Farm Activities

टमाटर की फसल में कीट व रोग प्रबन्धन

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सब्जियों में टमाटर का प्रमुख स्थान है. इसके फलों को विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लाया जाता है. इसकी खेती वर्ष भर की जा सकती है. टमाटर में विटामिन ए व सी की मात्रा अधिक होती है. टमाटर में लाल रंग लाइकोपीन नामक पदार्थ से होता है जिसे दुनिया का प्रमुख एंटीऑक्सीडेंट माना गया है. पिछले कुछ वर्षो में टमाटर की फसल की उत्पादकता घटी है, जिसमें कीट व रोग की अहम भूमिका रही है. कीटों व रोगों के प्रकोप के कारण पैदावार में कमी आ जाती है. इसके साथ ही फसल की उत्पादकता व गुणवत्ता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता हैं-

टमाटर की फसल के प्रमुख कीटः-

1. फेद लट: होलोटे्किया प्रजाति

क्षति का स्वरूपः यह कीट टमाटर की फसल को काफी नुकसान पहुँचाता है. इसका आक्रमण जड़़ों पर होता है. इसके प्रकोप से पौधे मर जाते हैं. प्रौढ़ कीट पेड़ पौधें की पत्तियों को खाकर हानि पहुँचाते है, जबकि सूंड़ी जमीन के अन्दर रहकर पौधों की जड़ों, तथा जड़ों पर उपस्थित रोयों आदि को खाकर फसल को काफी नुकसान पहुंचाते हैं.

नियंत्रण हेतु वर्षा के तुरन्त बाद खेत मे जगह-जगह पर नीम की टहनियाँ लगा देनी चाहिए.

रात्रि के समय सभी वृक्षों एवं टहनियों को हिलाकर प्रौढ़ कीटों को इकट्ठा कर नष्ट कर देना चाहियें. यह प्रक्रिया वर्षा के बाद लगातार 3-4 रातों तक करें.

खाली पडें खेतों की गहरी जुताईयां करनी चाहिए ताकि मिट्टी में छिपी सूड़ियां जमीन के ऊपर आ जाये. जिससे चिड़िया, मैना, आदि पक्षी उन्हें खा जाये.

गर्मी की बारिश होने के 20-25 दिन बाद क्लोरोपाईरिफाॅस 200सी0 4 लीटर मात्रा को 50 किग्रा0 राख में मिलाकर डाले एवं तुरन्त सिंचाई कर दें.

फोरेट 10 जी या कार्बोफ्यूरान 3 जी 20-25 किलो प्रति हैक्टर की दर से रोपाई से पूर्व कतारों में पौधों के पास डालें.

2. कटवा लट: (एग्रोटिस एप्सिलॉन)

क्षति का स्वरूपः

इस कीट की लटें रात्रि में भूमि से बाहर निकल कर छोटे-छोटे पौधों को सतह के बराबर से काटकर गिरा देती हैं. दिन में मिट्टी के ढेलों के नीचे छिपी रहती हैं. नियंत्रण हेतु क्यूनाॅलफाॅस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 20 से 25 किलो प्रति हैक्टर के हिसाब से भूमि में मिलावें.

3. सफेद मक्खी- (बेमीसिया टेबेसाई)

क्षति का स्वरूपः

इस कीट के वयस्क़ तथा शिशु पीले रंग के तथा पॅख पारदर्षी और मोम से ढके हुए होते है. ये आकार मे बहुत छोटे तथा मुलायम होते हैं. वयस्क कीट 1 से 2 मि.मी आकार के हल्के पीले रंग के होते है. मादा कीट पत्तियों के निचली सतह पर हल्के पीले रंग का अण्डें देती है. अण्डें से 5-10 दिन में शिशु निकलते हैं इसके प्रौढ़ तथा शिशु दोनों पत्तियों से रस चूसतें हैं तथा पत्ती के ऊपर मधु का स्त्राव छोड़ते है, जिससे काले रंग के कवक का आक्रमण हो जाता है, जिससे पत्तियों में प्रकाष संषलेषण वाधित हो जाता हैं व पत्तियाँ पीली पड़कर नीचे गिरने लगती हैं, तथा फूल एवं फलिया झड़ जाती हैं. इस कीट से टमाटर की फसल में पीला षिरा मोजेक्नाम विषाणु जनित रोग फैलता है. नियंत्रण हेतु डाइमिथोएट 30 ई.सी. या मैलाथियाॅन 50 ई.सी. एक मिलीलीटर का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें. आवश्यकता पड़ने पर यह छिड़काव 15 से 20 दिन बाद दोहरावें.

4. हरा फुदका- (एमपोस्का कैरी)

क्षति का स्वरूपः

यह हरा एवं हल्के पीले रंग का त्रिकोणीय कीट होता है. इसके प्रौढ़ तथा शिशु पौधों कोमल भागों जैसे पत्तियों तनों एवं फलियों आदि से रस चूसते है. प्रभावित पत्तिया पीली होकर नीचे की तरफ मुड़ जाती हैं. मादा कीट पत्तियों की निचली  षिराओं में अण्डें देती हैं. जिससे 2-5 दिन में शिशु निकलते है. ये शिशु प्रायः 20 से 25 दिन तक फसल से रस चूसते हैं. सामान्य रूप से एक वर्ष में इस कीट की 6 पीढियाॅ पायी जाती है. नियंत्रण हेतु डाइमिथोएट 30 ई.सी. या मैलाथियान 50 ई.सी. एक मिलीलीटर का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें. आवश्यकता पड़ने पर यह छिड़काव 15 से 20 दिन बाद दोहरावें.

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5. तेला- ( अम्रास्का बिगूटुला बिगूटुला )

क्षति का स्वरूपः

यह बहुभक्षी कीट है जो टमाटर की फसल में फूलों में लगने मे लगने वाला यह मुख्य कीट है. इसका रंग काला होता है. यह कीट फूलों को खरोच देता है तथा उससे निकले रस को चूसता है, जिससे पौधों की बढवार रूक जाती है. फलस्वरूप फूल कमजोर एवं झड़ जाते है. इनकी संख्या प्रति फूल 7 से 8 पायी जाती है. 25 से 27 डिग्री सेल्यिस तापमान तथा 80 प्रतिषत आर्द्रता पर इस कीट का आक्रमण अधिक होता है. नियंत्रण हेतु डाइमिथोएट 30 ई.सी. या मैलाथियान 50 ई.सी. एक मिलीलीटर का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

6. फल छेदक कीट: (हेलिकोवरपा आर्मीजेरा)

क्षति का स्वरूपः

इस कीट की हानिकारक अवस्था सूड़ी होती है जो हल्के हरे -भूरे रंग 3 से 5 सेमी.लम्बी होती है, तथा शरीर के ऊपरी भाग पर भूरे रंग की धारियां पायी जाती है. वानस्पतिक अवस्था में सूड़ी पत्ती एवं षाखाओं को खाती है. लेकिन फलों की अवस्था में यह कली तथा फलियों में छेंद करके नुकसान पहॅचाती है. फली को खाते समय प्रायः इसका सिर फली के अन्दर की तरफ तथा शरीर का भाग बाहर की तरफ लटका रहता हैं . एक सूँडी 30-40 फलियों के नुकसान पहॅुचाती हैं . कभी-कभी इनके प्रकोप से फल सड़ जाता है, इससे उत्पादन में कमी के साथ-साथ फलों की गुणवत्ता भी कम हो जाती

प्रबन्धन

जैविक:- 3: नीम तेल और 5: नीम बीज सार गेदा के फूल एवं पौधे को उबालकर
10-15 दिन के अन्तराल से छिड़काव करें.

रसायनिक:-इस्पाइनोसेड / 200 मिली॰/हेक्टेअर 
इन्डोक्साकार्ब / 500 मिली॰ /हेक्टेअर 
इयामेक्टिन बेन्जोएट 18.5: / 250 मिली॰/हेक्टेअर 
क्लोरेनट्रेनिप्रिओल 18.5: / 200 मिली॰/हेक्टेअर

7. मूलग्रंथि सूत्रकृमि:

क्षति का स्वरूपः

भूमि में इस कीट की उपस्थिति के कारण टमाटर की जड़ों पर गांठें बन जाती हैं तथा पौधों की बढ़वार रूक जाती है एवं उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

गर्मी में गहरी जुताई करनी चाहिए जिससे जमीन में छिपे कीटों की अन्य अवस्था नष्ट हो जाए है.

खेत को खरपतवार से मुक्त रखें जिससे कीटों का प्रकोप कम होता है.

नियंत्रण हेतु रोपाई से पूर्व 25 किलो कार्बोफ्यूरान 3 जी प्रति हैक्टर की दर से भूमि में मिलावें.

रोग प्रबंध:

1. आर्द्र गलन: इस रोग के प्रकोप से पौधे का जमीन की सतह पर स्थित तने का भाग काला पड़ जाता है और नन्हें पौधे गिरकर मरने लगते हैं. यह रोग भूमि एवं बीज के माध्यम से फैलता है. नियंत्रण हेतु बीज को 3 ग्राम थाइरम या 3 ग्राम केप्टान प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोयें. नर्सरी में बुवाई से पूर्व थाइरम या केप्टान 4 से 5 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से भूमि में मिलावें. नर्सरी आसपास की भूमि से 4 से 6 इंच उठी हुई बनावें.

झुलसा रोग (अल्टरनेरिया): इस रोग से टमाटर के पौधों की पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं. यह रोग दो प्रकार का होता है.

अगेती झुलसा: इस रोग में धब्बों पर गोल छल्लेनुमा धारियाँ दिखाई देती हैं.

पछेती झुलसा: इस रोग से पत्तियों पर जलीय, भूरे रंग के गोल से अनियमित आकार के धब्बे बनते हैं जिसके कारण अन्त में पत्तियाँ पूर्ण रूप से झुलस जाती है.

नियंत्रण हेतु मैन्कोजेब 2 ग्राम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम या रिडोमिल एम जैड 3 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव करें.

पर्णकुंचन व मोजेक विषाणु रोग: पर्णकुंचन रोग में पौधों के सिकुड़कर मुड़ जाते हैं तथा छोटे व झुर्रीयुक्त हो जाते हैं. मोजेक रोग के कारण पत्तियों पर गहरे व हल्का पीलापन लिये हुए धब्बे बन जाते हैं. इन रोगों को फैलाने में कीट सहायक होते हैं. नियंत्रण हेतु बुवाई से पूर्व कार्बोफ्यूरान 3 जी 8 से 10 ग्राम प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से भूमि में मिलावें. पौध रोपण के 15 से 20 दिन बाद डाइमिथोएट 30 ई.सी. एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें. छिड़काव 15 से 20 दिन के अन्तर पर आवश्यकतानुसार दोहरावें. फूल आने के बाद उपरोक्त कीटनाशी दवाओं के स्थान पर मैलाथियान 50 ई.सी. एक मिलीलीटर प्रति लीटर कंे हिसाब से छिड़कें.

निष्कर्ष

कुछ वर्षो में टमाटर की फसल की उत्पादकता घटी है जिसमें कीट व रोग की अहम भूमिका रही है. कीटों व रोगों के प्रकोप के कारण पैदावार में कमी आ जाती है. इन षत्रु कीट व रोग को समुचित प्रबन्धन करके इस हाॅनि को रोका जा सकता है.

अभिषेक यादव1, पंकज बाथम1
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पीएच.डी छात्र कीट विज्ञान विभाग, स.व.प.कृ.प्रौ.वि. मेरठ-250110
Correspondance author- abhicoa2@gmail.com



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