1. खेती-बाड़ी

सतावर की खेती से कमाएं अधिक मुनाफा

हेमन्त वर्मा
हेमन्त वर्मा
Shatavar

Shatavar

सतावर एक बहुवर्षीय लता है. जिसे खेत के अलावा घरों तथा बगीचों में शोभाकारी पादप के रूप में भी लगाया जाता है. यह औषधीय पौधा होने के कारण भी अधिक महत्वपूर्ण है. इसके पत्ते काफी पतले तथा सुइयों जैसे नुकीले होते हैं. इनके साथ-साथ इनमें छोटे-छोटे कांटे भी लगते हैं. जो किन्हीं क़िस्मों में अधिक तथा किन्हीं में कम आते हैं. ग्रीष्म ऋतु में इसकी लता का ऊपरी भाग सूख जाता है तथा बरसात के मौसम में फिर से नई शाखाएं निकलती हैं. इन्हीं फलों से निकलने वाले बीजों को आगे बुवाई हेतु प्रयुक्त किया जाता है.

पौधे के मुख्य जड़ से सफेद ट्यूबर्स का गुच्छा निकलता है जिसमें हर साल वृद्धि होती रहती है. औषधीय उपयोग में मुख्यतः यही जड़ अथवा ट्यूबर्स का उपयोग किया जाता है. सितंबर-अक्टूबर महीने में इसमें गुच्छों में पुष्प आते हैं, इसके बाद उन पर मटर के दाने जैसे हरे फल लगते हैं. धीरे-धीरे ये फल पकने लगते हैं तथा पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं.

सतावर के प्रमुख औषधीय उपयोग (Major Medicinal Uses of Satavar)

  • शक्तिवर्धक के रूप में विभिन्न शक्तिवर्धक दवाईयों के निर्माण में सतावर का उपयोग किया जाता है.

  • यह सामान्य कमजोरी के साथ-साथ शुक्रवर्धन तथा यौन शक्ति बढ़ाने वाली औषधि भी है.

  • यह न केवल पुरुषों बल्कि महिलाओं के विभिन्न योनि दोषों के निवारण के साथ-साथ महिलाओं के बांझपन के इलाज हेतु भी प्रयुक्त किया जाता है.

  • महिलाओं में दूध बढ़ा़ने का काम भी करती है.

  • इंटरनल हैमरेज, गठिया, पेट के दर्द, मूत्र से संबंधित रोगों, गर्दन के अकड़न, पैरों के तलवों में जलन, हाथों तथा घुटने आदि के दर्द आदि के निवारण हेतु विभिन्न औषधियों के निर्माण में उपयोग में लाया जाता है.

जलवायु और मिट्टी (Climate and soil)

सतावर के लिए गर्म एवं आर्द्र जलवायु उत्तम मानी जाती है. मध्य भारत के साल वनों तथा मिश्रित वनों में उगाया जाता है. सतावर का मुख्य उपयोगी भाग जड़ें होती हैं जो लगभग 6 से 9 इंच गहरी तक जमीन में जाती है. इसलिए अधिक रेतीली जमीनों में भी इसकी अधिक उपज ली जा सकती है. जहां इसकी बुवाई की जाए वहाँ की मिट्टी नर्म और पोली होनी चाहिए. लेकिन मिश्रित मिट्टी में भी इसकी खेती की जा सकती है.

बुवाई की विधि (Sowing method)

नर्सरी में बुवाई के लिए सबसे पहले एक एकड़ खेत में बुवाई के लिए 100 वर्ग फीट जमीन पर नर्सरी लगाएं. नर्सरी की अच्छी तरह से जुताई करके लगभग 9 इंच से एक फीट ऊंची होनी चाहिए, ताकि बाद में पौधों को उखाड़ कर आसानी से ट्रांसप्लांटिंग की जा सके. मिड मई के समय में बीज नर्सरी में छिटक देते है. इसके लिए बीज की मात्रा 5 किलो रखी जाती है. एक क्यारी की चौड़ाई का साइज़ 1.5 मीटर और लम्बाई सुविधानुसार बनाई जा सकती है.

बीज छिड़कने के बाद गोबर खाद की मिश्रित मिट्टी को हल्की परत चढ़ा दी जाती है. जिससे बीज ठीक से ढक जाएं. इसके बाद पौधशाला के फव्वारे से हल्की सिंचाई कर दी जाती हैं. लगभग 10 से 15 दिनों में इन बीजों में अंकुरण शुरू हो जाता है. जब ये पौधे लगभग 40-45 दिनों के हो जाएं तो इन्हें मुख्य खेत में प्रतिरोपित (Transplanting) कर दिया जाता है. सतावर की बुवाई बीजों से भी की जा सकती है और पुराने पौधों के कन्दो से भी. कन्दो से बुवाई सीधे खेत में करके हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए.

खेत की तैयारी (Field preparation)

सतावर की खेती 24 माह से 40 माह की फसल के रूप में की जाती है इसलिए यह आवश्यक होता है कि प्रारंभ में खेत की अच्छी प्रकार से तैयारी की जाए. इसके लिए मई-जून के महीनें में खेत की गहरी जुताई करके उसमें 2 टन वर्मी कम्पोस्ट या 5 टन गोबर की सड़ी खाद को अंतिम जुताई के समय मिला दिया जाता है. खेत में 60-60 से.मी. की दूरी पर मेड़ें बना दी जाती है, जिसमें ही पौधों की रोपाई की जाती है. ये मेड़े 9-10 इंच ऊँची बना दी जाती हैं. सतावर एक लता है अतः इसके सही विकास के लिए आवश्यक है कि इसके लिए उपयुक्त आरोहरण (चढ़ाई) की व्यवस्था की जाए. इस काम के लिए मचान जैसी व्यवस्था भी की जा सकती है या प्रत्येक पौधे के पास लकड़ी के सूखे डंठल अथवा बांस के डंडे गाड़ दिए जाऐं ताकि सतावर की लताऐं उन पर चढ़कर सही विस्तार कर सकें.

सतावर की प्रमुख किस्में (Major varieties of Satavar)

एस्पेरेगस सारमेन्टोससा, ए.कुरिलससा, ए. गोनोक्लैडोससा, ए. एडसेंडेससा, ए.आफीसीनेलिसा, ए.प्लुमोससा, ए.फिलिसिनसा, ए.स्प्रेन्गेरी आदि किस्में है. इनमें से एस्पेरेगस एडसेन्डेसस को सफेद मूसली के रूप में पहचाना गया है. जबकि एस्पेरेगस सारमेन्टोसस को महाशतावरी के नाम से जाना जाता है. महाशतावरी की लता अपेक्षाकृत अधिक बड़ी होती है तथा इसमें कंद लंबे तथा संख्या में अधिक होते हैं. सतावर की एस्पेरेगस फिलिसिनस किस्म कांटा रहित होती है तथा मुख्यतया हिमालयी क्षेत्रां में पाई जाती है. सतावर की एक अन्य किस्म एस्पेरेगस आफीसीनेलिस मुख्यतया सूप तथा सलाद बनाने के काम आती है जिसकी बड़े शहरों में अच्छी माँग है. इनमें से औषधीय उपयोग में मुख्यतया एस्पेरेगस रेसीमोसस किस्म काम में ली जाती है.

खरपतवार नियंत्रण तथा निराई-गुड़ाई (Weed control and weeding)

सतावर के पौधों को खरपतवार से मुक्त रखना आवश्यक होता है इसके लिए हाथों से नियमित अंतरालों पर निराई-गुड़ाई की जाए.

सिंचाई की व्यवस्था (Irrigation management)

सतावर के पौधों को ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती. महीने में एक बार सिंचाई की व्यवस्था हो सके तो ट्यूबर्स या जड़ों का अच्छा विकास हो जाता है. वैसे कम पानी में भी सतावर की खेती की जा सकती है. गर्मियों के मौसम में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है इसके लिए नमी देख कर सिंचाई करते रहे.

जड़ों की खुदाई तथा उपज (Excavation of roots and yield)

24 से 40 माह की फसल हो जाने पर सतावर की जड़ों की खुदाई कर ली जाती है. खुदाई का उपयुक्त समय अप्रैल-मई माह का होता है जब पौधों पर लगे हुए बीज पक जाएं. तब ऐसी स्थिति में कुदाली की सहायता से सावधानीपूर्वक जड़ों को खोद लिया जाता है. खुदाई से पहले यदि खेत में हल्की सिंचाई देकर मिट्टी को थोड़ा नरम बना लिया जाए तो फसल को उखाड़ना आसान हो जाता है.

जड़ों को उखाड़ने के उपरान्त उनके ऊपर का छिलका उतार लिया जाता है. ऐसा चीरा लगाकर भी किया जाता सकता है. सतावर की जड़ों के ऊपर पाया जाने वाला छिलका जहरीला होता है. अतः इसे ट्यूबर्स से अलग करना आवश्यक होता है. छिलका उतारने का कार्य ट्यूबर्स उखाड़ने के तत्काल बाद कर लिया जाना चाहिए. यदि ट्यूबर्स थोड़ी सूख जाऐं तो छिलका उतारना मुश्किल हो जाता है. ऐसी स्थिति में इन्हें पानी में हल्का उबालना पड़ता है तथा इसके बाद ठंडे पानी में थोड़ी देर रखने के बाद ही इन्हें छीलना संभव हो पाता है. छीलने के उपरान्त इन्हें छाया में सुखा लिया जाता है. सतावर की फसल से प्रति एकड़ लगभग 25 किंवटल सूखी जड़ों का उत्पादन प्राप्त होता है.

लागत व मुनाफा (Cost and profits)

एक एकड़ में लगभग 80 हजार से एक लाख रुपए का खर्च आ जाता है. 20 हजार से 30 हजार रुपए क्विंटल का बाजार में रेट शतावर का होता है तथा दो लाख से तीन लाख तक का मुनाफा हो जाता है. सतावर की खेती में कीट और बीमारी नहीं लगते जिससे खर्चा कम हो जाता है. शुरुआत के 2-3 महीने इसे बचाना होता है, क्‍योंकि इसमें कांटे नहीं होते. बाद में इसमें कांटे आ जाते हैं तो जानवर भी इसे नहीं खाते.

कहाँ संपर्क करें (Where to contact)

केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (CSIR-Central Institute of Medicinal and Aromatic Plants) P.O-CIMAP, कुकरेल पिकनिक स्पॉट के पास, लखनऊ-226015 जाकर संपर्क किया जा सकता है या Ph:91- 522-2718595, Ph:91- 522-2718629 Email: a.krishna@cimap.res.in पर भी बात की जा सकती है.

English Summary: Earn more profits from the cultivation of Asparagus

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