Animal Husbandry

मछली पालन के लिए तालाब का निर्माण एवं मछलियों में होने वाले विभिन्न प्रकार के जीवाणु जनित रोगों का उचित प्रबंधन

वर्तमान समय में बढती आबादी एवं घटती कृषि योग्य भूमि पर कम समय में अधिक पैदावार प्राप्त करना किसानों के लिए एक चुनौती है.  जिसका समाधान कृषि के लिए कुछ इस तरह की फसलों का चयन हो सकता है, जो कम समय में अधिक पैदावार दें एवं जिनका बाजार में मूल्य व मांग अधिक हो. मछली पालन व्यवसाय कुछ इसी तरह की फसल है. जिसमें उपरोक्त सारे गुण मौजूद है. क्योंकि यह फसल 6 माह में तैयार हो जाती है एवं 3-4 टन प्रति हैक्टेयर की दर से उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. मछली पालन व्यवसाय को सफल बनाने के लिए उचित प्रबंधन आवष्यक है जो कि निम्न प्रकार किया जा सकता है-

मछलीपालन तालाब के निर्माण हेतु ध्यान रखने योग्य बातें

तालाब की गहराई 1.5 से 2.0 मीटर होनी चाहिए, इससे अधिक गहराई मछली पालन पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है.

तालाब का आकार आयताकार होना अधिक उपयुक्त है.

जिन क्षेत्रों में रेतीली मिट्टी हो वहॉ तालाब के पैंदे का उचित उपचार किया जाना आवष्यक है, जिसके लिए विभिन्न विधियॉ काम में ली जा सकती है. जैसे- सोइल कॉम्पेक्सन, बेन्टोनाइट क्ले, पोलीथीन लेयर आदि। इन विधियों में पोलीथीन लेयर का इस्तेमाल जल के रिसाव को नगण्य कर सकता है.

तालाब में बीज संचय से पूर्व जल एवं मिट्टी की गुणवत्ता का प्रयोगशाला में परिक्षण करवाना आवष्यक है.

तालाब में बीज संचय हेतु 5 से 10 से.मी आकार के बीज किसी प्रमाणित हेचरी से लेकर एक निष्चित अनुपात में डालने चाहिए.

तालाब में ऑक्सिजन का स्तर उचित बनाये रखने हेतु पेडल व्हील एरेटर का उपयोग किया जा सकता है.

मछलियों के लिये 25 से 30 प्रतिशत प्रोटीन युक्त आहार दिया जाना आवश्यक है.

मछलियों कि उचित वृद्धि हेतु इनके भार का 2 से 3 प्रतिशत आहार प्रतिदिन देना  आवश्यक है.

मछलियों की प्रजातियों का चयन सावधानीपूर्वक करना चाहिए, जैसे कि ताजा पानी वाले क्षेत्रों में प्रमुखता से इंडियन मेजर कॉर्प, रोहू, कटला, नैनद्ध एवं एक्जोटिक कार्प ;सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प, कामन कार्पद्ध का उत्पादन किया जाता है.

तालाब में पादप प्लवक की संख्या बढाने हेतु कार्बनिक, गाय का गोबरद्ध एवं अकार्बनिक खाद, यूरिया, सुपर फास्फेट आदिद्ध का प्रयोग किया जा सकता है. ये पादप प्लवक मछलीयों के लिए उपयुक्त आहार का कार्य करते है, जिससे बाहरी स्रोत से दिये जाने वाले कृत्रिम भोजन की मात्रा में कमी आयेगी एवं लागत मूल्य कम होगा जिससे किसान का लाभ प्रतिशत बढ जायेगा.

मछली संचय से पूर्व तालाब का परीक्षण एवं प्रबंधन

तालाब में मछली पालन हेतु उचित जल स्तर बनाये रखना आवष्यक है.  अतः उन तालाबों में जहाँ पानी रिसता हो, मछली पालना मुश्किल होता है. यदि तालाब की तली में कंकड़ पत्थर अधिक हो तो पानी रिसने की समस्या और बढ़ जाती है. पानी रिसने की समस्या को गोबर की खाद की मात्रा बढ़ाकर कुछ हद तक कम किया जा सकता है. तालाब की तली में यदि पॉलीथीन की चादर बिछा दी जाये तथा उसके ऊपर लगभग 20 - 30 से.मी. मिट्टी डाल दी जाये तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है. यदि किसी तालाब में काई ज्यादा हो जाये तो काई को फ्राइनेट या कपड़े द्वारा कुछ हद तक साफ किया जा सकता है. काई को समाप्त करने के लिए रासायनिक पदार्थो में सीमाजीन (5-10 किग्रा/हे.मी.) के घोल का प्रयोग करना चाहिए, इसके प्रयोग से 3 सप्ताह में षैवाल का सम्पूर्ण विनाष हो जाता है.

सामान्यतः तालाब में रोड़ेदार चूने (CaCo3) का प्रयोग करना चाहिए. रोड़ेदार चूने को तालाब में प्रयोग करने से पहले कूट लेना चाहिए या एक दो दिन तक रखने के बाद प्रयोग करना चाहिए. कली चूना (Ca0) तथा बूझे हुए चुने (Ca(OH)2) का भी प्रयोग किया जा सकता है. लेकिन इनकी दरों में रोड़ेदार चूने से अंतर होता है. सामान्यतः रोड़ेदार चूने का प्रयोग 200-250 किग्रा  प्रति हे. (जब जलीय पी.एच मान 7.0 के आस-पास हो) किया जाता है जबकि कली चूने का प्रयोग 100-125 कि.ग्रा. प्रति हे. तथा बुझे चूने का प्रयोग 150-187.5 कि.ग्रा. प्रति हे. किया जाता है. तालाब में गोबर एवं चूने के प्रयोग के लगभग 10-15 दिनों के बाद ही मत्स्य बीज का संचय करना चाहिए. गोबर तथा चूने के प्रयोग हो जाने के बाद 10-15 दिनों में मछलियों के प्राकृतिक भोज्य पदार्थ (पादप एवं जन्तु प्लवक) प्रचुर मात्रा में बन जाते है तथा चूने एवं गोबर के सड़ने से उत्पन्न अनावश्यक गैसें उड़ जाती है. यदि किसी तालाब केजल का पी.एच. मान 9.0 से ज्यादा हो जाये तो उसमें जिप्सम (5000-6000 कि.ग्रा./हे.) का प्रयोग करना चाहिए. यदि जिप्सम उपलब्ध न हों पाये तो पी.एच. को उदासीन करने के लिए प्रति हैक्टेयर 20000-30000 किग्रा. तक कच्चा गोबर डालना चाहिए.

किसी भी जल क्षेत्र में खरपतवार मत्स्य उत्पादन में बाधक सिद्ध होते है. इनका सम्पूर्ण उन्मूलन तो संभव नहीं है, परन्तु समय-समय पर निकालने तथा विभिन्न तरीकों से रख रखाव करने से उनकी बढ़ोतरी पर नियंत्रण किया जा सकता है. जलीय वनस्पितियों का नियंत्रण मुख्यतः श्रमिकों द्वारा,  मशीनों द्वारा, रसायनों द्वारा तथा जीवों द्वारा किया जा सकता है. श्रमिकों द्वारा नियंत्रण हेतु हंसिया, पंजे, कांटेदार तार, जाल, बांस तथा मोटी रस्सी का प्रयोग किया जाता है. जब उपरोक्त विधियाँ कारगर न हो तो खरपतवार नाशक दवाओं का प्रयोग किया जाता है. इन रसायनों का प्रयोग खरपतवारों की प्रजातियों के अनुसार करना ज्यादा लाभदायक है जैसे 2-4 डी (10-20 मिग्रा./कि.ग्रा. पौधभार) जलकुम्भी के लिए, तरल अमोनिया (200-250 किग्रा./हे.) जलमग्न वनस्पितियों जैसे हाइड्रिला, वैलिसनेरिया, कारा, पोटैमोजिटान इत्यादि के लिए जलीय खरपतवारों का जैविक नियंत्रण करना सबसे अच्छा तरीका है। इसके लिए ग्रास कार्प मछली सबसे उपयुक्त है यह अधिकतर जलमग्न वनस्पितियों को खा लेती है. सिल्वर कार्प सूक्ष्म पादप प्लवकों को खाती है. बतख आदि भी छोटे जलीय खरपतवार को भोजन के रूप में ग्रहण करते है.

मत्स्य बीज संचय

हमारे देश में आमतौर पर तीन देशी (रोहू, कतला, मृगल) तथा तीन विदेशी (ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प तथा कामन कार्प) मछलियों का पालन किया जाता है. मछली का बीज बरसात के मौसम में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है. अतः इस मौसम में मत्स्य बीज का संचय करना ज्यादा अच्छा रहता है, वैसे किसी भी मौसम में (गर्मी को छोड़कर) मत्स्य बीज का संचय किया जा सकता है.

मीठे जल में पाली जाने वाली कार्प मछलियों का मिश्रित पालन करना ज्यादा अच्छा रहता है. सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प, कामन कार्प, कतला, रोहू तथा नैन मछलियाँ मिश्रित मत्स्य पालन के लिए उपयुक्त है. इनमें कतला तथा सिल्वर कार्प सतहभक्षी मछलियाँ है. इन्हें कुल मछलियों का 35 प्रतिशत (15 प्रतिशत कतला, 20 प्रतिशत सिल्वर कार्प) डालना चाहिए. नैन तथा कामन कार्प तल भक्षी मछलियाँ है. इन्हें भी 35 प्रतिशत (15 प्रतिशत नैन, 20 प्रतिशत कामन कार्प) तक डाला जा सकता है. रोहू तालाब के मध्य में रहती है तथा इसकी संख्या 20 प्रतिशत तक रखी जा सकती है. ग्रास कार्प घास खाने वाली मछली है. इसकी संख्या 10 प्रतिशत तक रखनी चाहिए. मैदानी क्षेत्रों में एक हैक्टेयर जलक्षेत्र में लगभग 8000- 10000 मत्स्य बीज (अंगुलिकाएँ) संचित की जा सकती है. ध्यान रहें विभिन्न प्रजातियों का संचय संस्तुत दरों से ही करें.

मत्स्य बीज संचय के समय मत्स्य बीज वाले पात्र को तालाब के पानी में कुछ समय के लिए बिना खोले डुबाकर रखना चाहिये. इससे मत्स्य बीज वाले पात्र तथा तालाब के जल का तापमान लगभग समान हो जाता है. वैसे तो मत्स्य बीज संचय तालाबों में किसी भी समय किया जा सकता है.  परन्तु प्रातः काल का समय सबसे उपयुक्त है. जीवाणुओं एवं परजीवी आदि से मछली के बच्चों को मुक्त कराने के लिए उनको 3 प्रतिशत साधारण नमक के घोल या 2-3 मिग्रा./ली. पोटैशियम परमैंग्नेट के घोल या 1 मिग्रा./ली. एक्रिफ्लैबिन के घोल में कुछ समय के लिए डुबो लेना चाहिए.

मत्स्य आहार

सभी जीव जन्तुओं की तरह मछलियों को भी वृद्धि एवं जीवन क्रियाओं के लिए भोजन की  अवश्यकता होती है. मछलियाँ अपना कुछ भोजन जलीय वनस्पति, जन्तु प्लावकों तथा जलीय जीवाणुओं से प्राप्त करती है. लेकिन इससे सीमित उत्पादकता ही प्राप्त हो पाती है. अतः मछलियों की संतोशजनक वृद्धि के लिए बाहर से एक निश्चित मात्रा में संतुलित भोजन देना अवश्यक हो जाता है. प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि केवल प्राकृतिक भोजन से प्राप्त उत्पादकता को परिपूरक आहार द्वारा 3 से 4 गुना तक बढ़ाया जा सकता है. कृत्रिम आहार या परिपूरक आहार बनाने वाली सामग्रियों को मुख्यतः दो वर्गो में रखा जा सकता है -

वनस्पति मूल की जैसे घास, विभिन्न प्रकार की खली, चावल का कन्ना, चावल की भूसी, गेंहू का चोकर, सोयाबीन, मक्का, ज्वार, बाजरा, इत्यादि।

जन्तु मूल की जैसे मत्स्य चूर्ण, कीड़ों के प्यूपा, मांस, रक्त चूर्ण, झींगा, केंकड़े, घोंघे, जलीय कीड़े इत्यादि.

आमतौर पर मत्स्य पालक चावल का कन्ना तथा मूंगफली या सरसों की खली को ही बराबर मात्रा में मिलाकर परिपूरक आहार के रूप में मछलियों को खिलाते है. प्रायः खली तथा चावल के कन्ने को भिगोकर गूंथने के बाद बड़े -बड़े गोल बनाकर मिट्टी या प्लास्टिक के थालों में रखकर दिया जाता है. आहार सर्वदा निश्चित समय एवं निश्चित स्थानों पर दिया जाना चाहिए. अतः तालाब में 3-4 जगहों पर बांस गाड़कर स्थाना निश्चित कर लिया जाता है. अच्छी उत्पादकता के लिए बड़ी मछलियों को प्रतिदिन आहार जितनी मात्रा में दिया जाना हो, उसे आधा- आधा बांटकर दो बार प्रातः काल 8-9 बजे और अपरान्ह में 4-5 बजे दिया जाना चाहिए. बढ़ती हुई मछलियों के बढ़ते हुए भार एवं उनकी खाने की क्षमता को आधार मानकर आहार देने का सुझाव दिया जाता है. बढ़ती मछलियों के लिए आहार को देहभार को 2-5 प्रतिशत देते है.

मछलियों में होने वाली बीमारियों का प्रबंधन

वातावरण के रासायनिक तथा भौतिक गुणों में लगातार परिवर्तन होता रहता है. जिससे मछली की सामान्य क्रियाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और मछली में तनाव उत्पन्न होता है. तनाव उत्पन्न करने वाले कारक मछली में कई संरचनात्मक, जैव रासायनिक एवं जैव क्रिया सम्बन्धी परिवर्तन करते हैं. मछली पर तनाव स्थिति के समयान्तराल एवं परिमाण पर निर्भर करता है. तनाव का अंतिम परिणाम मृत्यु है. लेकिन कम घातक तनाव के प्रभाव में मछली की पैदावार, कम हो जाती है.

मछलियों को रोग मुक्त रखने के लिए तालाब में प्रत्येक माह चूने का प्रयोग करते रहने चाहिए (100-200 किग्रा./हे.) जिससे जल का पी.एच. 8.5 से अधिक न हो. कभी-कभी लाल दवा के घोल का छिड़काव (1-2 मिग्रा./ली) भी मछलियों को रोग मुक्त करता है. मत्स्य आहार भी ताजा ही प्रयोग करना चाहिए. इस प्रकार प्रबंधन करने से मछलियों में जल्दी रोग नहीं लगते है.

अक्सर तालाब केजल में ऑक्सीजन की कमी होने पर मछलियाँ सतह के ऊपर आने लगती है तथा उनके मरने की सम्भावना भी बढ़ जाती है. उस समय जल में ऑक्सीजन बढ़ाने हेतु कुछ उपाय करने चाहिए. ऑक्सीजन बढ़ाने की पारंपरिक विधियों में पम्प द्वारा तालाब केजल को उसी में पुनः डालना, तालाब में स्वच्छ जल भरना, तालाब में तैरना, तालाब केजल को डण्डे से पीटना, तालाब में केले के पत्ते डालना, जल में लाल दवा डालना इत्यादि प्रमुख है. इन विधियों में तालाब में घुलित ऑक्सीजन के स्तर को बढ़ाया जा सकता है तथा मछलियों के मरने से बचाया जा सकता है.

वैसे तो मछलीयों में रोग का कारण कई प्रकार के रोगकारक जैसे जीवाणू , वीषाणू या कवक हो सकते है. लेकिन अधिकांश मछलियों में जीवाणू जनित रोग प्रमुखता से देखे गये है जो कि निम्न प्रकार है-

प्रमुख जीवाणु जनित रोग

बैक्टीरियल हीमोरैजिक सेप्टीसिमिया

मछलियों में सेप्टीसिमिया एरोमोनास हाइड्रोफिला (लिक्विफेसिएंस) तथा सीडोमोनास फ्लुरिसेन्स नामक जीवाणुओं से होता है. इसमें त्वचा पर घाव तथा नेत्रों में उभार आ जाता है. यह रोग जल के तापमान बढ़ने या प्रदूषित जल होने से उत्पन्न होता है. इसमें घाव तेजी से फैलते हैं तथा पंखों के आधार पर भी हो जाते हैं तथा शरीर के अन्दर रक्तीय द्रव्य भर जाता है. इस रोग के उपचार के लिए-

तालाब में 2-3 मिग्रा/ली. पोटेषियम परमैंगनेट का घोल डालना चाहिए.

टेरामाइसिन को 65-80 मिग्रा/किग्रा मछली भार भोजन के साथ 10 दिन तक लगातार दें.

बड़ी मछली को 25 मिग्रा स्ट्रेप्टोमाइसिन व 20000 आई यू पेनिसिलीन का प्रति किग्रा मछली भार का इन्जेक्षन देना चाहिए.

ड्राप्सीः-

यह मछलियों को पोषण युक्त भोजन न मिलने के कारण फैलता है. इससे मछली का शरीर सिर की तुलना में काफी पतला हो जाता है. ऐसी मछली पर एरोमोनास हाईड्रिला नामक जीवाणु आसानी से आक्रमण करता है. इस रोग में मछली के पेट में पानी भर जाता है. इसके उपचार के लिए-

मछलियों को उचित मात्रा में पोषण युक्त आहार देना चाहिए तथा तालाब में उपयुक्त जल स्तर बनाये रखना चाहिए.

तालाब में प्रति 15 दिन में 100 किग्रा./हे. की दर से चूना का प्रयोग इस रोग को ठीक कर देता है.

कोलुम्नैरिस रोग

यह बीमारी मीठे जल की मछलियों में लगती है. मछली में तनाव की स्थिति में फ्लेक्सीबैक्टर तथा साइटोफैगा कोलुम्नैरिस नामक जीवाणुओं द्वारा यह रोग उत्पन्न होता है. इस रोग को टेल राट तथा गिलराट भी कहा जाता है. इस रोग से ग्रस्त मछली के बाह्य शरीर व गलफड़ों पर घाव हो जाते हैं बाद में जीवाणु मछली के ऊतकों में चले जाते हैं. इस रोग के उपचार के लिए -

मछली के घाव वाले भाग में लाल दवा का लेप करना चाहिए.

तालाब में पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) का 2-3 मिग्रा./ली. छिड़काव करना चाहिए.

1-2 मिग्रा./ली. कापर सल्फेट का घोल तालाब मे डालना भी रोग को ठीक करता है.

भोजन के साथ नाइट्रोफ्यूराजोन की 6.5 ग्रा. मात्रा प्रति 100 किग्रा. मछली भार के बराबर देनी चाहिए.

एडवर्डसिलोसिस

यह रोग ऐडवर्डसिएला टारडा  नामक जीवाणु से फैलता है. इसे सड़कर गल जाने वाला रोग भी कहते हैं. इस रोग में गैस से भरे  फोड़े बन जाते हैं. रोग की अन्तिम अवस्था में मछली से सड़ी दुर्गंध आने लगती है. यह रोग मछली के लार्वा व जीरों में भी पाया जाता है। इस रोग के उपचार के लिए संक्रमित मछलियो को कापर सल्फेट के घोल में 15 मिनट तक डुबोना चाहिए. एक दूसरे उपचार में रोगग्रस्त मछली को 0.04 मिग्रा./ली. आयोडीन के घोल में 2 घंटे के लिए रखना चाहिए.

विब्रियोसिस

विब्रियो प्रजातियों के जीवाणु इस रोग को फैलाते हैं. इस रोग के मुख्य लक्षण मछली का भोजन न करना, पेट में पानी का जमाव तथा मछली का मर जाना इत्यादि है. यह रोग मछली की आँखों को भी प्रभावित करता है तथा आँखों में सूजन आ जाती है तथा आँखें सफेद पड़ जाती हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए टीकाकरण कराना चाहिए. इसके अलावा आक्सीटेट्रा साइक्लिन तथा सल्फोनामाइड को 8 -12 ग्रा./किग्रा. भोजन के साथ देना चाहिए.

फ्यूरूनकुलोसिस

एरोमोनास सालमोनिसिडा नामक जीवाणु इस रोग का रोग जनक है. इस रोग की शुरू की अवस्था में छोटे-छोटे फोड़े पड़ जाते हैं तथा फोड़ों के फूटने पर घाव बन जाते हैं. इसके उपचार के लिए आक्सीटेट्रा साइक्लिन की 55 मिग्रा/किग्रा. मछली भार की दर से 7-10 दिनों तक इंजेक्शन लगाने से इस रोग पर नियन्त्रण किया जा सकता है इस बीमारी में मछली की रक्त नलिकाओं में जीवाणु का जगह- जगह जमाव हो जाने से छोटे-छोटे फोड़े बन जाते हैं जिन्हे त्वचा पर देखा जा सकता है. मछली के जीरो तथा अंगुलिकाओं में यह रोग अधिकतर देखा जाता है. इसके उपचार के लिए सल्फोनामाइड की 3 ग्रा/किग्रा आहार की मात्रा के साथ 2 सप्ताह तक देना चाहिए.

फिन राट

यह रोग मुख्यतः ऐरोमोनास फ्लुओरेसेन्स, स्यूडोमोनास फ्लुओरेसेन्स तथा स्यूडोमोनास पुट्रीफेसीऐन्स नामक जीवाणुओं के द्वारा फैलता है. इसके उपचार के लिए-

स्वच्छ जल भरना चाहिए, साथ ही फोलिक एसिड की कुछ मात्रा भोजन में मिलाकर खिलाना चाहिए.

1 प्रतिशत एक्रिफ्लेविन को 1000 लिटर पानी में 100 मिली की दर से मिलाकर रोगी मछलियों को 30 मिनट के लिए रखना चाहिए.

अतः उपरोक्तानुसार तालाब एवं रोगों का प्रबंधन करके मत्स्य उत्पादन.

 

पवन कुमार शर्मा , डॉ. बी. के. शर्मा एवं डॉ. एस. के. शर्मा
ईमेल आईडी- pawan.sharma32224@gmail.com
मोबाइल नं. +91-9024974343


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