खेती-किसानी में मौसम, बाजार भाव और लागत बढ़ने जैसी कई चुनौतियां किसानों की कमाई को प्रभावित करती हैं. ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले किसान और युवा खेती के साथ-साथ पशुपालन जैसे दूसरे व्यवसायों की ओर भी रुख कर रहे हैं. इनमें बकरी पालन एक ऐसा व्यवसाय है, जिसे कम जगह और सीमित संसाधनों के साथ भी शुरू किया जा सकता है. यही वजह है कि गांवों और छोटे शहरों में बकरी पालन को रोजगार और अतिरिक्त आमदनी के बेहतर विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है.
अगर आप भी खेती के साथ कोई ऐसा व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं, जिससे नियमित आमदनी हो सके, तो बकरी पालन आपके लिए एक विकल्प हो सकता है. खास बात यह है कि पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं, जिनके तहत पात्र लाभार्थियों को बकरी पालन यूनिट स्थापित करने के लिए आर्थिक सहायता और सब्सिडी दी जाती है.
बिहार के सीतामढ़ी समेत कई जिलों में पशुपालन विभाग के माध्यम से ऐसी योजनाओं का लाभ पात्र किसानों और पशुपालकों को दिया जा रहा है. योजना के तहत निर्धारित मानकों के अनुसार बकरी पालन यूनिट स्थापित करने पर परियोजना लागत का एक हिस्सा सरकार अनुदान के रूप में देती है. इससे किसानों पर शुरुआती निवेश का बोझ कम हो जाता है.
क्या है बकरी पालन योजना?
पशुपालन विभाग की इस तरह की योजनाओं का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण युवाओं, छोटे किसानों और पशुपालकों को स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित करना है. इसके लिए बकरी पालन की अलग-अलग क्षमता वाली यूनिट निर्धारित की जाती हैं. उदाहरण के तौर पर 20 बकरियों के साथ 1 बकरा या 40 बकरियों के साथ 2 बकरों की यूनिट जैसी संरचनाएं शामिल हो सकती हैं.
योजना के तहत पात्र लाभार्थियों को परियोजना की निर्धारित लागत पर 50 फीसदी तक अनुदान दिया जा सकता है. वहीं कुछ आरक्षित श्रेणियों के पात्र लाभार्थियों के लिए अनुदान की सीमा अधिक हो सकती है. इससे किसानों को अपनी तरफ से लगाने वाली पूंजी कम करनी पड़ती है.
उदाहरण के तौर पर यदि किसी स्वीकृत परियोजना की लागत 2 लाख रुपये है और योजना के नियमों के अनुसार उस पर 50 फीसदी अनुदान लागू होता है, तो पात्र लाभार्थी को 1 लाख रुपये तक की सहायता मिल सकती है. बाकी राशि लाभार्थी को स्वयं या बैंक ऋण आदि के माध्यम से जुटानी पड़ सकती है. हालांकि वास्तविक लागत, सब्सिडी की राशि और पात्रता संबंधित राज्य की योजना और उसके मौजूदा दिशा-निर्देशों पर निर्भर करती है.
आवेदन कैसे करें?
बकरी पालन योजना का लाभ लेने के लिए इच्छुक लोगों को सबसे पहले अपने राज्य के पशुपालन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट या संबंधित विभागीय कार्यालय से योजना की मौजूदा गाइडलाइन और आवेदन प्रक्रिया की जानकारी लेनी चाहिए.
आवेदन प्रक्रिया ऑनलाइन होने पर लाभार्थी को निर्धारित पोर्टल पर जाकर रजिस्ट्रेशन करना होता है. आवेदन के दौरान सामान्य तौर पर पहचान, बैंक खाते और पात्रता से जुड़े दस्तावेज मांगे जा सकते हैं. इनमें आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक पासबुक, निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र और जमीन से जुड़े दस्तावेज या लीज एग्रीमेंट शामिल हो सकते हैं.
यदि आवेदक के पास बकरी पालन से संबंधित प्रशिक्षण का प्रमाण पत्र है, तो उसे भी आवेदन के साथ लगाया जा सकता है, यदि संबंधित योजना में इसकी आवश्यकता या प्रावधान हो. कृषि विज्ञान केंद्र, पशुपालन विभाग या किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से लिया गया प्रशिक्षण बकरी पालन शुरू करने में व्यावहारिक रूप से भी काफी मददगार हो सकता है.
आवेदन जमा होने के बाद संबंधित विभाग द्वारा दस्तावेजों और पात्रता की जांच की जाती है. आवेदन स्वीकृत होने के बाद विभागीय नियमों के अनुसार यूनिट स्थापित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है.
सही नस्ल का चुनाव बेहद जरूरी
बकरी पालन में मुनाफा केवल सब्सिडी या यूनिट की संख्या पर निर्भर नहीं करता. इसमें बकरियों की नस्ल, भोजन, स्वास्थ्य, प्रबंधन और बाजार की मांग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इसलिए बकरी खरीदने से पहले अपने क्षेत्र के मौसम और बाजार के हिसाब से नस्ल का चुनाव करना चाहिए.
बिहार और आसपास के मैदानी इलाकों में ब्लैक बंगाल नस्ल को काफी पसंद किया जाता है. यह नस्ल अपने मांस की गुणवत्ता और प्रजनन क्षमता के लिए जानी जाती है. इसके अलावा बरबरी और सिरोही जैसी नस्लों को भी किसान अपनी जरूरत और क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार चुन सकते हैं.
हालांकि किसी भी नस्ल को चुनने से पहले स्थानीय पशु चिकित्सक, पशुपालन विभाग या अनुभवी पशुपालक से सलाह लेना बेहतर रहता है. अच्छी नस्ल के साथ स्वस्थ पशुओं का चयन भी उतना ही जरूरी है.
कम लागत में शुरू हो सकता है व्यवसाय
बकरी पालन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे अपेक्षाकृत कम जगह में शुरू किया जा सकता है. बकरियों के लिए साफ-सुथरा और हवादार शेड, पर्याप्त पानी, संतुलित आहार और नियमित स्वास्थ्य देखभाल जरूरी है.
बकरियों को हरी घास, पत्तियां, भूसा और अन्य उपलब्ध चारे के माध्यम से खिलाया जा सकता है. इससे यदि किसान के पास अपने खेत या आसपास चारे की उपलब्धता है तो भोजन पर होने वाला खर्च कुछ हद तक कम किया जा सकता है.
इसके साथ ही समय-समय पर टीकाकरण, कृमिनाशक दवा और पशु चिकित्सक की सलाह लेना जरूरी है. केवल कम लागत देखकर बकरी पालन शुरू करना पर्याप्त नहीं है. बेहतर उत्पादन और कम मृत्यु दर के लिए पशुओं की नियमित देखभाल आवश्यक है.
कितनी हो सकती है कमाई?
बकरी पालन से होने वाली कमाई कई बातों पर निर्भर करती है. इनमें बकरियों की संख्या, नस्ल, बच्चों की संख्या, वजन, मृत्यु दर, चारे की लागत और स्थानीय बाजार में मिलने वाला भाव प्रमुख हैं.
एक अच्छी तरह प्रबंधित यूनिट में बकरियों से बच्चे प्राप्त होने के बाद उन्हें उचित उम्र और वजन पर बेचकर आमदनी हासिल की जा सकती है. इसके अलावा कुछ नस्लों से दूध के माध्यम से भी आय हो सकती है. हालांकि 2 से 2.5 लाख रुपये जैसी आय को हर किसान के लिए निश्चित नहीं माना जा सकता. वास्तविक मुनाफा स्थानीय परिस्थितियों और व्यवसाय के प्रबंधन पर निर्भर करेगा.
इसलिए यदि आप बकरी पालन शुरू करने की योजना बना रहे हैं तो पहले अपने क्षेत्र के बाजार, चारे की उपलब्धता, पशु चिकित्सा सुविधा और बकरियों की खरीद-बिक्री की स्थिति का अध्ययन करें. इसके बाद सरकारी योजना के तहत मिलने वाली सब्सिडी और अपनी आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखकर यूनिट का आकार तय करें.
सरकारी सहायता का लाभ मिलने से शुरुआती निवेश का बोझ कम हो सकता है, लेकिन सफल बकरी पालन के लिए सही नस्ल, वैज्ञानिक प्रबंधन, पशु स्वास्थ्य और बाजार की समझ सबसे जरूरी है.
Share your comments