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GI टैग वाला भालिया गेहूं भेजा गया विदेश, किसानों को इस किस्म की बुवाई से होगा खूब फायदा

कंचन मौर्य
कंचन मौर्य

Wheat Variety

मां के हाथों की गेहूं की फूली हुई गर्मागर्म रोटियों से ज्यादा स्वादिष्ट शायद ही कोई भोजन हो, जिससे हर भारतीय जुड़ाव महसूस करता है. चाहे घर में रहें या हॉस्टल में, भारत में रहें या विदेश में माँ के हाथ की रोटियों का स्वाद हर भारतीय की ज़ुबान पर होता है. पढ़ाई या नौकरी के लिए अन्य शहरों में रह रहे युवा अक्सर मां को फ़ोन करके कहते है- ‘मां यहाँ सब कुछ है पर बस, तुम्हारे हाथ की गरम रोटियों का स्वाद नहीं है.’  हर भारतीय का गेहूं से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ाव है.  देश में गेहूं की खेती प्रमुखता से की जाती है.

यहां हर राज्य के किसान गेहूं की उन्नत किस्मों की बुवाई करते हैं. इसके साथ ही सरकार भी गेहूं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत है. इसी सन्दर्भ में गेहूं की खेती करने वाले किसानों के लिए एक बड़ी खुशखबरी है. दरअसल, गेहूं की भालिया किस्म की फसल की पहली खेप गुजरात से केन्या और श्रीलंका निर्यात की गई है. गेहूं की भालिया किस्म प्रमुख रुप से गुजरात के भाल क्षेत्र में पैदा की जाती है. इस लेख में पढ़िए भालिया गेंहू से जुड़ी जरूरी जानकारीयां -

गेहूं की भालिया किस्म को मिला है जीआई टैग

गेहूं की इस किस्म को स्थानीय लोग दौदखानी (Daudkhani )कहते हैं.  खास बात यह है कि गेहूं की भालिया किस्म को जुलाई, 2011 में आणंद कृषि विश्वविद्यालय के प्रोपराइटरशिप में जी.आई. टैग(GI Tag) मिला था. जीआई प्रमाणित इस गेहूं में प्रोटीन की अधिक मात्रा पाई जाती है. इसका स्वाद मीठा होता है. इस किस्म की विशेषता यह है कि इसे बारिश के मौसम में बिना सिंचाई के उगा सकते हैं. इसकी खेती गुजरात में लगभग 2 लाख हेक्टेयर में की जाती है.

क्यों पड़ा भालिया किस्म नाम?

किसान भाइयों आपके मन में सवाल होगा कि गेहूं की इस किस्म का नाम भालिया क्यों है? तो आपके प्रश्नों का समाधान कृषि जागरण हमेशा करता रहा है.  प्राप्त जानकारी के अनुसार गेहूं की भालिया किस्म का नाम भाल क्षेत्र की वजह से पड़ा है. यह क्षेत्र अहमदाबाद और भावनगर जिलों के बीच स्थित है. ऐसा कहा जाता है कि यहां आजादी से बहुत पहले से ही इस गेहूं की खेती की जाती है. गेहूं की इस किस्म की खेती व्यापक रूप से अहमदाबाद के धंधुका, ढोलका और बावला में होती है. इसके अलावा अहमदाबाद जिले के धंधुका, ढोलका और बावला, सुरेंद्र नगर के लिम्बडी, भावनगर के वल्लभीपुर और आणंद जिले के तारापुर और खंभात, खेड़ा के मातर, भरुच के जम्बुसार, वाग्रा में बड़े क्षेत्रफल में इसकी खेती की जाती है.

गेहूं की भालिया किस्म की बुवाई

किसान खेत की मेड़ ऊंची करके बारिश का पानी खेत में इकट्ठा करते हैं, जिससे खेत में नमी बनी रहे. गेहूं की भालिया किस्म की बुवाई बारिश का पानी खाड़ी में चले जाने के बाद अक्टूबर के अंत से नवंबर के पहले सप्ताह तक होती है. इस किस्म को सिंचाई या बारिश की आवश्यकता नहीं होती है. फसल की कटाई मार्च-अप्रैल में या उसके बाद होती है.

भालिया किस्म के लिए ये मिट्टी है उत्तम

गेहूं की इस किस्म की बुवाई संरक्षित मिट्टी की नमी में की जाती है.

भालिया गेहूं है पोषण से भरपूर

  • भालिया गेहूं में ग्लूटेन पाया जाता है, जो कि एक तरह का अमीनो एसिड होता है.

  • इसमें भरपूर प्रोटीन होता है.

  • इसके अलावा कैरोटीन की मात्रा अधिक पाई जाती है.

  • इसमें पानी का अवशोषण कम होता है.

  • स्वाद में मीठा होता है.

सूजी तैयार करने में इस्तेमाल

गेहूं की इस किस्म का उपयोग सूजी तैयार करने में होता है. इससे तैयार सूजी से पास्ता, मैकरोनी, पिज्जा, स्पेगेटी, सेवई, नूडल्स आदि उत्पाद बनाए जाते हैं.

किसानों को होगा फायदा

भालिया किस्म के निर्यात से भारत को गेहूं निर्यात के क्षेत्र में बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई गई है. इसका सीधा लाभ किसानों को मिलेगा. जानकारी के लिए बता दें कि भारत से वर्ष 2020-21 में गेहूं का निर्यात लगभग 4034 करोड़ रुपए का हुआ, जो कि उसके पहले साल की तुलना में 808 प्रतिशत ज्यादा था. उस अवधि में लगभग 444 करोड़ रुपए का गेहूं निर्यात किया गया था. अगर अमेरिकी डॉलर के लिहाज से देखा जाए, तो वर्ष 2020-21 में गेहूं का निर्यात लगभग 778 प्रतिशत बढ़कर लगभग 549 मिलियन डॉलर हो गया है.

इन देशों में गेहूं का हुआ निर्यात

भारत ने वर्ष 2020-21 में यमन, इंडोनेशिया, भूटान, ईरान, फिलीपींस, म्यांमार व कंबोडिया जैसे 7 नए देशों को अनाज का निर्यात किया है. हालाकिं, पिछले वित्तीय वर्षों में इन देशों को थोड़ी मात्रा में गेहूं का निर्यात किया गया था. मगर इन 7 देशों को वर्ष 2018-19 में गेहूं का निर्यात नहीं किया गया, तो वहीं वर्ष 2019-20 में केवल 4 मीट्रिक टन अनाज का निर्यात किया. बता दें कि वर्ष 2020-21 में गेहूं के निर्यात की मात्रा बढ़कर 1.48 लाख टन हो गई है.

गेहूं की पैदावार में बढ़ोतरी का अनुमान

फसल वर्ष 2020-21 के लिए कृषि मंत्रालय की ओर से जारी तीसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक, इस बार रबी गेहूं की पैदावार लगभग  10 करोड़ 87 लाख 50 हजार टन रह सकती है. पिछले साल रबी गेहूं की उपज 10 करोड़ 78 लाख 60 हजार टन थी.

फिलहाल देश की अलग-अलग मंडियों में गेहूं के भाव में कोई खास उतार-चढ़ाव देखने को नहीं मिल रहा है. 6 जुलाई के आंकड़ों के अनुसार कृषि उपज मंडियों में गेहूं की कीमत 1550  से लेकर 1900 रुपए प्रति क्विंटल तक रही.

पंजाब से हुई है सबसे अधिक खरीद

रबी मार्केटिंग सीजन 2020-21 के लिए देश के कई राज्यों में किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं की सरकारी खरीदी की जा रही है. उपभोक्ता कार्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात तथा अन्य राज्यों से अब तक 4 करोड़ 33 लाख मीट्रिक टन गेहूं की सरकारी खरीदी हो चुकी है. यह बीते साल से 11 प्रतिशत ज्यादा है.

आंकड़ों के मुताबिक, गेहूं की सबसे अधिक सरकारी खरीद पंजाब से हुई है. दूसरे स्थान पर मध्यप्रदेश है. इसके बाद हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान का नंबर है. मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, इस बार राजस्थान से रिकॉर्ड तौर गेहूं की खरीदी हुई है, जिसका लाभ किसानों को मिला है.

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मंडियों में गेहूं की अच्छी आवक हो रही है. बाजार में पर्याप्त मात्रा में गेहूं उपलब्ध है. किसान भाइयों के लिए विशेष सलाह यह है कि वे खुले बाजार में गेहूं बिक्री करने की बजाय सरकारी मंडियों में यदि अपनी उपज को बेचेंगे तो उपज का अधिक दाम मिलेगा .  फसल का खुले बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम मिल रहा है.

गेहूं से संबंधित शोध, नई क्रांति की इबारत लिख रहे कृषि वैज्ञानिक

वर्ष 2050 तक दुनिया की आबादी 9.6 अरब होने का अनुमान है. इस हिसाब से खाद्य आपूर्ति के लिए हर साल गेहूं उत्पादन में 1.6 फीसदी की बढ़ोतरी आवश्यक है. वर्ष 2019 में भारत में 102.19 मिलियन टन गेहूं उत्पादन हुआ. अब अनवरत रिसर्च से ही गेहूं की उत्पादकता बढ़ाने, नई उन्नत प्रजातियां विकसित करने के साथ हर मौसम व तमाम बीमारियों से निपटने में कारगर किस्में तैयार करने में मदद मिलेगी. वर्तमान में भारत गेहूं उत्पादन में चीन के बाद दुनिया में दूसरे नंबर पर है.  

देश में नई गेहूं क्रांति ला रहे भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों की गेहूं से संबंधित शोध और यहां विकसित गेहूं की प्रजातियां न केवल पौष्टिकता के मापदंडों पर सर्वोत्कृष्ट हैं, बल्कि खाने का स्वाद बढ़ाने में भी उत्तम है. आज पूरे भारत के कुल गेहूं रकबे में 60 प्रतिशत पैदावार इनके द्वारा विकसित प्रजातियों की है. इस संस्थान के द्वारा ऐसी 48 उन्नत प्रजातियां विकसित की गई हैं, जो भारत सरकार के 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के अभियान में बहुपयोगी साबित हो रही हैं.  

100 एकड़ क्षेत्र में हो रहें प्रयोग

आइआइडब्ल्यूबीआर के करनाल केंद्र पर करीब सौ एकड़ भूमि के लंबे-चौड़े क्षेत्र में गेहूं व जौ की विभिन्न किस्मों पर प्रयोग किए जा रहे हैं.  इसके अतिरिक्त हरियाणा के हिसार और हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति क्षेत्रों में भी संस्थान के केंद्र हैं,  जहां अलग-अलग वातावरण व पारिस्थतिकी तंत्र के अनुकूल गेहूं पर पडऩे वाले प्रभावों  का अध्ययन किया जाता है . इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ व्हीट एंड बार्ले रिसर्च के वैज्ञानिक मुख्यत: उन जीन की पहचान कर रहे हैं, जो उत्पादन व गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं. फसल में लगने वाली बीमारियों और कीट नियंत्रण से लेकर तापमान से जुड़ी समस्याओं से निजात दिलाने में भी शोध कारगर साबित हो रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत गेहूं उत्पादन में पहले पायदान पर आने का लक्ष्य भी जल्दी ही हासिल कर लेगा.

कम पानी में बढ़िया पैदावार

इस संस्थान ने तीन उच्च उपज वाले गेहूं की किस्मों डीबीडब्ल्यू 243, डीबीडब्ल्यू-166 और डीबीडब्ल्यू 222 विकसित की हैं. ये उन क्षेत्रों के लिए वरदान हैं, जहां जल स्तर तेजी से कम हो रहा है. गेहूं की ये किस्में कम पानी में अच्छी पैदावार देने वाली हैं. सामान्य गेहूं की किस्मों में जहां बुआई से लेकर कटाई तक छह बार सिंचाई होती है, वहीं इन नई किस्मों में सिर्फ चार सिंचाई की आवश्यकता होती है. ये लगभग 20 प्रतिशत पानी की बचत करती हैं. 

गेहूं की ये किस्में है , बहुत अच्छी

किस्म                   पकने की अवधि      उपज क्षमता                     औसत उपज

डीबीडब्ल्यू-187 :    148 दिन               96.6 क्विंटल                   78.0 क्विंटल   

डीबीडब्ल्यू-222 :    143 दिन               82.1 क्विंटल                   61.3 क्विंटल 

डब्ल्यू बी-2 :          142 दिन               58.9 क्विंटल                   51.6 क्विंटल   

एचडी-3086 :        141 दिन               71.1 क्विंटल                  54.6 क्विंटल 

एचडी-2967 :        143 दिन               66.0 क्विंटल                  50.4 क्विंटल 

डीबीडब्ल्यू 173 :     120 दिन              57.0 क्विंटल                  47.2 क्विंटल   

नोट: उपज के आंकड़े कुल क्विंटल  प्रति हेक्टेयर में

डीबी डब्ल्यू के मिलेंगे बेहतर परिणाम

इस साल की आखिरी तिमाही तक आइआइडब्ल्यूआर के कृषि वैज्ञानिकों की टीम गेहूं की डीबीडब्ल्यू-303 प्रजाति लाने वाली है, जिसके बारे में यह संभावना जताई जा रही है कि यह पिछली तमाम उन्नत प्रजातियों से भी कहीं शानदार नतीजे देगी, तो किसान भाइयों भालिया गेहूं के साथ ही आप उपरोक्त गेहूं की किस्मों की बोवनी अपने यहाँ की जलवायु संबंधित परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कर सकते है और बहुत अच्छी गेहूं की उपज के द्वारा अधिक मुनाफ़ा कमा सकते है. कृषि से संबंधित समस्त जानकारियों के लिए कृषि जागरण की हिंदी वेबसाइट के लेखों को जरुर पढ़िए.

English Summary: bhalia wheat with GI tag sent abroad

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