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सूक्ष्म पोषक तत्त्व: केवल एनपीके नहीं, संतुलित पोषण भी आवश्यक

सूक्ष्म पोषक तत्त्व (जस्ता, लोहा, बोरॉन, मैंगनीज, मोलिब्डेनम आदि) फसलों की स्वस्थ वृद्धि, उच्च उपज और बेहतर गुणवत्ता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं. संतुलित पोषण, मृदा परीक्षण, जैविक खादों तथा वैज्ञानिक उर्वरक प्रबंधन से इनकी कमी दूर कर मृदा स्वास्थ्य, उर्वरक उपयोग दक्षता, उत्पादकता और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा दिया जा सकता है.

KJ Staff

उर्वरकों के प्रयोग मात्र से अधिक उत्पादन सुनिश्चित नहीं किया जा सकता, जब तक कि पौधों को उनकी आवश्यकता के अनुसार सभी आवश्यक पोषक तत्त्व उचित अनुपात में उपलब्ध न हों. यद्यपि प्राथमिक पोषक तत्त्वों (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश) पर किसानों का विशेष ध्यान रहता है, किन्तु द्वितीयक पोषक तत्त्वों (कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं गंधक (सल्फर)) तथा सूक्ष्म पोषक तत्त्वों, जैसे—जस्ता (Zn), लोहा (Fe), मैंगनीज (Mn), ताँबा (Cu), बोरॉन (B), मोलिब्डेनम (Mo), क्लोरीन (Cl) एवं निकेल (Ni) की प्रायः उपेक्षा की जाती है. सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की आवश्यकता पौधों को बहुत ही कम मात्रा में होती है, किन्तु इष्टतम उत्पादन के लिए इनका महत्त्व समान रूप से अनिवार्य है. ये पौधों की विभिन्न जैविक क्रियाओं के सुचारु संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ये एंजाइमों को सक्रिय करते हैं, हरितलवक (क्लोरोफिल) के निर्माण को प्रोत्साहित करते हैं, प्रकाश संश्लेषण में सहायता करते हैं, पुष्पन एवं फल बनने की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं, दानों के समुचित भराव में योगदान देते हैं, पौधों की कीट एवं रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करते हैं तथा उन्हें विभिन्न पर्यावरणीय प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने में सक्षम बनाते हैं. यदि किसी एक भी सूक्ष्म पोषक तत्त्व की कमी हो जाए, तो नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होने पर भी फसल की वृद्धि एवं उपज में उल्लेखनीय कमी आ सकती है. इस स्थिति को प्रायः पौधों की "छिपी हुई भूख" कहा जाता है, क्योंकि इसकी कमी के लक्षण तुरंत दिखाई नहीं देते, किन्तु फसल की उत्पादकता एवं गुणवत्ता प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती रहती है.

उच्च उपज देने वाली फसल किस्मों के बढ़ते उपयोग, सघन फसल प्रणाली, असंतुलित उर्वरक प्रयोग तथा मृदा में जैविक पदार्थ की निरंतर घटती मात्रा के कारण अनेक कृषि क्षेत्रों में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों, विशेषकर जस्ता (Zn), बोरॉन (B), लोहा (Fe) एवं मैंगनीज (Mn) की कमी व्यापक रूप से देखी जा रही है. अतः स्थूल (मैक्रो) एवं सूक्ष्म पोषक तत्त्वों के बीच अंतर केवल पौधों द्वारा आवश्यक मात्रा का है, उनके महत्त्व का नहीं. सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी का समय पर निदान एवं उचित सुधारात्मक उपाय अपनाकर उपज में होने वाली उल्लेखनीय हानि को रोका जा सकता है. इसलिए संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन केवल एन.पी.के. उर्वरकों तक सीमित न रखकर, द्वितीयक एवं सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की पर्याप्त उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी चाहिए.

फसलों के लिए प्रमुख सूक्ष्म पोषक तत्त्व

प्रत्येक सूक्ष्म पोषक तत्त्व पौधों में एक विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण कार्य करता है तथा इनमें से किसी एक की भी कमी फसल की वृद्धि, उपज एवं उत्पाद की गुणवत्ता को सीमित कर सकती है.

जस्ता (Zn): वृद्धि को प्रोत्साहित करने वाला पोषक तत्त्व

जस्ता भारतीय मृदा में सर्वाधिक कमी वाले सूक्ष्म पोषक तत्त्वों में से एक है. यह एंजाइमों की सक्रियता, प्रोटीन संश्लेषण, हरितलवक (क्लोरोफिल) के निर्माण तथा पादप वृद्धि हार्मोनों के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है. जस्ता की पर्याप्त उपलब्धता जड़ों के सुदृढ़ विकास, अनाज वाली फसलों में स्वस्थ कल्ले बनने तथा दानों के बेहतर विकास को प्रोत्साहित करती है. यह पौधों द्वारा नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस के अधिक दक्षतापूर्वक उपयोग में भी सहायता करता है, जिससे उर्वरकों के उपयोग की दक्षता बढ़ती है तथा फसल की उत्पादकता में सुधार होता है.

लोहा (Fe): हरितिमा प्रदान करने वाला पोषक तत्त्व

लोहा पौधों में हरितलवक (क्लोरोफिल) के निर्माण तथा कोशिकाओं के भीतर ऊर्जा के स्थानांतरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यद्यपि यह स्वयं हरितलवक का घटक नहीं है, फिर भी इसके निर्माण के लिए अनिवार्य है. लोहा श्वसन एवं प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रियाओं में भी सहायक होता है, जिससे पौधे सूर्य के प्रकाश को दक्षतापूर्वक भोजन में परिवर्तित कर पाते हैं. लोहे की पर्याप्त उपलब्धता फसलों को हरा-भरा, स्वस्थ तथा अधिक जैवभार उत्पादन करने में सक्षम बनाए रखती है.

बोरॉन (B): प्रजनन विकास का पोषक तत्त्व

बोरॉन पुष्पन, परागकणों के अंकुरण, फल बनने, बीज विकास तथा पौधों के भीतर शर्करा के परिवहन के लिए अत्यंत आवश्यक है. यह कोशिका भित्तियों को सुदृढ़ बनाता है तथा पत्तियों से विकसित हो रहे फलों एवं दानों तक कार्बोहाइड्रेट के संचरण को भी बेहतर बनाता है. बोरॉन की कमी होने पर फसलों में पुष्पन कम होना, फूलों का झड़ना, तनों अथवा फलों का खोखला होना तथा बीज निर्माण में कमी जैसी समस्याएँ दिखाई देती हैं, जिससे उपज एवं गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं.

मैंगनीज (Mn): प्रकाश संश्लेषण को सक्रिय करने वाला पोषक तत्त्व

मैंगनीज प्रकाश संश्लेषण, श्वसन तथा नाइट्रोजन उपापचय (मेटाबॉलिज्म) से संबंधित अनेक एंजाइमों को सक्रिय करता है. यह हरितलवक (क्लोरोफिल) के निर्माण में योगदान देता है तथा पौधों को अवशोषित पोषक तत्त्वों का अधिक दक्षतापूर्वक उपयोग करने में सहायता करता है. मैंगनीज की पर्याप्त उपलब्धता पौधों की स्फूर्ति बढ़ाती है, स्वस्थ पत्ती विकास को प्रोत्साहित करती है तथा विभिन्न पर्यावरणीय प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति उनकी सहनशीलता में वृद्धि करती है.

मोलिब्डेनम (Mo): नाइट्रोजन प्रबंधन का पोषक तत्त्व

यद्यपि मोलिब्डेनम की आवश्यकता पौधों को अत्यंत अल्प मात्रा में होती है, फिर भी यह नाइट्रोजन उपापचय के लिए अनिवार्य है. यह नाइट्रेट रिडक्टेज तथा नाइट्रोजनेज एंजाइमों का अभिन्न घटक है, जो पौधों को नाइट्रेट को उपयोगी रूप में परिवर्तित करने तथा दलहनी फसलों में जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया को सुचारु रूप से संचालित करने में सक्षम बनाते हैं. मोलिब्डेनम की पर्याप्त उपलब्धता जड़ों में ग्रंथियों (नोड्यूल) के बेहतर विकास, नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में वृद्धि तथा विशेष रूप से दलहनी फसलों में स्वस्थ पौध वृद्धि को प्रोत्साहित करती है.

सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी के लक्षण

सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी सामान्यतः धीरे-धीरे विकसित होती है और प्रारम्भिक अवस्था में प्रायः ध्यान में नहीं आती. किसान अक्सर इन लक्षणों को कीट प्रकोप, रोग संक्रमण, सूखे के प्रभाव अथवा उर्वरकों की कमी समझ बैठते हैं. सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी के कारण सामान्यतः फसल की कमजोर वृद्धि, बौनापन, पत्तियों का पीला पड़ना (क्लोरोसिस), पत्तियों के अग्रभाग अथवा किनारों का सूखना, पुष्पन में विलंब, फल अथवा दानों का कम बनना, पौधों के विभिन्न भागों का विकृत होना तथा बीज की गुणवत्ता में कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. ये लक्षण पौधे में सर्वप्रथम कहाँ प्रकट होंगे, यह उस पोषक तत्त्व की पौधे के भीतर गतिशीलता पर निर्भर करता है. लोहा एवं बोरॉन जैसे अपेक्षाकृत कम गतिशील पोषक तत्त्वों की कमी के लक्षण सामान्यतः सबसे पहले नई पत्तियों एवं वृद्धि बिंदुओं पर दिखाई देते हैं, जबकि अधिक गतिशील पोषक तत्त्वों की कमी के लक्षण प्रायः पुरानी पत्तियों पर पहले दिखाई देते हैं.

जस्ता (Zn) की कमी: जस्ता की कमी होने पर पौधों की वृद्धि रुक जाती है तथा पर्व (Internodes) की लंबाई कम हो जाती है, जिससे पौधे का स्वरूप रोसेट (Rosette) जैसा दिखाई देता है. नई पत्तियाँ सामान्य से छोटी रह जाती हैं तथा विशेष रूप से धान एवं मक्का जैसी अनाज फसलों में शिराओं के बीच हल्के पीले अथवा सफेद रंग की पट्टियाँ विकसित हो जाती हैं. कल्लों की संख्या कम हो जाती है, जिससे दानों का विकास प्रभावित होता है तथा उपज में कमी आती है.

लोहा (Fe) की कमी: लोहे की कमी का प्रमुख लक्षण नई पत्तियों में शिराओं के बीच क्लोरोसिस का दिखाई देना है. इस अवस्था में पत्तियों की शिराएँ हरी बनी रहती हैं, जबकि उनके बीच का ऊतक हल्का पीला अथवा लगभग सफेद हो जाता है. गंभीर स्थिति में पत्तियाँ पूर्णतः श्वेत (Bleached) हो सकती हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण की क्षमता घट जाती है तथा पौधों की वृद्धि कमजोर पड़ जाती है.

बोरॉन (B) की कमी: बोरॉन वृद्धिशील ऊतकों एवं प्रजनन विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है, इसलिए इसकी कमी का प्रभाव सबसे पहले वृद्धि बिंदुओं पर दिखाई देता है. इसके प्रमुख लक्षणों में शीर्ष कलिका (Terminal Bud) का सूख जाना, पुष्पन में कमी, फूलों का झड़ना, फल अथवा दानों का विकृत होना, कुछ फसलों में तनों अथवा फलों का खोखला होना तथा बीज निर्माण में कमी शामिल हैं. इसके अतिरिक्त जड़ों का विकास भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है.

मैंगनीज (Mn) की कमी: मैंगनीज की कमी होने पर नई अथवा हाल ही में विकसित हुई पत्तियों में शिराओं के बीच हल्के हरे से पीले रंग का क्लोरोसिस दिखाई देता है. बाद में प्रभावित पत्तियों पर छोटे-छोटे भूरे अथवा धूसर (Grey) रंग के धब्बे विकसित हो सकते हैं, जिससे पत्तियाँ चितकबरी दिखाई देने लगती हैं. इससे प्रकाश संश्लेषण की क्षमता घट जाती है तथा पौधों की स्फूर्ति एवं वृद्धि प्रभावित होती है.

मोलिब्डेनम (Mo) की कमी: मोलिब्डेनम की कमी मुख्यतः नाइट्रोजन उपापचय को प्रभावित करती है. इसकी कमी होने पर पौधों में नाइट्रोजन की कमी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, जैसे—पत्तियों का हल्का हरा पड़ना, कमजोर वृद्धि तथा पौधों की स्फूर्ति में कमी. दलहनी फसलों में जड़ों की ग्रंथियों का विकास तथा जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण उल्लेखनीय रूप से घट जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उपज कम हो जाती है. फूलगोभी में इसकी गंभीर कमी होने पर "व्हिपटेल" नामक विशिष्ट लक्षण दिखाई देता है, जिसमें पत्तियाँ अत्यधिक संकरी एवं विकृत हो जाती हैं.

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इसी प्रकार के लक्षण सूखा, जलभराव, रोगों अथवा प्रमुख पोषक तत्त्वों की कमी के कारण भी उत्पन्न हो सकते हैं. इसलिए किसानों को केवल दृश्य लक्षणों के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए. जहाँ तक संभव हो, मृदा परीक्षण एवं पादप ऊतक विश्लेषण द्वारा पोषक तत्त्व की कमी की पुष्टि करने के बाद ही अनुशंसित सूक्ष्म पोषक तत्त्व का उचित मात्रा एवं उपयुक्त विधि से प्रयोग करना चाहिए.

सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का प्रबंधन

चूँकि सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की आवश्यकता मृदा के प्रकार, फसल तथा प्रबंधन पद्धतियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है, इसलिए किसानों को सूक्ष्म पोषक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग करने के बजाय संतुलित एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए.

उर्वरकों के प्रयोग से पहले अपनी मृदा को जानें: सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी के प्रभावी प्रबंधन का पहला चरण मृदा की पोषक तत्त्व स्थिति का सही आकलन करना है. नियमित मृदा परीक्षण से कमी वाले पोषक तत्त्वों की पहचान की जा सकती है, जिससे किसान केवल उन्हीं सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का प्रयोग कर सकते हैं जिनकी वास्तव में आवश्यकता है.

मृदा में जैविक पदार्थ की मात्रा बनाए रखें: अच्छी तरह गोबर खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद, फसल अवशेष तथा अन्य जैविक स्रोत मृदा की संरचना में सुधार करते हैं तथा सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढ़ाते हैं. ये मृदा की जलधारण क्षमता, सूक्ष्मजीवी गतिविधियों एवं पोषक तत्त्वों के संतुलन को भी बेहतर बनाते हैं.

संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाएँ: केवल नाइट्रोजन, फॉस्फोरस अथवा पोटाश का अत्यधिक प्रयोग मृदा में पोषक तत्त्वों का संतुलन बिगाड़ सकता है तथा विशेष रूप से जस्ता जैसे सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की उपलब्धता को कम कर सकता है. इसलिए उर्वरकों का प्रयोग सदैव संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन के सिद्धांतों के अनुसार किया जाना चाहिए, ताकि स्थूल (मैक्रो) एवं सूक्ष्म दोनों प्रकार के पोषक तत्त्व उचित अनुपात में उपलब्ध हो सकें.

उचित सूक्ष्म पोषक तत्त्व का उचित विधि से प्रयोग करें: सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की आपूर्ति मृदा में प्रयोग, पर्णीय छिड़काव, बीजोपचार अथवा फर्टिगेशन के माध्यम से की जा सकती है. इन विधियों का चयन फसल, पोषक तत्त्व की कमी की गंभीरता तथा फसल की वृद्धि अवस्था के अनुसार किया जाना चाहिए. दीर्घकालीन रूप से कमी को दूर करने के लिए सामान्यतः मृदा में प्रयोग अधिक उपयुक्त माना जाता है, जबकि फसल अवधि के दौरान कमी के लक्षण दिखाई देने पर पर्णीय छिड़काव द्वारा पोषक तत्त्वों की त्वरित आपूर्ति की जा सकती है.

मृदा एवं जल प्रबंधन की उत्तम पद्धतियाँ अपनाएँ: मृदा की अभिक्रिया (pH), जल निकास, सिंचाई जल की गुणवत्ता तथा मृदा में नमी का स्तर सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की उपलब्धता को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं. उदाहरण के लिए, क्षारीय एवं चूना-युक्त मृदा में जस्ता एवं लोहा अपेक्षाकृत कम उपलब्ध होते हैं, जबकि मोलिब्डेनम की उपलब्धता उदासीन से हल्की क्षारीय परिस्थितियों में अधिक होती है. इसलिए मृदा में उपयुक्त नमी बनाए रखना, आवश्यकता अनुसार जल निकास की व्यवस्था करना तथा अत्यधिक चूना के प्रयोग से बचना सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की बेहतर उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहायक होता है.

जैविक एवं अजैविक स्रोतों का समन्वित उपयोग करें: सर्वोत्तम परिणाम तब प्राप्त होते हैं जब किसान स्वस्थ मृदा, जैविक खादों तथा मृदा परीक्षण की अनुशंसाओं के आधार पर आवश्यकता अनुसार सूक्ष्म पोषक उर्वरकों का समन्वित उपयोग करते हैं. यह समेकित दृष्टिकोण न केवल पोषक तत्त्वों की कमी को दूर करता है, बल्कि मृदा स्वास्थ्य में सुधार, उर्वरकों के उपयोग की दक्षता में वृद्धि तथा टिकाऊ फसल उत्पादन को भी प्रोत्साहित करता है.

सूक्ष्म पोषक तत्त्वों के स्रोत: निरंतर खेती, फसल अवशेषों को खेत से हटाना, अधिक उपज देने वाली किस्मों का सघन उपयोग तथा बार-बार केवल एन.पी.के. उर्वरकों का प्रयोग करने से मृदा में उपलब्ध सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का भंडार धीरे-धीरे कम होता जाता है. इसलिए इन पोषक तत्त्वों की पूर्ति उपयुक्त प्राकृतिक एवं बाह्य स्रोतों के माध्यम से करना आवश्यक है.

सूक्ष्म पोषक उर्वरक: जब मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का भंडार पर्याप्त नहीं होता, तब सूक्ष्म पोषक उर्वरक उनकी कमी को दूर करने का एक प्रभावी माध्यम हैं. ये उर्वरक मृदा में प्रयोग, पर्णीय छिड़काव, बीजोपचार तथा फर्टिगेशन के लिए विभिन्न रूपों में उपलब्ध हैं. सामान्यतः प्रयुक्त सूक्ष्म पोषक उर्वरकों में निम्नलिखित शामिल हैं—

  • जस्ता (Zn): जिंक सल्फेट (ZnSO₄·7H₂O अथवा ZnSO₄·H₂O), केलेटेड जस्ता (Zn-EDTA).

  • लोहा (Fe): फेरस सल्फेट (FeSO₄), केलेटेड लोहा (Fe-EDTA, Fe-EDDHA).

  • बोरॉन (B): बोरेक्स, सोलुबोर (Solubor), बोरिक अम्ल.

  • मैंगनीज (Mn): मैंगनीज सल्फेट (MnSO₄).

  • ताँबा (Cu): कॉपर सल्फेट (CuSO₄).

  • मोलिब्डेनम (Mo): सोडियम मोलिब्डेट एवं अमोनियम मोलिब्डेट.

केलेटेड (Chelated) सूक्ष्म पोषक उर्वरक विशेष रूप से उच्च pH वाली मृदाओं में अधिक उपयोगी होते हैं, क्योंकि पारंपरिक अजैविक लवणों की तुलना में ये अधिक घुलनशील रहते हैं तथा पौधों द्वारा आसानी से अवशोषित किए जा सकते हैं.

जैविक खाद एवं कम्पोस्ट

गोबर खाद, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, कुक्कुट खाद, हरी खाद तथा फसल अवशेष सूक्ष्म पोषक तत्त्वों के महत्वपूर्ण स्रोत हैं. ये न केवल आवश्यक पोषक तत्त्वों की अल्प मात्रा उपलब्ध कराते हैं, बल्कि मृदा की संरचना में सुधार करते हैं, जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ाते हैं, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को प्रोत्साहित करते हैं तथा मृदा में स्वाभाविक रूप से उपस्थित सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की उपलब्धता भी बढ़ाते हैं.

जैव-संवर्धित एवं अनुकूलित उर्वरक

वर्तमान में अनेक व्यावसायिक उर्वरकों को जस्ता अथवा बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्त्वों से जैव-संवर्धित किया जा रहा है, ताकि पौधों को संतुलित पोषण उपलब्ध कराया जा सके. इसके अतिरिक्त, विभिन्न फसलों एवं मृदा परिस्थितियों की विशिष्ट पोषक तत्त्व आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए स्थूल (मैक्रो) एवं सूक्ष्म दोनों प्रकार के पोषक तत्त्वों से युक्त अनुकूलित उर्वरकों का उपयोग भी तेजी से बढ़ रहा है.

स्वस्थ मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का इष्टतम स्तर

सूक्ष्म पोषक तत्त्व

क्रांतिक स्तर (कमी की सीमा)

इष्टतम / पर्याप्त स्तर

जस्ता (Zn)

0.6 मि.ग्रा./कि.ग्रा. (ppm)

> 0.6 मि.ग्रा./कि.ग्रा.

लोहा (Fe)

4.5–5.0 मि.ग्रा./कि.ग्रा.

> 5.0 मि.ग्रा./कि.ग्रा.

मैंगनीज (Mn)

1.0 मि.ग्रा./कि.ग्रा.

> 1.0 मि.ग्रा./कि.ग्रा.

ताँबा (Cu)

0.2 मि.ग्रा./कि.ग्रा.

> 0.2 मि.ग्रा./कि.ग्रा.

बोरॉन (B)

0.5 मि.ग्रा./कि.ग्रा.

0.5–1.0 मि.ग्रा./कि.ग्रा.

मोलिब्डेनम (Mo)

अत्यल्प / परिवर्तनशील (लगभग <0.1 मि.ग्रा./कि.ग्रा.)

लगभग 0.1–0.5 मि.ग्रा./कि.ग्रा.

 

सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की विषाक्तता से बचाव

सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का आवश्यकता से अधिक प्रयोग करने से फसल की उपज नहीं बढ़ती, बल्कि इससे पौधों को हानि पहुँच सकती है, अन्य पोषक तत्त्वों का अवशोषण कम हो सकता है तथा मूल्यवान कृषि आदानों की अनावश्यक बर्बादी होती है. इसका मूल सिद्धांत सरल है "सूक्ष्म पोषक तत्त्व अल्प मात्रा में अत्यधिक प्रभावी होते हैं. अतः फसल की आवश्यकता के अनुसार ही इनका प्रयोग करें, न उससे अधिक और न उससे कम."

मुख्य संदेश

सूक्ष्म पोषक तत्त्व वैकल्पिक नहीं, बल्कि टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि के लिए अनिवार्य हैं. स्वस्थ फसलें समृद्ध कृषि की आधारशिला हैं और स्वस्थ फसलों के लिए संतुलित पोषण आवश्यक है. जहाँ नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश फसल की मूल संरचना एवं वृद्धि का आधार प्रदान करते हैं, वहीं सूक्ष्म पोषक तत्त्व पौधों की जैविक क्रियाओं को सुचारु रूप से संचालित करते हैं, उर्वरकों के उपयोग की दक्षता बढ़ाते हैं तथा फसल को उसकी पूर्ण उत्पादन क्षमता प्राप्त करने में सक्षम बनाते हैं. इन "अल्प मात्रा में आवश्यक पोषक तत्त्वों" की उपेक्षा से ऐसे अदृश्य नुकसान हो सकते हैं, जो उत्पादकता एवं लाभप्रदता दोनों को प्रभावित करते हैं. अतः प्रमुख पोषक तत्त्वों के साथ-साथ सूक्ष्म पोषक तत्त्वों पर भी समुचित ध्यान देकर किसान टिकाऊ, जलवायु-सहिष्णु एवं लाभकारी कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ सकते हैं.

लेखकगण: गौस अली, अनुप दास, सोनका घोष एवं अभिषेक कुमार
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना

English Summary: micronutrients in agriculture importance balanced plant nutrition Published on: 29 June 2026, 12:59 PM IST

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