संतुलित पादप पोषण सतत् कृषि उत्पादन के लिए अत्यंत आवश्यक है. यद्यपि नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस पर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान दिया जाता है, परंतु पोटाश (K) को वह महत्त्व नहीं मिल पाता, जबकि स्थायी उत्पादकता एवं मृदा स्वास्थ्य बनाए रखने में इसकी भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण है. देशभर में किए गए हालिया मृदा परीक्षणों से पता चलता है कि भारत की लगभग एक-तिहाई (करीब 32%) मृदा में उपलब्ध पोटाश की कमी है. इसका प्रमुख कारण निरंतर पोषक तत्त्वों का दोहन, सघन फसल प्रणाली, फसल अवशेषों को खेत से हटाना तथा पोटाश की अपर्याप्त पूर्ति है, जिसके परिणामस्वरूप पोटाश की कमी लगातार बढ़ रही है. पोटाश की कमी से फसल की उपज घटती है, उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित होती है तथा फसल की सूखा, कीट एवं रोगों के प्रति सहनशीलता कम हो जाती है.
अजैविक उर्वरकों, जैविक पोषक स्रोतों तथा पोटाश-घुलनशील जैव उर्वरकों के समन्वित उपयोग पर आधारित पोषण प्रबंधन एक प्रभावी, किफायती एवं पर्यावरण-अनुकूल रणनीति है. यह न केवल फसल उत्पादकता को बनाए रखने में सहायक है, बल्कि मृदा की उर्वरता एवं दीर्घकालिक स्वास्थ्य में भी सुधार करता है.
पोटाश क्यों आवश्यक है?
पोटाश पौधों के लिए आवश्यक तीन प्रमुख महापोषक तत्त्वों में से एक है. नाइट्रोजन के विपरीत, यह पौधों के ऊतकों का संरचनात्मक भाग नहीं बनता, बल्कि अनेक महत्वपूर्ण शारीरिक एवं जैवरासायनिक प्रक्रियाओं का नियमन करता है.
पर्याप्त पोटाश पोषण से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं-
-
प्रकाश संश्लेषण तथा कार्बोहाइड्रेट के निर्माण में वृद्धि होती है.
-
जल उपयोग दक्षता तथा सूखा सहनशीलता में सुधार होता है.
-
तने अधिक मजबूत बनते हैं तथा फसल के गिरने की संभावना कम होती है.
-
पोषक तत्त्वों के अवशोषण एवं उनके स्थानांतरण में वृद्धि होती है.
-
कीटों एवं रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.
-
दानों के भराव, फलों की गुणवत्ता, रंग, आकार तथा भंडारण क्षमता में सुधार होता है.
-
अधिक तापमान, कम तापमान, लवणीयता तथा अन्य प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता बढ़ती है.
इन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों के कारण पोटाश को प्रायः "गुणवत्ता का पोषक तत्त्व" अथवा "तनाव प्रबंधन पोषक तत्त्व" भी कहा जाता है.
पोटाश की कमी के लक्षण
पोटाश एक गतिशील पोषक तत्त्व है, इसलिए इसकी कमी के लक्षण सामान्यतः सबसे पहले पुरानी पत्तियों पर दिखाई देते हैं.
पोटाश की कमी के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं-
-
पत्तियों के किनारों का पीला पड़ना तथा झुलसना.
-
पत्तियों के किनारों का भूरा एवं जला हुआ दिखाई देना.
-
तनों का कमजोर होना तथा फसल के गिरने की संभावना बढ़ जाना.
-
जड़ों का अपर्याप्त विकास.
-
दानों अथवा फलों का आकार छोटा रह जाना.
-
सूखा एवं रोगों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाना.
-
फसल की उपज में कमी तथा उत्पाद की गुणवत्ता में गिरावट.
पोटाश के स्रोत
-
अजैविक स्रोत
रासायनिक उर्वरक फसलों को शीघ्र उपलब्ध होने वाला पोटाश प्रदान करते हैं.
प्रमुख पोटाश उर्वरक निम्नलिखित हैं—
|
उर्वरक |
पोटाश (K₂O) की मात्रा |
|
म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) |
60% |
|
सल्फेट ऑफ पोटाश (SOP) |
50% |
|
पोटेशियम नाइट्रेट |
44% |
|
पोटेशियम मैग्नीशियम सल्फेट |
22–30% |
इनमें म्यूरेट ऑफ पोटाश सर्वाधिक प्रचलित उर्वरक है, क्योंकि इसमें पोटाश की सांद्रता अधिक होती है तथा इसकी लागत अपेक्षाकृत कम होती है. हालांकि, क्लोराइड के प्रति संवेदनशील फसलें, जैसे आलू, तंबाकू, अंगूर तथा कुछ फल फसलें, सल्फेट ऑफ पोटाश के प्रयोग से बेहतर प्रतिक्रिया देती हैं.
-
जैविक स्रोत (Organic Sources)
कार्बनिक पदार्थ धीरे-धीरे पोटाश उपलब्ध कराते हैं तथा साथ ही मृदा के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में भी सुधार करते हैं.
पोटाश के प्रमुख कार्बनिक स्रोत निम्नलिखित हैं—
-
गोबर खाद
-
कम्पोस्ट
-
वर्मीकम्पोस्ट
-
फसल अवशेष
-
हरी खाद एवं हरी पत्ती की खाद
-
कुक्कुट
-
प्रेसमड
-
लकड़ी की राख
-
केले के छद्म तने से निर्मित कम्पोस्ट
-
गन्ने की पत्तियों से निर्मित कम्पोस्ट
यद्यपि जैविक स्रोतों में रासायनिक उर्वरकों की तुलना में पोटाश की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है, फिर भी इनके नियमित उपयोग से मृदा में कार्बनिक पदार्थ एवं सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है, जिससे पोटाश की उपलब्धता में सुधार होता है.
-
पोटाश जैव उर्वरक
मृदा में उपस्थित पोटाश का एक बड़ा भाग खनिजों के भीतर बंधा रहता है, जो फसलों के लिए सीधे उपलब्ध नहीं होता. पोटाश-घुलनशील सूक्ष्मजीव इन अनुपलब्ध रूपों को घुलनशील बनाकर पौधों के लिए उपलब्ध पोटाश में परिवर्तित करते हैं.
प्रमुख पोटाश-घुलनशील सूक्ष्मजीव निम्नलिखित हैं—
-
बेसिलस म्यूसिलेजिनोसस
-
बेसिलस सर्कुलैन्स
-
फ्रेट्यूरिया ऑरैंटिया
-
पैनीबैसिलस प्रजाति
-
स्यूडोमोनास प्रजाति
ये लाभकारी सूक्ष्मजीव जैविक अम्लों एवं अन्य जैव सक्रिय यौगिकों का स्राव करते हैं, जो फेल्डस्पार (Feldspar) एवं अभ्रक (Mica) जैसे पोटाश-युक्त खनिजों को घुलनशील बनाकर उनमें विद्यमान पोटाश को पौधों के लिए उपलब्ध कराते हैं.
समन्वित पोटाश प्रबंधन
केवल रासायनिक उर्वरकों अथवा केवल जैविक स्रोतों के उपयोग से दीर्घकाल तक मृदा की उर्वरता बनाए रखना संभव नहीं है. इसलिए समन्वित पोषक तत्त्व प्रबंधन अपनाने की अनुशंसा की जाती है.
एक प्रभावी पोटाश प्रबंधन रणनीति में निम्नलिखित उपाय शामिल हैं—
-
मृदा परीक्षण की अनुशंसाओं के आधार पर पोटाश उर्वरकों का प्रयोग करें.
-
बुवाई से पूर्व गोबर खाद, कम्पोस्ट अथवा वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग करें.
-
फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका पुनर्चक्रण करें.
-
बीजोपचार अथवा मृदा में प्रयोग के समय पोटाश-घुलनशील जैव उर्वरकों का उपयोग करें.
-
नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश का संतुलित मात्रा में प्रयोग करें.
-
पोटाश के बेहतर अवशोषण के लिए मृदा में उपयुक्त नमी बनाए रखें.
-
फसल चक्र तथा विविधीकृत फसल प्रणाली अपनाएँ.
-
खेत में कम-से-कम 30% फसल अवशेष सुरक्षित रखें तथा उन्हें जलाने से बचें.
प्रयोग की विधि
- अजैविक उर्वरक
पोटाश उर्वरकों का प्रयोग बुवाई अथवा रोपाई से पूर्व आधार (बेसल) मात्रा के रूप में करें.
- हल्की बनावट (बलुई) वाली मृदाओं में पोटाश का विभाजित मात्रा (स्प्लिट डोज) में प्रयोग करने से इसकी उपयोग दक्षता बढ़ सकती है.
- जड़ों के समीप पट्टी (बैंड) विधि से उर्वरक देने पर पोषक तत्त्वों की हानि कम होती है.
- जैविक स्रोत
- भूमि की तैयारी के समय प्रति हेक्टेयर 5–10 टन गोबर की सड़ी हुई खाद (एफ.वाई.एम.) अथवा कम्पोस्ट का प्रयोग करें.
- कार्बनिक खादों को उचित अपघटन (विघटन) के लिए बुवाई से कम-से-कम 2–3 सप्ताह पहले मृदा में अच्छी तरह मिला दें.
- पोटाश जैव उर्वरक
- बुवाई से पूर्व अनुशंसित पोटाश-घुलनशील जैव उर्वरक से बीजोपचार करें.
- वैकल्पिक रूप से, जैव उर्वरक को अच्छी तरह सड़ी हुई कम्पोस्ट अथवा गोबर खाद में मिलाकर जड़ों के समीप मृदा में प्रयोग करें.
- जैव उर्वरकों को रासायनिक कीटनाशकों अथवा फफूंदनाशकों के साथ सीधे न मिलाएँ.
सावधानियाँ
- पोटाश का प्रयोग सदैव मृदा परीक्षण की अनुशंसाओं के आधार पर करें.
- पोटाश का अत्यधिक प्रयोग न करें, क्योंकि इससे मैग्नीशियम एवं कैल्शियम के अवशोषण में बाधा उत्पन्न हो सकती है.
- केवल अच्छी तरह सड़ी हुई कार्बनिक खादों का ही उपयोग करें.
- जैव उर्वरकों का भंडारण ठंडी एवं छायादार जगह पर करें.
- जैव उर्वरकों का प्रयोग उनकी समाप्ति तिथि से पहले ही करें.
- जैव उर्वरकों को सीधे सूर्य के प्रकाश के संपर्क में न आने दें.
- जैव उर्वरकों के प्रयोग के बाद मृदा में पर्याप्त नमी बनाए रखें.
- केवल एक ही स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय जैविक, अजैविक तथा जैव-आधारित स्रोतों का समन्वित उपयोग करें.
निष्कर्ष
अजैविक उर्वरकों, जैविक खादों तथा पोटाश-घुलनशील जैव उर्वरकों के समन्वित उपयोग पर आधारित पोटाश प्रबंधन फसलों को संतुलित पोषण प्रदान करने के साथ-साथ मृदा की दीर्घकालिक उर्वरता बनाए रखने का प्रभावी उपाय है. यह पद्धति फसल उत्पादकता एवं उत्पाद की गुणवत्ता में वृद्धि करती है, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करती है तथा सतत् एवं जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देती है.
लेखकगण: सोनका घोष, आशुतोष उपाध्याय एवं अनुप दास
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना
Share your comments