1. पशुपालन

Goat Farming Business: बकरी पालन में लागत, फायदे, प्रमुख नस्लें और संभावित रोग समेत सम्पूर्ण जानकारी

Goat Farming

पशुपालन बिजनेस (Animal Husbandry Business) एक ऐसा बिजनेस है जिसे छोटे से छोटे स्तर पर कम लागत में शुरू कर सकते हैं. ऐसे में अगर आप एक किसान हैं और पशुपालन करने की इच्छा रखते हैं तो बकरी पालन बिजनेस (Goat Farming Business) शुरू कर सकते हैं. Goat Farming Business एक ऐसा बिजनेस है, जिसे कम लागत में शुरू कर सकते हैं.

गौरतलब है कि बकरियों की कई ऐसी नस्लें हैं जिनसे मांस के साथ-साथ अच्छा दुग्ध उत्पादन भी हो जाता है. तो आइए जानते हैं कि बकरी पालन क्या है और इसमें कितनी लागत आती है, साथ ही बकरी पालन बिजनेस से कितना कमा सकते हैं-

बकरी पालन बिजनेस में लागत (Cost in Goat Rearing Business)

अगर आप बकरी पालन शुरू करना चाहते हैं, तो आपको कम से कम 4 से 5 लाख रूपये तक की जरूरत पड़ेगी. इतने में बकरियों के लिए शेड, साथ ही उनका दाना-पानी और उनके देखभाल सकुशलता कर सकते हैं.

आपको यह लागत शुरुआती दौर में बकरियां खरीदने में, शेड बनाने में, बकरियों का चारा खरीदने और लेबर कॉस्ट में लगानी है. बता दें कि बकरी पालन बिजनेस में लागत से कई गुणा ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है.

बकरी पालन के फायदे (Benefits of Goat Farming)

सूखा प्रभावित क्षेत्र में खेती के साथ बकरी पालन (Bakari Palan) आसानी से किया जा सकने वाला कम लागत का अच्छा बिजनेस है, इससे मोटे तौर पर निम्न लाभ होते हैं-

- जरूरत के समय बकरियों को बेचकर आसानी से नकद पैसा प्राप्त किया जा सकता है.
- बकरी पालन करने के लिए किसी भी प्रकार की तकनीकी ज्ञान की जरुरत नहीं पड़ती.
- यह बिजनेस बहुत तेजी से बढ़ता है. इसलिए यह Business कम लागत में अधिक मुनाफा देना वाला है.
- इनके लिए बाजार स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हैं. अधिकतर व्यवसायी गांव से ही आकर बकरी-बकरे को खरीदकर ले जाते हैं.

बकरियों की प्रमुख नस्लें (Major Breeds of Goats)

ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरी (Black Bengal Goat Breed)

ब्लैक बंगाल नस्ल के मादा बच्चे करीब 8-10 माह की उम्र में वयस्क हो जाते हैं. अगर शारीरिक वजन ठीक हो तो मादा मेमना (पाठी) को 8-10 माह की उम्र में पाल दिलाना चाहिए अन्यथा 12 महीने की उम्र में पाठी में ऋतुचक्र एवं ऋतुकाल छोटा होता है. वैसे बकरी में ऋतुचक्र करीब 18-20 दिनों का होता है एवं ऋतुकाल 36 घंटों का. बकरियां सालों भर गर्म होती है लेकिन अधिकांश बकरियां मध्य सितम्बर से मध्य अक्टूबर तथा मध्य मई से मध्य जून के बीच गर्म होती है. अन्य समय में कम बकरियां गर्म होती है.

जमुनापारी नस्ल की बकरी (Jamunapari Goat Breed)

जमुनापारी भारत में पायी जाने वाली अन्य नस्लों की तुलना में सबसे उँची तथा लम्बी होती है. यह उत्तर प्रदेश के इटावा जिला एवं गंगा, यमुना तथा चम्बल नदियों से घिरे क्षेत्र में पायी जाती है.एंग्लोनुवियन बकरियों के विकास में जमुनापारी नस्ल का विशेष योगदान रहा है.

सिरोही नस्ल की बकरी (Sirohi Goat Breed)

सिरोही नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से राजस्थान के सिरोही जिला में पायी जाती हैं. यह गुजरात एवं राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी उपलब्ध हैं. इस नस्ल की बकरियां दूध उत्पादन हेतु पाली जाती हैं लेकिन मांस उत्पादन के लिए भी यह उपयुक्त हैं. इनका शरीर गठीला एवं रंग सफेद, भूरा या सफेद एवं भूरा का मिश्रण लिए होता है. इनका नाक छोटा और उभरा हुआ है. कान लम्बा होता है. पूंछ मुड़ा हुआ एवं पूंछ का बाल मोटा तथा खड़ा होता है. यह सलाना एक वियान में औसतन 1 से 5 बच्चे उत्पन्न करती है. इस नस्ल की बकरियों को बिना चराये भी पाला जा सकता है.

ओस्मानाबादी नस्ल की बकरी (Usmanabadi Goat Breed)

बकरी की यह नस्ल महाराष्ट्र के ओस्मानाबादी जिले में पाई जाती है इसलिए इसे ओस्मानाबादी बकरी कहा जाता है. जो कि दूध और मांस उत्पादन दोनों के लिए उपयोगी होती है. इस नस्ल की बकरी कई रंगों में पाई जाती है. इसके प्रौढ़ नर बकरे का वजन लगभग 34 किलो और मादा बकरी का वजन 32 किलो ग्राम होता है. बकरी की यह नस्ल रोजाना 0.5 से 1.5 लीटर दूध देने में सक्षम होती है.

बीटल नस्ल की बकरी (Beetle Goat Breed)

बीटल नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से पंजाब प्रांत के गुरदासपुर जिला के बटाला अनुमंडल में पाई जाती हैं. पंजाब से लगे पाकिस्तान के क्षेत्रों में भी इस नस्ल की बकरियां उपलब्ध हैं. इनका शरीर भूरे रंग पर सफेद-सफेद धब्बा या काले रंग पर सफेद-सफेद धब्बा लिये होता है.

बकरियों को होने वाले सामान्य रोग (Common Diseases of Goats)

पी. पी. आर: यह रोग “काटा” या “गोट प्लेग” के नाम से भी जाना जाता है. यह एक संक्रमक बीमारी है जो भेड़ों एवं बकरियों में होती है.

खुरपका मुहंपका रोग: मुहं के अंदर जीभ, होठ गाल, तालू और मुहं के अन्य भागों में फफोले निकल जाते हैं. केवल खुरपका होने पर खुर के बीच और खुर के ऊपरी भागों में फफोलें निकल आते हैं. ये फफोले फट जाते हैं. कभी– कभी बीमार बकरी को दस्त होने लगता है निमोनिया भी हो जाती है. यह रोग ज्यादातर गर्मी या बरसात में फैलता है.

प्लूरों निमोनिया (संक्रामक): यह बहुत खतरनाक बीमारी है और इसका शिकार किसी आयु की बकरी को हो सकती है. खाँसी आना, लगातार छींकना, नाक बहना और भूख की कमी इस रोग के खास लक्षण हैं.

निमोनिया: सर्दी लग जाने या लंबी सफर तय करने के फलस्वरूप यदि बकरी को बुखार हो जाए, उसे भूख नहीं लगे, कभी – कभी खाँसी हो और साँस लेने में कठिनाई हो तो समझ लेना चाहिए की उसे निमोनिया हो गया है.

अधिक जानकारी के लिए निचे दिये गए पता पर संपर्क करें-

बकरी पालक का नाम: शशि भूषण
ब्रांड नाम- झारखंड बकरी फार्म      
पता- गोविंदपुर, धनबाद, झारखंड
फोन नंबर- 9905274413

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Hey! I am विवेक कुमार राय. Did you liked this article and have suggestions to improve this article? Mail me your suggestions and feedback.

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