1. Home
  2. ख़बरें

अन्न से ईंधन तक: आखिर किस दिशा में धकेली जा रही है भारतीय खेती?

भारत की खेती आज गंभीर संकट और नीतिगत असंतुलन के दौर से गुजर रही है. एथेनॉल उत्पादन के लिए खाद्यान्न और जल संसाधनों का बढ़ता उपयोग, किसानों को MSP न मिलना, भंडारण व प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी, महंगा डीजल और कर्ज आधारित कृषि मॉडल किसानों की समस्याएं बढ़ा रहे हैं.

from food to fuel where is Indian agriculture heading
डॉ. राजाराम त्रिपाठी, ग्रामीण अर्थशास्त्र व कृषि विशेषज्ञ तथा राष्ट्रीय संयोजक - अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)
  • एथेनॉल नीति के कारण खाद्यान्न और जल संसाधनों पर भारी दबाव बढ़ रहा है.

  • किसानों को MSP न मिलने से हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये का अप्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान हो रहा है.

  • भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं के अभाव में फल-सब्जी उत्पादकों को लगभग ₹2 लाख करोड़ का वार्षिक नुकसान होता है.

  • कृषि डीजल पर भारी कर लगाकर किसानों से हजारों करोड़ रुपये वसूले जा रहे हैं.

  • छोटे किसानों को आवश्यकता से अधिक महंगे ट्रैक्टरों और अनुपयुक्त मशीनरी की ओर धकेला जा रहा है.

  • नए अजब-गजब गन्ना नियंत्रण कानून-2026 से गन्ना किसान सिर पीट रहे हैं वहीं खांडसारी उद्योग वाले भी छाती पीट रहे हैं!

भारत की खेती और किसान इस समय केवल संकट में नहीं है, बल्कि दिशाहीनता के एक ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं जहां यह समझना कठिन हो गया है कि कृषि नीति का वास्तविक उद्देश्य आखिर है क्या. क्या देश की खेती का लक्ष्य लोगों को भोजन उपलब्ध कराना है, किसानों की आय बढ़ाना है, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना है, या फिर कृषि को धीरे-धीरे ईंधन, कॉरपोरेट बाजार और कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था का परिशिष्ट बना देना है?

कृषि नीतियों का हाल अब ऐसा हो गया है कि सरकार खेती किसानी की बेहतरी के नाम पर जो भी नया लाती है, उसे देखकर किसान सिर पकड़ लेते हैं, दूसरी ओर छोटे उद्योग वाले भी छाती पीटने लगते हैं. नवजात "गन्ना नियंत्रण आदेश"  भी कुछ वैसा ही चमत्कार दिखाने जा रहा है, जिसमें न किसान खुश दिख रहा है, न खांडसारी उद्योग, लेकिन नीति बनाने वालों को सब कुछ “चमत्कारी सुधार” ही नजर आ रहा.  गजब के हैं हमारे ये नीतिगत सुधार, जिनके बोझ का असर हर बार खेती और किसान की पीठ पर ही टूटता है.

        अब एथेनॉल को ही ले लीजिए. आजकल एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को 'देशभक्ति और ऊर्जा आत्मनिर्भरता का परम प्रतीक'  बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे छिपा आर्थिक और प्राकृतिक संसाधनों का भयावह गणित शायद ही जनता को बताया जाता हो.

         पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के लक्ष्य लगातार बढ़ाए जा रहे हैं. वर्ष 2024-25 के लिए पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा लगभग 971 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदने का लक्ष्य तय किया गया. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा मक्का आधारित एथेनॉल का रहा है और  इसके बाद एथेनॉल की बनाने के लिए‌ गन्ना तथा चावल का नंबर आता है. हाल ही में कानपुर स्थित नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट (NSI) ,भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) , इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट्स रिसर्च ने मिलकर मीठे ज्वार  से इथेनॉल उत्पादन की संभावनाएं तलाशने के लिए एक प्रोजेक्ट शुरू किया था, जिसके लिए फंड की व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने का जुम्मा पेट्रोलियम कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड ने लिया है.इसके लिए निजी बीज कंपनी एडवांटा की हाईब्रिड ज्वार किस्म 'मेगास्वीट' का  उपयोग किया जाना चाहिए हुआ है. यद्यपि अब आईआईएमआर  इस कंपनी के बीज के को लेकर तथा इससे जुड़े कुछ अन्य मुद्दों पर अपनी असहमति जताते हुए अपने को इस प्रोजेक्ट से अपने को अलग करने की बात कर रही है.

   लेकिन इस पूरी नीति के मूल प्रश्नों पर शायद ही कोई गंभीर राष्ट्रीय बहस हो रही हो. इसे सरल भाषा में समझने की जरूरत है . सत्य यह है कि मक्का से 1 लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 2.5 से 3 किलोग्राम मक्का लगता है. यदि 474 करोड़ लीटर मक्का आधारित एथेनॉल तैयार किया जाता है, तो इसके लिए लगभग 120 से 140 लाख टन मक्का चाहिए होगा. यह मात्रा देश के कुल मक्का उत्पादन का अत्यंत बड़ा हिस्सा है. यही मक्का पोल्ट्री उद्योग, पशुपालन और खाद्य उपयोग का भी आधार है. यही कारण है कि बीते वर्षों में मक्का की कीमतों में तेज वृद्धि हुई और पोल्ट्री उद्योग ने आयात की मांग तक उठानी शुरू कर दी.

इसी तरह गन्ना और चावल से 1 लीटर एथेनॉल तैयार करने के लिए लगभग 12 से 14 किलोग्राम गन्ना अथवा लगभग 2.5 किलोग्राम चावल की आवश्यकता पड़ती है. वर्तमान सरकारी दरों और बाजार मूल्यों के अनुसार केवल कच्चे माल की लागत ही गन्ना आधारित एथेनॉल में लगभग ₹45 से ₹50 प्रति लीटर, मक्का आधारित एथेनॉल में ₹60 से ₹78 प्रति लीटर और चावल आधारित एथेनॉल में ₹55 से ₹65 प्रति लीटर बैठती है. इसमें डिस्टिलेशन, बिजली, भाप, श्रम, परिवहन, ब्याज, संयंत्र संचालन और प्रसंस्करण लागत जोड़ दी जाए तो गन्ने से तैयार एथेनॉल की वास्तविक लागत लगभग ₹60 से ₹70 प्रति लीटर, मक्का आधारित एथेनॉल की ₹70 से ₹90 प्रति लीटर और चावल आधारित एथेनॉल की लगभग ₹70 से ₹85 प्रति लीटर तक पहुंच जाती है.

   सबसे भयावह पक्ष जल उपयोग का है. गन्ना और धान पहले से ही देश की सबसे अधिक पानी पीने वाली फसलें हैं. विभिन्न अध्ययनों के अनुसार केवल 1 लीटर चावल आधारित एथेनॉल तैयार करने के पीछे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 10 हजार लीटर तक पानी खर्च हो सकता है. अर्थात एक ओर देश में किसान सिंचाई जल के अभाव में आत्महत्या कर रहा है, दूसरी ओर हजारों लीटर भूजल जला कर कारों के लिए ईंधन तैयार किया जा रहा है. विडंबना यह है कि मई 2026 की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में पश्चिम एशिया तनाव के बावजूद वैश्विक बाजार में परिष्कृत डीजल की आधार लागत भारतीय मुद्रा में लगभग ₹52 से ₹60 प्रति लीटर के आसपास बैठ रही है, जबकि भारत में किसान लगभग ₹90 प्रति लीटर डीजल खरीदने को मजबूर है और उसी देश में खाद्यान्न तथा भूजल को जलाकर ₹70 से ₹90 प्रति लीटर लागत वाला एथेनॉल तैयार किया जा रहा है.

    *और यहां हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि गन्ना हो या चावल हो अथवा मक्का हो इससे एथेनाल बनाने की प्रक्रिया में ऊर्जा का भारी खपत होता है यानी एथेनॉल को डीजल के विकल्प के रूप में को ऊर्जा उपयोग करने के पहले इसी एथेनॉल को तैयार करने में जो भारी मात्रा में ऊर्जा लगती है वह उर्जा उत्पादन तथा खपत के सारे समीकरण को बिगाड़ रही है. अब यह केवल ऊर्जा नीति नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ अत्यंत गंभीर राष्ट्रीय प्रश्न है.

शोचनीय यह भी है कि यह सब उस देश में हो रहा है जहां करोड़ों लोग अब भी पौष्टिक भोजन से वंचित हैं, जहां जल संकट लगातार बढ़ रहा है और जहां किसानों को अपनी फसलों का लाभकारी मूल्य तक नहीं मिल पा रहा. यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या भारत भोजन उत्पादन आधारित कृषि अर्थव्यवस्था से हटकर ईंधन आधारित कृषि अर्थव्यवस्था की ओर धकेला जा रहा है?

किसानों की सबसे बड़ी पीड़ा यही है कि वे उत्पादन तो करते हैं, लेकिन  सही न्याय काली लाभकारी मूल्य नहीं पाते. न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था का लाभ केवल सीमित फसलों और सीमित क्षेत्रों तक सिमट कर रह गया है. अधिकांश किसान खुले बाजार में अपनी उपज लागत से नीचे बेचने को मजबूर हैं.

कृषि अर्थशास्त्र से जुड़े विभिन्न अध्ययनों और किसान संगठनों के आकलनों के अनुसार यदि उत्पादन लागत, घोषित MSP और वास्तविक बिक्री मूल्य के अंतर का समग्र मूल्यांकन किया जाए तो किसानों को प्रतिवर्ष लगभग 5 से 7 लाख करोड़ रुपए का अप्रत्यक्ष नुकसान उठाना पड़ता है. अनेक बार किसान को लागत तक नहीं मिलती. वह केवल घाटा कम करने के लिए फसल बेचता है.

यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, नैतिक विफलता भी है. जिस देश में उद्योगों के लिए प्रोत्साहन पैकेज, टैक्स छूट और राहत योजनाएं तत्काल बन जाती हैं, वहां खाद्य उत्पादक अन्नदाता किसान को उसकी लागत तक दिलाने की मजबूत व्यवस्था आज तक नहीं बन पाई.

और यदि किसी किसान ने मेहनत करके उत्पादन बढ़ा भी लिया, तो उसके सामने अगला संकट खड़ा होता है भंडारण और प्रसंस्करण का अभाव.

राष्ट्रीय बागवानी क्षेत्र से जुड़े विभिन्न आकलनों के अनुसार भारत में हर वर्ष लगभग ₹2 लाख करोड़ के फल और सब्जियां केवल इसलिए खराब हो जाती हैं क्योंकि गांव, तहसील और विकासखंड स्तर तक कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउस, प्रसंस्करण इकाइयां और वैज्ञानिक परिवहन व्यवस्था विकसित नहीं की गई. यह नुकसान किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि नीतिगत उपेक्षा से हो रहा है.

देश का किसान उत्पादन तो कर देता है, लेकिन उसे बचाने की व्यवस्था नहीं है. कहीं टमाटर सड़क पर फेंका जाता है, कहीं प्याज औने-पौने दामों में बिकता है, कहीं आलू गोदाम के अभाव में सड़ जाता है. यह केवल बाजार की समस्या नहीं है. यह उस विकास मॉडल की विफलता है जिसने शहरों में चमकदार मॉल तो बना दिए, लेकिन गांवों में वैज्ञानिक भंडारण व्यवस्था नहीं पहुंचाई.

यदि विकासखंड स्तर तक खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित होतीं, तो किसान केवल कच्चा माल बेचने वाला व्यक्ति नहीं रहता. वह मूल्य संवर्धन का भागीदार बनता. गांवों में रोजगार पैदा होता. महिलाओं के लिए स्थानीय उद्योग विकसित होते. किसानों की आय बढ़ती. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कृषि नीति अब भी उत्पादन बढ़ाने तक सीमित है, किसान की आय और सुरक्षा तक नहीं पहुंचती.

इसी बीच खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है. इसका सबसे बड़ा कारण कृषि डीजल पर भारी कर संरचना है. भारत में खेती के लिए उपयोग होने वाले डीजल पर भी वही कर लगाया जाता है जो व्यावसायिक वाहनों या निजी उपभोग वाले ईंधन पर लागू होता है. जबकि दुनिया के अनेक कृषि प्रधान देशों में खेती के ईंधन पर कर छूट दी जाती है.

भारतीय किसान ट्रैक्टरों और कृषि यंत्रों में उपयोग होने वाले डीजल पर प्रतिवर्ष , हजारों करोड़ रुपये का कर चुकाते हैं. इसमें केंद्र और राज्य दोनों स्तर के कर शामिल हैं. विडंबना यह है कि ट्रैक्टरों को एक्सप्रेसवे पर चलाने तक की अनुमति नहीं होती, फिर भी उनसे सड़क और बुनियादी ढांचा उपकर वसूला जाता है.

यह नीति उस मानसिकता को दर्शाती है जिसमें ट्रैक्टर को अब भी उत्पादन के औजार के बजाय लक्जरी बीएमडब्ल्यू मर्सिडीज़ वाहन की तरह देखा जाता है. जबकि ट्रैक्टर विलासिता नहीं, खेती की आवश्यकता है.

 लेकिन ट्रैक्टर की त्रासदी यहीं समाप्त नहीं होती. पिछले कुछ वर्षों में ट्रैक्टरों को गांवों में एक सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया. भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा ट्रैक्टर बाजार बन चुका है. हर वर्ष लगभग 9 से 10 लाख ट्रैक्टर बिक रहे हैं. लेकिन भारत के अधिकांश छोटे किसानों को वास्तव में इतने बड़े और महंगे ट्रैक्टरों की आवश्यकता ही नहीं होती.

गांवों में अब ट्रैक्टर खेती से अधिक “प्रतिष्ठा” का विषय बन गया है. एक किसान ने बड़ा ट्रैक्टर लिया तो दूसरा उससे बड़ा लेने की कोशिश करता है. बैंक, फाइनेंस कंपनियां और ट्रैक्टर कंपनियों की संयुक्त संरचना किसान को यह विश्वास दिलाती है कि मशीन स्वयं कमाकर अपनी किस्त निकाल देगी.

लेकिन जब पूरे गांव में आवश्यकता से अधिक ट्रैक्टर हो जाते हैं तो किराये का काम कम हो जाता है. मशीन खड़ी रहती है, लेकिन EMI चलती रहती है. धीरे-धीरे किसान कर्ज के मकड़जाल में फंसता जकड़ता चला जाता है. कई राज्यों में ट्रैक्टर ऋणों के कारण जमीन नीलामी और किसानों की आत्महत्या एेतक की घटनाएं सामने आ चुकी हैं.

सबसे दुखद बात यह है कि छोटे किसानों के लिए अपेक्षाकृत किफायती और उपयोगी विकल्पों को भी पर्याप्त बढ़ावा नहीं दिया गया. पावर टिलर और पावर वीडर जैसे उपकरण, जो छोटे खेतों के लिए अधिक व्यावहारिक हो सकते थे, उनके लिए भी ऐसी तकनीकी और नीतिगत सीमाएं बना दी गईं जिनसे किसानों के विकल्प सीमित हो गए.

कई विशेषज्ञों और जमीनी अनुभवों के अनुसार वर्तमान खेत परिस्थितियों में छोटे किसानों के लिए हल्के, बहुउपयोगी और कम ईंधन खपत वाले उपकरण अधिक उपयुक्त हो सकते हैं. लेकिन कृषि यंत्रीकरण की नीति कई बार वास्तविक खेत आवश्यकताओं के बजाय बाजार आधारित मॉडल से प्रभावित दिखाई देती है.

इसी पूरी व्यवस्था के बीच सबसे दुखद तथ्य यह है कि भारत में लगभग हर घंटे एक किसान या खेत मजदूर आत्महत्या कर रहा है. यह केवल आर्थिक संकट नहीं, राष्ट्रीय चेतना के  माथे पर लगा हुआ कलंक है.

विडंबना यह भी है कि देश में जैविक खेती पर साल भर सबसे अधिक चर्चा होती है, लेकिन बजट का सबसे बड़ा हिस्सा आज भी रासायनिक खाद आधारित खेती को जाता है. वर्ष 2025-26 में रासायनिक उर्वरकों पर लगभग ₹1.68 लाख करोड़ की सब्सिडी का प्रावधान है, जबकि जैविक खेती के लिए समर्पित संरचनात्मक निवेश अत्यंत सीमित है.

यदि किसान वास्तव में प्राकृतिक या जैविक खेती करना चाहे तो उसे जैविक बीज, जैविक खाद, स्थानीय प्रसंस्करण और बाजार की कोई मजबूत व्यवस्था उपलब्ध नहीं मिलती. भाषणों में जैविक खेती है, लेकिन बजट में रासायनिक खेती.

अब समय आ गया है कि कृषि नीति को केवल उत्पादन आधारित दृष्टिकोण से निकालकर किसान-केंद्रित दृष्टिकोण में बदला जाए. खेती को ईंधन, कॉरपोरेट बिक्री और कर्ज आधारित बाजार का माध्यम बनाने के बजाय उसे खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और प्राकृतिक संतुलन की दृष्टि से देखा जाए.

अन्यथा आने वाला समय यह स्वीकार करने को मजबूर करेगा कि भारत की खेती को सबसे अधिक नुकसान मौसम या बीमारियों ने नहीं पहुंचाया; बल्कि उन नीतियों ने पहुंचाया जो किसान को लगातार उत्पादन करने के लिए तो कहती रहीं, लेकिन उसे सम्मानजनक आय, सुरक्षा और स्थिर भविष्य देने में असफल रहीं.

लेखक: डॉ. राजाराम त्रिपाठी, ग्रामीण अर्थशास्त्र व कृषि विशेषज्ञ तथा राष्ट्रीय संयोजक: "अखिल भारतीय किसान महासंघ" (आईफा)

English Summary: from food to fuel where is Indian agriculture heading Published on: 11 May 2026, 02:02 PM IST

Like this article?

Hey! I am डॉ राजाराम त्रिपाठी. Did you liked this article and have suggestions to improve this article? Mail me your suggestions and feedback.

Share your comments

हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें. कृषि से संबंधित देशभर की सभी लेटेस्ट ख़बरें मेल पर पढ़ने के लिए हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें.

Subscribe Newsletters

Latest feeds

More News