आज के समय में गाय को केवल दूध देने वाले पशु के रुप में नहीं देखा जाता है, बल्कि इसे प्राकृतिक खेती की रीढ़ माना जाता है, जिस तरह से रासायनिक खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है और मिट्टी का उपजाऊ पन खत्म होता जा रहा है. इसी को देखते हुए किसान भाई फिर से प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं और ऐसे में गाय का गोबर-गोमूत्र किसानों के लिए कम लागत वाली खेती और अतिरिक्त आय के साधन के रुप में उभर रहा है, जिससे किसानों की मुनाफे की संभावना बढ़ रही है.
गोबर से खेतों की सेहत कैसे सुधार सकते हैं?
अगर आप गाय का पालन करते हैं तो आपको इससे कहीं तरह के लाभ हो सकते हैं. यानी आप गाय से दूध भी प्राप्त कर सकते हैं और गाय का गोबर से प्राकृतिक खाद, क्योंकि इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और कई सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं, जिस तरह से किसान खेतों में रासायनिक खादों का इस्तेमाल खेत में कर रहे हैं, जिससे जमीन की उर्वरता घटती जा रही है. ऐसे में गोबर की खाद मिट्टी को उपजाऊ बनाने में मदद कर रही है.
वहीं, कई किसान अब वर्मी कम्पोस्ट और जैविक खाद तैयार कर बाजार में बेच भी रहे हैं. इससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी मिल रही है. साथ ही गांवों में गोबर से बने कंडे, खाद और जैविक उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है.
गोमूत्र से कैसे तैयार होता है प्राकृतिक कीटनाशक?
किसान भाई गोमूत्र को खेती में प्राकृतिक कीटनाशक और पौधों के ग्रोथ प्रमोटर के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं, क्योंकि इसमें कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो पौधों को रोगों और कीटों से बचाने में मदद करते हैं. इसके अलावा, कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, गोमूत्र का छिड़काव करने से फसलों में फफूंद और रस चूसने वाले कीटों का असर कम होता है. इससे किसानों को महंगे रासायनिक कीटनाशकों पर कम खर्च करना पड़ता है. कई किसान गोमूत्र में नीम की पत्ती, लहसुन और तंबाकू मिलाकर घर पर ही जैविक कीटनाशक तैयार कर फसलों में इस्तेमाल कर सकते हैं. यह देसी घोल फसलों पर छिड़कने से सूंडी, माहू और अन्य हानिकारक कीटों का प्रभाव कम होगा और किसान भाइयों उपज अधिक प्राप्त होने की संभावना बढ़ जाएगी.
बीज उपचार में भी कारगर है गोमूत्र
किसान अगर खेती कर रहे हैं तो वह इस दौरान बीज बोने से पहले उन्हें गोमूत्र मिले पानी में कुछ घंटों तक भिगोने के बाद इस्तेमाल करते हैं, तो अंकुरण बेहतर होता है. इससे पौधे मजबूत बनते हैं और उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. साथ ही प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों का मानना है कि गोमूत्र आधारित घोल का नियमित उपयोग करने से फसल लंबे समय तक हरी-भरी रहती है और उत्पादन की गुणवत्ता भी सुधरती है.
कम लागत में बढ़ सकता है किसानों का मुनाफा
आज खेती में सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती लागत है. खाद, दवा और कीटनाशकों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं. ऐसे में गोबर और गोमूत्र आधारित खेती किसानों के लिए राहत का रास्ता बन सकती है.
विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह मॉडल काफी फायदेमंद माना जा रहा है. इससे रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है और खेती का खर्च घटता है. साथ ही जैविक उत्पादों की बाजार में बढ़ती मांग किसानों को बेहतर दाम दिला सकती है.
लेखक: रवीना सिंह
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