-
डॉ. राजाराम त्रिपाठी एग्री-100 की उच्चस्तरीय निर्णायक मंडल के सदस्य चुने गए हैं.
-
नीति आयोग के सदस्य प्रो. रमेश चंद अध्यक्ष तथा डॉ. हिमांशु पाठक और डॉ. त्रिलोचन महापात्र सह-अध्यक्ष होंगे.
-
एग्री और एग्री-संबद्ध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले 100 नेतृत्वकर्ताओं का चयन किया जाएगा.
-
एग्री-100 का पहला संस्करण 1 अक्टूबर को बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी केंद्र में आयोजित होगा.
-
करीब तीन दशक से जैविक खेती, नवाचार, किसान हित, जनजातीय आजीविका और पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय डॉ. त्रिपाठी को मिली राष्ट्रीय जिम्मेदारी से एग्री जगत में उत्साह है.
बस्तर की धरती से निकलकर खेती और एग्री नवाचार के क्षेत्र में राष्ट्रीय पहचान बनाने वाले प्रगतिशील जैविक किसान एवं किसान नेता डॉ. राजाराम त्रिपाठी अब देश के एग्री नेतृत्व का मूल्यांकन करने वाली महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रक्रिया का हिस्सा होंगे. उन्हें ‘एग्री-100, एग्री जागरण एग्री नेतृत्व सूची’ के लिए गठित उच्चस्तरीय निर्णायक मंडल का सदस्य चुना गया है.
एग्री-100 का उद्देश्य देश के एग्री तथा एग्री-संबद्ध गतिविधियों के विविध क्षेत्रों में अपने कार्य, नवाचार, नेतृत्व, विचार और वास्तविक प्रभाव से उल्लेखनीय योगदान देने वाले 100 अग्रणी एग्री नेतृत्वकर्ताओं की पहचान करना है. इनके चयन की जिम्मेदारी देश के प्रतिष्ठित एग्री वैज्ञानिकों, नीति विशेषज्ञों और जमीनी एग्री क्षेत्र के प्रतिनिधियों वाली उच्चस्तरीय निर्णायक मंडल को सौंपी गई है.
बस्तर जैसे जनजातीय और अपेक्षाकृत दूरस्थ क्षेत्र में स्वयं खेती करने वाले किसान का इस राष्ट्रीय चयन मंडल में शामिल होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि एग्री नेतृत्व के मूल्यांकन में खेत और किसान के वास्तविक अनुभव को भी निर्णायक दृष्टि मिलेगी.
शीर्ष एग्री विशेषज्ञों के साथ निर्णायक मंडल में डॉ. त्रिपाठी
एग्री-100 की निर्णायक मंडल की अध्यक्षता नीति आयोग के सदस्य एवं प्रख्यात एग्री अर्थशास्त्री प्रो. रमेश चंद करेंगे. भारतीय एग्री अनुसंधान व्यवस्था के शीर्ष पदों पर सेवाएं दे चुके डॉ. हिमांशु पाठक और डॉ. त्रिलोचन महापात्र सह-अध्यक्ष होंगे.
डॉ. हिमांशु पाठक भारतीय एग्री अनुसंधान परिषद के महानिदेशक तथा एग्री अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव रह चुके हैं. डॉ. त्रिलोचन महापात्र भी भारतीय एग्री अनुसंधान परिषद के महानिदेशक और एग्री अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव के पद पर रह चुके हैं.
इन शीर्ष एग्री वैज्ञानिकों और नीति विशेषज्ञों के साथ डॉ. त्रिपाठी का चयन बस्तर के जमीनी एग्री अनुभव और नवाचार को राष्ट्रीय एग्री नेतृत्व के मूल्यांकन की प्रक्रिया में मिली महत्वपूर्ण जगह के रूप में देखा जा रहा है.
एग्री के विविध क्षेत्रों से चुने जाएंगे 100 अग्रणी नेतृत्वकर्ता :- एग्री-100 केवल पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं है. इसमें एग्री, एग्री विज्ञान, नवाचार, एग्री उद्यमिता, किसान नेतृत्व, एग्री संस्थान, एग्री-आधारित गतिविधियों और एग्री परिवर्तन से जुड़े विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान को शामिल किया गया है.
देशभर से ऐसे व्यक्तियों और संस्थाओं में से 100 अग्रणी एग्री नेतृत्वकर्ताओं की पहचान की जाएगी, जिनका एग्री और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर वास्तविक प्रभाव रहा है. इसका उद्देश्य ऐसे योगदानों को राष्ट्रीय मंच देना है, जो एग्री क्षेत्र में स्थायी बदलाव ला रहे हैं.
1 अक्टूबर को बेंगलुरु में उद्घाटन
एग्री-100 का उद्घाटन संस्करण 1 अक्टूबर 2026 को बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी केंद्र में एग्री-कॉन इंडिया एवं हॉर्टीकनेक्ट इंडिया के अंतर्गत प्रस्तुत किया जाएगा. आयोजन एग्री जागरण द्वारा किया जा रहा है और मेसे म्यूनिख इंडिया का सहयोग प्राप्त है. एग्री मंत्रालय तथा एग्री क्षेत्र से जुड़े प्रतिष्ठित संस्थानों की सहभागिता भी इस आयोजन को व्यापक संस्थागत महत्व प्रदान करती है.
तीन दशक से खेत, किसान और पर्यावरण के साथ
डॉ. राजाराम त्रिपाठी करीब तीन दशकों से जैविक खेती, औषधीय पौधों, एग्री वानिकी, किसान हित, जनजातीय आजीविका और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे अखिल भारतीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक तथा सेंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष हैं.
बस्तर स्थित मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं अनुसंधान केंद्र के माध्यम से उन्होंने जैविक और टिकाऊ एग्री के अनेक प्रयोग किए हैं. पेड़ों को जीवित संरचना के रूप में उपयोग करने वाली कम लागत की प्राकृतिक हरितगृह अवधारणा तथा अधिक उत्पादन क्षमता वाली ‘मां दंतेश्वरी ब्लैक पेपर-16’ जैसी नवाचार पहलों ने उन्हें राष्ट्रीय एग्री जगत में पहचान दिलाई है.
उनका काम केवल एग्री उत्पादन तक सीमित नहीं है. स्थानीय वन संसाधनों, औषधीय पौधों, एग्री वानिकी और जनजातीय समुदायों की आजीविका को टिकाऊ आर्थिक अवसरों से जोड़ना भी उनके कार्य का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है.
किसान नीतियों पर सरकारों को दिए महत्वपूर्ण सुझाव
डॉ. त्रिपाठी विभिन्न सरकारों और नीति-निर्माताओं के समक्ष किसानों की आय, एग्री बाजार, जैविक खेती, किसान सम्मान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं.
उनके अनुसार, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौर में नई दिल्ली में वरिष्ठ राजनीतिक नेतृत्व और चुनिंदा किसान नेताओं की बैठक में उन्होंने किसानों और एग्री के लिए समर्पित अलग टेलीविजन चैनल शुरू करने तथा उत्कृष्ट किसानों को पद्म सम्मानों की परिधि में लाने जैसे सुझाव रखे थे. बाद के वर्षों में किसान केंद्रित टेलीविजन चैनल और किसानों को पद्म सम्मान दिए जाने की पहलें राष्ट्रीय स्तर पर सामने आईं.
इसी प्रकार किसानों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था की आवश्यकता पर भी वे लंबे समय से सरकार का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं. उनका कहना है कि उन्होंने केंद्र सरकार के समक्ष किसानों के लिए प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता आधारित किसान कल्याण निधि जैसी व्यवस्था का सुझाव भी रखा था.
कोविड-19 महामारी के कठिन दौर में उन्होंने एग्री कार्य तथा वन क्षेत्रों में लघु वनोपज संग्रह जैसी ग्रामीण आजीविका गतिविधियों को आवश्यक कार्यों के अनुरूप प्रतिबंधों से राहत देने की मांग भी प्रमुखता से उठाई थी.
किसान, पर्यावरण और साहित्य की बहुआयामी पहचान
बस्तर के ककनार गांव में जन्मे डॉ. त्रिपाठी की पहचान किसान और एग्री नवाचारक के साथ पर्यावरण कार्यकर्ता, जनजातीय सरोकारों के समर्थक, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अध्येता, लेखक और साहित्यकार के रूप में भी है.
उन्होंने बस्तर की पारंपरिक चिकित्सा पर शोध किया है और विभिन्न विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त की है. वे आदिवासी सरोकारों से जुड़ी साहित्यिक पत्रिका ‘ककसाड़’ के संपादक हैं. उनकी प्रमुख कृतियों में ‘मैं बस्तर बोल रहा हूं’, ‘बस्तर बोलता भी है’ और ‘दुनिया इन दिनों’ शामिल हैं. एग्री, पर्यावरण और साहित्य के क्षेत्र में उन्हें विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से भी सम्मानित किया जा चुका है.
राष्ट्रीय एग्री नेतृत्व के मूल्यांकन में पहुंचेगी खेत की आवाज
एग्री-100 की निर्णायक मंडल में डॉ. त्रिपाठी का चयन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि देश के एग्री नेतृत्व की पहचान करने वाली प्रक्रिया में एक सक्रिय किसान की प्रत्यक्ष जमीनी दृष्टि भी शामिल होगी.
बस्तर जैसे जनजातीय और दूरस्थ अंचल में वर्षों से खेती, नवाचार और किसान हित के लिए काम कर रहे व्यक्ति का देश के शीर्ष एग्री नीति विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के साथ बैठकर अग्रणी एग्री नेतृत्वकर्ताओं का चयन करना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है. यह छत्तीसगढ़ और विशेषकर बस्तर की एग्री प्रतिभा, जमीनी अनुभव और नवाचार क्षमता के राष्ट्रीय एग्री विमर्श में बढ़ते महत्व का भी संकेत है.
यदि एग्री-100 के माध्यम से प्रयोगशाला, नीति और संस्थानों की उपलब्धियों के साथ खेत में वास्तविक बदलाव लाने वाले किसानों की पहचान भी राष्ट्रीय स्तर पर होती है, तो यह भारतीय एग्री नेतृत्व की तस्वीर को अधिक व्यापक और जमीन से जुड़ा बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है.
Share your comments