प्राकृतिक खेती एक कृषि-पारिस्थितिकीय पद्धति है, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए फसलों की खेती पर बल देती है तथा रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों एवं अन्य बाहरी रासायनिक आदानों पर निर्भरता को न्यूनतम या पूर्णतः समाप्त करने का प्रयास करती है. यह इस सिद्धांत पर आधारित है कि स्वस्थ मृदा, विविध जैविक समुदाय तथा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन पर्यावरणीय गुणवत्ता को संरक्षित रखते हुए फसल उत्पादकता को बनाए रख सकते हैं. पारिस्थितिकीय संतुलन को बढ़ावा देकर तथा कृषि संसाधनों के पुनर्चक्रण को प्रोत्साहित करते हुए, प्राकृतिक खेती का उद्देश्य सुरक्षित खाद्य उत्पादन, उत्पादन लागत में कमी तथा कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करना है. प्राकृतिक खेती में मृदा की उर्वरता तथा फसलों के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए अनेक परस्पर पूरक पद्धतियों का समन्वित रूप से उपयोग किया जाता है. इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं-
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बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत तथा संजीवक जैसे देशी गाय-आधारित सूक्ष्मजीवी घोलों का बीज उपचार तथा मृदा समृद्धि के लिए उपयोग.
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आच्छादन के अंतर्गत फसल अवशेषों अथवा अन्य जैविक पदार्थों का उपयोग कर मृदा में नमी का संरक्षण, खरपतवारों की रोकथाम तथा मृदा कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि.
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वापसा की अवधारणा के अनुसार मृदा का वातन तथा न्यूनतम मृदा छेड़छाड़, जिससे जड़ों की वृद्धि एवं सूक्ष्मजीवों की सक्रियता के लिए अनुकूल मृदा दशाएँ बनी रहें.
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फसल विविधीकरण, जिसमें अंतरवर्तीय खेती, मिश्रित खेती, फसल चक्र तथा दलहनी फसलों का समावेश कर जैव विविधता एवं पोषक तत्त्वों के चक्रण को बढ़ावा दिया जाता है.
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वानस्पतिक अर्कों तथा लाभकारी जीवों के माध्यम से कीट एवं रोगों का जैविक प्रबंधन.
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प्रक्षेत्र द्वारा उत्पन्न होने वाले जैवभार, पशुधन अपशिष्ट तथा अन्य स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी पुनर्चक्रण, जिससे खरीदे जाने वाले बाहरी आदानों पर निर्भरता कम हो.
इन सभी घटकों में पोषक तत्त्व प्रबंधन प्राकृतिक खेती की सफलता का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्धारक माना जाता है. पारंपरिक कृषि के विपरीत, जहाँ पौधों को पोषक तत्त्व मुख्यतः रासायनिक उर्वरकों के माध्यम से उपलब्ध कराए जाते हैं, प्राकृतिक खेती में कृषि पारितंत्र के भीतर जैविक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ बनाकर तथा पोषक तत्त्वों के कुशल चक्रण को प्रोत्साहित करके उनकी उपलब्धता बढ़ाने का प्रयास किया जाता है.
यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि प्राकृतिक खेती स्वयं नए पोषक तत्त्वों का निर्माण नहीं करती, बल्कि यह मृदा में ऐसी अनुकूल परिस्थितियाँ विकसित करती है, जिनसे मृदा में पहले से विद्यमान अनुपलब्ध पोषक तत्त्व पौधों द्वारा ग्रहण किए जा सकने वाले उपलब्ध रूपों में परिवर्तित हो जाते हैं. साथ ही, फसलों द्वारा मृदा से अवशोषित किए गए पोषक तत्त्वों की भरपाई समय-समय पर करना आवश्यक है, ताकि मृदा की उर्वरता दीर्घकाल तक बनी रहे.
इसलिए, प्राकृतिक खेती में प्रभावी पोषक तत्त्व प्रबंधन का आधार कृषि संसाधनों का पुनर्चक्रण, पोषक तत्त्वों की हानि को न्यूनतम करना, मृदा में नमी का संरक्षण, जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण को प्रोत्साहित करना तथा मृदा में पोषक तत्त्वों की प्राकृतिक उपलब्धता सुनिश्चित करने वाली प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करना है. जब इन सभी उपायों को वैज्ञानिक एवं समुचित ढंग से अपनाया जाता है, तब मृदा का स्वास्थ्य निरंतर बेहतर होता है, पोषक तत्त्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ती है, उत्पादन लागत में कमी आती है तथा कृषि अधिक टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल और आर्थिक रूप से लाभकारी बनती है.
प्राकृतिक खेती में पोषक तत्त्व प्रबंधन की रणनीतियाँ
प्राकृतिक खेती में पोषक तत्त्व प्रबंधन "पौधे को सीधे पोषण देने के बजाय मृदा को पोषित करने" के सिद्धांत पर आधारित है. कार्बनिक पदार्थ तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों से समृद्ध स्वस्थ मृदा दीर्घकाल तक अपनी उर्वरता बनाए रखते हुए धीरे-धीरे पौधों के लिए उपलब्ध रूपों में पोषक तत्त्व प्रदान कराती है.
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मृदा की जैविक सक्रियता को बढ़ाना
सूक्ष्मजीव पोषक तत्त्वों के चक्रण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वे कार्बनिक अवशेषों का अपघटन, पोषक तत्त्वों को पौधों द्वारा ग्रहण योग्य रूप में परिवर्तित करना, वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण तथा अपेक्षाकृत अनुपलब्ध फॉस्फोरस एवं सूक्ष्म पोषक तत्त्वों को घुलनशील बनाकर पौधों के लिए उपलब्ध कराने का कार्य करते हैं. जीवामृत तथा घनजीवामृत जैसे जैविक घोल लाभकारी सूक्ष्मजीवों की वृद्धि एवं सक्रियता के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं, जिससे पोषक तत्त्वों के रूपांतरण एवं उनकी उपलब्धता में वृद्धि होती है.
प्राकृतिक खेती में जीवामृत, घनजीवामृत, बीजामृत, पंचगव्य तथा विभिन्न वानस्पतिक अर्कों जैसे किण्वित जैविक घोलों का उपयोग कृषि-पारितंत्र की उन जैविक प्रक्रियाओं को सक्रिय करने के लिए किया जाता है, जो फसल वृद्धि एवं मृदा स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाती हैं. इन घोलों में विविध प्रकार के सूक्ष्मजीव, कार्बनिक यौगिक, एंजाइम, अमीनो अम्ल तथा विभिन्न उपापचयी उत्पाद उपस्थित होते हैं, जो राइजोस्फीयर में सूक्ष्मजीवी सक्रियता को बढ़ाते हैं. सक्रिय सूक्ष्मजीवी समुदाय कार्बनिक अवशेषों के अपघटन की गति को तेज करता है तथा पोषक तत्त्वों को पौधों द्वारा ग्रहण योग्य रूप में परिवर्तित करता है. इसके परिणामस्वरूप मृदा में कार्बनिक रूप से बंधी नाइट्रोजन, अल्प घुलनशील फॉस्फोरस तथा सूक्ष्म पोषक तत्त्व जैसे अपेक्षाकृत अनुपलब्ध पोषक तत्त्व अधिक सुलभ एवं गतिशील रूप में पौधों को प्राप्त होने लगते हैं.
इन जैविक घोलों से संबद्ध कुछ सूक्ष्मजीव पादप वृद्धि हार्मोन तथा अन्य जैव-सक्रिय यौगिक भी उत्पन्न करते हैं, जो जड़ों की वृद्धि को प्रोत्साहित कर पोषक तत्त्वों के अवशोषण की दक्षता में सुधार करते हैं. इन जैविक घोलों का पर्णीय तथा मृदा अनुप्रयोग पौधों की स्फूर्ति एवं वृद्धि को बढ़ाता है तथा प्राकृतिक प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय करके कुछ कीटों एवं रोगों के प्रति सहनशीलता विकसित करने में सहायक हो सकता है. साथ ही, पौधों की सतह एवं राइजोस्फीयर में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की प्रतिस्पर्धात्मक सक्रियता भी बढ़ती है. जब इन घोलों का प्रयोग कार्बनिक मल्च के साथ मृदा में किया जाता है, तब यह बेहतर नमी संरक्षण तथा संतुलित तापमान वाला जैविक रूप से सक्रिय सूक्ष्म वातावरण निर्मित करता है, जो निरंतर पोषक तत्त्व चक्रण के लिए अनुकूल होता है.
इसके अतिरिक्त, फूलों वाली अंतरवर्ती फसलें तथा चयनित वानस्पतिक मिश्रण का उपयोग परागणकर्ताओं एवं लाभकारी कीटों के लिए उपयुक्त आवास एवं भोजन स्रोत उपलब्ध कराता है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से फसल उत्पादकता एवं पारिस्थितिकीय स्थिरता में वृद्धि होती है. इस प्रकार, इन जैविक घोलों की भूमिका बड़ी मात्रा में पोषक तत्त्व उपलब्ध कराने में नहीं, बल्कि उन जैविक एवं जैवरासायनिक प्रक्रियाओं को सक्रिय करने में है, जो पोषक तत्त्वों की उपलब्धता, पौधों के स्वास्थ्य तथा कृषि-पारितंत्र की स्थिरता एवं सहनशीलता को नियंत्रित करती हैं.
पारितंत्र की स्थिरता एवं सहनशीलता को नियंत्रित करती हैं.
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प्रक्षेत्र पर उपलब्ध कार्बनिक संसाधनों का पुनर्चक्रण
प्राकृतिक खेती में फसल अवशेष, गोबर खाद, कम्पोस्ट, हरी जैविक सामग्री, पशुओं का गोबर एवं मूत्र तथा अन्य जैव-अपघटनीय पदार्थों का पुनर्चक्रण खेतों में ही किया जाता है. मल्च के रूप में प्रयुक्त कार्बनिक पदार्थ तथा आवरण फसलें दीर्घकाल में अपघटित होकर पोषक तत्त्वों के पुनर्चक्रण में योगदान देती हैं. इनके अपघटन से मृदा में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है तथा आवश्यक पोषक तत्त्व धीरे-धीरे मुक्त होते हैं, जिससे मृदा की उर्वरता एवं संरचना दोनों में सुधार होता है. प्राकृतिक खेती में केंचुए तथा लाभकारी सूक्ष्मजीव पोषक तत्त्वों के पुनर्चक्रण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
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मल्चिंग की भूमिका
मल्चिंग प्राकृतिक खेती की एक मूलभूत तकनीक है, जिसका महत्त्व केवल मृदा में नमी संरक्षण एवं खरपतवार नियंत्रण तक सीमित नहीं है. फसल अवशेषों, सूखी पत्तियों, पुआल अथवा अन्य कार्बनिक पदार्थों से मृदा की सतह को ढकने से मृदा का तापमान संतुलित रहता है, वाष्पीकरण कम होता है तथा खरपतवारों का उगना नियंत्रित होता है. इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि मल्च मृदा में स्थिर नमी एवं संतुलित तापमान वाला अनुकूल सूक्ष्म वातावरण निर्मित करता है, जो लाभकारी मृदा सूक्ष्मजीवों की वृद्धि एवं सक्रियता को प्रोत्साहित करता है. ये सूक्ष्मजीव कार्बनिक अवशेषों के अपघटन को तीव्र करते हैं, जिससे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश तथा सूक्ष्म पोषक तत्त्वों सहित आवश्यक पोषक तत्त्व धीरे-धीरे मृदा में पौधों के लिए उपलब्ध होते हैं . अपघटन की यह प्रक्रिया मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाती है, मृदा संरचना में सुधार करती है, जल धारण क्षमता को बढ़ाती है तथा पोषक तत्त्वों के चक्रण को सक्रिय करती है. इस प्रकार, मल्चिंग केवल मृदा की सुरक्षा ही नहीं करती, बल्कि सूक्ष्मजीवों द्वारा संचालित पोषक तत्त्वों के रूपांतरण एवं उपलब्धता को भी बढ़ावा देती है, जिससे यह प्राकृतिक खेती में सतत पोषक तत्त्व प्रबंधन का एक प्रमुख घटक बन जाती है. साथ ही, यह मृदा की सतह को अपरदन एवं अत्यधिक वाष्पीकरण से भी सुरक्षित रखती है तथा सूक्ष्मजीवी सक्रियता के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनाए रखती है.
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फसल चक्र एवं दलहनी फसलों का समावेश
फसल चक्र अपनाने तथा दलहनी फसलों के समावेश से पोषक तत्त्वों का चक्रण तथा जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण बेहतर होता है. दलहनी फसलें अपनी जड़ों में उपस्थित राइजोबियम जीवाणुओं के साथ सहजीवी संबंध स्थापित कर वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती हैं. इससे बाहरी नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है तथा मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है.
इसके अतिरिक्त, अरहर जैसी दलहनी फसलों को खेत की मेड़ों अथवा बोर्डर फसल के रूप में उगाने से प्राकृतिक खेती में अनेक जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से पोषक तत्त्व प्रबंधन को सुदृढ़ किया जा सकता है. दलहनी फसल होने के कारण अरहर अपनी जड़ों की गांठों में राइजोबियम जीवाणुओं के साथ सहजीवी संबंध स्थापित करती है, जिससे मृदा में वायुमंडलीय नाइट्रोजन पौधों के लिए उपलब्ध होती है. यद्यपि इस नाइट्रोजन का अधिकांश भाग का उपयोग पौधे करते हैं परन्तु पत्तों के झड़ने तथा छंटाई से प्राप्त अवशेष नाइट्रोजन-समृद्ध कार्बनिक पदार्थ के रूप में पुनः मृदा में लौट आते हैं. इन अवशेषों का कार्बन-नाइट्रोजन अनुपात अधिकांश अनाज फसलों के अवशेषों की तुलना में अपेक्षाकृत कम होता है, जिसके कारण मृदा सूक्ष्मजीव इनका शीघ्र अपघटन कर देते हैं. अपघटन के दौरान पोषक तत्त्वों का खनिजीकरण होता है तथा वे मृदा में मुक्त होकर आगामी फसलों के लिए उपलब्ध हो जाते हैं. साथ ही, यह अतिरिक्त कार्बनिक पदार्थ सूक्ष्मजीवी सक्रियता को बढ़ाता है, मृदा संरचना में सुधार करता है तथा नमी संरक्षण को बेहतर बनाता है, जिससे पोषक तत्त्वों का निरंतर चक्रण बना रहता है. अतः खेत की मेड़ों पर अरहर का समावेश न केवल अन्यथा अनुपयोगी स्थान का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करता है, बल्कि उन जैविक प्रक्रियाओं को भी सुदृढ़ बनाता है जो दीर्घकाल तक मृदा की उर्वरता बनाए रखने में सहायक होती हैं.
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दलहनी एवं गैर-दलहनी फसलों की अंतरवर्तीय खेती
अंतरवर्तीय खेती प्राकृतिक खेती के प्रमुख सिद्धांतों में से एक है तथा पोषक तत्त्व प्रबंधन एवं मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है. अंतरवर्ती फसलों में दलहनी फसलों का समावेश विशेष रूप से लाभकारी होता है, क्योंकि ये अपनी जड़ों में राइजोबियम जीवाणुओं के साथ सहजीवी संबंध स्थापित कर वायुमंडलीय नाइट्रोजन को जैविक रूप से उपयोगी रूपों में स्थिर करती हैं. निम्नभूमि धान की खेती में अजोला का समावेश धान के लिए पोषक तत्त्वों का एक उत्कृष्ट प्राकृतिक स्रोत है.
यद्यपि स्थिर की गई अधिकांश नाइट्रोजन का उपयोग दलहनी फसल स्वयं अपनी वृद्धि के दौरान कर लेती है, फिर भी जड़ों से स्रावित पदार्थ, जड़ गांठें, गिरी हुई पत्तियाँ तथा फसल अवशेष कार्बनिक नाइट्रोजन के रूप में मृदा में योगदान करते हैं. सूक्ष्मजीवों द्वारा इनके अपघटन एवं पोषक तत्त्वों को पौधों द्वारा ग्रहण योग्य रूप में परिवर्तित करने के पश्चात यह नाइट्रोजन आगामी फसलों के लिए उपलब्ध हो जाती है. इसके अतिरिक्त, अंतरवर्ती फसलों की विविध जड़ प्रणालियाँ राइजोस्फीयर में विभिन्न प्रकार के कार्बन यौगिकों का स्राव करती हैं, जिससे विविध प्रकार के मृदा सूक्ष्मजीवों की वृद्धि एवं सक्रियता को बढ़ावा मिलता है. बढ़ी हुई सूक्ष्मजीवी सक्रियता कार्बनिक अवशेषों के अपघटन को तीव्र करती है, पोषक तत्त्वों के चक्रण में सुधार लाती है तथा स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों प्रकार के पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढ़ाती है. अंतरवर्तीय खेती के कारण मृदा की सतह निरंतर ढकी रहती है तथा विविध प्रकार के जैवभार का उत्पादन होता है, जिससे अपरदन द्वारा पोषक तत्त्वों का ह्रास कम होता है तथा मृदा में कार्बनिक पदार्थ का संचय बढ़ता है. इस प्रकार, दलहनी फसलों पर आधारित अंतरवर्तीय खेती न केवल पोषक तत्त्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ाती है, बल्कि प्राकृतिक खेती में सतत पोषक तत्त्व प्रबंधन के आधारभूत पारिस्थितिकीय तंत्रों को भी सुदृढ़ करती है.
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मृदा जैविक कार्बन का संरक्षण और पोषक तत्त्वों की घुलनशीलता बढ़ाना
प्राकृतिक खेती में प्रभावी पोषक तत्त्व प्रबंधन के लिए मृदा कार्बनिक कार्बन का निर्माण एवं संरक्षण अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. मृदा में कार्बनिक कार्बन की अधिक मात्रा जल धारण क्षमता, मृदा समुच्चयों की स्थिरता तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल आवास में वृद्धि करती है. परिणामस्वरूप पोषक तत्त्वों का संरक्षण बेहतर होता है, उनका अपव्यय कम होता है तथा पौधों द्वारा पोषक तत्त्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ती है.
प्राकृतिक खेती वायुमंडलीय नाइट्रोजन का जैविक स्थिरीकरण करने तथा फॉस्फोरस, पोटाश, जस्ता और लौह जैसे पोषक तत्त्वों को घुलनशील एवं पौधों के लिए उपलब्ध रूप में परिवर्तित करने वाले लाभकारी सूक्ष्मजीवों की वृद्धि और सक्रियता को प्रोत्साहित करती है. ये जैविक प्रक्रियाएँ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर हुए बिना ही पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढ़ाती हैं, जिससे पौधों को संतुलित पोषण प्राप्त होता है, मृदा की उर्वरता में सुधार होता है तथा कृषि प्रणाली अधिक टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल और संसाधन-कुशल बनती है.
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संतुलित पोषक तत्त्व चक्रण
प्राकृतिक खेती में पौध अवशेषों, पशु अपशिष्ट, जड़ जैवभार तथा सूक्ष्मजीवों द्वारा होने वाले अपघटन के माध्यम से पोषक तत्त्वों का निरंतर पुनर्चक्रण होता है. यह आंतरिक पोषक तत्त्व चक्रण निक्षालन तथा मृदा अपरदन के कारण होने वाली पोषक तत्त्वों की हानि को कम करता है तथा दीर्घकालीन मृदा उत्पादकता को बनाए रखने में सहायक होता है.
धान-आधारित उत्पादन प्रणालियों में ग्रीष्मकालीन फसल के रूप में मूंग का समावेश प्राकृतिक खेती में पोषक तत्त्व प्रबंधन की एक प्रभावी रणनीति है. रबी फसलों की कटाई के पश्चात अथवा खरीफ धान की बुवाई से पूर्व उपलब्ध परती अवधि में मूंग मृदा में उपलब्ध अवशिष्ट नमी तथा शेष संसाधनों का उपयोग करते हुए अल्प अवधि में पोषक तत्त्वों से समृद्ध जैवभार का उत्पादन करती है. दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में राइजोबियम जीवाणुओं के साथ सहजीवी संबंध स्थापित होता है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर उसे जड़ ग्रंथियों में कार्बनिक रूप में परिवर्तित करते हैं. यद्यपि इस स्थिरीकृत नाइट्रोजन का एक बड़ा भाग स्वयं फसल की वृद्धि एवं विकास में उपयोग हो जाता है, तथापि शेष नाइट्रोजन जड़ों, जड़ ग्रंथियों, पर्ण अवशेषों तथा कटाई के उपरांत बचे हुए फसल अवशेषों में संचित रहती है. इन अवशेषों को मृदा में मिलाने पर सूक्ष्मजीवों द्वारा उनका क्रमिक अपघटन होता है, जिससे उनमें निहित पोषक तत्त्व धीरे-धीरे पौधों के लिए उपलब्ध रूपों में परिवर्तित होते हैं. परिणामस्वरूप मृदा का पोषक तत्त्व भंडार समृद्ध होता है तथा आगामी धान की फसल को पर्याप्त पोषण प्राप्त होता है.
मूंग की जड़ों से स्रावित होने वाले जड़ स्राव राइजोस्फीयर में सूक्ष्मजीवी गतिविधियों को प्रोत्साहित करते हैं, जिससे कार्बनिक पदार्थों का अपघटन तीव्र होता है तथा पोषक तत्त्वों का चक्रण अधिक प्रभावी बनता है. इसके अतिरिक्त, मूंग के फसल अवशेषों को मृदा में मिलाने अथवा सतह पर बनाए रखने से मृदा कार्बनिक कार्बन की मात्रा में वृद्धि होती है तथा मृदा की जैविक सक्रियता बढ़ती है. इससे ऐसी अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं जो पोषक तत्त्वों के संरक्षण तथा उनकी उपलब्धता को अधिक प्रभावी बनाती हैं.
ग्रीष्मकाल की अन्यथा परती रहने वाली अवधि का उपयोग करते हुए मूंग न केवल मृदा अपरदन तथा खरपतवारों की वृद्धि के कारण होने वाली पोषक तत्त्वों की हानि को कम करती है, बल्कि जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से मृदा की उर्वरता को भी समृद्ध बनाती है. इस प्रकार, धान-आधारित प्राकृतिक खेती प्रणालियों में मूंग एक आदर्श घटक के रूप में कार्य करती है, जो संतुलित पोषक तत्त्व चक्रण तथा दीर्घकालीन मृदा स्वास्थ्य एवं कृषि स्थिरता को सुदृढ़ करती है.
चुनौतियाँ एवं भावी संभावनाएँ
यद्यपि प्राकृतिक खेती पर्यावरणीय एवं आर्थिक दृष्टि से अनेक महत्त्वपूर्ण लाभ प्रदान करती है, फिर भी रासायनिक से प्राकृतिक खेती अपनाने के दौरान, विशेषकर कम उर्वरता वाली मृदा अथवा सघन फसल प्रणाली वाले क्षेत्रों में, पर्याप्त पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. फसलों की प्रतिक्रिया जलवायु, मृदा के प्रकार, जैविक पदार्थों की उपलब्धता तथा प्रबंधन पद्धतियों के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है. इसलिए प्राकृतिक खेती प्रणालियों में उत्पादकता को बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक प्रमाणीकरण, स्थान-विशिष्ट पोषक तत्त्व प्रबंधन रणनीतियों तथा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैविक संसाधनों के समुचित एकीकरण की आवश्यकता होती है.
निष्कर्ष
पोषक तत्त्व प्रबंधन प्राकृतिक खेती की सफलता का आधारस्तंभ है. जैविक प्रक्रियाओं का प्रभावी उपयोग, जैविक संसाधनों का पुनर्चक्रण, सूक्ष्मजीवी विविधता को बढ़ावा तथा मृदा में जैविक पदार्थ की वृद्धि के माध्यम से प्राकृतिक खेती एक ऐसी आत्मनिर्भर कृषि प्रणाली का निर्माण करती है, जो मृदा के साथ-साथ पर्यावरणीय स्वास्थ्य का भी संरक्षण करती है. उपयुक्त प्रबंधन, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा सतत् नवाचार के माध्यम से प्राकृतिक खेती में पोषक तत्त्व प्रबंधन कृषि को अधिक अनुकूल, संसाधन-कुशल, सुरक्षित तथा दीर्घकालीन रूप से टिकाऊ बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकती है.
लेखकगण: शिवानी, अनुप दास, ग़ौस अली एवं उमेश कुमार मिश्र
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना
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