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नसीब में धूप है तेरे और तू है जो छाया तलाश रहा है !

मनसुख भाई अक्सर मुझसे पूछते हैं - तू इतनी नौटंकी करता है, तू ड्रामा क्यों नहीं करता ? वैसे तो दिनभर यहां-वहां ठुड्डे मारता फिरता है. जा ! वहां जा के मर.

लंगोटिया यार अतुल भी कईं बार टोक चुका है. दोस्ती की भाषा में कहता है - जाता क्यों नहीं है नल्ले ! तू और कुछ करे न करे, बकलोली कर सकता है. लेकिन मैं हूं जो अंगद के पैर की तरह अड़ा हुआ हूं. हां, यहां मैनें खुद से अंगद को जोड़कर उनका अपमान कर दिया. लेकिन कभी-कभी पैर में पड़कर आप इस काबिल हो जाते हो कि भविष्य आपसे कोई प्रश्न नहीं करता. क्योंकि अब आपका अपना कोई वजूद नहीं रहा. आप पहली सफ़ से घिसकर दूसरी सफ़ में जा बैठे हो. चलो, इतिहास को किसी ने इस कदर तो इस्तेमाल किया की विवाद नहीं हुआ.

खैर ! बात यहां पर धूप और छांव की नहीं हो रही. वो तो वह ढ़ोंग है जिसका एक बेनिफिशरी मैं भी हूं. एक रवायत जिससे समाज आपको ले...ख....क कहता हैं. यहां धूप मतलब संघर्ष और छांव का मतलब कम्फर्ट ज़ोन से है. मैं ताउम्र संघर्ष से बचता रहा और अब भी बच रहा हूं. मूंगरी लाल के हसीन सपने और मेरे बीच कोई नहीं आ सकता. वैसे भी दिन में सपने देखने का विश्वसनीय टैलेंट हर किसी के पास नहीं होता. मैं यही चाहता हूं कि कम संघ्रर्ष से बड़ी कामयाबी हाथ आ जाए. सच कहूं तो इस गलतफहमी की सही जगह मेरे नज़दीक रखा हुआ कचरे का डिब्बा है न कि मेरा दिमाग. अगर आप कुछ पाना चाहते हैं तो आपको वही रास्ता अख्तियार करना पडेगा जो औरों ने तय किया है. अगर आप कुछ अलग करना चाहते हैं तो भी और नहीं करना चाहते, तो भी. चलना तो कदम दर कदम ही पड़ेगा न कि छलांग लगाकर या उड़कर.

कभी मुझे डॉक्टर बनना था, कभी इंजीनियर, कभी मैं फिल्मों में गाने गा रहा था तो कभी मैं क्रिकेट के मैदान की सुर्खियां था, पर तभी तक जब तक मेरी मनूस अलार्म घड़ी ने बांग नहीं दी. कुछ हासिल करना है तो उसके लिए कुरबानी देनी पड़ती है. खुद को तपाना पड़ता है. जिंदगी में देर-सवेर ही सह पर संघर्ष तो करना ही पड़ेगा. फर्क सिर्फ इतना ही है अगर सही वक्त पर धूप में तप लिए तो बाद में छांव नसीब होगी. इसलिए कोशिश धूप में निकलने की कोशिश कीजिए. शुरु में तपन महसूस होगी पर बाद में इससे यारी हो जाएगी. ये बात मैने देर से समझी पर समझी. एक शेर यूं है के -

इश्क में दान करना पड़ता है, जी को भी हलकान करना पड़ता है

तजूरबा यूं ही मुफ्त में नहीं मिलता, पहले नुकसान करना पड़ता है

इस शेर को लिखने वाला मुझसे बिल्कुल अंजान है पर चार मिसरों में उसने जिंदगी की कहानी लिख डाली.

और लिखूंगा तो मेरे दूसरे काम आड़े आ जाएंगे और 6 बजे घर भी जाना है इसलिए आज इतना ही.



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