फॉस्फोरस एक आवश्यक पादप पोषक तत्व है, जो जड़ों के विकास, ऊर्जा स्थानांतरण, पुष्पन तथा बीज निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और विशेष रूप से फसल की प्रारंभिक वृद्धि अवस्थाओं में इसकी आवश्यकता अधिक होती है. दशकों से किसान फसलों की पोषक तत्व आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यूरिया, डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भर रहे हैं. हालांकि, इसके परिणामस्वरूप भारतीय कृषि में पोषक तत्वों का गंभीर असंतुलन उत्पन्न हुआ है, जहाँ अनुशंसित N:P:K अनुपात 4:2:1 से बदलकर लगभग 9.8:3.7:1 हो गया है. उर्वरकों की बढ़ती लागत, सब्सिडी पर बढ़ता दबाव तथा वैश्विक आपूर्ति संबंधी अनिश्चितताओं ने फॉस्फोरस प्रबंधन रणनीतियों पर पुनर्विचार की आवश्यकता को और अधिक बढ़ा दिया है.
भारत में अधिकांश मृदा उपलब्ध फॉस्फोरस की दृष्टि से कमीग्रस्त है. यहाँ तक कि जब फॉस्फोरस मृदा में उपस्थित होता है, तब भी यह प्रायः कैल्शियम, लौह तथा एल्युमिनियम यौगिकों के साथ स्थिरीकरण के कारण पौधों के लिए अनुपलब्ध हो जाता है. परिणामस्वरूप, उर्वरकों के माध्यम से प्रदान किए गए फॉस्फोरस का केवल लगभग 10–30 प्रतिशत ही फसलों द्वारा उपयोग किया जा पाता है, जबकि शेष भाग मृदा में स्थिर हो जाता है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ती है तथा पर्यावरणीय चिंताएँ भी उत्पन्न होती हैं.
पूर्ववर्ती कृषि प्रणालियाँ फॉस्फोरस की आपूर्ति के लिए मुख्यतः प्राकृतिक खनिज स्रोत, फसल अवशेषों तथा पशु अपशिष्टों जैसे प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर थीं. किंतु हरित क्रांति के बाद रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता बढ़ती गई और इन पारंपरिक स्रोतों की उपेक्षा होने लगी. वर्तमान समय में इन जैविक संसाधनों का पुनः एकीकरण तथा उनका वैज्ञानिक उन्नयन, आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना के अनुरूप सतत एवं आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में एक आशाजनक मार्ग प्रदान करता है. इन चुनौतियों से निपटने के लिए फॉस्फोरस के वैकल्पिक, स्थानीय रूप से उपलब्ध, लागत-प्रभावी तथा पर्यावरण-अनुकूल स्रोतों को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया जा रहा है, ताकि पोषक तत्व उपयोग दक्षता में सुधार किया जा सके तथा दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य एवं उत्पादकता सुनिश्चित की जा सके. डीएपी उर्वरक के विकल्प के रूप में निम्नलिखित उर्वरकों का उपयोग किया जा सकता है:-
1. वैकल्पिक रासायनिक उर्वरक: डीएपी के विकल्प के रूप में सिंगल सुपर फॉस्फेट, ट्रिपल सुपर फॉस्फेट, मोनोअमोनियम फॉस्फेट तथा एनपीके मिश्रित उर्वरकों का उपयोग किया जा सकता है, जो अतिरिक्त नाइट्रोजन असंतुलन उत्पन्न किए बिना फॉस्फोरस की आपूर्ति करते हैं. एसएसपी (16% P₂O₅) में सल्फर की अतिरिक्त उपलब्धता होने के कारण यह दलहनी एवं तिलहनी फसलों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है, जबकि टीएसपी (44–46% P₂O₅) तथा एमएपी (50–52% P₂O₅) अधिक फॉस्फोरस आवश्यकता वाली फसलों के लिए उपयुक्त हैं. एनपीके मिश्रित उर्वरक नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश की संतुलित आपूर्ति कर समग्र फसल उत्पादकता में वृद्धि करते हैं. मृदा परीक्षण एवं फसल की आवश्यकता के आधार पर इन विकल्पों का चयन पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाने, लागत कम करने तथा दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य बनाए रखने में सहायक होता है.
2. प्राकृतिक खनिज स्रोत: रॉक फॉस्फेट
रॉक फॉस्फेट रासायनिक फॉस्फोरस उर्वरकों का एक महत्वपूर्ण विकल्प है. इसमें लगभग 20–30% P₂O₅ पाया जाता है और यह फॉस्फोरस का एक प्राकृतिक खनिज स्रोत है. डीएपी के विपरीत यह मृदा में शीघ्र घुलनशील नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे फॉस्फोरस उपलब्ध कराता है. अम्लीय मृदाओं में इसकी घुलनशीलता अधिक होने के कारण इसका प्रभाव बेहतर होता है. कम्पोस्ट अथवा गोबर की खाद के साथ मिलाकर इसके उपयोग से इसकी प्रभावशीलता बढ़ाई जा सकती है. लाभकारी सूक्ष्मजीवों के साथ प्रयोग करने पर रॉक फॉस्फेट रासायनिक उर्वरकों के समान परिणाम देने में सक्षम होता है.
3. जैविक खाद एवं कम्पोस्ट: जैविक खाद व्यापक रूप से उपलब्ध है तथा अनेक लाभ प्रदान करती हैं. गोबर खाद में लगभग 0.3% P₂O₅ तथा कम्पोस्ट में लगभग 0.5% P₂O₅ पाया जाता है. यद्यपि इनमें फॉस्फोरस की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती है, फिर भी ये मृदा संरचना में सुधार, जलधारण क्षमता में वृद्धि तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता को बढ़ावा देती हैं. कुक्कुट खाद अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध होती है तथा इसमें लगभग 2.5% P₂O₅ पाया जाता है, जिससे पोषक तत्वों का अपेक्षाकृत शीघ्र उत्सर्जन होता है. वर्मीकम्पोस्ट, जिसमें लगभग 0.6–1.0% P₂O₅ होता है, फॉस्फोरस का एक अन्य मूल्यवान स्रोत है. यह केंचुओं एवं सूक्ष्मजीवों की क्रियाशीलता द्वारा पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाता है. जैविक खादों का नियमित उपयोग न केवल फॉस्फोरस की आपूर्ति करता है, बल्कि मृदा में पहले से स्थिर फॉस्फोरस को भी उपलब्ध कराने में सहायता करता है.
4. फॉस्फेट समृद्ध जैविक खाद (Phoshrous Rich Organic Manures (PROM)): फॉस्फोरस प्रबंधन के क्षेत्र में फॉस्फेट समृद्ध जैविक खाद एक अत्यंत आशाजनक नवाचार है. इसमें लगभग 10–14% P₂O₅ पाया जाता है. इसे रॉक फॉस्फेट, जैविक पदार्थों तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों के साथ कम्पोस्टिंग द्वारा तैयार किया जाता है. यह प्रक्रिया साधारण कम्पोस्ट की तुलना में फॉस्फोरस की उपलब्धता को बढ़ाती है. PROM का उपयोग सरल है तथा यह मृदा उर्वरता एवं फसल उत्पादकता पर दीर्घकालिक सकारात्मक प्रभाव डालता है.
5. सघन जैविक स्रोत: अस्थि (बोन मील) चूर्ण एवं खली
कुछ जैविक स्रोतों में फॉस्फोरस की मात्रा अधिक होती है और ये विशेष रूप से उच्च मूल्य वाली फसलों के लिए उपयोगी हैं. अस्थि चूर्ण (बोन मील) में लगभग 20–30% P₂O₅ पाया जाता है तथा यह पोषक तत्वों की धीमी एवं निरंतर आपूर्ति करता है. मछली चूर्ण (फिश मील) में लगभग 3–6% P₂O₅, मांस चूर्ण (मीट मील) में 2–5% P₂O₅ तथा गुआनो में लगभग 11–14% P₂O₅ पाया जाता है. सरसों खली एवं मूंगफली खली जैसी तेल खलियों में लगभग 1.5–1.8% P₂O₅ उपलब्ध होता है. ये स्रोत पोषक तत्वों की आपूर्ति के साथ-साथ मृदा में जैविक कार्बन एवं सूक्ष्मजीवीय सक्रियता को भी बढ़ाते हैं, जिससे ये जैविक खेती प्रणालियों के लिए उपयुक्त बनते हैं.
6. फसल अवशेष: फसल अवशेषों को प्रायः खेतों में जला दिया जाता है, जिससे पोषक तत्वों की हानि तथा पर्यावरण प्रदूषण होता है. जबकि इन अवशेषों में लगभग 0.2–0.4% फॉस्फोरस पाया जाता है. जब इन्हें मृदा में मिलाया जाता है, तो इनके अपघटन के दौरान पोषक तत्व धीरे-धीरे मुक्त होते हैं. फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण मृदा कार्बनिक कार्बन में वृद्धि, सूक्ष्मजीवीय गतिविधियों के संवर्धन तथा सतत पोषक तत्व प्रबंधन में महत्वपूर्ण योगदान देता है.
7. पुनर्चक्रित पोषक तत्व स्रोत
वर्तमान में अपशिष्ट पदार्थों से पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.
(क) सीवेज स्लज: अपशिष्ट जल शोधन संयंत्रों से प्राप्त सीवेज स्लज में लगभग 8% (W/W) फॉस्फोरस पाया जाता है. उचित उपचार के बाद इसका उपयोग उर्वरक के रूप में किया जा सकता है. यह पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व प्रदान करता है तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में सहायक है.
(ख) स्ट्रुवाइट: स्ट्रुवाइट एक उभरता हुआ उर्वरक है, जिसे पशु अपशिष्ट एवं अपशिष्ट जल से प्राप्त किया जाता है. इसमें लगभग 28–30% P₂O₅ पाया जाता है तथा यह पोषक तत्वों को धीरे-धीरे उपलब्ध कराता है. यह अत्यधिक दक्ष एवं पर्यावरण-अनुकूल स्रोत है, हालांकि वर्तमान में इसका उपयोग सीमित क्षेत्रों तक ही सीमित है.
8. औद्योगिक उपोत्पाद: स्टील स्लैग
स्टील उद्योग से प्राप्त स्टील स्लैग में लगभग 1–3% P₂O₅ के साथ कैल्शियम एवं सिलिकॉन भी उपस्थित होते हैं. यह मृदा की अम्लता (pH) में सुधार करता है तथा फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने में सहायता करता है. स्लैग में उपस्थित सिलिकॉन पौधों को मजबूत बनाता है तथा कीट एवं रोगों के प्रति उनकी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.
9. सूक्ष्मजीवी एवं जीवाणु खाद : जैविक एवं सतत कृषि प्रणालियों में सूक्ष्मजीव अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु अघुलनशील फॉस्फोरस को घुलनशील रूप में परिवर्तित करते हैं, जिसे पौधे आसानी से अवशोषित कर सकते हैं. ये जैविक अम्लों का स्राव कर उन रासायनिक बंधनों को तोड़ते हैं जिनमें फॉस्फोरस बंधा होता है. पीएसबी के उपयोग से प्रति हेक्टेयर 10–20 किलोग्राम उपलब्ध फॉस्फोरस मुक्त किया जा सकता है. इसी प्रकार, माइकोराइजा कवक जड़ों के सतही क्षेत्रफल को बढ़ाकर पौधों की पोषक तत्व अवशोषण क्षमता में वृद्धि करते हैं. ये प्रति हेक्टेयर 20–25 किलोग्राम फॉस्फोरस को गतिशील कर सकते हैं तथा सूखा सहनशीलता में भी सुधार करते हैं. ये जैव उर्वरक कम लागत वाले, उपयोग में सरल तथा जैविक स्रोतों के साथ प्रयोग करने पर अत्यंत प्रभावी सिद्ध होते हैं.
10. फॉस्फोरस के कुशल उपयोग हेतु कृषि प्रबंधन पद्धतियाँ
(क) मृदा जुताई एवं संरक्षण संबंधी पद्धतियाँ
फॉस्फोरस का कुशल उपयोग केवल उर्वरकों के प्रयोग पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि उचित मृदा एवं फसल प्रबंधन पद्धतियों पर भी आधारित होता है. भारी कृषि यंत्रों के उपयोग को कम करना, संरक्षण कृषि की पद्धतियों जैसे न्यूनतम जुताई अथवा शून्य जुताई को अपनाना तथा खेत प्रबंधन में सुधार करना मृदा संघनन (Soil Compaction) को कम करने, जड़ों के बेहतर विकास को प्रोत्साहित करने तथा जड़ क्षेत्र में फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने में सहायक होता है. इसके अतिरिक्त, मल्चिंग तथा समोच्च खेती जैसी तकनीकें मृदा अपरदन को कम करती हैं तथा सतही बहाव के माध्यम से होने वाली फॉस्फोरस की हानि को न्यूनतम करती हैं.
(ख) फसल चक्र, आवरण फसलें एवं दलहनी फसलें
आवरण फसलें मृदा में उपलब्ध फॉस्फोरस को गतिशील बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. उनकी जड़ें जैविक अम्लों का स्राव करती हैं, जो मृदा में स्थिर एवं अनुपलब्ध फॉस्फोरस को घुलनशील रूप में परिवर्तित करने में सहायता करते हैं. कुट्टू (Buckwheat) जैसी फसलें साइट्रिक एवं ऑक्सैलिक अम्ल का स्राव करती हैं, जिससे बंधित फॉस्फोरस मुक्त होकर अगली फसलों के लिए उपलब्ध हो जाता है. इसी प्रकार, सरसों एवं मूली जैसी फसलें अपनी गहरी एवं विस्तृत जड़ प्रणाली के माध्यम से मृदा की गहरी परतों से फॉस्फोरस को अवशोषित कर जैव द्रव्यमान के अपघटन द्वारा पुनः सतह पर उपलब्ध कराती हैं, जिससे मृदा में फॉस्फोरस चक्रण में सुधार होता है.
दलहनी फसलें राइजोस्फीयर में उपस्थित फॉस्फोरस-घुलनशील तथा नाइट्रोजन-स्थिरीकरण करने वाले सूक्ष्मजीवों के साथ सहजीवी संबंध स्थापित कर फॉस्फोरस उपयोग दक्षता बढ़ाती हैं. गेहूँ–सोयाबीन अथवा धान–मसूर जैसे फसल चक्र मृदा उर्वरता में वृद्धि करते हैं तथा अवशिष्ट फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाते हैं. दलहनी फसलों के अवशेषों के अपघटन से कार्बनिक रूप में बंधा फॉस्फोरस मुक्त होता है, जिससे आगामी फसलों को लाभ प्राप्त होता है.
(ग) अम्लीय मृदा में चूना प्रयोग
अम्लीय मृदाओं में फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कृषि चूना का 3–4 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से प्रयोग एक महत्वपूर्ण प्रबंधन उपाय है. चूना मृदा की अम्लता को कम कर pH में वृद्धि करता है तथा लौह एवं एल्युमिनियम के ऑक्साइड एवं हाइड्रॉक्साइड के साथ होने वाले फॉस्फोरस स्थिरीकरण को घटाता है. परिणामस्वरूप, अधिक फॉस्फोरस पौधों के लिए उपलब्ध रूप में बना रहता है, जिससे पोषक तत्व अवशोषण, फसल वृद्धि एवं उत्पादकता में सुधार होता है.
(घ) फॉस्फोरस उर्वरकों के प्रयोग की विधि: फॉस्फोरस उर्वरकों की उपयोग दक्षता उचित प्रयोग विधियों को अपनाकर बढ़ाई जा सकती है. छिड़काव के स्थान पर पट्टी विधि (Band Placement) अथवा जड़ क्षेत्र के निकट उर्वरकों का प्रयोग करने से फॉस्फोरस के स्थिरीकरण से होने वाली हानि कम होती है तथा जड़ों एवं उपलब्ध फॉस्फोरस के बीच बेहतर संपर्क स्थापित होता है. मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक अनुशंसाओं का पालन करना तथा उर्वरकों को सतह पर डालने के बजाय मृदा में मिलाकर प्रयोग करना फॉस्फोरस की उपलब्धता एवं फसलों द्वारा उसके अवशोषण को और अधिक बढ़ाता है.
11. किसानों के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण: किसानों को केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय समेकित फॉस्फोरस प्रबंधन रणनीति अपनानी चाहिए. रॉक फॉस्फेट, फॉस्फेट समृद्ध जैविक खाद, जैविक खादें, फसल अवशेष तथा पीएसबी एवं माइकोराइजा जैसे जैव उर्वरकों का संयुक्त उपयोग फॉस्फोरस उपयोग दक्षता को बढ़ाने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो सकता है. मृदा का उपयुक्त pH बनाए रखना, फसल चक्र अपनाना तथा उर्वरकों को जड़ क्षेत्र के निकट उचित स्थान पर प्रयोग करना फॉस्फोरस उपयोग दक्षता में उल्लेखनीय सुधार ला सकता है. फॉस्फोरस का अत्यधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे सतही बहाव, जल प्रदूषण तथा शैवाल प्रस्फुटन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं. अतः मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन तथा समयानुकूल पोषक तत्व प्रबंधन सतत कृषि के लिए अत्यंत आवश्यक हैं.
निष्कर्ष
फॉस्फोरस कृषि के लिए एक सीमित किन्तु अत्यंत आवश्यक संसाधन है. डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता न तो आर्थिक दृष्टि से और न ही पर्यावरणीय दृष्टि से दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ है. रॉक फॉस्फेट, जैविक खादें, फॉस्फेट समृद्ध जैविक खाद, फसल अवशेष, पुनर्चक्रित अपशिष्ट स्रोत तथा सूक्ष्मजीवीय जैव उर्वरकों जैसे अनेक वैकल्पिक स्रोत फॉस्फोरस उपयोग दक्षता बढ़ाने के व्यवहारिक एवं प्रभावी विकल्प प्रदान करते हैं. समेकित पोषक तत्व प्रबंधन तथा वैज्ञानिक कृषि प्रबंधन पद्धतियों के संयोजन से न केवल सतत् फसल उत्पादन सुनिश्चित किया जा सकता है, बल्कि दीर्घकालिक मृदा स्वास्थ्य एवं कृषि उत्पादकता को भी संरक्षित रखा जा सकता है.
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