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मानसून 2026: देश में 12.6% कम बारिश, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत सबसे ज्यादा प्रभावित, रबी की तैयारी में नमी बनेगी चुनौती

समय पर पहुंचा मानसून, फिर भी जून में भारी कमी; पंजाब, बिहार, असम, मराठवाड़ा और कर्नाटक में किसानों की चिंता बढ़ी...

रामजी कुमार

दक्षिण-पश्चिम मानसून का चार महीने का मौसम 30 सितंबर 2026 को समाप्त हो गया. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के अनुसार 1 जून से 30 सितंबर के बीच देश में औसतन 759.4 मिमी बारिश दर्ज हुई, जबकि इस अवधि की सामान्य बारिश 868.6 मिमी है. इस तरह पूरे देश में मौसमी बारिश सामान्य से 12.6% कम रही.

खास बात यह रही कि मानसून समय पर आया और तय तारीख के आसपास पूरे देश में फैल भी गया, लेकिन बारिश की मात्रा और उसका वितरण दोनों असमान रहे. कहीं सामान्य से ज्यादा पानी गिरा, तो कई इलाकों में खेत सूखे रह गए.

मानसून की चाल: आगमन में देरी नहीं, फिर भी कमजोर प्रदर्शन

दक्षिण-पश्चिम मानसून ने 4 जून को केरल में दस्तक दी, जबकि इसकी सामान्य तारीख 1 जून है. आगे बढ़ते हुए यह 9 जुलाई 2026 तक पूरे देश में पहुंच गया, जबकि इसकी सामान्य तारीख 8 जुलाई है. यानी आगमन और प्रसार में केवल एक से तीन दिन का अंतर रहा.

फिर भी मौसमी बारिश में कमी दर्ज हुई. इससे साफ है कि मानसून के जल्दी या समय पर पहुंचने से यह तय नहीं होता कि पूरे सीजन में बारिश कितनी होगी.

महीने-दर-महीने: जून में सबसे बड़ी गिरावट

आईएमडी के आंकड़ों के मुताबिक:

  • जून: 8 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य 165.3 मिमी है. यानी 35.4% की कमी.

  • जुलाई: 3 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य 280.5 मिमी है. यानी 1.0% ज्यादा.

  • अगस्त: 3 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य 254.9 मिमी है. यानी 16.3% कम.

  • सितंबर: 1 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य 167.9 मिमी है. यानी 7.6% कम.

खरीफ फसलों की बुवाई के लिए जून की बारिश बेहद अहम मानी जाती है. इसी महीने में 35 फीसदी से ज्यादा कमी रहने से कई इलाकों में शुरुआती चरण पर असर पड़ने की आशंका रही. जुलाई में स्थिति संभली, लेकिन अगस्त और सितंबर में फिर कमी लौट आई. ये वही महीने हैं जब कई फसलों में बढ़वार, फूल आने और दाना भरने की अवस्था चलती है.

क्षेत्रवार तस्वीर: पूर्वी-पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा कमी

देश के चार समरूप क्षेत्रों में बारिश की स्थिति इस प्रकार रही:

क्षेत्र

वास्तविक (मिमी)

सामान्य (मिमी)

विचलन

पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत

1017.1

1367.3

−25.6%

दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत

542.0

716.2

−24.3%

उत्तर-पश्चिम भारत

553.0

587.6

−5.9%

मध्य भारत

972.0

978.0

−2.6%

पूर्वी-पूर्वोत्तर और दक्षिणी क्षेत्रों में एक-चौथाई के आसपास कमी रही. वहीं मध्य भारत में बारिश लगभग सामान्य रही.

राज्यों और उपखंडों का हाल

आईएमडी के उपखंडवार वर्षा नक्शे में क्षेत्रीय असमानता साफ दिखती है.

सबसे ज्यादा कमी वाले इलाके (आईएमडी के अनुसार "अपर्याप्त" श्रेणी):

  • उत्तर भारत: पंजाब में 41% कम बारिश हुई. पश्चिमी राजस्थान में 30% और हरियाणा-चंडीगढ़-दिल्ली उपखंड में 23% की कमी रही.

  • पूर्वोत्तर: अरुणाचल प्रदेश में 44%, असम-मेघालय में 40% और नागालैंड-मणिपुर-मिजोरम-त्रिपुरा (एनएमएमटी) में 21% कम बारिश दर्ज हुई.

  • बिहार: 32% की कमी, जो पूर्वी भारत के प्रमुख कृषि राज्यों में सबसे ज्यादा है.

  • महाराष्ट्र: मराठवाड़ा में 39% और विदर्भ में 27% कम बारिश हुई.

  • दक्षिण भारत: रायलसीमा में 40%, उत्तरी आंतरिक कर्नाटक और दक्षिणी आंतरिक कर्नाटक में 31-31%, तटीय कर्नाटक और केरल में 28-28%, और तमिलनाडु-पुडुचेरी-कराइकल में 20% की कमी रही.

  • अन्य: सौराष्ट्र-कच्छ में 23% कम बारिश हुई.

सामान्य श्रेणी वाले इलाके:

पूर्वी उत्तर प्रदेश (+2%), पूर्वी मध्य प्रदेश (+4%), छत्तीसगढ़ (+5%), उत्तराखंड (+9%), गंगीय पश्चिम बंगाल (+8%), गुजरात क्षेत्र (−1%), जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (−3%), झारखंड (−4%) और मध्य महाराष्ट्र (−7%) में बारिश सामान्य दायरे में रही. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 17% ज्यादा बारिश हुई, जो सामान्य श्रेणी के दायरे में ही आती है.

अधिक बारिश: ओडिशा देश का एकमात्र प्रमुख उपखंड रहा जहां सामान्य से 29% ज्यादा बारिश हुई और उसे "अधिक" श्रेणी में रखा गया.

अल नीनो की पृष्ठभूमि

आईएमडी से जुड़े जलवायु वैज्ञानिक डॉ. सत्यबन बी. रत्ना के विश्लेषण के अनुसार इस मौसम में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति विकसित हुई और मजबूत होती गई. मध्य और पूर्वी प्रशांत में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ऊंचा रहा. अल नीनो को भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून को प्रभावित करने वाला एक अहम बड़ा जलवायु कारक माना जाता है. हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) मोटे तौर पर तटस्थ रहा.

हालांकि विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि ये बड़े कारक केवल पृष्ठभूमि तैयार करते हैं. बारिश का स्थानीय वितरण मानसून के भीतर की उतार-चढ़ाव, निम्न दबाव प्रणालियों, वायुमंडलीय परिसंचरण और क्षेत्रीय प्रक्रियाओं पर भी निर्भर करता है. इसलिए पूरे देश की कमी को केवल अल नीनो से जोड़कर देखना सही नहीं होगा.

नवंबर में चरम पर पहुंच सकता है अल नीनो

यह स्थिति ऐसे समय सामने आई है जब अल नीनो की परिस्थितियां मजबूत हो रही हैं. आईएमडी के महानिदेशक एम महापात्र ने कहा, "अल नीनो के नवंबर में चरम पर पहुंचने और उसके बाद कमजोर होने की संभावना है." सितंबर में तापमान ने भी रिकॉर्ड बनाए. देश का औसत अधिकतम तापमान 32.05 डिग्री सेल्सियस रहा, जो 1901 के बाद सितंबर महीने का सबसे अधिक औसत अधिकतम तापमान है.

औसत न्यूनतम तापमान 23.39 डिग्री सेल्सियस रहा, जो अब तक का चौथा सबसे अधिक सितंबर औसत न्यूनतम तापमान है. वहीं, 27.72 डिग्री सेल्सियस का औसत तापमान 1901 के बाद सितंबर का पांचवां सबसे अधिक औसत रहा.

किसानों के लिए क्या मायने

खरीफ: जून में बुवाई के समय कमी और अगस्त-सितंबर में फिर कमी का असर उन इलाकों में ज्यादा पड़ने की आशंका है जहां फसलें पूरी तरह वर्षा पर निर्भर हैं. पंजाब जैसे राज्यों में सिंचाई के साधन अपेक्षाकृत मजबूत हैं, जबकि मराठवाड़ा, रायलसीमा, उत्तरी कर्नाटक और बिहार जैसे क्षेत्रों में असर अधिक महसूस हो सकता है. वास्तविक फसल नुकसान का आकलन राज्य कृषि विभागों की रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा.

रबी की तैयारी: जिन इलाकों में मानसून कमजोर रहा, वहां मिट्टी में नमी और जलाशयों में उपलब्ध पानी रबी की बुवाई की योजना तय करेगा. किसानों को अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) और कृषि विभाग से सलाह लेकर फसल चयन, बीज और सिंचाई की योजना बनानी चाहिए.

बीमा और राहत: कम बारिश वाले क्षेत्रों के किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत दावों और राज्य सरकारों की सूखा राहत घोषणाओं पर नजर रखनी चाहिए.

मानसून की वापसी अभी बाकी

आईएमडी ने स्पष्ट किया है कि 30 सितंबर को मानसून सीजन की समाप्ति का मतलब यह नहीं है कि मानसून देश से लौट गया है. मानसून की वापसी की घोषणा आईएमडी अलग से मौसम विज्ञान मानदंडों के आधार पर करता है. इसलिए अक्टूबर में भी कुछ इलाकों में बारिश की गतिविधि जारी रह सकती है, जिस पर कटाई के लिए तैयार खरीफ फसलों वाले किसानों को नजर रखनी चाहिए.

English Summary: southwest monsoon 2026 rainfall 12-6 percent below normal impact on kharif and rabi crops Published on: 03 October 2026, 12:27 PM IST

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