1. Home
  2. खेती-बाड़ी

दलहनी फसलें: प्रकृति का नाइट्रोजन कारखाना

दलहनी फसलें प्रकृति का नाइट्रोजन कारखाना हैं, जो राइजोबियम जीवाणुओं की सहायता से वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर मृदा उर्वरता बढ़ाती हैं. ये रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करती हैं, मृदा स्वास्थ्य सुधारती हैं, जैव विविधता को बढ़ावा देती हैं तथा फसल चक्र, अंतरवर्तीय खेती और हरित खाद के माध्यम से टिकाऊ, लाभकारी एवं पर्यावरण-अनुकूल कृषि को सशक्त बनाती हैं.

KJ Staff

खेत बचाओ अभियान मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, कृषि रसायनों के अत्यधिक उपयोग में कमी, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा तथा सतत् कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने पर बल देता है. दलहनी फसलों की खेती जलवायु-स्मार्ट कृषि में महत्वपूर्ण योगदान देती है, क्योंकि यह नाइट्रोजन उर्वरकों के निर्माण एवं उपयोग से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में सहायक होती है. इनकी भूमि को ढकने वाली प्रकृति मृदा अपरदन को कम करती है, खरपतवारों की वृद्धि को नियंत्रित करती है, मृदा में नमी संरक्षण करती है तथा लाभकारी कीटों और मृदा सूक्ष्मजीवों को सहारा देकर जैव विविधता को बढ़ावा देती है. वायुमंडलीय नाइट्रोजन को राइजोबियम जीवाणुओं के साथ सहजीवी संबंध के माध्यम से स्थिर करने की अपनी विशिष्ट क्षमता के कारण दलहनी फसलों को उचित रूप से “प्रकृति का नाइट्रोजन कारखाना” कहा जाता है. यह प्राकृतिक प्रक्रिया मृदा उर्वरता को समृद्ध करती है, रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों पर निर्भरता को कम करती है तथा सतत फसल उत्पादन में योगदान देती है. नाइट्रोजन स्थिरीकरण के अतिरिक्त, दलहनी फसलें मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाकर, मृदा संरचना में सुधार कर, लाभकारी सूक्ष्मजीवी गतिविधियों को प्रोत्साहित कर तथा पोषक तत्वों के चक्रण को बेहतर बनाकर मिट्टी के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में सुधार करती हैं.

वर्तमान फसल प्रणालियों में दलहनी फसलों को फसल चक्र अथवा अनाज/मोटे अनाज (मिलेट्स) के साथ अंतरवर्तीय खेती के रूप में शामिल करना कृषि की स्थिरता बढ़ाने का एक प्रभावी एवं प्राकृतिक उपाय है. दलहनी फसलें जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से समग्र मृदा उर्वरता में सुधार करती हैं, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करती हैं तथा क्षरित मृदाओं के पुनर्स्थापन में सहायता करती हैं. मानव उपभोग के लिए पोषक तत्वों से भरपूर दाने प्रदान करने के अतिरिक्त, दलहनी फसलें सब्जी, पशु आहार तथा हरी खाद फसलों के रूप में भी बहुउद्देशीय उपयोग रखती हैं. इनकी खेती ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी तथा मृदा स्वास्थ्य सुधार में भी योगदान देती है. इसके अतिरिक्त, अधिकांश अनाज फसलों की तुलना में दलहनी फसलों की खेती की लागत अपेक्षाकृत कम होती है तथा ये प्राकृतिक एवं जैविक कृषि प्रणालियों के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं. लोबिया, सेम, सब्जी मटर, सब्जी सोयाबीन, फ्रेंच बीन आदि जैसी सब्जी दलहनी फसलें न केवल प्रोटीन युक्त सब्जियाँ एवं हरी फलियाँ प्रदान करती हैं, बल्कि उत्कृष्ट आच्छादन फसलों के रूप में कार्य करते हुए मृदा एवं जल संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं. इस प्रकार, फसल प्रणालियों में दलहनी फसलों का समावेश एक साथ उत्पादकता, लाभप्रदता तथा पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो सकता है.

दलहनी फसलों द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण

दलहनी फसलें अपनी जड़ों में बनने वाली गांठों (रूट नोड्यूल्स) में उपस्थित राइजोबियम जीवाणुओं के साथ सहजीवी संबंध के माध्यम से वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती हैं. ये जीवाणु पौधों की जड़ों को संक्रमित कर गांठों का निर्माण करते हैं, जहाँ वे नाइट्रोजिनेज एंजाइम की सहायता से वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अमोनिया (NH₃) में परिवर्तित करते हैं. पौधे इस अमोनिया का उपयोग अपनी वृद्धि एवं विकास के लिए करते हैं, जबकि जीवाणुओं को पौधों से कार्बोहाइड्रेट तथा ऊर्जा प्राप्त होती है. यह प्रक्रिया, जिसे जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण कहा जाता है, मृदा की उर्वरता को समृद्ध बनाती है तथा नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता को कम करती है.

 

तालिका : दलहनी फसलों द्वारा मृदा में नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता

दलहनी फसल

नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता (कि.ग्रा./हेक्टेयर)

दलहनी फसल

नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता (कि.ग्रा./हेक्टेयर)

मूंगफली (Groundnut)

150–200

मूंग (Greengram)

19–54

अरहर (Pigeon pea)

120–170

राजमा (Common bean)

20–60

मटर (Pea)

90–128

बाकला/फावा बीन (Faba bean)

23–79

सोयाबीन (Soybean)

71–108

लोबिया (Cowpea)

14–35

चना (Chickpea)

64–103

राइस बीन (Rice bean)

13–30

उड़द (Blackgram)

16–79

मसूर (Lentil)

8–14

सनई (Sunhemp)

100–200

 

मृदा उर्वरता में दलहनी फसलों की भूमिका

  • राइजोबियम जीवाणुओं के साथ सहजीवी संबंध स्थापित कर वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती हैं.

  • नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता कम करती हैं, जिससे उत्पादन लागत घटती है.

  • फसल चक्र में अगली फसलों के लिए अवशिष्ट नाइट्रोजन उपलब्ध कराती हैं.

  • पत्तियों, जड़ों तथा फसल अवशेषों के माध्यम से मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाती हैं.

  • मृदा कणों के समुच्चयन (Aggregation) को बढ़ाकर मृदा संरचना में सुधार तथा संघनन (Compaction) को कम करती हैं.

  • जल अवशोषण एवं जल धारण क्षमता में वृद्धि करती हैं.

  • लाभकारी जीवाणुओं एवं कवकों सहित मृदा सूक्ष्मजीव गतिविधियों को प्रोत्साहित करती हैं.

  • फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर एवं कैल्शियम जैसे पोषक तत्वों के घुलनशीलन, पुनर्चक्रण एवं उपलब्धता में सहायता करती हैं.

  • मृदा में कार्बन बढ़ाकर दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाती हैं.

  • बेहतर भूमि आवरण और जड़ों के जाल के कारण मृदा अपरदन को कम करती हैं.

  • धान, गेहूँ एवं मक्का जैसी अनाज फसलों सहित अनुवर्ती फसलों की उत्पादकता में वृद्धि करती हैं.

  • रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाकर सतत एवं पर्यावरण-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देती हैं.

  • गहरी मृदा परतों से पोषक तत्वों को अवशोषित कर सतह के निकट लाती हैं, जिससे वे अन्य फसलों के लिए उपलब्ध हो जाते हैं.

  • उर्वरकों के कम उपयोग के कारण ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में कमी लाने में योगदान देती हैं.

दलहनी फसलों की प्रमुख फसल प्रणालियाँ

दलहनी फसलें मृदा उर्वरता में सुधार, कृषि प्रणाली की उत्पादकता बढ़ाने तथा टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. इन्हें विभिन्न फसल प्रणालियों में निम्नलिखित प्रकार से सम्मिलित किया जाता है:

फसल चक्र: चना, मसूर तथा मूंग जैसी दलहनी फसलों को धान, गेहूँ और मक्का जैसी अनाज फसलों के साथ फसल चक्र में उगाया जाता है. इससे मृदा में नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ती है तथा कीट एवं रोगों के चक्र को तोड़ने में सहायता मिलती है.

अंतरवर्तीय खेती: दलहनी फसलों को गैर-दलहनी फसलों के साथ उगाया जाता है, जैसे अरहर + मक्का (2:4) तथा सोयाबीन + ज्वार (4:2) .  इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है और कुल उत्पादकता में वृद्धि होती है.

क्रमिक फसल प्रणाली: धान–चना तथा गेहूँ–मूंग जैसी प्रणालियों में दलहनी फसलों को अनाज फसलों के बाद उगाया जाता है, जिससे मृदा में उपलब्ध अवशिष्ट नमी और पोषक तत्वों का प्रभावी उपयोग किया जा सकता है.

मिश्रित खेती: दलहनी फसलों को अन्य फसलों के साथ मिलाकर उगाया जाता है, जिससे उत्पादन जोखिम कम होता है तथा उपज की स्थिरता में सुधार होता है.

आच्छादन फसल: लोबिया, सेम तथा सोयाबीन जैसी तीव्र वृद्धि वाली और भूमि को अच्छी तरह ढकने वाली दलहनी फसलों का उपयोग आवरण फसल के रूप में किया जाता है. ये मृदा अपरदन को रोकती हैं, खरपतवारों को दबाती हैं तथा मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाती हैं.

हरित खाद: ढैंचा और सनई जैसी दलहनी फसलों को पुष्पन से पूर्व मिट्टी में पलट दिया जाता है, जिससे मृदा में कार्बनिक पदार्थ तथा जैविक रूप से स्थिर नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है.

संरक्षण कृषि आधारित उत्पादन प्रणालियाँ: दलहनी फसलें शून्य जुताई तथा फसल अवशेष संरक्षण प्रणालियों में अच्छी तरह समाहित होती हैं. ये मृदा स्वास्थ्य, पोषक तत्वों के चक्रण तथा संसाधन संरक्षण में योगदान देती हैं.

मेड़ों पर दलहनी फसल: अरहर जैसी दलहनी फसल को खेत की मेड़ों एवं सीमाओं पर उगाया जाता है. इससे अतिरिक्त प्रोटीनयुक्त अनाज प्राप्त होता है तथा पत्तियों के गिरने और नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मृदा उर्वरता में सुधार होता है.

निष्कर्ष

फसल प्रणालियों में दलहनी फसलों को फसल चक्र, अंतरवर्तीय खेती, क्रमिक फसल प्रणाली, मिश्रित खेती, आच्छादन फसल तथा हरित खाद के रूप में शामिल करने से अनेक कृषिगत, आर्थिक एवं पर्यावरणीय लाभ प्राप्त होते हैं. दलहनी फसलें मृदा उर्वरता एवं स्वास्थ्य में सुधार करती हैं, रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करती हैं, संसाधनों के उपयोग की दक्षता बढ़ाती हैं तथा कृषि उत्पादन को अधिक टिकाऊ बनाती हैं. इसके परिणामस्वरूप किसानों की आय, आजीविका सुरक्षा एवं समग्र समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान मिलता है.

लेखकगण: राकेश कुमार एवं अनुप दास
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना

English Summary: Pulse crops natures nitrogen factory for soil health and sustainable farming Published on: 19 June 2026, 06:43 PM IST

Like this article?

Hey! I am KJ Staff. Did you liked this article and have suggestions to improve this article? Mail me your suggestions and feedback.

Share your comments

हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें. कृषि से संबंधित देशभर की सभी लेटेस्ट ख़बरें मेल पर पढ़ने के लिए हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें.

Subscribe Newsletters

Latest feeds

More News