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तीन दशक से निःशुल्क कृषि शिक्षा: जैविक, हर्बल और उन्नत खेती का व्यावहारिक प्रशिक्षण लगातार जारी है.
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कोंडागांव का निशुल्क कृषि गुरुकुल: देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों से किसान यहां प्रशिक्षण लेने पहुंचे हैं.
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शिष्य बने प्रशिक्षक: उनके प्रशिक्षित किसान अब स्वयं हजारों किसानों को खेती की नई राह दिखा रहे हैं.
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विज्ञान और नवाचार का साथ: ड्रिप, इटालियन रेन गन, Effective Microorganisms, MDBP-16 काली मिर्च की नई प्रजाति और नेचुरल ग्रीनहाउस जैसे अनूठा सफल लोकप्रिय वैश्विक मॉडल.
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पद्मश्री पर यक्ष प्रश्न: उनसे प्रेरित किसानों को राष्ट्रीय सम्मान मिला है, तो स्वयं डॉ. त्रिपाठी के योगदान का राष्ट्रीय मूल्यांकन कब होगा?
शिक्षक-दिवस पर हम सामान्यतः स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षकों को याद करते हैं. लेकिन क्या शिक्षक वही है जो कक्षा में खड़ा होकर पाठ पढ़ाए? क्या कला विज्ञान साहित्य तकनीक आदि के शिक्षक की शिक्षक होते हैं. यदि कोई व्यक्ति तीन दशकों तक किसानों के खेत में खड़ा होकर उन्हें खेती का विज्ञान सिखाए, ज्ञान के बदले एक रुपया न ले और उसके शिष्य आगे चलकर स्वयं शिक्षक बन जाएं, तो उसे शिक्षक कहने में संकोच क्यों?
बस्तर के कोंडागांव स्थित मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म तथा रिसर्च सेंटर की कहानी इसी सवाल का जवाब देती है. डॉ. राजाराम त्रिपाठी लगभग 30 वर्षों से जैविक खेती, हर्बल खेती, जैविक खाद और जैविक कृषि-इनपुट बनाने, औषधीय पौधों की खेती, सामाजिक वानिकी, उन्नत खेती तथा नेचुरल ग्रीनहाउस (Natural Greenhouse) जैसी तकनीकों का निःशुल्क व्यावहारिक प्रशिक्षण देते आ रहे हैं. आज भी किसान प्रतिदिन उनके फार्म पर पहुंचते हैं.
यह कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वयं डॉ. त्रिपाठी का जीवन शिक्षा के संघर्ष से निकला है. देश के तत्कालीन सबसे पिछड़े क्षेत्र बस्तर के दरभा विकासखंड के आदिवासी ग्राम ककनार में जन्मे डॉ. त्रिपाठी को मिडिल स्कूल के लिए लगभग सात किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था. कॉलेज की पढ़ाई के लिए वे प्रतिदिन करीब 60 किलोमीटर साइकिल चलाते थे. फिर भी उन्होंने छह विषयों में स्नातकोत्तर शिक्षा, एलएलबी और डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की और आज भी उनका अध्ययन स्वाध्याय जारी है. प्रोफेसर और प्रतिष्ठित बैंक अधिकारी की नौकरी के अवसर छोड़कर उन्होंने खेती को जीवन का मिशन बनाया.
कृषि सीखने के लिए उन्होंने लगभग 40 देशों का भ्रमण किया. लेकिन विदेशों की तकनीक को जस का तस अपनाने के बजाय भारतीय किसान और भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाने पर जोर दिया.
लगभग 30 वर्ष पहले उन्होंने ड्रिप सिंचाई शुरू की. करीब 27 वर्ष पहले इटालियन रेन गन का प्रयोग किया. जापान की Effective Microorganisms तकनीक को भारतीय परिस्थितियों और किसानों की जरूरत के अनुसार ढालने का प्रयास किया. लगभग तीन दशक पहले अंतरराष्ट्रीय मानकों वाली प्रमाणित जैविक खेती की दिशा में कदम बढ़ाया और उनके फार्म को देश के शुरुआती प्रमाणित हर्बल फार्म की पहचान मिली.
इंटरनेट के शुरुआती दौर में अपनी वेबसाइट बनाने वाले किसानों में भी डॉ. त्रिपाठी का नाम अलग दिखाई देता है. उस समय वेबसाइट कोई सामान्य बात नहीं थी. उनके डिजिटल माध्यमों ने उनके फार्म की गतिविधियों को स्थानीय सीमा से बाहर पहुंचाने का रास्ता खोला. उनके अनुसार आज लाखों, बल्कि व्यापक डिजिटल पहुंच के कारण करोड़ों लोगों तक उनके कृषि कार्य की जानकारी पहुंच चुकी है और देश-विदेश के किसान उनसे जुड़े हैं.
यानी जिस व्यक्ति की शुरुआत बस्तर के एक पिछड़े आदिवासी गांव से हुई, उसने एक ओर दुनिया की कृषि प्रणालियों को देखा और दूसरी ओर इंटरनेट, ड्रिप, रेन गन, माइक्रोबियल तकनीक और प्रमाणित जैविक खेती जैसे आधुनिक साधनों को किसानों तक पहुंचाने का प्रयास किया.
यही कारण है कि डॉ. त्रिपाठी को केवल पारंपरिक जैविक खेती के प्रचारक के रूप में देखना उनके काम को छोटा करके देखना होगा. वे लगातार विज्ञान और तकनीक के साथ चलने की बात करते हैं और अपने शिष्यों को भी यही सिखाते हैं कि जैविक खेती का अर्थ विज्ञान से दूरी बनाना नहीं, बल्कि प्रकृति और आधुनिक तकनीक के बीच बेहतर संतुलन बनाना है.
उनके अनुसार, उनके डिजिटल माध्यमों से 25 लाख से अधिक किसान जुड़े हैं. बस्तर के लगभग 25 गांवों के छोटे किसान भी उनके साथ जुड़कर लाभदायक खेती की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. उनके फार्म पर देश के विभिन्न राज्यों के अलावा विदेशों से भी किसान और कृषि प्रतिनिधि प्रशिक्षण लेने पहुंचे हैं.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने अपने बाद प्रशिक्षकों की टीम तैयार की. अनुराग कुमार, जसमती नेताम और शंकर नाग जैसे अनुभवी साथी उनकी अनुपस्थिति में भी किसानों को प्रशिक्षण देते हैं. उनके अनेक शिष्य अब स्वयं प्रशिक्षक बन चुके हैं.
गाजीपुर के किसान रंग बहादुर सिंह करीब 25 वर्ष पहले इस फार्म पर आए थे. आज उनके नेतृत्व में हजारों किसान जैविक कृषि, औषधीय पौधों की खेती, वृक्षारोपण और लाभदायक खेती से जुड़े होने की बात सामने आती है. उनके एमबीबीएस डॉक्टर बच्चे भी जड़ी-बूटियों की खेती में हाथ बंटाते हैं. रंग बहादुर सिंह को राज्य स्तरीय धनवंतरी पुरस्कार भी मिल चुका है.
भदोही के चंद्रशेखर मिश्र औषधीय खेती और प्रशिक्षण के लिए देशभर में पहचाने जाते हैं और गर्व से बताते हैं कि उनका गुरुकुल कोंडागांव में है. ऐसे उदाहरण अनेक हैं. उनके प्रशिक्षित किसान डॉ. त्रिपाठी को ‘गुरुदेव’ कहते हैं और कोंडागांव के फार्म को गुरुस्थान मानते हैं. कई किसानों के घरों में उनकी तस्वीर सम्मान के साथ लगी है.
डॉ. त्रिपाठी का योगदान प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है. उन्होंने मां दंतेश्वरी ब्लैक पेपर-16 यानी MDBP-16 काली मिर्च विकसित की. यह मध्य भारत सहित देश के बड़े हिस्से में गर्म परिस्थितियों में कम पानी के साथ खेती के लिए उपयुक्त है और सामान्य किस्मों की तुलना में कई गुना अधिक उत्पादन क्षमता रखती है.
उनका दूसरा बड़ा प्रयोग नेचुरल ग्रीनहाउस (Natural Greenhouse) है. प्लास्टिक और लोहे के महंगे पॉलीहाउस के विकल्प के रूप में विकसित इस मॉडल की प्रस्तावित लागत लगभग दो लाख रुपये प्रति एकड़ है, जबकि पारंपरिक संरक्षित खेती में इससे कई गुना अधिक खर्च हो सकता है. पेड़ों की छाया में हल्दी और अन्य औषधीय फसलों की खेती के साथ यह मॉडल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, जैविक उत्पादन और नाइट्रोजन चक्र को बनाए रखने पर जोर देता है.
लेकिन यह भी सच है कि डॉ. राजाराम त्रिपाठी के कार्यों और उपलब्धियों को एक लेख में पूरी तरह समेटना संभव नहीं है. तीन दशकों में कृषि, जैविक खेती, औषधीय पौधों, पर्यावरण संरक्षण, तकनीकी नवाचार, किसान प्रशिक्षण, बाजार से जोड़ने और ग्रामीण-आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका के लिए उन्होंने जो काम किए हैं, वे अपने आप में एक विस्तृत दस्तावेज का विषय हैं. यहां जिन उपलब्धियों का उल्लेख है, वे उस लंबी यात्रा की केवल कुछ झलकियां हैं.
आज खेती मिट्टी की उर्वरता, भूजल, बढ़ती लागत, रासायनिक निर्भरता, महंगे बीज-खाद और किसान आय जैसे संकटों से जूझ रही है. देश की खाद्य सुरक्षा अंततः खेतों पर निर्भर है. ऐसे समय में किसान को आत्मनिर्भर और टिकाऊ खेती सिखाने वाले व्यावहारिक शिक्षक का महत्व और बढ़ जाता है.
डॉ. त्रिपाठी आज 64 वर्ष की आयु में भी किसानों को पढ़ा रहे हैं. उनकी कक्षा आज भी खेत है और विद्यार्थी आज भी किसान.
और यहीं एक सवाल सामने आता है.
जब किसी विशिष्ट संगठन से जुड़े सामान्य किसानों को भी पद्मश्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान दिए जा रहे हैं, डॉ. त्रिपाठी से प्रेरणा लेकर जैविक खेती की ओर बढ़े किसानों को भी राष्ट्रीय सम्मान मिल चुका है, तो तीन दशकों तक निःशुल्क कृषि प्रशिक्षण, किसान-निर्माण, शोध और नवाचार में लगे डॉ. राजाराम त्रिपाठी के योगदान का राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त मूल्यांकन कब होगा?
उन्हें पद्मश्री न मिलने का कारण उनकी सरकारों की आलोचना है, ऐसा बिना प्रमाण के कहना उचित नहीं होगा. इतना जरूर है कि उन्होंने चाहे किसी भी दल की सरकार रही हो, किसान विरोधी नीतियों की आलोचना करने में अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी है. इसलिए यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि क्या ऐसे स्वतंत्र और मुखर कृषि कर्मयोगियों के योगदान को हमारी सम्मान व्यवस्था पर्याप्त महत्व देती है?
डॉ. त्रिपाठी स्वयं पुरस्कारों को अंतिम उपलब्धि नहीं मानते. उनका कहना है कि यदि उनके प्रयास से किसी गरीब किसान की आमदनी बढ़ती है, कोई किसान सफल होता है और उसके परिवार का जीवन सुधरता है, तो वही उनका सबसे बड़ा पुरस्कार और वही उनका पद्म विभूषण है.
सरकार उन्हें पद्मश्री दे या पद्म विभूषण, निर्णय सरकार का है. लेकिन समाज का दायित्व है कि ऐसे निःस्वार्थ शिक्षक की पीठ थपथपाए.
क्योंकि उन्होंने केवल खेती नहीं सिखाई. उन्होंने किसान तैयार किए, प्रशिक्षक तैयार किए और ज्ञान को आगे बढ़ाने वाली एक परंपरा तैयार की.
जहां डॉ. राजाराम त्रिपाठी खड़े होते हैं, वहां कक्षा बन जाती है. जिस खेत में वे किसान के साथ खड़े होते हैं, वह प्रयोगशाला बन जाता है. और उनका शिष्य जब किसी दूसरे किसान को सिखाता है, तो वही शिक्षा आगे फसल बनकर उगती है.
शिक्षक दिवस पर ऐसे शिक्षक को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि देश का भविष्य केवल विश्वविद्यालयों में नहीं लिखा जाता. उसका एक बड़ा हिस्सा खेतों में लिखा जाता है.
और कोंडागांव की उस पाठशाला में एक शिक्षक आज भी अविचल खड़ा है.
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