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ड्रिप सिंचाई तकनीक के सहारे किसानों ने की तरबूज की खेती

वैसे तो तरबूज की खेती को नदी के किनारे किया जाता है लेकिन मध्य प्रदेश के देवास जिले के खाते गांव के रहने वाले कई किसान अपने खेतों में तरबूज की खेती करके गेहूं, चना और मूंग की फसलों की तुलना में कई गुना ज्यादा मुनाफा कमा रहे है. दरअसल मध्य प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में खेती करने का तरीका काफी ज्यादा बदला है. सभी किसान अब परंपरागत फसल को उगाने की जगह ऐसी फसलें उगाने लगे है जिनमें अधिक मुनाफा हो रहा है. इस तरह से किसानों को ज्यादा मुनाफा भी प्राप्त हो रहा है.

दरअसल किसान तरबूज की खेत में सिंचाई के लिए ड्रिप इरिगेशन सिस्टम का प्रयोग कर रहे है. जिससे वह खेत को इस पद्धति के जरिए आवश्यक मात्रा में पानी को उपलब्ध करवा रहे है. ग्राम घोड़ी घाट के किसान शरद मनोरी लाल विश्नोई पिछले चार वर्षों से न केवल तरबूज की खेती कर रहे है बल्कि वह इसकी खेती के लिए अन्य किसानों को प्रेरित भी कर रहे है.अब उनकी कमाई लाखों में हो रही है. हालांकि बीज का गलत चयन और नाली वाली पद्धति के चलते शुरूआती दो सालों में उनको भारी नुकसान भी उठाना पड़ा था. उस वक्त खेत में तरबूज की फसल लगने से हुए नुकसान के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और ड्रिप सिंचाई को अपनाया. आज वह खेत में मल्चिंग प्रणाली का भी उपयोग कर रहे है.

कुछ मुनाफा, कुछ नुकसान

शरद ने अपने 4 एकड़ के खेत में तरबजू लगाए थे. इसमें एक हजार क्विंटल की पैदावार हुई थी. इस उपज को भोपाल के होलसेल बाजार में दलालों के माध्यम से बेचा है. फसल की लागत कमीशन, ट्रांसपोर्टेशन का खर्च काटकर उन्हें लगभग 4.50 लाख का शुद्ध मुनाफा हुआ है. इस वर्ष पानी की कमी के चलते सिर्फ एक एकड़ में ही तरबूज लगा पाए है. इस वर्ष शरद ने काजल की किस्म का तरबूज लगाया है. इस साल तरबूज की फसल को पानी की कमी के चलते केवल एक एकड़ में ही तरबूज लगा पाए है. इससे उनको ज्यादा मुनाफा नहीं मिल पाया है.

कैशक्रॉप की ओर किसानों का रूझान

मध्य प्रदेश कृषि विभाग के अनुसार कुछ साल पहले तक क्षेत्र के अधिकतर किसान इस सीजन में गेंहू, चना, मूंग की फसल को लेते थे. लेकिन अब किसानों का रूझान खीरा, ककड़ी, भिंडी सहित अन्य सब्जियों और तरबूज जैसी कैश क्रॉप की तरफ तेजी से बढ़ा रहे है.

ड्रिप सिंचाई प्रणाली

ड्रिप सिंचाई प्रणाली फसल को मुख्य रूप से पंक्ति, उप पंक्ति, और पाश्रव पंक्ति के तंत्र के उनकी लंबाईयों के अंतराल के साथ उत्सर्जन बिंदु का उपयोग करके पानी को वितरित करती है. प्रत्येक ड्रिपर, महाना, संयंत्र, पानी और पोषक तत्वों और अन्य वृद्धि के लिए आवश्यक पदार्थों की विधिपूर्वक नियंत्रित करके एक समान निर्धारित मात्रा, सीधे पौधों की जड़ों में आपूर्ति करता है. इस विधि के सहारे पौधों की नमी और पोषक तत्वों की कमी को तुरंत ही दोबारा से प्राप्त किया जा सकता है.



English Summary: Watermelon growing with drip technology in Madhya Pradesh

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