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सरसों की फसल के रोग और उनका निवारण

कड़ाके की सर्दी पड़ने से सरसों समेत हरी सब्जियों की खेती में काफी नुकसान हो रहा है जिससे किसानों की मुश्किल बढ़ती ही जा रही है. देश के कई हिस्सों में सर्दी और ठंडी हवाओं के चलते तापमान 4 डिग्री से नीचे तक जा चुका है. जिसके कारण किसानों को आलू, चना, सरसों आदि फसलों के नुकसान होने के साथ ही उन पर रोग लगने का खतरा बढ़ता जा रहा है. तापमान गिरने से सरसों में माऊं समेत चेंपा और तना सड़न रोग तेजी से फैल रहा है. दरअसल, सर्दी आते ही सरसों में कई तरह के रोग लग जाते है जिससे फसल को काफी ज्यादा नुकसान होता है

1. चेंपा कीट

 यह कीट सरसों की खेती पर सबसे ज्यादा प्रभाव डालता है. चेंपा फसलों का रस चूसने वाली श्रेणी का कीट है. इस कीट का साइज बेहद ही छोटा होता है. इस कीट के कोई भी पंख नहीं होते हैं.

2. सरसों का छाछाया रोग

यह एक कवक जनित रोग है, जो शुरूआती अवस्था में पौधे की पत्तियों व टहनियों पर मटमेले चूर्ण के रूप में दिखाई देता है. जो बाद में संपूर्ण पौधे पर फैल जाता है. इसके कारण पत्तियां पीली होकर झड़ने लगती हैं. इसके प्रभाव से खड़ी फसल को अधिक नुकसान होता है. फरवरी के मौसम में यह हल्के पंख उग जाने से दूसरे फसलों पर पहुंच जाता है और उनको नुकसान पहुंचाता है. इसका सबसे ज्यादा नुकसान सरसों की पछेती फसल पर हो रहा है.

3. तना सड़न रोग

सरसों की फसल पर लगने वाला यह रोग सबसे ज्यादा खतरनाक है. यह भूमि व बीज जनित रोग है. इस रोग के लक्षण सबसे पहले लंबे धब्बों के रूप में तने पर दिखाई देने लगते है. जिन पर कवक जाल के रूप में दिखाई देने लगती है, उग्र अवस्था में इसका तना फट जाता है व पौधा मुरझाकर सुख जाता है. इसके संक्रमित भाग पर काले रंग के गोल कवक के स्केलेरोशिया दिखाई पड़ते हैं. अधिक नमी की दशा में रोग का प्रकोप सबसे ज्यादा होता है.

4. अंगमारी रोग

इस सरसों के रोग से पत्तियों पर कत्थई-भूरे रंग के उभरे हुए धब्बे दिखाई पड़ते हैं. इनके किनारे पीले रंग के होते हैं. देखने में यह धब्बे आंख की तरह प्रतीत होते हैं. उग्र अवस्था में यह धब्बे आपस में मिलकर बड़े हो जाते हैं. जिसके कारण पत्तियाँ पीली होकर झड़ने लगती हैं.

5. आर्द गलन रोग

इस रोग के प्रकोप से पौधे के सतह या भूमि के अंदर वाले भाग पर जल सिकत धब्बे बन जाते है. कवक के आक्रमण होने से जड़ पर इसका असर होता है. ये तने को कमजोर कर देते हैं इससे तना सूख जाता है. सूखकर पौधे पर बुरा असर पड़ता है और वह पूरी तरह से सूखकर गिर जाता है.

ऐसें बचाएं सरसों की फसल को

सरसों की फसल को फरवरी में लगने वाली माऊं से बचाने के लिए एजाडिरेक्टिन 0.15 प्रतिशत ईसी 2.5 लीटर, ईमोथोएट 30 प्रतिशत ईसी 1.0 लीटर, अक्सीडिमोटान मिथाइल 25 प्रतिशत ईसी एक लीटर, इनमें से किसी भी एक का 500 लीटर पानी में ड़ालकर घोल बना छिड़काव करें. इसके अलावा रिडोमील, मेनकोजैब दिन का भी निश्चित मात्रा में छिड़काव करना चाहिए. कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस फसलों के रोग से बचाव हेतु कई वैज्ञानिक विधियों का इस्तेमाल करना बेहद ही जरूरी है.



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