी सब्जियों में कैडमियम और आर्सेनिक के अवशेष पाए गए हैं.

  • गंभीर बीमारियां : दक्षिण बिहार के कुछ गांवों को 'कैंसर प्रभावित' घोषित करना पड़ा है. आर्सेनिक और नाइट्रेट युक्त पानी व भोजन के कारण त्वचा के रोग, लिवर सिरोसिस, और बच्चों में दिमागी विकास की कमी जैसी समस्याएं महामारी का रूप ले रही हैं.

प्रकरण अध्ययन (केस स्टडी) 2 - बिहार का 'जैविक कॉरिडोर' और समेकित कृषि की सफलता

  1. पृष्ठभूमि

बिहार सरकार ने गंगा नदी के दोनों किनारों पर पड़ने वाले 13 जिलों (जैसे बक्सर, भोजपुर, पटना, वैशाली, बेगूसराय, भागलपुर आदि) में 'जैविक कॉरिडोर' की स्थापना की है. इसके तहत हजारों किसानों को जैविक, प्राकृतिक और समेकित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने के लिए प्रोत्साहित और प्रमाणित किया गया है.

  1. मिट्टी, जल और पर्यावरण पर सुधारात्मक आंकड़े

  • मिट्टी की उर्वरता में सुधार: जिन खेतों में यूरिया को पूरी तरह बंद करके या आधा करके वर्मीकंपोस्ट (केंचुआ खाद), ढैंचा (हरी खाद) और जीवामृत का प्रयोग किया गया, वहाँ मात्र 3 वर्षों में मिट्टी का जैविक कार्बन32% से बढ़कर 0.68% दर्ज किया गया.

  • समेकित पोषक तत्व प्रबंधन का जादू: केवल जैविक पर निर्भर न रहकर जिन किसानों ने 50% रासायनिक + 50% जैविक (गोबर खाद/नीम केक) का मिश्रण अपनाया, उनकी फसल उपज में 15-20% की वृद्धि हुई और मिट्टी की भौतिक संरचना (Porosity) में उल्लेखनीय सुधार हुआ.

  • पानी की भारी बचत: जैविक खादों के उपयोग से मिट्टी की 'जल धारण क्षमता' बढ़ गई, जिससे धान की फसल में जहाँ पहले 6-7 सिंचाइयों की जरूरत होती थी, वहीं अब केवल 4 सिंचाइयों में काम हो रहा है.

  1. फसल व मानव स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव
  • पोषण से भरपूर फसलें: जैविक कॉरिडोर के तहत उत्पादित 'कतरनी चावल', 'जर्दालू आम' और सब्जियों में जिंक और आयरन की मात्रा सामान्य से 18% अधिक पाई गई है. ये उत्पाद पूरी तरह से रासायनिक अवशेष मुक्त हैं.

  • स्वास्थ्य और समृद्धि: इन क्षेत्रों के किसान परिवारों में औषधीय खर्चों में 50% तक की गिरावट देखी गई है. जैविक प्रमाणीकरण मिलने के बाद किसानों को अपनी उपज का मूल्य बाजार से 20 से 30% अधिक मिल रहा है.

बिहार के संदर्भ में दोनों पद्धतियों का वैज्ञानिक विश्लेषण

बिहार की सघन जनसंख्या और सीमित भूमि को देखते हुए रासायनिक बनाम टिकाऊ खेती का तुलनात्मक वैज्ञानिक विश्लेषण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट है:

पर्यावरण एवं स्वास्थ्य संकेतक रासायनिक पद्धति (पारंपरिक अंधाधुंध उपयोग) जैविक, प्राकृतिक एवं समेकित पद्धति (बिहार मॉडल)  
मिट्टी के सूक्ष्मजीव (Microbes) यूरिया-DAP के कारण मित्र बैक्टीरिया और केंचुए समाप्त. जीवामृत और वर्मीकंपोस्ट से प्रति ग्राम मिट्टी में करोड़ों लाभकारी  बैक्टीरिया.
फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता कीड़े और बीमारियों का प्रकोप अधिक (कीटनाशकों पर खर्च अधिक). नीम अस्त्र और जैविक खाद से फसल मजबूत, बीमारियां न्यूनतम.  
लागत और शुद्ध मुनाफा महंगी खाद-दवाइयों के कारण लागत उच्च, शुद्ध मुनाफा कम. घर पर इनपुट तैयार होने से लागत में 45% की कमी, मुनाफा अधिक.  
पर्यावरणीय प्रभाव (वायु व जल) मिट्टी से नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन (ग्लोबल वार्मिंग) व जल प्रदूषण. कार्बन चक्र में सुधार, वातावरण की कार्बन डाइऑक्साइड को मिट्टी में सोखना.  
खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता अनाज और सब्जियां जल्दी खराब होती हैं, स्वाद में कमी. उत्पाद लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं (Better Shelf Life) और स्वादिष्ट.  

निष्कर्ष एवं बिहार के लिए आगे की राह

बिहार जैसे घनी आबादी वाले राज्य में, जहाँ खाद्य सुरक्षा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, पूरी तरह से शून्य-रासायनिक खेती पर अचानक जाना जोखिम भरा हो सकता है.

इसलिए, सबसे सटीक और वैज्ञानिक मार्ग समेकित पोषक तत्व प्रबंधन है. किसानों को चाहिए कि वे:

  1. अंधाधुंध रासायनिक खादों का प्रयोग मिट्टी के स्वास्थ्य को खराब करता है और उसमें उपस्थित मित्र कीटों को समाप्त करता है, अत: मिट्टी की जांच करवाने के उपरांत ही आवश्यकतानुसार संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करें.

  2. नीम लेपित यूरिया का सीमित उपयोग करने से नाइट्रोजन धीरे धीरे फसल को उपलब्ध होती है, जिसके कारण इसका ह्रास कम होता है और नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ती है . उर्वरक उपयोग दक्षता अभी मात्र 30-40% है, जिसको बढ़ाकर 70-80% तक किया जा सकता है अगर तरल उर्वरकों का टपक सिंचाई द्वारा जड़ क्षेत्र के पास प्रयोग किया जाये और नैनो यूरिया, नैनो डीएपी जैसे विकल्पों को शामिल किया जाये.

  3. धान की रोपाई से पहले ढैंचा या मूंग की हरी खाद को मिट्टी में जरूर पलटें, ऐसा करने पर यूरिया पर निर्भता कम होगी, मिट्टी का स्वास्थ्य अच्छा होगा और फसल का उत्पादन भी बढ़ेगा. अजोला फ़र्न भी धान के खेत में वातावरण से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करता है.

  4. रासायनिक खादों के साथ वर्मीकंपोस्ट और ट्राइकोडर्मा जैसे जैव-उर्वरकों का संयोजन करें.

  5. एक ही फसल को लगातार खेत में न लगाएं और फसल चक्रीकरण को अपनायें.

  6. फसल अवशेष को खेत में ही मिला दें. पराली जलाने से मिट्टी का तापमान बढ़ता है और सूक्ष्म जीवाणु जो मिट्टी को भुरभुरा करते हैं, मिट्टी के और नीचे चले जाते हैं.

  7. जल एवं वायु द्वारा होने वाले मृदा क्षरण को रोकें, और मिट्टी से वाष्पीकरण द्वारा नमी का ह्रास रोकने के लिए फसल अवशेष या प्लास्टिक पलवार (मलचिंग) का प्रयोग करें     

  8. उर्वरकों के प्रयोग से पूर्व सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही विधि को जानें, समझें और अपनायें.

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य

सतत कृषि केवल एक वैकल्पिक उत्पादन प्रणाली नहीं है, बल्कि भविष्य की कृषि की वैज्ञानिक आधारशिला है. भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए वैज्ञानिक रूप से प्रबंधित समेकित कृषि प्रणाली तथा समेकित पोषक तत्त्व प्रबंधन, पूर्णतः रसायन-मुक्त कृषि की ओर अचानक संक्रमण की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक, उत्पादक तथा पर्यावरणीय दृष्टि से अधिक टिकाऊ विकल्प प्रस्तुत करते हैं. बिहार के अनुभव स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि समेकित पोषक तत्त्व प्रबंधन, संरक्षण कृषि, जैविक संसाधनों का पुनर्चक्रण, फसल विविधीकरण तथा कुशल जल प्रबंधन को अपनाकर मृदा स्वास्थ्य, जल गुणवत्ता, पर्यावरणीय स्थिरता तथा किसानों की आय में एक साथ उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है. राष्ट्रीय स्तर पर "संरक्षण के साथ उत्पादन" के सिद्धांत को अपनाकर भारतीय कृषि को अधिक लाभकारी, जलवायु-अनुकूल, संसाधन-कुशल तथा भावी पीढ़ियों के लिए अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है. यही दृष्टिकोण विकसित, समृद्ध एवं आत्मनिर्भर भारतीय कृषि की आधारशिला सिद्ध होगा.

लेखकगण: आशुतोष उपाध्याय, आरती कुमारी, पवनजीत एवं अनुप दास
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना

English Summary: sustainable agriculture in bihar through integrated nutrient management Published on: 30 June 2026, 02:10 PM IST

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